विवाह-विच्छेद (तलाक)

आजकल कुछ लोग इस प्रयत्नमें हैं कि हिन्दू-नारीको कानूनद्वारा विवाह-विच्छेदका अधिकार प्राप्त हो। जो लोग इस समय हिन्दू-विवाह सम्बन्धी नये कानून बनाना चाहते हैं, उनकी नीयतपर सन्देह करनेका कोई कारण नहीं है। जहाँतक अपना अनुमान और ज्ञान है, यह कहा जा सकता है कि वे सज्जन सचमुच ही भारतीय हिन्दू नारीकी कल्याणकामनासे ही इस प्रकारका प्रयत्न कर रहे हैं। उनके सामने ऐसे प्रसंग आये और आते रहते हैं, जिनके कारण उनके मनमें यह बात धँस गयी है कि कानूनमें परिवर्तन हुए बिना हिन्दू-स्त्रियोंपर जो सामाजिक अत्याचार होते हैं, उनका अन्त नहीं होगा। ऐसे विचारवाले सज्जन यह कहते हैं और उनके दृष्टिकोणसे ऐसा कहना ठीक भी है कि आदर्शवाद ऊँची चीज है, परंतु उसका प्रयोग इस युगमें सम्भव नहीं है, फिर आदर्शवादका प्रयोग केवल नारी-जातिके लिये ही क्यों हो? पुरुषोंके प्रति क्यों न हो? पुरुष चाहे जैसा चाहे जितना अनाचार, स्वेच्छाचार, व्यभिचार और अत्याचार करे, कोई आपत्ति नहीं, वह सर्वथा स्वतन्त्र है, परंतु सारे नियम, सारे बन्धन केवल स्त्रीके लिये हों—यह चल नहीं सकता। ऊँचे आदर्शकी चिल्लाहट मचानेसे काम नहीं चलेगा। इस प्रकार चिल्लाहट मचानेवालोंमें कितने ऐसे हैं जो स्वयं आदर्शकी रक्षा करते हैं, फिर इस युगमें पुराने आदर्शके अनुसार चलना भी सम्भव नहीं है। युगधर्मके अनुसार परिवर्तन करना ही पड़ेगा। पुरानी लकीरको पकड़े रहना तो पागलपन है आदि।

इसमें संदेह नहीं कि पुरुषोंके द्वारा कहीं-कहीं अपने घरकी स्त्रियोंके प्रति तथा विधवा बहिनोंके प्रति ऐसे-ऐसे अमानुषिक अत्याचार होते हैं, जिनको देख-सुनकर सहृदय पुरुषका मन प्राचीन प्रथाके प्रति विद्रोह कर उठता है और वह स्वाभाविक ही हर उपायसे ऐसे अत्याचारोंको रोकनेका प्रयास करता है; परंतु इस प्रकार सुधारकी वास्तविक इच्छा होनेपर भी वे सज्जन यह नहीं विचारते कि ‘इस समय यदि कुछ लोग झूठ बोलते और उसमें सुविधाका अनुभव करते हैं तो यह नहीं कहा जा सकता कि झूठ बोलना ही उचित है सत्यको छोड़ देना चाहिये; बल्कि यह कहना संगत होगा कि सत्य-भाषण और सत्य-पालनमें युगके प्रभावसे या हमारी कमजोरीसे जो अड़चनें पैदा हो गयी हैं, उन्हें दूर करनेका प्रयत्न करना चाहिये।’ यही वास्तविक सुधार है। कुछ लोग आदर्शकी रक्षा नहीं करते, इसलिये आदर्शके त्यागका आदेश न देकर आदर्शको सर्वथा छोड़ देनेकी चेष्टा न करके जो लोग आदर्शकी रक्षा नहीं कर सकते उनके लिये उसकी रक्षा कर सकनेयोग्य मनोवृत्ति और परिस्थिति उत्पन्न कर देना—तमाम अड़चनोंको मिटा देना—यही कर्तव्य है।

परंतु ऐसा न करके, एक आँख फूट गयी है तो दूसरी भी फोड़ दो—इस नीतिके अनुसार कुछ लोग आदर्शकी रक्षा नहीं कर रहे हैं, इसलिये जो कर रहे हैं उनके लिये भी उसका दरवाजा बन्द कर दो—आदर्शको रहने ही न दो—यह कहना वस्तुत: प्रमाद है, तथापि ऐसा कहा जा रहा है। इसका कारण किसीकी नीयतका दोष नहीं। इसमें प्रधान कारण है—आधुनिक सभ्यताका प्रभाव तथा विजातीय आदर्शको लेकर निर्माण की हुई आधुनिक शिक्षा। इसीका यह परिणाम हुआ है कि हमारी अपनी संस्कृतिके प्रति—अपनी प्राचीन प्रथाओंके प्रति हमारी दोष-बुद्धि दृढ़मूल हो गयी है। इसीसे हिन्दुस्तानका सच्चे हृदयसे कल्याण चाहनेवाले उच्च स्थितिके बड़े पुरुष भी इस विचारधाराके कारण बात-बातमें विदेशी संस्कृतिकी प्रशंसा करते हैं और अपनी संस्कृतिकी निन्दा। सचमुच आज अपनी सभ्यतामें हमारी अश्रद्धा और अनास्था तथा पश्चिमीय सभ्यतामें हमारी श्रद्धा और आस्था इतनी बढ़ गयी है कि हम आज वहाँके दोषोंको भी गुण समझकर ग्रहण करनेके लिये आतुर हैं। हमें अपने-आपपर इतनी घृणा हो गयी है कि हमारी प्रत्येक प्राचीन प्रथामें हमें तीव्र दुर्गन्ध आने लगी है, हम उससे नाक-भौंह सिकोड़ने लगे हैं और इधर हमारी मानसिक गुलामी इतनी बढ़ गयी है कि दूसरे लोग जिसको अपना दोष मानकर उससे मुक्त होनेके लिये छटपटा रहे हैं, हम उसीको गुण मानकर उसका आलिंगन करनेको लालायित हैं। इसीसे आजका प्रगतिशील भारतीय तरुण परदेशी सभ्यताकी निन्दा करता हुआ भी पर-पदानुगामी, परानुकरण-परायण, परभावापन्न और पर-मस्तिष्कके सामने नत-मस्तक होकर उन्नति और विकासके नामपर अपनेको महान् विनाशकारी आगमें झोंक रहा है।

पाश्चात्य जगत‍्के मनीषीगण समाजका अध:पतन होता देखकर जिन चीजोंको समाजसे निकालना चाहते हैं, हमारे शिक्षित प्रगतिमान् भारतीय उसीको ग्रहण करनेके लिये व्याकुल हैं। कुछ समय पूर्व ईसाई-जगत‍्के धर्माचार्य रोमके पोपने कहा था—‘यूरोपमें तलाककी संख्या बहुत जोरोंसे बढ़ रही है, विद्यार्थियोंका ईश्वरविश्वास घट रहा है और अश्लील नाटकोंका प्रचार बढ़ रहा है। यह बहुत बुरी बात है।’ सुधारवादियोंके नक्‍कारखानेके सामने बेचारे पोपकी यह तूतीकी क्षीण आवाज किसीके कानमें क्यों जाने लगी?

विवाह-विच्छेदकी आलोचना करती हुई विदुषी अंग्रेज महिला श्रीमती एन० मैकिट्स एम० ए० ने लिखा है—

‘सभी युगोंमें नर-नारियोंके जीवनके दो प्रधान अवलम्बन रहे हैं, एक विवाह और दूसरा घर। वर्तमान युगमें ये दोनों ही अवलम्बन डाईवोर्स (तलाक) नामक अमंगलकारी प्रेतके प्रभावसे तमसाच्छन्न हो गये हैं। इस प्रेतने नर-नारियोंके हृदयोंको भयसे भर दिया है। तलाकसे समाजका सर्वनाश होता है और यह समाजहितके सर्वथा प्रतिकूल है, इस बातको अनेक युक्तियोंसे सिद्ध किया जा सकता है। इसमें एक युक्ति तो यह है कि तलाकसे घर टूट जाता है और परिवार नष्ट हो जाता है। विवाहका प्रधान उद्देश्य है—सन्तानोत्पादन। इस उद्देश्यकी पूर्तिके लिये पारिवारिक बन्धनकी आवश्यकता है। यदि पति-पत्नी मृत्युकालतक एक-दूसरेके प्रति पूरा विश्वास रखकर दाम्पत्य-बन्धन सुदृढ़ न बनाये रखें तो उपर्युक्त उद्देश्यकी सिद्धि नहीं हो सकती।’

आजकल स्वतन्त्र प्रेम (free-love) की नयी रीति चली है। इसके अनुसार आधुनिक नर-नारी विवाह-बन्धनको शिथिल करके ‘कामज-प्रेम’ के स्वाभाविक अधिकारकी निर्बाध स्थापना करना चाहते हैं। इस नयी व्यवस्थाके परिणामस्वरूप मनुष्यकी वंशवृद्धि तो चलेगी, परंतु चलेगी बिलकुल स्वतन्त्र पद्धतिसे। पितृत्व और मातृत्वकी धारणा लुप्त हो जायगी और बच्चोंका दल कीट-पतंगोंकी तरह पलेगा। सब समान हो जायँगे। उनमें रहेगा न व्यक्तित्व और न रहेगी किसी उद्देश्यकी विशिष्टता ही.............।

डॉक्टर डेनेवल महोदयने लिखा था—‘हमारी समझमें विवाहसे तात्पर्य है दायित्वका वहन या बन्धन। इसमें दायित्वशून्यता या निर्बाध स्वतन्त्रताका कोई भी संकेत हम नहीं पाते। बन्द घर निरापद और शान्तिमय होता है। दरवाजा खुला रहनेपर उसमें चोर-डकैत आ सकते हैं और भी तरह-तरहके उत्पात, उपद्रव आकर घरकी शान्तिको भंग कर सकते हैं। यह बन्धनका सुख है। जिस घरका दरवाजा चौपट है, वह घर नहीं, वह तो सराय है।’

‘विवाहके साथ ही यदि विवाह-विच्छेदका खुला द्वार छोड़ दिया जाय तो स्त्री-पुरुष दोनोंकी कोई विशिष्टता नहीं रह सकेगी। फिर तो विवाह और विच्छेद तथा नित्य नयी-नयी जोड़ीका निर्माण—यह तमाशा चलता रहेगा...........।’

‘पाश्चात्य समाजमें विवाह एक प्रकारका शर्तनामा (Contract) होनेपर भी उसमें यह स्पष्ट निर्देश रहता है कि यह सम्बन्ध मृत्युकाल- तकके लिये है—till breath us do part’ यदि आरम्भसे ही पति-पत्नीके मनोंमें यह धारणा जाग्रत् रहेगी कि जब चाहे तभी मिलन टूट सकता है, तब तो देह-मनको शुद्ध रखना बहुत ही कठिन होगा। फिर प्रेम-स्नेहकी दुहाई कोई नहीं मानेगा और फिर कौन किसके बच्चे-बच्चियोंको पालेगा।......... विवाह-विच्छेदकी बातके साथ ही पुनर्विवाहकी बात भी चित्तमें आ ही जाती है। इस पुनर्विवाहकी, चाहे जिसको देहसमर्पणकी कल्पनासे यदि सुसंस्कृत (Cultured) मनमें विद्रोह नहीं पैदा होगा तो फिर मनकी इस संस्कृतिका गौरव ही क्या है। फिर तो विवाह कानून-सम्मत एक रखेली रखनेका रूप (Legalized form of concubinage) होगा।

प्रेम और काममें बड़ा अन्तर है। प्रेममें त्याग है, उत्सर्ग है, बलिदान है। मनुष्य-जीवनकी पूर्ण परिणति प्रेमसे ही होती है। प्रेम त्यागस्वरूप है, उत्सर्गपरायण है। काम विषयलुब्ध है, भोगपरायण है। जहाँ केवल निजेन्द्रिय-सुखकी इच्छा है, वहाँ ‘काम’ है, चाहे उसका नाम प्रेम हो। वस्तुत: उसमें प्रेमको स्थान नहीं है। पशुमें प्रेम नहीं होता। इसीसे उनका दाम्पत्य क्षणिक भोग-विलासकी पूर्तिमें ही समाप्त हो जाता है । इसीसे कामको ‘पाशविक वृत्ति’ कहा जाता है। मनुष्यमें प्रेम है, इसलिये उसमें क्षणिक लालसा-पूर्ति नहीं है। वह नित्य है, शाश्वत है। विवाह उत्सर्ग और प्रेमका मूर्तिमान् स्वरूप है। इसीसे विवाह-बन्धन भी नित्य और अच्छेद्य है। जहाँ विवाह-विच्छेदकी बात है, वहाँ तो मनुष्यके पशुत्वकी सूचना है। विवाहमें जहाँ विच्छेदकी सम्भावना आ जाती है, वहीं नर-नारीका पवित्र और मधुर सम्बन्ध अत्यन्त जघन्य हो जाता है। फिर मनुष्य और पशुमें कोई भेद नहीं रह जाता। विवाह-विच्छेदकी प्रथा चलाना मानवताको मारकर उसे कुत्ते-कुतियाके रूपमें परिणत कर देना है!!

हिन्दू-विवाह दूसरी जातियोंकी भाँति कोई शर्तनामा नहीं है, पवित्र धर्म-संस्कार है। एक महायज्ञ है, स्वार्थ इसकी आहुति है और नैष्कर्म्यसिद्धि या मोक्ष इसका परम धन है। यज्ञकी पवित्र अग्निसे इसका आरम्भ होता है, परंतु श्मशानकी चिताग्नि भी इस बन्धनको तोड़ नहीं सकती। त्यागद्वारा प्रेमकी पवित्रताका संरक्षण करना और प्रेमको उत्तरोत्तर उच्च स्थितिपर ले जाना विवाहका महान् उद्देश्य है। प्रेम, स्नेह, प्रीति, अनुराग, मैत्री, मुदिता, करुणा आदि पवित्र और मधुर भाव मनुष्य-जीवनकी परम लोभनीय सम्पत्ति है। इस परम सम्पत्तिकी रक्षा होती है त्याग, क्षमा, सहनशीलता, धैर्य और सेवा आदि सद‍्वृत्तियोंके द्वारा और इन्हींसे इन भावोंकी वृद्धि भी होती है।

हिन्दू-विवाह-संस्कारमें पति-पत्नीकी यह निश्चित धारणा होती है कि हमारा यह सम्बन्ध सर्वथा अविच्छिन्न है। जन्म-जन्मान्तरमें भी यह कभी नहीं टूट सकता। ऐसी ही प्रार्थना और कामना भी की जाती है। इसलिये कभी किसी कारणवश यदि किसी बातपर परस्पर मतभेद हो जाता है अथवा आपसमें झगड़ा भी हो जाता है तो वह बहुत समयतक टिकता नहीं। त्याग, क्षमा, सहिष्णुता, धैर्य आदि वृत्तियाँ दोनोंके मनोंको शीघ्र ही सुधारकर कलह शान्त करा देती हैं; अतएव प्रेम अक्षुण्ण बना रहता है। जीवनमें दु:खके दिन अधिक कालतक स्थायी नहीं होते, क्योंकि पति-पत्नी दोनोंको ही एक-दूसरेसे मेल करनेकी इच्छा हो जाती है। ‘हम दोनों जीवनभरके संगी हैं, यह धारणा अत्यन्त दृढ़ होनेके कारण पारस्परिक विश्वास और प्रेम केन्द्रीभूत हो जाते हैं। और किसी प्रकार किसी कारणवश सामान्य उत्तेजना, जोश, क्रोध या अविश्वासके उदय होनेपर सहसा ऐसा कोई कार्य प्राय: नहीं होता, जिससे सम्बन्ध टूट जाय।

उत्तेजना, जोश या क्रोध आदिका कार्य यदि उसी समय नहीं हो जाता, बीचमें कुछ समय मिल जाता है तो फिर उनकी शक्ति क्षीण हो जाती है, जितनी ही देर होती है उतना ही उनका आवेग घटता है। कुछ समय बाद तो वे सर्वथा नष्ट हो जाते हैं। परंतु यदि विच्छेदका दरवाजा खुला हो तो जहाँ जोश आया और जोशके जोरसे होश गया कि वहीं सम्बन्ध टूट गया—तलाक कर दिया गया। इसीसे अमेरिका-जैसे देशमें प्रतिवर्ष लगभग सात-आठ लाख तलाकके मामले होते हैं और उत्तरोत्तर इनकी संख्या बढ़ रही है। रूसमें तो आज विवाह, कल तलाक—यही खेल चल रहा है! हमारे यहाँ विवाह-बन्धनके कारण स्त्री-पुरुष पारिवारिक जीवनमें इतने बँध जाते हैं कि कभी सामयिक उत्तेजनाके कारण अलग होनेकी इच्छा होती भी है तो वैसा सहजमें हो नहीं पाता। इससे पारिवारिक संघटन टूटता नहीं।

साथ ही, जब विवाह होते ही पत्नी-पति दोनोंको यह निश्चय हो जाता है कि यह मेरा पति है और यह मेरी पत्नी है, हम दोनोंका यह प्रेममय पवित्र सम्बन्ध नित्य और अटूट है तब दोनोंके मन केन्द्रीभूत हो जाते हैं। इसलिये उनके मनोंके लिये अन्य किसी ओर जानेकी सम्भावना ही नहीं रहती। कोई कितना ही सुन्दर आकर्षक और गुणवान् स्त्री-पुरुष क्यों न हों, ‘उनसे अपना क्या काम’—यह भावना दृढ़ रहती है। ऐसी अवस्थामें नर-नारीके अबाध मिलनकी बात दूर रही, पर-स्त्री या पर-पुरुषके चिन्तनको उन्हें कामलोलुप दृष्टिसे एक बार देखनेमात्रको भी महान् पाप माना जाता है तथा प्राय: भले नर-नारी इस पापसे बचनेका प्रयत्न भी करते रहते हैं। पाश्चात्य देशोंमें ऐसी बात नहीं है। वहाँ व्यभिचारकी संख्या बहुत संकुचित है। नर-नारीके शारीरिक मिलनको वे स्वाधीनता मानते हैं, व्यभिचार नहीं। इसीसे इस स्वाधीनताका उपभोग करनेके लिये वे लालायित रहते हैं। इसीका नाम उनके यहाँ ‘स्वतन्त्र प्रेम’ (free Love) है। विवाह-बन्धनसे इस पापमें स्वाभाविक ही रुकावट होती है; और विवाह-विच्छेदसे इस पापको प्रोत्साहन मिलता है। अतएव तलाकका कानून बन जानेपर, अन्य कारण न होनेपर भी बहुत-से विवाह-विच्छेदके मामले तो केवल इसी निमित्तसे होने लगेंगे।*

विवाहित स्त्री-पुरुषके पारस्परिक व्यवहारके सम्बन्धमें आलोचना करती हुई श्रीमती राबिन्सन् कहती हैं—‘हिस्सेदारीके कारबारमें जैसे हिस्सेदारों (Copartners) को एक-दूसरेको मानकर चलना पड़ता है—मौज या मनमानी करनेसे कारबार नहीं चलता, वैसे ही पति-पत्नीके हिस्सेदारीमें घरका भी नियम है। दोनों एक-दूसरेसे मिलकर सलाह करके काम करेंगे तो घरका व्यापार सुचारुरूपसे चलेगा। यही विवाहका मुख्य उद्देश्य है, क्योंकि इस सहयोगितापर ही दोनोंकी सुख-शान्ति निर्भर है! एक-दूसरेके दोषों या भूलोंको क्षमाकी आँखोंसे देखकर चलनेसे ही हिस्सेदारी निभती है। नहीं तो उसका विच्छेद अवश्यम्भावी है। इस सहयोगिताको जिस पवित्र वृत्तिसे पोषण मिलता है, उसीका नाम है प्रेम, प्रीति या अनुराग। मनमानी तृप्ति या स्वेच्छाचारके सुखको ही जीवनका उद्देश्य बना लेनेपर तो परिणाममें क्षोभ और पश्चात्ताप ही प्राप्त होगा। अतएव पति-पत्नीको परस्पर एक-दूसरेकी सहकर चलना चाहिये। स्वतन्त्रता या स्वेच्छाचारको सिर नहीं चढ़ाना चाहिये।

इस सहयोगिताके भावोंकी रक्षा जिस प्रेमसे होती है, विवाह-विच्छेदका मार्ग खुला रहनेपर विवाहमें उस प्रेमकी उत्पत्ति ही रुक जायगी। फिर सहयोगिता कहाँसे होगी? सहयोगिता न होनेपर तलाककी संख्या उत्तरोत्तर बढ़ेगी ही। यूरोपमें यही हो रहा है और इसीसे वहाँका समाज आज अशान्ति और अनाचारका घर बना हुआ है। विवाह-विच्छेद होने तथा स्त्रीका दूसरे पुरुषसे और पुरुषका दूसरी स्त्रीसे विवाह होनेपर पहलेके बच्चे अनाथ हो जायँगे। स्त्रियोंमें मातृत्वकी जो महान् वृत्ति है और पितामें जो पितृत्वका पवित्र भाव है, वे क्रमश: नष्ट हो जायँगे। फिर तो बच्चोंका पोषण या तो रूसकी भाँति राज्य करेगा या उनकी दुर्दशा होगी।

अमेरिकाके भूतपूर्व प्रेसीडेंट रूजवेल्ट महोदयने अपनी जीवन स्मृतिमें कहा है—‘मेरी उम्र उस समय दस वर्षकी थी। मैं बीमार था। बिछौनेपर पड़ा पुस्तककी तस्वीर देखा करता। बगलमें बैठी हुई माँ मुझे तस्वीरोंका भाव समझाया करती। मुझे बड़ा अच्छा लगता, नींद नहीं आती तो मेरी माँ मेरे मुँह-में-मुँह देकर मुझे सान्त्वना देती। पिता और माता दोनों ही मुझे लेकर व्यस्त रहते। कितनी कहानियाँ कहते। कहानियाँ—वह माता-पिताका स्नेह । उस स्नेहने ही मेरे सारे कष्टोंको मिटा दिया। यदि ऐसा न होता, यदि मुझ बीमारको बिछौनेपर फेंक दिया जाता और दो-तीन नर्सोंपर मेरा भार देकर मेरे माँ-बाप बाहर चले गये होते—पार्टीमें, नाटकमें, सान्ध्य-भोजनमें या राजनीतिक आलोचना-समितिमें—तो यह विचार करते ही मेरा शरीर काँप जाता है—फिर मेरा न जाने क्या होता। फिर रूजवेल्टके पलटनेकी कोई आशा नहीं रहती।’

मातृत्व और पितृत्वकी भावना नष्ट होनेपर समाजकी कैसी भयानक स्थिति हो सकती है, इसकी कल्पनासे ही हृदय काँप जाता है।

तलाकका कानून बना तो वह केवल स्त्रीके लिये ही नहीं होगा, पुरुषके लिये भी होगा और ऐसा होनेपर अधिक हानि स्त्री-जातिकी ही होगी; क्योंकि भारतवर्षमें अबतक भी स्त्री-जातिका पुरुषकी अपेक्षा बहुत कम पतन हुआ है! स्त्रियाँ पतिको तलाक देने बहुत कम आवेंगी—पुरुष बहुत अधिक आवेंगे। अतएव किसी भी दृष्टिसे तलाकका कानून श्रेयस्कर नहीं है। इसमें सब प्रकारसे हानि-ही-हानि है। इसलिये प्रत्येक नर-नारीको इसका विरोध करना चाहिये। पर दु:खकी बात है, आज भारतका शिक्षित नारी-समाज पतनको ही उत्थान मानकर ‘तलाक’ कानूनके लिये लालायित हो रहा है।

हिन्दू-शास्त्रके अनुसार सतीत्व परम पुण्य है और पर-पुरुष-चिन्तनमात्र महापाप है। इसीलिये आज इस गये-गुजरे जमानेमें भी स्वेच्छापूर्वक पतिके शवको गोदमें रखकर सानन्द प्राण-त्याग करनेवाली सतियाँ हिन्दूसमाजमें मिलती हैं। भारतवर्षकी स्त्री-जातिका गौरव उसके सतीत्व और मातृत्वमें ही है। स्त्री-जातिका यह गौरव भारतका गौरव है। अत: प्रत्येक भारतीय नर-नारीको इसकी रक्षा प्राणपणसे करनी चाहिये।