भगवान‍्की दयालुता

प्रवचन—दिनांक १८-६-१९३६, बृहस्पतिवार, प्रातःकाल, गीताभवन, स्वर्गाश्रम

रातको दस बजे सो जाना चाहिये और तीन-चार बजे उठना चाहिये। भगवान‍्की रासलीला विशुद्ध प्रेमकी थी। इस समय तो बड़ी खराब रीतिसे रास होता है। रामलीला भी जो वास्तवमें थी, उसमें भी फेरबदल कर भाव बिगाड़ दिया गया है।

सब चीजें भगवत्स्वरूप ही दीखने लग जायँ, उनसे मिलनेकी इच्छा हो जाय, वृक्ष, पत्थर जो कुछ भी हो, सभी परमात्मा दीखें। जैसे तस्वीरमें आकृति है, उसी तरह ध्यानमें दीखना कोई बड़ी बात नहीं। भगवान् तो सभीके अति प्यारे हैं, फिर उनके याद आनेमें कौन बड़ी बात है। जो दीखता है, वह भगवान‍्का स्वरूप है। ऐसा विश्वास करनेपर भगवान‍्का स्वरूप ही दीखेगा।

ऐसी बातें होनी चाहिये, जिससे भगवान‍्में खूब प्रेम हो, विश्वास हो, श्रद्धा हो। विश्वास होनेपर भगवान् प्रकट हो जायँगे।

हम किसी महात्मासे मिलने जायँ, वह महात्मा मार्गमें मिल जायँ और हम उन्हींसे महात्माकी बात पूछें तो वे तो संकोचमें पड़ जाते हैं, पर साथवाले कह दें कि ये ही महात्मा हैं तो क्षणभरमें हमारा भाव बदल जाता है। इसी प्रकार हमको महात्मा मिल जायँ और उनपर हमारा विश्वास हो जाय और वे भगवान‍्को पहचानते हों और वे हमें दिखा देवें कि ये भगवान् हैं तो हमारा काम सिद्ध हो जाय।

भगवान् बहुत दयालु हैं। उनसे किसीका दु:ख देखा नहीं जाता। आतुर होनेके साथ तो उनको प्रकट होना ही पड़ेगा। ये बात जिसके समझमें आ जाय, उसको रोना आ जायगा। रोना नहीं आता है तो उसके विश्वासमें कमी है।

भगवान् इतने दयालु हैं, कि वे रुक नहीं सकते। जब हम यह समझ लेंगे तो भगवान् रुक नहीं सकेंगे।

जन अवगुन प्रभु मान न काऊ।

दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ॥

भरतजीके शब्दोंमें विश्वास हो जाय कि मेरी करनीकी तरफ देखनेसे दर्शन होनेका नहीं है, किन्तु भगवान‍्की ओर देखनेसे विश्वास हो जाता है। गीतामें भी भगवान‍्ने कहा है—

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।

(गीता ५। २९)

भगवान‍्को सब भूतोंका सुहृद् जाननेसे ही शान्ति मिल जाती है। भगवान‍्की दयापर विश्वास करे कि वे बड़े दयालु हैं, किसीका दु:ख नहीं देख सकते, परन्तु अपनेको भूख तो होनी चाहिये। भूखेके चेहरेसे उसकी भूखका मालूम पड़ जाता है। ऐसी श्रद्धाके लिये प्रभुके आगे रोवे।

भगवान् पहले निराकार-रूपसे आते हैं, तब सारी इन्द्रियोंमें ज्ञान, प्रकाश और आनन्दका संचार हो जाता है। पीछे रोमांच, अश्रुपात, उसके पीछे बिजलीके समान प्रत्यक्ष चमक फिर क्षणभरमें भगवान् प्रकट हो जाते हैं। रोनेके लिये भरतजीका उदाहरण बहुत अच्छा है।

भरतजीने आते ही मातासे पूछा पिताजी कहाँ हैं? माताने कहा तुम्हारे पिताजी उत्तम गतिको प्राप्त हो गये। पिताजीकी मृत्यु सुनकर दोनों भाई रोने लग गये। मरते समय पिताजीने मुझे रामके हाथ नहीं सौंपा। भरतजीने पूछा पिताजी मरते समय क्या कहे थे? कैकई बोली—पिताजीने हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण! ऐसा कहा था। क्या राम उस समय नहीं थे, तब कैकईने सारी बातें कह सुनायी। माताकी बातें सुनकर भरतजी गिर पड़े। जिस रामके आश्रित होकर मैं अपना जीवन बिताना चाहता हूँ, उस रामके साथ माताने ऐसा व्यवहार किया। जैसे कोई मछलीको जलके बाहर निकालकर जीवित रखना चाहे, उसी तरह रामके वियोगमें मैं कैसे जी सकता हूँ। मछलीके लिये जलका संयोग, मेरे लिये रामका संयोग आवश्यक है। उनको वनमें भेजकर मुझे जीवित देखना चाहती है।

भरतजी माता कौशल्याके पास गये, कहा—जननी! मैं इस बातसे बिलकुल सहमत नहीं हूँ, यदि रामके वन जानेमें मेरी किंचित् भी सलाह हो तो मुझे घोर पाप लगे। कौशल्याजीने बहुत समझाया, अपने कपड़ेसे आंसू पोंछते हुए कहा—राम जाते समय मुझसे कह गये थे कि भरत मेरेसे भी अधिक तुम्हारी सेवा करेंगे। भरतजी रातभर कौशल्याके पास रहे, प्रात:काल गुरुजी आये। राजाकी आज्ञा सुनाकर राजगद्दीकी बात कही। भरतजीने कहा—मैं इसका अधिकारी नहीं हूँ। हमलोग रघुनाथजीके पास चलें, उनको वापस यहाँ ले आयें। सब लोग तैयार हो गये। भरतजी पैदल चलने लगे, सब लोग पैदल चलने लगे। लोगोंका दु:ख देखकर माँ बोलीं—भरत रथपर बैठ जाओ, भरतने कहा—माँ प्रभु पैदल गये हैं तो मेरा कर्तव्य है कि सिरके बल चलूँ, पर चला नहीं जाता। भरतजीका कैसा उत्तम व्यवहार है।