अनित्यका त्याग आवश्यक

प्रवचन—दिनांक १५-६-१९३६, सोमवार, प्रात:काल, गीताभवन, स्वर्गाश्रम

शरीरके आरामकी इच्छा नहीं करनी चाहिये। धन, मान और बड़ाईका त्याग करना चाहिये। ये चार बातें भगवान‍्के दर्शनमें सहायक हैं—भजन, ध्यान, सत्संग और पवित्र स्थान। इन चारोंका आश्रय लेनेसे भगवान‍्के साक्षात् दर्शन बहुत शीघ्र हो सकते हैं। ध्यान या भजन करते समय मृत्यु हो जाय तो परम गति मिलती है। काशीमें मरनेसे कल्याण तो हो जाता है, किन्तु साथमें भजन-ध्यान भी हो तो अति उत्तम है। बहुत-से लोग काशीमें जाकर भजन, ध्यान छोड़ देते हैं यह बुरी बात है। हरेक व्यक्तिको चारों बातोंके लिये प्रयास करना चाहिये। घरवालोंको, स्त्रीको, बच्चोंको सभीको भगवान‍्के स्मरणमें लगाना चाहिये, सत्संगमें लगाना चाहिये। स्त्री, पुत्र, धन, विद्या आदिमें आसक्ति और ममता नहीं रखनी चाहिये। स्त्री-पुत्र आदिसे प्रेम उन्हींके हितके लिये करना चाहिये। अपने स्वार्थके हेतु नहीं करना चाहिये। रुपयों-पैसोंको व्यवहारमें तो रुपये-पैसे ही समझे और मनमें कंकड़-पत्थरकी भावना करनी चाहिये।

हरेक व्यक्तिको परमात्माका कुछ-कुछ ज्ञान है, परन्तु वह परोक्ष ज्ञान है। जिसे भगवत्प्राप्ति हो गयी है, उसका ज्ञान सच्चा ज्ञान है। यदि सब साधकोंका ज्ञान इकट्ठा कर लें तो भी वह ज्ञान भगवत्प्राप्तिवाले सिद्धके ज्ञानकी एक बूँदके बराबर भी नहीं उतरेगा। इसी तरह लोग शान्ति, शान्ति कहते और सुनते हैं, परन्तु पता नहीं है कि शान्ति क्या चीज है। परम निर्वाणरूपी शान्तिका पता लगानेके लिये बड़ा उतावला हो जाना चाहिये।

मनको समझानेकी आवश्यकता है कि तू अनित्यके लोभमें फँसकर नित्य वस्तुको क्यों खो रहा है? हम भोजन कर रहे हैं उसमें जो स्वाद आ रहा है वह झूठा है। यह स्वाद जो आ रहा है, वह तो स्वादका अन्त हो रहा है। थोड़ी देर बाद तुम खाना बन्द कर दोगे, परन्तु भगवान‍्की ओरका जो स्वाद है, वह नित्य है। वह तो सदा आता रहेगा, इसलिये उस नित्य स्वादको प्राप्त करना चाहिये।

जिसका नाश हो रहा है, उसको तो पकड़ रखा है। काँचके टुकड़ोंसे, पत्थरके ठीकरोंसे घर भर रखा है। इन सबको फेंककर अविनाशी वस्तु नित्यानन्दको ग्रहण करना चाहिये। निर्गुण भगवान् ही सगुणरूपमें आते हैं। अपना संसारी प्रेम अनित्य है, यह सच्ची मित्रता नहीं है। सच्ची मित्रता रत्तीभरकी अच्छी और झूठी रुपयेभरकी भी खराब समझनी चाहिये। संसारमें जो स्वार्थ और रुपयोंके कारण प्रेम है, वह जिस दिन स्वार्थ और धनकी हानि होगी, उसी दिन प्रेमका अन्त हो जायगा, फिर ऐसी मित्रताका मूल्य ही क्या रहा, किन्तु वैर करनेकी अपेक्षा मित्रता ही ठीक है। साधकको राग-द्वेषसे वैराग्य करना अति उत्तम है। सच्चा प्रेम ही परमात्माका स्वरूप है। सच्चा प्रेम होनेपर समझना चाहिये कि परमात्मा मिल गये।

एक तो स्थायी पूँजी होती है और एक रोजगार, उसी प्रकार हम जो नित्य सत्संग करते हैं, यह तो रोजगार है और परमात्माके स्वरूपमें जितनी स्थिति हुई है वह और निष्काम कर्म, भक्ति आदि स्थायी पूँजी है। जैसे लड़केके नाम रुपये जमा करानेपर आप भी वापस लेना चाहें तो नहीं मिल सकते, उसी तरह निष्काम कर्म एवं भक्ति है, उसका फल भी नहीं मिल सकता। हमारेमें जितनी समता और शान्ति है उससे हमारी स्थायी पूँजीका नाप हो सकता है। श्रद्धाकी कमी है, पूर्ण श्रद्धा होते ही दर्शनमें विलम्ब नहीं हो सकता। श्रद्धाके साथ ही प्रेम है, आगे श्रद्धा चलती है, उसके पीछे प्रेम, प्रेमके पीछे साधन और साधनके पीछे तत्परता, तत्परताके पीछे संयम, संयम होनेपर उपरामता तथा वैराग्य हो जाता है, तत्पश्चात् शान्ति प्राप्त होकर परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।

किसी भी विषयमें जितना विश्वास होगा, उतनी ही तत्परता होगी। किसी भी पदार्थका गुण, प्रभाव, तत्त्व, रहस्य जितना समझमें आ जायगा, उतनी ही उसमें श्रद्धा होगी। रहस्य और तत्त्व ये दोनों जिसमें श्रद्धा बढ़ानी होगी उसमें बढ़ा देंगे और हटानेकी बातोंमें हटा देंगे।