अन्याय कभी न करें
प्रवचन—दिनांक १८-६-१९३६, बृहस्पतिवार, रात्रि, गीताभवन, स्वर्गाश्रम
परमात्माकी प्राप्ति होनेपर सभी कमी पूरी हो जाती है। व्यापारमें हमारी कमजोरीके कारण ही झूठ-कपट नहीं छूटता। सत्तासे ही पैसोंको पकड़ रखा है। धनमें सत्ताकी इतनी प्रगाढ़ता है कि मैं मरूँगा पर तुझको नहीं छोड़ूँगा।
धनकी सत्ता साधनसे कम हो सकती है। ऊँची स्थितिके पुरुष हैं, उनकी धनकी सत्ता बहुत कम हो जाती है। तत्त्व समझनेपर तो कुछ सत्ता ही नहीं रहती।
जिस तरह बच्चे ठीकरियोंके लिये लड़ते हैं और हमलोग हँसते हैं, क्योंकि हमलोग ठीकरियोंका तत्त्व समझते हैं। उसी तरह महात्मालोग हमलोगोंके धन और मकानकी लड़ाईको देखकर हँसते हैं।
हमलोग यहाँ इकट्ठे हुए हैं, हमें परस्पर चर्चा करनेसे जो ज्ञान हुआ है, उन बातोंको घरपर जाकर कटिबद्ध होकर काममें लाना चाहिये। तत्पर होकर साधन करेंगे तो बहुत जल्दी भगवत्प्राप्ति हो सकेगी।
भारी-से-भारी आपत्तियाँ आवें तो उनका खूब सामना करना चाहिये। जैसे कर्मयोगकी बात सुनी, उसमें कोई दोष आवे तो उसे निकाल देना चाहिये तथा माता, पिता-भाई आदि पाप करनेको कहें तो सुनना ही नहीं चाहिये। अपना स्वच्छ-साफ व्यवहार करना चाहिये। लोभ आवे तो उसकी भी नहीं सुने, भक्तिके विरुद्ध बड़ोंकी आज्ञा भी नहीं माननी चाहिये। बड़े लोग चोरी, पाप, झूठ, कपट, अन्याय करनेको कहें तो उनकी बात भी नहीं माननी चाहिये। काम, क्रोध, लोभ आदिको एकदम दबा दे। इन सारी बातोंके लिये बड़ा शूरवीर बननेकी आवश्यकता है। काम, क्रोध, लोभ धर्ममें बाधक हैं। इनको एकदम निकाल दे। धर्मके लिये मरनेमें जरा भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये।
घरवाले कहें तो भी अन्यायका व्यवहार नहीं करना चाहिये। इसके लिये अलग भले ही हो जाओ। संसारमें लोग अलग होते आये ही हैं।
अपने तो ऐसा काम करना है कि एक सालमें ही भगवत्प्राप्ति हो जाय। अपना वियोग तो निश्चित ही है, परन्तु अगली साल संयोग होगा इसका पता नहीं। हम समझ-बूझकर भी नरकमें क्यों जायँ। इसलिये कार्यकी सिद्धिके लिये एकदम तत्पर हो जाना चाहिये। इस जीवनमें थोड़े दिनकी आपत्ति है। कायरताको त्यागकर शूरवीर बनना चाहिये।
भगवान् जिसके लिये प्रकट होते हैं, उसीको वह प्रकाश दीखता है। विष्णुभगवान्की छाया नहीं पड़ती। भगवान् विष्णुके शरीरका तेजस धातु है। छाया तो देवताओंकी भी नहीं पड़ती। भगवान् राम और कृष्ण दोनों ही परब्रह्म परमात्माके अवतार थे। उनका मनुष्य-अवतार था, इसलिये छाया पड़ती थी।
ऐसा विश्वास होना चाहिये कि भगवान् प्रकट होनेवाले हैं। ऐसा विश्वास हो जाय तो भगवान् प्रकट हो जाते हैं।
किसी भी भाईको भगवान्का ध्यान करना कठिन नहीं मानना चाहिये। भगवान्का ध्यान करना तो ऐसी मामूली बात है कि जैसे किसी देखी हुई बातका आकार बँध जाना। ध्यानावस्थामें भगवान्का प्रकट होना क्या कुछ कठिन बात है? हमलोगोंने उसे कठिन मान रखा है इसलिये कठिन है। विश्वास करनेपर भगवान् प्रकट होते हैं।
जो मनुष्य एक बार हृदयसे कह देता है कि प्रभो! मैं आपका हूँ, भगवान् उसे त्यागते नहीं, अपना लेते हैं।
भगवान्का स्वरूप आकाशके भीतर कैसा चमक रहा है। भगवान्की अवस्था सोलह वर्षके राजकुमार-जैसी है। सुन्दर, अद्भुत स्वरूप दीख रहा है। चन्द्रमाके प्रकाशसे करोड़ों गुना प्रकाश अधिक दीख रहा है, शान्तिका साम्राज्य विराजमान है, प्रेमकी मूर्ति हैं। भगवान्का मुखारविन्द बड़ा सुन्दर कुछ लम्बा-सा है, भगवान् आकाशमें खड़े हैं। भगवान्के चरणारविन्द बड़े सुन्दर हैं। पैरोंके तलवे कुछ लाल हैं, गुलाबी हैं। कोमलता फूलोंसे भी बढ़कर है, चरणारविन्द बहुत चिकने हैं। प्रभु पीताम्बर पहने हैं। पीताम्बर बहुत चमक रहा है, प्रभु मन्द-मन्द हँस रहे हैं, प्रभुके ध्यानसे सारे पापोंका नाश होकर रोमांच हो जाता है। फिर प्रभुका साक्षात्कार होनेपर वह प्रभुमें टकटकी लगाकर प्रभुकी ओर देखता रहता है। यह भी आपकी कृपा ही है कि मैं आपका ध्यान करते हुए भी वर्णन कर रहा हूँ और बेसुध नहीं होता। प्रभुका मूल्य प्रेम है।