विवाहका महान् उद्देश्य और विवाहकाल

मनुष्योंमें पशुकी भाँति यथेच्छाचार न हो, इन्द्रियलालसा और भोगभाव मर्यादित रहें, भावोंमें शुद्धि रहे, धीरे-धीरे संयमके द्वारा मनुष्य त्यागकी ओर बढ़े, सन्तानोत्पत्तिके द्वारा वंशकी रक्षा और पितृऋणका शोध हो, प्रेमको केन्द्रीभूत करके उसे पवित्र बनानेका अभ्यास बढ़े, स्वार्थका संकोच और परार्थ-त्यागकी वृद्धि जाग्रत् होकर वैसा ही परार्थ-त्यागमय जीवन बने—और अन्तमें भगवत्प्राप्ति हो जाय। इन्हीं सब उद्देश्योंको लेकर हिन्दू-विवाहका विधान है। विवाह धार्मिक संस्कार है, मोक्ष-प्राप्तिका एक सोपान है। इससे विलास-वासनाका सूत्रपात नहीं होता, बल्कि संयमपूर्ण जीवनका प्रारम्भ होता है। इसीसे विवाहमें अन्य विषयोंके विचारके साथ-साथ कालका भी विचार किया गया है। इसमें सर्वप्रधान एक बात है—वह यह कि कन्याका विवाह रजोदर्शनसे पूर्व हो जाना चाहिये। रजोदर्शन सब देशोंमें एक उम्रमें नहीं होता। प्रकृतिकी भिन्नताके कारण कहीं थोड़ी उम्रमें हो जाता है तो कहीं कुछ बड़ी अवस्था होनेपर होता है। अतएव उम्रका निर्णय अपने देश-कालकी स्थितिके अनुसार करना चाहिये, परंतु रजोदर्शनके पूर्व विवाह हो जाना आवश्यक है।

रजोदर्शन प्रकृतिका एक महान् संकेत है। इसके द्वारा स्त्री गर्भ-धारणके योग्य हो जाती है और इसी कारण ऋतुकालमें स्त्रियोंकी काम-वासना बलवती हुआ करती है और वह पुरुष-सम्बन्धकी इच्छा करती है। इसी स्वाभाविक वासनाको केन्द्रीभूत करनेके लिये रजस्वला होनेसे पूर्व विवाहका विधान किया गया है। स्वामीके आश्रयसे स्त्रीकी काम-वासना इधर-उधर फैलकर दूषित नहीं हो पाती, पर विवाह न होनेकी हालतमें वही वासना अवसर पाकर व्यभिचारके रूपमें परिणत हो जाती है, जैसा कि आजकल यूरोपमें हो रहा है। वहाँ कुमारी माताओंकी संख्या जिस प्रकार बढ़ रही है, उसको देखते यह कहना पड़ता है कि वहाँ सतीत्व या तो है ही नहीं और यदि कुछ बचा है तो वह शीघ्र ही नष्ट हो जायगा!

रजस्वला होनेपर स्त्रीको पुरुष-प्राप्तिकी जो इच्छा होती है, वह उसे बलात् पुरुष-दर्शन करवाती है। उस समय यदि पतिके द्वारा अन्त:करण सुरक्षित नहीं होता तो उसके चित्तपर अनेकों पुरुषोंकी छाया पड़ती है, जिससे उसका आदर्श सतीत्व नष्ट हो जाता है। ऋतुमती स्त्रीके चित्तकी स्थिति ठीक फोटोके कैमरेकी-सी होती है। ऋतुस्नान करके वह जिस पुरुषको मनसे देखती है, उसकी मूर्ति चित्तपर आ जाती है। इसीलिये ऋतुकालसे पहले ही विवाह हो जाना अत्यन्त आवश्यक है। आदर्श सती वही है, जो या तो पतिके सिवा किसीको पुरुषरूपमें देखती ही नहीं और यदि देखती है तो पिता, भ्राता या पुत्रके रूपमें; पर ऐसा देखनेवाली भी मध्यम श्रेणीकी पतिव्रता मानी गयी है—

उत्तम के अस बस मन माहीं।

सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥

मध्यम परपति देखइ कैसें।

भ्राता पिता पुत्र निज जैसें॥

यह तभी सम्भव है, जब ऋतुकालके पूर्व विवाह हो चुका हो और वह ऋतुकालमें पतिके संरक्षणमें रहे।

साधारणतया विवाहके समय कन्याकी उम्र तेरह और वरकी कम-से-कम अठारह वर्ष होनी चाहिये। विवाह करना आवश्यक है और वह भी बहुत बड़ी उम्र होनेके पहले ही कर लेना चाहिये।