गीताकी महिमा

प्रवचन—दिनांक १७-६-१९३६, बुधवार, दोपहर, गीताभवन, स्वर्गाश्रम

जैसे समुद्रमें गोता मारनेपर चारों तरफ पानी-ही-पानी रहता है, और हम पानीमें ही डूबे रहते हैं उसी प्रकार आनन्दमें डूबे रहना चाहिये। उस आनन्दकी सीमा नहीं है। जैसे-जैसे भावनाकी प्रगाढ़ता होती है, वैसे-वैसे ही आनन्दकी सीमा बढ़ती जाती है। वही ज्ञानस्वरूप है, वही चेतनस्वरूप है, वही परमात्मा है, जब आनन्दमें डूबनेपर शरीर ही नहीं रहता है, तब संसार कहाँ रहेगा? आनन्दको जाननेवाला ही आनन्द है, आनन्द ही आनन्द है, शान्त आनन्द, चेतन आनन्द, अपार आनन्द सब तरफ मालूम पड़ता है। ऐसा भाव प्रभुकी कृपासे ही प्राप्त होता है।

प्रभुकी दयाका अनुमान कोई नहीं लगा सकता। समुद्रके जलका अनुमान लगाया जा सकता है, परन्तु प्रभुकी कृपाका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। प्रभुकी दया असीम है, पूतना राक्षसी जो कि भगवान‍्को विष देनेके लिये आयी थी, उसको भी भगवान‍्ने विषके बदलेमें मुक्ति दी। भगवान‍्की कितनी दया है।

गोपीचन्दकी माँ अपने पुत्रसे कहती है—

चार दिननकी चाँदनी फेर अँधेरी रात।

माताकी शिक्षासे गोपीचन्द भजनमें लग गये और संन्यास ले लिया।

हमलोगोंके जानेका समय निकट आ गया है, इसलिये तत्परतासे चेष्टा करनी चाहिये। भगवान‍्के प्रकट होनेमें एक क्षण भी नहीं लगता। आँखके झपकनेमें देर लगती है, किन्तु उनके प्रकट होनेमें देर नहीं लगती, केवल विश्वास होनेकी आवश्यकता है। भगवान् तो गले पड़कर प्रकट होना चाहते हैं, उनके समान दयालु कौन हो सकता है।

भगवान् अर्जुनके सम्मुख प्रकट हुए और बोले कि मेरे तत्त्वको जो जान जाता है, उसके उद्धारमें किसी प्रकारकी भी शंका नहीं है। जिनके राग, द्वेष, भय, क्रोध नष्ट हो गये हैं, ऐसे बहुत-से पुरुष मुझे प्राप्त हो चुके हैं।

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता:।

बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता:॥

(गीता ४। १०)

पहले भी, जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गये थे और जो मुझमें अनन्यप्रेमपूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे मेरे आश्रित रहनेवाले बहुत-से भक्त उपर्युक्त ज्ञानरूप तपसे पवित्र होकर मेरे स्वरूपको प्राप्त हो चुके हैं।

इन श्लोकोंमें भगवान‍्की दया, प्रेम और नीति भरी हुई है तथा निष्कामकर्मका उपदेश भी है। सारी गीता ज्ञान, योग एवं भक्तिका सागर है। गीताके महत्त्वके सामने रत्न तो कंकर, पत्थरसे भी तुच्छ हैं। गीता गंगासे बढ़कर है। गीता भगवान‍्के मुखारविन्दसे उत्पन्न हुई है और गंगा भगवान‍्के चरणोंसे उत्पन्न हुई है। गंगाजीमें स्नान करनेसे ही मनुष्य पवित्र होते हैं, किन्तु गीता तो घर-घर पहुँचकर कल्याण करती है। गीता ज्ञान और भक्तिसे परिपूर्ण है। गीताकी संस्कृत बड़ी सरल और मधुर है। उसमें किसीकी भी निन्दा नहीं है। उसके एक श्लोकको भी धारण करनेसे बेड़ा पार है। गीताकी महिमा अद‍्भुत है।

जिस देशमें महाराज श्रीकृष्णचन्द्रजीने अवतार लिया, जहाँ उनके चित्र उपलब्ध हैं, जहाँ उनकी कृपा बह रही है, वहाँसे हमलोग खाली हाथ जायँ तो हमलोगोंकी कितनी मूर्खता है।

वृन्दावनमें उनकी मधुर वंशीकी धुन सुनकर पशु-पक्षीतक बेसुध हो जाते थे। विचार करनेसे हमलोग पशु-पक्षीसे भी गये- बीते हैं। एक मनुष्य अमेरिका गया, वहाँ रहनेवालोंने उससे पूछा कि तुम गीता पढ़े हो? तब उसने कहा कि मैंने नहीं पढ़ा। तब वहाँके लोगोंने उसे धिक्‍कार दिया और कहा कि जहाँ श्रीकृष्णचन्द्रजीने अवतार लेकर गीता सुनायी है, आप उस देशके वासी हैं, आपने इतना पढ़ा-लिखा, किन्तु गीताका अनुभव नहीं किया, यह कितनी बड़ी मूर्खता है। फिर उसने आकर गीता पढ़ी। वे सज्जन मेरे एक मित्रको यात्रामें गीता पढ़ते हुए मिले थे। वार्तालापमें उन्होंने यह बात बतायी।

चलते, उठते, बैठते सभी समय गीताका स्मरण रखना चाहिये, गीताके अनुसार ही सारे कर्तव्य करने चाहिये। गीता भगवान‍्का हृदय है। मरते समय गीताकी पुस्तक मस्तकपर रख दी जाय तो भी कल्याण हो जाता है, फिर उसको अर्थसहित याद रखनेवाला तो महात्मा ही हो सकता है।

प्रभुके नाम, गुण, स्वरूपकी महिमा अपार है। जो आदमी कहता है कि मेरा ध्यान नहीं लगता तो समझना चाहिये वह ध्यानके लिये प्रयत्न ही नहीं करता। जब हमारा ध्यान सांसारिक चित्र देखनेमें लग सकता है, लग जाता है, तब फिर भगवान‍्के चित्रमें ध्यान लगाना कौन-सी बड़ी बात है। विश्वास होनेपर भगवान‍्का प्रत्यक्ष दर्शन होना एकदम सरल है।

रामका नाम लेनेसे राम याद आ ही जाना चाहिये। उनका स्वरूप इतना मोहित करनेवाला है, उनके दर्शनमें इतना आनन्द आता है कि शरीरको काट डालनेपर भी मालूम नहीं पड़ता है।

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:।

यस्मिन् स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते॥

(गीता ६। २२)

परमात्माकी प्राप्तिरूप जिस लाभको प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मप्राप्तिरूप जिस अवस्थामें स्थित योगी बड़े भारी दु:खसे भी चलायमान नहीं होता।

हमलोग नकली कीर्तन करते हैं, उसमें भी कितना आनन्द आता है। प्रभुका नाम कृष्ण है, ‘कृष्’=आकर्षणका द्योतक है और ‘ण’ आनन्दका द्योतक है। इस प्रकार प्रेममें मग्न होकर भगवान‍्के नामका उच्चारण करे और आनन्दमें पागलकी तरह मग्न हो जाय, फिर उस समयका तो कहना ही क्या है।

हमलोग भगवान‍्को ढूँढ़ रहे हैं, किन्तु वे तो यहीं हैं। उनको देखनेके लिये कई रास्ते हैं। सर्वोत्तम तो यही है कि जहाँ हमारे नेत्र जायँ, वहीं-वहीं परमात्माका स्वरूप ही देखें। सारे संसारको आप अपना बना लें और उसमें भगवान‍्का ही चेहरा देखें। गोपियाँ पत्ते-पत्तेपर भगवान‍्का रूप देखती थीं। आँखके सामने भगवान‍्की मूर्ति बाँध लें। भगवान‍्को साकाररूपमें इस तरह देखना चाहिये कि पत्ते-पत्तेपर प्रभुकी मूर्ति दीखे।

एक व्यक्ति भगवान‍्की भक्ति करता था। वह नित्यप्रति बगीचेसे फूल ले जाकर भगवान‍्की प्रतिमापर चढ़ाता था। जब उसे पूर्ण विश्वास हुआ तो प्रभुकी साक्षात् मूर्ति हर जगह दीखने लगी। जब वह फूल तोड़ने गया तो जिस वृक्षके पास जाता, उसी वृक्षपर जो फूल होते, वे भगवान‍्के मस्तकपर ही चढ़े दीखते। क्या ही आनन्दमयी अवस्था है। ऐसे ही विश्वास कर प्रभुको सर्वत्र देखनेका अनुभव करे। सारा ब्रह्माण्ड भगवान‍्के एक अंशमें स्थित है।

ज्ञानके मार्गसे देखनेपर सारा ब्रह्माण्ड आनन्दसे भरा पड़ा है। जैसे बर्फमें जल-ही-जल भरा है। तत्त्वज्ञ जिधर भी देखता है, उधर उसे आनन्द-ही-आनन्द दीखता है। जैसे चन्द्रमा और चाँदनी एक ही है। पानी और बर्फ एक ही है। उसी तरह भगवान् भी साकार-निराकार एक ही हैं। जैसे पानी बर्फरूपमें साकार हो जाता है, वैसे ही भगवान् भी निराकारसे साकार हो जाते हैं। इसमें कोई शंकाकी बात नहीं है। जैसे आनन्दका उच्चारण करनेसे प्रत्यक्षरूपमें रोमांच होता है। गंधकी बात चले तो सुगन्ध आने लगती है। प्रकाशकी बात चले तो प्रकाश दीखने लग जाता है, वैसे ही प्रकट होनेकी बात चले और भगवान् प्रकट हो जायँ, इसमें कौन-सी बड़ी बात है। विश्वास कर कहना चाहिये कि परमात्मा अभी आते हैं तो वे आ जायँगे। विश्वास करनेकी बात है। देखिये सभामें द्रौपदीको अपमानित किया जा रहा है, उस समय द्रौपदीका विश्वास अटल था, उसकी आर्त पुकारकी भगवान‍्ने कैसी लज्जा रखी। उनके आनेमें क्षणभर भी नहीं लगा। वैसी ही आर्त पुकार हमें भी लगानी चाहिये।

प्रभुकी कितनी कृपा है। लँगड़ा भी पहाड़ लाँघ जाता है, गूँगा भी बोल सकता है, भगवान‍्की दयाका प्रवाह बड़े जोरोंसे बह रहा है, जो जितनी चाहे वह उतनी दया ले सकता है। लेना स्वयंके हाथ है।

भगवान् बिजलीके समान प्रकट हो सकते हैं। पन्द्रह वर्ष बाद महाराज वेदव्यासजीने सम्पूर्ण सेनाका आवाहन करके सबको मिला दिया। वेदव्यासजीमें अलौकिक शक्ति थी। भगवान‍्के प्रकट होनेका यही उपाय है कि सब लोग मिलकर एकदम आर्त पुकार लगायें, तब भगवान् आ सकते हैं। भगवान् जहाँ-जहाँ भी प्रकट हुए हैं, वहाँ-वहाँ विश्वाससे ही प्रकट हुए हैं। भगवान् अपने भक्तकी बात रखनेके लिये खम्भेमेंसे भी प्रकट हो गये। भगवान् निराकार-रूपसे हर जगह उपस्थित हैं ही। जो आर्त होकर उन्हें पुकारता है, वे उसकी आर्त पुकार सुनकर बिजलीके समान प्रकट हो जाते हैं।

एक गरीब आदमी था। उसका एक साधुमें विश्वास था। वह साधुके पास गया। उसने कहा मुझे धनकी बड़ी आवश्यकता है, मेरे घरपर एक पत्थरकी शिला पड़ी हुई है, वह सोनेकी हो जाय तो मैं धनवान हो जाऊँ। साधुको दया आ गयी, उन्होंने कहा आठ पहरतक शिला सोनेकी हो, शिला सोनेकी हो कहो तो वह सोनेकी हो जायगी। उसको साधुपर विश्वास था, वह आठ पहरतक कहता ही रहा—शिला सोनेकी हो, शिला सोनेकी हो। अन्तमें जब आठ पहरमें थोड़ा-सा समय बाकी रह गया, तब वह घबराकर मनमें विचार करने लगा कि शिला सोनेकी तो नहीं हुई, तब उकताकर वह कहने लगा शिला सोनेकी न हो तो लोहेकी तो हो जा, यह शब्द उसके अन्तिम विश्वासके थे, शिला लोहेकी हो गयी। वैसे ही विश्वास होनेपर भगवान् हरेक रूपमें प्रकट हो सकते हैं। जिस रूपमें विश्वास हो उसी रूपसे प्रकट हो जाते हैं।

रातको जो स्वप्न आता है वह प्रत्यक्ष ही प्रतीत होता है। उस समय कोई शंका नहीं रहती। भगवान् तो हर समय प्रत्यक्ष हैं ही। सिर्फ मायाका पर्दा अपने ऊपर पड़ा हुआ है।

शान्ति, आनन्द ये सब उन्हींके स्वरूप हैं, वह परिपूर्ण है। जितने भी उसके विशेषण हैं, सभी उनमें विद्यमान हैं।