चेतावनी

प्रवचन—दिनांक २०-६-१९३६, शनिवार, दोपहर, गीताभवन, स्वर्गाश्रम

प्राण निकल जानेके बाद यह शरीर किसी काम नहीं आयेगा। अपना तन, मन, धन परमात्माकी प्राप्तिमें लगा देना चाहिये। अपने माता-पिता-कुटुम्बी चले गये, उनसे अपना कुछ सम्बन्ध नहीं रहा। हमको परमेश्वरने बुद्धि दी है, ज्ञान दिया है, तब भी इस अमूल्य समयको व्यर्थ खो देंगे तो मूर्खता ही है। यह जीवन बड़ा अमूल्य है।

संसारमें असंख्य कोटि जीव हैं, उनमेंसे दुनियाभरमें इस समय केवल दो अरब मनुष्य हैं। असंख्य कोटि जीवोंमेंसे भगवान‍्ने दया करके मनुष्य-जीवन दिया है। जिस कार्यके लिये भगवान‍्ने हमें मनुष्य-जीवन दिया है, वह कार्य तत्परतासे सिद्ध कर लेना चाहिये। इस जन्ममें भगवत्प्राप्ति नहीं की तो करोड़ों योनियाँ भोगनी पड़ेंगी। पता नहीं फिर कब मनुष्य-जन्म मिले। मनुष्य-जीवनका प्रत्यक्ष फल प्राप्त कर लेना चाहिये।

भगवत्प्राप्तिका मार्ग बड़ा सुगम है, संसारमें सबसे पवित्र है, हाथोंहाथ प्रत्यक्ष फल मिलता है, धर्ममय है, धर्मानुकूल है, ऐसा समझ करके हरेक भाई-बहनको इसे जाननेके लिये तत्पर हो जाना चाहिये।

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।

प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥

(गीता ९। २)

यह विज्ञानसहित ज्ञान सब विद्याओंका राजा, सब गोपनीयोंका राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाला, धर्मयुक्त, साधन करनेमें बड़ा सुगम और अविनाशी है।

भगवान‍्ने आज्ञा भी दी है कि तू मेरी शरण हो जा, मेरी शरण होनेसे स्त्री, शूद्र, पापयोनि सबका मैं कल्याण कर देता हूँ।

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय:।

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥

(गीता ९। ३२)

हे अर्जुन! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि—चाण्डालादि जो कोई भी हों, वे भी मेरी शरण होकर परमगतिको ही प्राप्त होते हैं।

इस नाशवान् क्षणभंगुर मनुष्य-शरीरको प्राप्त होकर मेरा ही भजन कर।

अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥

(गीता ९। ३३)

सब जीवोंको आराम पहुँचाना ही मेरी सेवा है।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण:॥

(गीता ९। ३४)

मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करनेवाला हो, मुझको प्रणाम कर। इस प्रकार आत्माको मुझमें नियुक्त करके मेरे परायण होकर तू मुझको ही प्राप्त होगा।

एकोऽपि कृष्णस्य कृत: प्रणामो

दशाश्वमेधाऽवभृथेन तुल्य:।

दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म

कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय॥

भगवान् श्रीकृष्णको श्रद्धासे नमस्कार करनेसे दस अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। दस अश्वमेध यज्ञ करनेवाला तो संसारमें जन्म लेता है, परन्तु भगवान् कृष्णको नमस्कार करनेवाला जन्म नहीं लेता।

अन्तसमयमें भगवन्नामका जप करनेवालेका, स्वरूपका ध्यान करनेवालेका कल्याण हो जाता है। एक क्षणके भगवान‍्के ध्यानके मूल्यके बराबर पृथ्वीभरका धन भी नहीं हो सकता। जब भगवान‍्के ध्यानमें आनन्द आ जाता है, उस समय त्रिलोकीका राज्य भी तुच्छ प्रतीत होता है, इसलिये भगवान‍्की शरण होकर भगवान‍्का ध्यान करना चाहिये। भगवान् कहते हैं—

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।

स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥

(गीता १५। १९)

हे भारत! जो ज्ञानी पुरुष मुझको इस प्रकार तत्त्वसे पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकारसे निरन्तर मुझ वासुदेव परमेश्वरको ही भजता है।

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।

साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥

(गीता ९। ३१)

यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधु ही माननेयोग्य है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है। अर्थात् उसने भलीभाँति निश्चय कर लिया है कि परमेश्वरके भजनके समान अन्य कुछ भी नहीं है।

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।

कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति॥

(गीता ९। ३१)

वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहनेवाली परम शान्तिको प्राप्त होता है। हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।

भगवान‍्के इतना विश्वास दिलानेपर भी हम भगवान‍्का भजन नहीं करते, यह कितनी नीचता है।

ध्यानकी मस्तीमें इन्द्रका भोग भी कुत्तेके भोगके समान मालूम पड़ता है। उस अवस्थामें कुत्ते और इन्द्रमें कुछ फर्क नहीं जान पड़ता। जिस सुखकी सीमा नहीं है, उस सुखको प्राप्त करना चाहिये।

ऐसे आनन्दमयको छोड़कर जो विषय-भोगोंमें मन लगाता है वह अमृतको छोड़कर मल-मूत्रका पान करता है। जितनी भक्ति कुत्तेकी उसके मालिकके प्रति रहती है, उतनी ही भक्ति मनुष्यकी भगवान‍्के प्रति हो जाय तो कल्याण हो जाय।

ये सारी बातें जोरोंके साथ काममें लानी चाहिये। जिस प्रकार राजा युधिष्ठिर धर्मसे नहीं हटते थे, उसी प्रकार सबको धर्मके पालनमें डटे रहना चाहिये। ऐसे महात्माके ध्यानसे हृदयमें सद‍्गुणोंका संचार होता है, इस प्रकार सारी बातें सोचकर हमें राजा जनक एवं तुलाधारकी तरह अपना जीवन बिताना चाहिये। दु:खमें भी आनन्द समझे। पत्थर, सोना और मिट्टीमें कोई भेद न समझे। यह त्यागका रास्ता है।

परमात्मा सर्वव्यापी है, ऐसा सोचकर दूसरोंकी सेवा करना ही अपना कार्य समझे। ऐसा करनेसे आत्मा बहुत बलवान् और बुद्धिमान् हो जाती है। गोपियाँ घरका काम करती हुई मुँहसे भगवान‍्के नामका जप और मनसे ध्यान करती थीं। हमको भी ऐसा साधन करना चाहिये।