ध्यानकी विशेषता
प्रवचन—दिनांक १३-६-१९३६, प्रात:काल, गीताभवन, स्वर्गाश्रम
परिग्रहका त्याग करे। चित्त और शरीरको वशमें रखकर परमात्माका दर्शन करना ही प्रधान ध्येय रखे। गृहस्थमें रहते हुए संन्यासीके समान आचरण करे, निरन्तर भगवान्की स्मृति बनी रहे। इन्द्रियोंको संसारसे हटाकर परमात्मामें लगावे, उसके बाद मनके संकल्पका त्याग करे, कामनाका त्याग करे, स्फुरणाका त्याग करे। जिसके अन्त:करणसे संकल्पका अभाव हो जाता है, ऐसे पुरुषका नाम प्रशान्तात्मा है—
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थित:।
मन: संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्पर:॥
(गीता ६। १४)
ब्रह्मचारीके व्रतमें स्थित, भयरहित तथा भलीभाँति शान्त अन्त:करणवाला सावधान योगी मनको रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होवे।
हम सब लीला करने आये हैं, इसलिये ऐसी लीला करनी चाहिये जिससे भगवान् प्रसन्न हों। झूठ, कपट, चोरीका व्यवहार न करे। ऐसा सोचना चाहिये कि भगवान् हमारे साथ ही रहते हैं, भगवान् लीला करते हैं, उनके साथ लीला करना ही उनको मदद देना है। भगवान्के मनमाफिक बन जायँ, यह मार्ग बड़ा सुन्दर और सरल है। भगवान्के अनुकूल ही सब कार्य करें तो कार्यकी सिद्धि बहुत शीघ्र हो सकती है। भगवान्के प्रति इतना प्रेम होना चाहिये कि उनका नाम सुनते ही प्रेममें मुग्ध हो जाय। मन्दिरमें भगवान्की मूर्ति दीखते ही प्रेममें गद्गद हो जाय। वंशीकी ध्वनि सुनते ही भगवान् कृष्णकी याद आ जाय। कभी-कभी भगवान्से वह करुणाभावसे प्रार्थना करता है कि आप क्यों नहीं आते हैं, कभी भगवान्पर रोष भी आ जाता है, भगवान् उससे नाराज नहीं होते। ये सारी बातें मनसे होनी चाहिये। हमारे मनको भगवान्में रमाना चाहिये। भगवान् कहते हैं, मनका संयम कर वशमें करके मुझमें लगाओ, अपने चित्तको भगवान्के मुखारविन्दपर टिका दे। इसका नाम मच्चित्ता है। एक प्रभुके स्वरूपके अतिरिक्त और कोई वस्तु उनके हृदयमें है ही नहीं। यहाँ दसवें अध्यायके नवें श्लोकमें भगवान्ने छ: विशेषण बतलाये हैं। जो व्यक्ति ऐसा बन जाता है वह आनन्द-ही-आनन्दमें मग्न हो जाता है, फिर उसका ध्यान नहीं छूट सकता।
कैसे छूटे? वहाँ तो ऐसा आस्वादन आता है कि यदि तलवारोंसे उसका शरीर काटा जाय तो भी ध्यान नहीं छूटता। जो अपने शरीरकी परवाह छोड़कर भगवान्में मन लगाता है, उसे मरनेकी परवाह नहीं रहती। उदाहरणके लिये भक्त प्रह्लादका ध्यान एक मिनट भी नहीं छूटता था। जिस तरह मछली जलके बिना एक मिनट भी नहीं रह सकती, वैसे ही हमलोगोंकी दशा ध्यानके लिये होनी चाहिये। भगवान्का मुखारविन्द कितना सुन्दर और आनन्ददायक है। जैसे भँवरा पुष्पका रस लेता रहता है, उसी प्रकार हमें भी भगवान्के मुखारविन्द, मुखकमलको निरखते रहना चाहिये। मुखारविन्दकी सुन्दरता अवर्णनीय है। रूप-लावण्यकी सीमा नहीं है। भगवान् श्रीकृष्णका मुखारविन्द चन्द्रमाकी तरह गोल है, विष्णुजीका मुख थोड़ा गोल है, विष्णुभगवान्का स्वरूप तेजस् वस्तुसे बना हुआ है और वह तेजस् वस्तु भी दिव्य है, देवताओं-जैसी नहीं है। भगवान्के नेत्र सदा खुले ही रहते हैं। उन नेत्रोंमें अपार गुण, शान्ति प्रतीत होती है। मुख कमलपुष्पके समान खिला हुआ है, वह शान्ति लिये हुए है। प्रेमकी तो आप मूर्ति हैं और आनन्दका श्रोत बह रहा है। उस आनन्दको देखकर पशु-पक्षी भी मुग्ध हो जाते हैं, फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या है। संसारमें ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसमें इतने तेजोमय नेत्र हों। जितनी कल्पना करेंगे उससे करोड़ों गुना अधिक ही तेज प्रतीत होगा। उसकी कल्पना भी नहीं हो सकती। यदि स्वप्नमें दर्शन होगा तो तुम मुग्ध हो जाओगे। जब उनका मुखकमल समझमें आ जायगा तो उसे नहीं छोड़ सकोगे। वर्तमान ध्यानसे इस प्रकार ध्यानावस्थाका दर्शन विलक्षण है। ध्यानावस्थामें प्रभु दर्शन देते हैं वह अलौकिक दर्शन है, फिर ऐसा ध्यान नहीं छूटता और अन्तकालमें ऐसा ध्यान रहनेसे मुक्ति हो जाती है। हमको अभी वैसा ध्यान हुआ ही नहीं, यदि ध्यान हुआ होता तो ध्यान छूटता ही नहीं। उस ध्यानकी बात सुनकर रोमांच होने लगता है, चित्रके समान बन जाते हैं। जिस ध्यानमें मुग्ध होनेपर खान-पान, निद्रा आदि सब नष्ट हो जाते हैं, उनके मुखारविन्दको एक क्षण भी छोड़कर मन और कहीं किसीकी ओर नहीं ताकता।
भगवान्के प्रकट होनेमें जो विलम्ब हो रहा है उसमें प्रेमकी एवं विश्वासकी कमी है, यदि कमी न हो तो भगवान्के प्रकट होनेमें विलम्ब नहीं होता, भगवान् प्रेमके आधारपर ही आ सकते हैं। भरतजी कहते हैं—
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ।
दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ॥
आपकी दया और मृदुल स्वभावको देखकर विश्वास होता है कि आप अवश्य मिलेंगे। आँख खोलने और बन्द करनेमें भी समय लगता है, किन्तु भगवान्के आनेमें समय नहीं लगता। प्रभु तो हर जगह मौजूद हैं। उनके प्रकट होनेमें क्या समय लग सकता है। आनन्दके उच्चारणके साथ रोमांच हो जाता है, मालूम होता है कि भगवान् एकदम शरीरमें प्रवेश कर गये हों।
रग-रग बोले रामजी रोम-रोम रंकार।
जो इस प्रकारका जप करता है उसके द्वारा तो एक पलमें कोटि नामका उच्चारण हो जाता है। जिस समय इस प्रकारका जप होता है उस समय अपार आनन्द प्रतीत होता है। जिसका जप इस प्रकार होता है वही धन्य है।
भगवान् ध्यानमें क्षणभर भी आ गये तो संसारके सारे सुख सूखे—रसहीन हो जायँगे। जिसको साक्षात् भगवान् मिल जाते हैं फिर उसकी क्या दशा होती होगी? यदि उन परमात्माके लिये प्राण भी देने पड़ें तो हँसते-हँसते दे देना चाहिये। जिस व्यक्तिने इस जीवनमें भगवान्का ध्यान नहीं किया उसका जन्म लेना व्यर्थ ही हुआ, प्राण भले ही चले जायँ, किन्तु ध्यान करके ही छोड़े। जब हम यह बात दृढ़तासे धारण कर लेंगे तो ध्यानकी बात तो दूर रही, साक्षात् भगवान्को आकर दर्शन देना पड़ेगा।
हरेक मनुष्यको सोचना चाहिये कि जैसा सुन्दर स्वरूप बतलाया गया है, वैसा ध्यान होनेपर वह कैसे छोड़ सकता है। वहाँ कोटि कामदेवकी छवि भी एकत्र की जाय तो उनके सामने वह कुछ भी नहीं प्रतीत होगा।
असली ध्यान तो वही है जिसमें भगवान् प्रकट हो जायँ। ध्रुवने अपना ध्यान प्रभुमें लगाया था। वे ध्यानमें इतने मग्न हुए कि प्रभुको प्रकट होना पड़ा। ऐसा ही ध्यान हमें लगाना चाहिये। परमात्मामें ध्यान लगनेपर नहीं छूट सकता। सूरदासजी कहते हैं—
बाँह छुड़ाकर जात हो निबल जान के मोहि।
हिरदेसे जब जाहुगे तब पुरुष बदूँगा तोहि॥
क्या अद्भुत बात है आप बाँह छुड़ाकर तो जा रहे हैं, किन्तु मैं आपको तभी बलवान् समझूँगा जब हृदयसे चले जायँ। ध्यान अपने हाथकी बात है।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थित:।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥
(गीता ६। ३०-३१)
जो पुरुष सम्पूर्ण भूतोंमें सबके आत्मरूप मुझ वासुदेवको ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतोंको मुझ वासुदेवके अन्तर्गत देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।
जो पुरुष एकीभावमें स्थित होकर सम्पूर्ण भूतोंमें आत्मरूपसे स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेवको भजता है, वह योगी सब प्रकारसे बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है।
जो निरन्तर ध्यान करता है, उससे प्रभु नहीं हट सकते। भगवान् कहते हैं जो मुझसे अलग नहीं होता, मुझमें सामर्थ्य नहीं कि मैं उससे अलग हो जाऊँ। जो पुरुष ऐसे भगवान्को छोड़कर स्त्री, पुत्र, धन आदिमें रमे, उससे बढ़कर मूर्ख और कौन होगा।
भगवान् समभावसे ध्यानमें सदा मौजूद रहते हैं और जब प्रभुका विशेष ध्यान करते हैं, तब प्रकाशके रूपमें प्रकट हो जाते हैं। आनन्द, ज्ञान, शान्ति यह भगवान्का निराकार स्वरूप है तथा प्रकाश साकार है। अहा! देखो, आकाशमें प्रभुकी कैसी मूर्ति स्थित है। ओष्ठ बिम्ब फलके समान लाल हैं, नासिकाकी सुन्दरता निराली है, नेत्र कितने सुन्दर हैं। ऐसी आकृति जब मनुष्य देख लेता है तब उसमें आनन्द नहीं समाता। ध्रुवजीके समान मुग्ध हो जाता है। प्रभुकी भृकुटी विशाल और भौंहपर काले-काले केश हैं। कानोंमें रत्नजटित मकराकृति कुण्डल हैं। प्रभु जब देखते हैं तो सारी दुनियाको मोहित कर देते हैं, उनके नेत्रोंमें अपार समता, आनन्द, शान्ति, तेज, ज्ञान प्रतीत होता है। उनका मुख अमृतमें भीगा हुआ-सा दीखता है। देखनेवालेको प्रतीत होता है कि मैं नासिकासे, मुँहसे अमृतका पान कर रहा हूँ। प्रभुके पैर और हाथोंकी लाली निराली है। दर्शनसे मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ प्रफुल्लित हो जाती हैं। स्पर्श करनेसे सारे शरीरमें रोमांच और कम्प होता है। मन आनन्दमय बन जाता है। प्रभुके चरण बड़े कोमल, सुन्दर और चिकने हैं, वैसे ही ग्रीवा भी है, भुजाएँ हृष्ट-पुष्ट हैं। प्रभुका स्वरूप अद्भुत-दिव्य है। गलेमें कई प्रकारकी मालाएँ हैं, हृदयमें लक्ष्मीके चित्रको धारण कर रखा है, उसके ऊपर भृगुलताका चिह्न है। मन्द-मन्द हँस रहे हैं, ऐसा प्रतीत होता है मानो फूल खिल रहे हैं। प्रभुका स्वरूप स्वयं ही बना हुआ है, किसीका बनाया हुआ नहीं है, उनका मुखारविन्द चन्द्रमासे बढ़कर चमक रहा है, नेत्रोंसे मैं आनन्दका पान कर रहा हूँ। भगवान्के आनन्दका गुण गानेमें वाणी थकती नहीं है। वंशीकी कैसी अद्भुत ध्वनि है। वंशीसे भगवान् प्रेम और वेदका उपदेश सुनाया करते हैं तथा जगत्को मोहित करते रहते हैं। इसीलिये आपका नाम मनमोहन है। कम-से-कम ऐसा ध्यान तो बना ही रहना चाहिये। जिसका ऐसा ध्यान हो जाता है, उसके शरीरका टुकड़ा-टुकड़ा कर डालनेपर भी उसे दु:ख नहीं होता, जैसे राजा मयूरध्वजकी कथा इस प्रकार है—
द्वापरके अन्तमें रत्नपुरके अधिपति महाराज मयूरध्वज एक बहुत बड़े धर्मात्मा तथा भगवद्भक्त संत हो गये हैं। इनकी धर्मशीलता, प्रजावत्सलता एवं भगवान्के प्रति इनका स्वाभाविक अनुराग अतुलनीय ही था। इन्होंने भगवत्प्रीत्यर्थ अनेकों बड़े-बड़े यज्ञ किये थे, करते ही रहते थे।
एक बार इनका अश्वमेधका घोड़ा छूटा हुआ था और उसके साथ इनके वीर पुत्र ताम्रध्वज तथा प्रधान मन्त्री सेनाके साथ रक्षा करते हुए घूम रहे थे। उधर उन्हीं दिनों धर्मराज युधिष्ठिरका भी अश्वमेध यज्ञ चल रहा था और उनके घोड़ेके रक्षकरूपमें अर्जुन और उनके सारथि स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण साथ थे। मणिपुरमें दोनोंकी मुठभेड़ हो गयी।
उन दिनों भगवान्के सारथ्य और अनेकों वीरोंपर विजय प्राप्त करनेके कारण अर्जुनके मनमें कुछ अपनी भक्ति तथा वीरताका गर्व-सा हो गया था। सम्भव है इसीलिये अथवा अपने तथा छिपे हुए भक्तकी महिमा प्रकट करनेके लिये भगवान्ने एक अद्भुत लीला रची। परिणामत: युद्धमें श्रीकृष्णके ही बलपर मयूरध्वजके पुत्र ताम्रध्वजने विजय प्राप्त की और श्रीकृष्ण तथा अर्जुन दोनोंको मूर्च्छित करके वह दोनों घोड़ोंको अपने पिताके पास ले गया। पिताके पूछनेपर मन्त्रीने बड़ी प्रसन्नतासे सारा समाचार कह सुनाया। किन्तु सब कुछ सुन लेनेके पश्चात् मयूरध्वजने बड़ा खेद प्रकट किया। उन्होंने कहा—‘तुमने बुद्धिमानीका काम नहीं किया। श्रीकृष्णको छोड़कर घोड़ेको पकड़ लेना या यज्ञ पूरा करना अपना उद्देश्य नहीं है! तुम मेरे पुत्र नहीं, बल्कि शत्रु हो, जो भगवान्के दर्शन पाकर भी उन्हें छोड़कर चले आये।’ इसके बाद वे बहुत पश्चात्ताप करने लगे।
उधर जब अर्जुनकी मूर्च्छा टूटी, तब उन्होंने श्रीकृष्णजीसे घोड़ेके लिये बड़ी व्यग्रता प्रकट की। भगवान् अपने भक्तकी महिमा दिखानेके लिये स्वयं ब्राह्मण बने और अर्जुनको अपना शिष्य बनाया तथा दोनों मयूरध्वजकी यज्ञशालामें उपस्थित हुए। इनके तेज और प्रभावको देखकर मयूरध्वज अपने आसनसे उठकर नमस्कार करनेवाले ही थे कि इन्होंने पहले ही ‘स्वस्ति’ कहकर आशीर्वाद दिया। मयूरध्वजने इनके इस कर्मको अनुचित बतलाते हुए इन्हें नमस्कार किया और स्वागत-सत्कार करके अपने योग्य सेवा पूछी। ब्राह्मणवेशधारी भगवान्ने अपनी इच्छित वस्तु लेनेकी प्रतिज्ञा कराकर बतलाया—‘मैं अपने पुत्रके साथ इधर आ रहा था कि मार्गमें एक सिंह मिला और उसने मेरे पुत्रको खाना चाहा। मैंने पुत्रके बदले अपनेको देना चाहा, पर उसने स्वीकार नहीं किया। बहुत अनुनय-विनय करनेपर उसने यह स्वीकार किया है कि राजा मयूरध्वज पूर्ण प्रसन्नताके साथ अपनी स्त्री और पुत्रके द्वारा अपने आधे शरीरको आरेसे चिरवाकर मुझे दे दें, तो मैं तुम्हारे पुत्रको छोड़ सकता हूँ।’ राजाने बड़ी प्रसन्नतासे यह बात स्वीकार कर ली। उन्हें ऐसा मालूम हुआ कि इस वेशमें स्वयं भगवान् ही मेरे सामने उपस्थित हैं। वह बात सुनते ही सम्पूर्ण सदस्योंमें हलचल मच गयी। साध्वी रानीने अपनेको उनका आधा शरीर बताकर देना चाहा, पर भगवान्ने दाहिने अंशकी आवश्यकता बतलायी। पुत्रने भी अपनेको पिताकी प्रतिमूर्ति बताकर सिंहका ग्रास बननेकी इच्छा प्रकट की; पर भगवान्ने उसके द्वारा चीरे जानेकी बात कहकर उसकी प्रार्थना भी अस्वीकार कर दी।
अन्तमें दो खंभे गाड़कर उनके बीचमें हँसते हुए और उच्चस्वरसे भगवान्के ‘गोविन्द’, ‘मुकुन्द’, ‘माधव’ आदि मधुर नामोंका सस्वर उच्चारण करते हुए मयूरध्वज बैठ गये और उनके स्त्री-पुत्र आरा लेकर उनके सिरको चीरने लगे। सदस्योंने आपत्ति करनेका भाव प्रकट किया; परन्तु महाराजने यह कहकर कि ‘जो मुझसे प्रेम करते हों, मेरा भला चाहते हों, वे ऐसी बात न सोचें’ सबको मना कर दिया। जब उनका शरीर चीरा जाने लगा, तब उनकी बायीं आँखसे आँसूकी कुछ बूँदें निकल पड़ीं, जिन्हें देखते ही ब्राह्मणदेवता बिगड़ गये और यह कहकर चल पड़े कि ‘दु:खसे दी हुई वस्तु मैं नहीं लेता।’ फिर अपनी स्त्रीकी प्रार्थनासे मयूरध्वजने उन ब्राह्मणदेवताको बुलाकर बड़ा आग्रह किया और समझाया कि ‘भगवन्! आँसू निकलनेका यह भाव नहीं है कि मेरा शरीर काटा जा रहा है; बल्कि बायीं आँखसे आँसू निकलनेका भाव है कि ब्राह्मणके काम आकर दाहिना अंग तो सफल हो रहा है, परन्तु बायाँ अंग किसीके काम न आया। बायीं आँखके खेदका यही कारण है।’
अपने परम प्रिय भक्त मयूरध्वजका यह विशुद्ध भाव देखकर भगवान्ने अपने-आपको प्रकट कर दिया। शंख-चक्र-गदाधारी, चतुर्भुज, पीताम्बर पहने हुए, मयूरमुकुटी प्रभुने अभयदान देते हुए उनके शरीरका स्पर्श किया और स्पर्श पाते ही मयूरध्वजका शरीर पहलेकी अपेक्षा अधिक सुन्दर, हृष्ट-पुष्ट एवं बलिष्ट हो गया। वे भगवान्के चरणोंपर गिरकर स्तुति करने लगे। भगवान्ने उन्हें सान्त्वना दी और वर माँगनेको कहा। उन्होंने भगवान्के चरणोंमें अविचल प्रेम माँगा और आगे चलकर ‘वे भक्तोंकी ऐसी परीक्षा न लें’ इसका अनुरोध किया। भगवान्ने बड़े प्रेमसे उनकी अभिलाषा पूर्ण की और स्वयं अपने सिरपर कठोरताका लांछन लेकर भी अपने भक्तकी महिमा बढ़ायी। अर्जुन उनके साथ-ही-साथ सब लीला देख रहे थे। उन्होंने मयूरध्वजके चरणोंपर गिरकर अपने गर्वकी बात कही और भक्तवत्सल भगवान्की इस लीलाका रहस्य अपने घमंडको चूर करना बतलाया। अन्तमें तीन दिनोंतक उनका आतिथ्य स्वीकार करनेके पश्चात् घोड़ा लेकर वे दोनों चले गये और मयूरध्वज निरन्तर भगवान्के प्रेममें छके रहने लगे।
खूब ध्यान लगाओ, खूब प्रेम करो, ऐसा विश्वास करो कि आज भगवान् अवश्य प्रकट होंगे, फिर विलम्ब नहीं होता। अभी हमारी आशा-प्रतीक्षामें कमी है।
प्रभुका जन्म अलौकिक है, दिव्य है। भगवान् अकेले नहीं आते। जैसे भगवान् रामचन्द्रजीके साथ लक्ष्मणजी, भरतजी, शत्रुघ्नजी आये, वैसे ही श्रीकृष्णजीके साथ भी बलरामजी एवं बहुतसे गोप, गोपी उनके साथ लीला करनेके लिये आये थे। जो भगवान्के प्रेमी होते हैं, उनके चरणोंकी धूलि भी महान् पवित्र होती है। उद्धवजी कहते हैं कि प्रभु मुझे वृन्दावनमें लता-पत्ता बनायें, जहाँपर गोपियोंकी चरणधूलि लग-लगकर मैं पवित्र हो जाऊँगा। प्रभुके ऐसे भक्तोंसे यदि मिलन हो जाय तो फिर भगवान्से मिलनेकी परवाह न करे, उससे भगवान् स्वयं आकर मिलते हैं।
जो भगवान्के रहस्यको जान जाता है, सभीको भगवान्का स्वरूप समझता है, वह स्वत: आनन्दमय बन जाता है।