भगवान‍्की आवश्यकता

प्रवचन—दिनांक १७-६-१९३६, बुधवार, रात्रि, गीताभवन, स्वर्गाश्रम

जनसमुदायको जल्दी लाभ देनेवाला उपाय भगवान‍्का स्मरण ही है। भगवान‍्का स्मरण निराकारसहित साकारका हो या आनन्दघनका हो, जो जिसके अनुकूल पड़े, उसे उसीके द्वारा भगवत्प्राप्ति हो सकती है। भगवान‍्का निराकारसहित साकारका ध्यान और दु:खियोंकी सेवा करे। सत्संग इनका पोषक भी है और सरल उपाय भी है। जिस किसी प्रकारसे उनका दु:ख शीघ्र शान्त हो ऐसा उपाय करना चाहिये। यदि बहुत प्रयास करनेपर भी दु:ख न मिटे तो वह उसका प्रारब्ध है। असाध्य रोग दीख पड़नेपर भी सेवा करनी चाहिये। यदि अपयश हो तो भी सेवा करता जाय, क्योंकि वह अपयश किसीपर तो जाता ही, अपने पर ले लेवे। अपयश बहुत अच्छी चीज है।

प्रश्न— अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।

तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥

(गीता ८। १४)

हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्यचित्त होकर सदा ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्तमको स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझमें युक्त हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ, अर्थात् उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ।

इस श्लोकके अनुसार साधन करे तो कितने दिनमें भगवत्प्राप्ति हो सकती है।

उत्तर—इस बातका करार न करें। जैसा रोगी हो उतने दिन ही लगेंगे। रोगका भी नियम नहीं है। ज्यादा-से-ज्यादा रोग हो तो भी जल्दी आराम हो सकता है।

भगवान‍्ने समय नहीं बाँधा है, तब मैं कैसे कहूँ कि जल्दी हो जायगा। इसका अर्थ समझनेवाला जैसा समझे वैसा ही है। एक दिनमें मिल जायँगे ऐसा माननेवालेको एक दिनमें मिल सकते हैं। दो दिनमें माने तो दो दिनमें मिल सकते हैं। जैसी अवधि बाँधे, वैसा ही काम हो जाता है। क्षणमें प्राप्तिवाली बात तो आपलोगोंकी सुनी हुई है ही, पर उसमें तो एक प्रकारसे संसारसे मरना पड़ेगा।

भगवान‍्के ध्यानमें तो खूब मुग्ध होकर मर जाय। ऐसा मस्त हो जाय कि फिर पीछे चेत ही न हो। पहलेसे खूब दृढ़ रहनेसे अन्तसमयमें चेत रह सकता है।

भगवान् जैसे समझमें आयें, वैसे ही उनका लगातार चिन्तन रहना चाहिये। कभी चिन्तन करे और कभी न करे यह बात ठीक नहीं है।

ऊँची-से-ऊँची स्थिति हो जाय उसका तो कहना ही क्या है। परमात्माकी साधारण भावना होते हुए भी मरे तो कोई हर्ज नहीं है।

एक नयी बात सुनाता हूँ। ‘समलोष्टाश्मकाञ्चन:’ लोष्ट शब्दके दो अर्थ होते हैं। एक मिट्टीका ढे़ला और दूसरा लोहेका मैल। ये दोनों ही खानसे उत्पन्न होनेवाले हैं। धातुसे दोनों जड़ हैं। केवल मूल्यका अन्तर है। वैसे ही यावन्मात्र पार्थिव वस्तु क्षणभंगुर है। इन चारों वस्तुओंको (मिट्टीका ढ़ेला, लोहेका मैल, पत्थर और सोना) समान आदर देना चाहिये। सोनेको आदर देना मूर्खता है। जिस जगह जिस वस्तुकी कमी होगी, उस जगह उसी वस्तुका मूल्य अधिक होगा। जैसे रामेश्वरमें गंगाजलकी कीमत अधिक है। यहाँ चाहे लाखों घड़ा भर लो। वैसे ही यहाँ सोनेकी कमी है, इसलिये सोनेका मूल्य अधिक है। जिस जगह लोहा कमती होगा, उस जगह सोनेसे भी ज्यादा कीमत लोहेकी होगी। लोहेकी मानी हुई कीमत है। ज्ञानीकी दृष्टिसे तो एक ही है। एक तरफ सोनेकी ढेरी, एक तरफ पत्थरकी और एक तरफ रत्नोंकी भरी हुई ढेरी है, उसमें क्या अन्तर है। सोना कमानेमें समय बिताना कितनी मूर्खता है। आत्माके कल्याणमें समय बिताना चाहिये। ग्राहक आनेसे ही मूर्खोंने इनके दामोंमें फर्क कर दिया। ये सब तुच्छ और नाशवान् हैं। इनमें क्या पड़ा है, ये तो बाधक ही हैं। यह सब खनिज वस्तु है, नाशवान् है। ये क्या काम आयेगी। एक मोती और रत्नोंकी भरी हुई डिब्बी पड़ी है, कुत्ता उसका क्या करे। उसका पेट तो रोटियोंसे ही भरेगा, इसलिये अपना समय भजन-ध्यानमें बिताओ।

आत्माके कल्याणके लिये परमार्थकी आवश्यकता है। गहने-रुपयोंको धन न समझे, असली धन तो सेवाको समझे। दु:खियोंकी सेवा और ईश्वरकी भक्ति ये दो चीजें कल्याणकारक हैं। अच्छे पुरुषोंकी बातोंमें विश्वास करनेसे ही मनुष्य लाभ उठा सकता है।

घरमें स्त्रियोंको सेवा कार्य इस प्रकार करना चाहिये कि सबका चित्त आकर्षित हो जाय। सुहागिन स्त्रियोंको ईश्वरकी भक्ति और पातिव्रतधर्म तथा विधवाओंके लिये ईश्वरकी भक्ति और वैराग्य प्रधान है। सेवा कार्य तो सबको ही करना चाहिये।