वृद्धा माताकी शिक्षा

माताकी अवस्था सत्तर वर्षसे कम नहीं है। उन्हें जब देखिये किसी काममें लगी हैं। कोई जाता है तो एक बार नेहभरी नजरसे देखकर मुसकरा देती हैं। कभी-कभी पूछ देती हैं—क्यों कैसे आये? प्रात:काल एक मील जाकर गंगास्नान भी कर आती हैं। पूजाके दिनोंमें ठाकुरजीके लिये प्रसाद भी अपने हाथोंसे ही बनाती हैं। शिवरात्रिके दिन चौबीस घण्टे लगातार काम करते मैंने अपनी आँखोंसे देखा है। दोपहरके बाद गाँवकी कई स्त्रियाँ उनके पास आ जाती हैं। वे हिन्दी न जाननेपर भी अपनी मातृभाषामें उनके उत्तर देती हैं। मैं उनका पता नहीं बताऊँगा—परंतु बातें उनकी ही लिखूँगा।

प्रश्न—हम स्त्रियोंको किसकी पूजा करनी चाहिये?

उत्तर—पूजा करनेयोग्य तो एकमात्र भगवान् ही हैं।

प्रश्न—भगवान‍्की किस मूर्तिकी पूजा करनी चाहिये?

उत्तर—स्त्रियोंके लिये तो भगवान‍्की मूर्ति दूसरी ही प्रकारकी निश्चित है। जैसे और लोगोंके लिये वैदिक और पौराणिक मन्त्रोंद्वारा भाँति-भाँतिकी मूर्तियोंमें भगवान‍्की प्रतिष्ठा—स्थापना होती है, वैसे ही स्त्रियोंके लिये विवाहके समय ‘वर’ में भगवान‍्की प्रतिष्ठा होती है। कन्याका समर्पण वररूपी विष्णुको होता है।

वरोऽसौ विष्णुरूपेण प्रतिगृह्णात्वयं विधि:।

इसलिये विवाहिता स्त्रियोंके लिये अपने पतिदेव ही भगवान् हैं। भगवान‍्की इसी मूर्तिकी उपासना करना स्त्रियोंका धर्म है।

प्रश्न—तब क्या स्त्रियोंको भगवान‍्की दूसरी मूर्तिकी पूजा नहीं करनी चाहिये?

उत्तर—दूसरी मूर्तियोंकी पूजाका निषेध नहीं है। हाँ, किसी-किसी मूर्तिकी पूजाका तो निषेध भी है, परंतु दूसरी मूर्तियोंकी पूजा भी पतिदेवकी प्रसन्नता और सुखके लिये ही करनी चाहिये। उनसे भी यही प्रार्थना करनी चाहिये कि पतिदेवके चरणोंमें मेरा विशुद्ध प्रेम हो। पूजा भी उसी देवताकी होनी चाहिये, जिसमें पतिदेवकी अनुमति हो। इसलिये पतिपूजा ही स्त्रियोंका प्रधान धर्म है।

प्रश्न—जो फल भगवान‍्की पूजासे मिलता है, क्या वही फल पति-पूजासे भी मिल सकता है?

उत्तर—भगवान‍्की पूजामें भावकी प्रधानता है। मूर्ति-पूजा करते समय यदि यह भाव बना रहे, यह भगवान‍्की पूजा है तो पूजाका पूरा फल मिलता है। इसी प्रकार पतिदेवकी सेवा करते समय यदि यह याद रहे कि मैं भगवान‍्की सेवा कर रही हूँ और यह सोचकर प्रत्येक कार्य करते समय हृदय आनन्द, उछाह और चाहसे भरा रहे तो यह साक्षात् भगवान‍्की पूजा ही है। पुरुषके जीवनकी अपेक्षा स्त्रीके जीवनमें इसके लिये ज्यादा सुभीता है। यदि पतिदेवमें भगवान् होनेकी भावना निरन्तर न रहे तो बार-बार उसे स्मरण रखनेकी चेष्टा करनी चाहिये। थोड़े ही दिनोंमें वह भावना दृढ़ हो जायगी और जीवन आनन्दमय हो जायगा। यदि भगवान‍्की भावना न हो तो अपने स्वामीके रूपमें ही उनकी सेवा और आज्ञापालन करना चाहिये। दूसरे देवताओंकी पूजासे जो लाभ होता है वह पतिको भगवान् जाने बिना भी उनकी पूजा करनेसे होता है।

प्रश्न—आजकल तो स्त्रियोंकी प्रवृत्ति इसके विपरीत ही देखी जाती है, इसका क्या कारण है?

उत्तर—आजकल देशमें जिस शिक्षा और आदर्शका प्रचार हो रहा है, उसका आधार धार्मिक भाव नहीं है। वह एक ऐसे देश और जातिकी नकल है, जिसमें भगवान‍्की पूजा और अपने असली कल्याणपर नजर ही नहीं रखी जाती। उनका लक्ष्य भौतिक सुख है और वे केवल मनको अच्छे लगनेवाले इन्द्रियोंके भोगोंमें ही लगे हुए हैं। वे जो कुछ करते हैं उसमें अधिकांश धर्मभावनाके विपरीत ही होता है। यही कारण है कि उन देशोंमें प्राय: सतीधर्मका अभाव देखा जाता है। परिवारमें अशान्ति, घरमें अशान्ति और पति-पत्नीमें अशान्ति, बात-बातपर तलाक और मुकदमेबाजी—यह उनकी सभ्यताका लक्षण है। यह सब झगड़ा भगवान‍्को भूलने और उस भावनाको छोड़ देनेका फल है। हिन्दू-स्त्रियोंके लिये उनका अनुकरण—न केवल स्त्रियोंके लिये बल्कि समस्त धार्मिक समाज, मानव-समाजके लिये घातक है; परंतु आज परलोक और परिणामपर कौन दृष्टि डालता है। लोग क्षणिक सुखकी ओर ही देखते हैं, ऊपर-ही-ऊपर देखते हैं। यही कारण है कि आजकल स्त्रियोंकी प्रवृत्ति भी दूसरी ही ओर हो रही है।

प्रश्न—इससे रक्षा कैसे हो?

उत्तर—धर्मभावनाकी वृद्धि ही एकमात्र रक्षाका उपाय है। धर्मकी पूर्णता सब जगह भगवान‍्के दर्शनमें है। एक जगह दृढ़ भावनासे ही सब जगह भगवान‍्के दर्शन होते हैं। वही महापुरुष है, वही मूर्ति है, वही पति है। यदि स्त्री अपने पतिमें भगवान‍्की दृढ़ भावना कर ले तो उसे सब जगह भगवान‍्की भावना और दर्शन होने लगें। ऐसी स्थिति प्राप्त होनेपर फिर किसी प्रकारकी अशान्तिकी सम्भावना नहीं रहती। इसीसे स्त्रियोंके धर्म, देश और जातिकी रक्षा सहज ही हो सकती है।