घर-घरमें मूर्तिपूजा
प्रवचन—दिनांक १५-६-१९३६, सोमवार, प्रात:काल, गीताभवन, स्वर्गाश्रम
हरेक व्यक्ति अपने-अपने घरमें भगवान्की मूर्तिका पूजन करे तो उत्तम बात है, स्त्रियोंको चाहिये कि अपने पतिके साथ ही तीर्थ व मन्दिर आदिमें जायँ। जहाँतक हो सके वहाँतक घरमें ही भगवान्की मूर्ति रखकर दर्शन करना उत्तम है। मन्दिरोंमें जानेकी कोई आवश्यकता नहीं है। प्रतिष्ठित मन्दिरमें जानेकी आवश्यकता होनेपर पतिके साथ ही जाना चाहिये। भगवान्की आराधना स्त्री-पुरुष सभी कर सकते हैं। उससे अपने-आप परमगतिकी प्राप्ति हो जाती है।
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय:।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥
(गीता ९। ३२)
हे अर्जुन! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि—चाण्डालादि जो कोई भी हों, वे भी मेरी शरण होकर परमगतिको ही प्राप्त होते हैं।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥
(गीता १८। ६२)
हे भारत! तू सब प्रकारसे उस परमेश्वरकी ही शरणमें जा। उस परमात्माकी कृपासे ही तू परम शान्तिको तथा सनातन परम धामको प्राप्त होगा।
भगवान्की भक्तिसे दुर्लभ-से-दुर्लभ वस्तुकी प्राप्ति हो जाती है। जब भगवान् स्वयं उसके आधीन हो जाते हैं तो और क्या बाकी रहा। कलियुगमें बहुत-से भक्तोंको भगवान् मिले हैं। जो भगवान्के मिलनेमें शंका रखता है, वह भक्त होते हुए भी दर्शनसे वंचित रह सकता है। वे नहीं मिल सकते या नहीं मिलते हैं, यह कहना मूर्खता है। कहनेवाला सर्वज्ञ नहीं है, इसलिये उसे ऐसा कहनेका अधिकार ही नहीं है। यदि कोई चीज हमारे देखनेमें नहीं आयी तो हम ऐसा कैसे कह सकते हैं कि वह चीज नहीं होती, क्योंकि हम संसारके छोटेसे एक कोनेमें पड़े हैं। हम संसारकी सारी वस्तुओंको कैसे समझ सकते हैं। इसलिये भगवान् नहीं हैं, ऐसा कहना मूर्खता ही तो है।
सब आदमियोंको सभी वस्तुओंकी आवश्यकता नहीं होती है। शूद्रोंको वेद पढ़नेकी आवश्यकता नहीं है। उनका उद्धार वेद पढ़नेसे जितनी जल्दी नहीं हो सकता, उतनी जल्दी भक्ति और सेवासे हो सकता है। वैसे ही स्त्रीका उद्धार भी जितनी जल्दी पतिकी सेवासे हो सकता है, उतनी जल्दी उद्धार होनेका और कोई उपाय नहीं है। ब्राह्मणको वेद पढ़कर ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। वे यदि सेवा-कार्य करें तो उनका उद्धार नहीं हो सकता, इसलिये उन्हें वेद पढ़नेकी आवश्यकता है। जितनी बातोंकी शास्त्रोंमें व्यवस्था की गयी है, उनमेंसे हम पूर्ण रीतिसे थोड़ी भी पालन नहीं कर रहे हैं। भगवान्की भक्तिसे साक्षात् दर्शन हो सकते हैं। वेद पढ़नेसे भी जैसे दर्शन नहीं हो सकते, वैसे अनन्य भक्तिसे हो सकते हैं।
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥
(गीता ११। ५३)
जिस प्रकार तुमने मुझको देखा है—इस प्रकार चतुर्भुज-रूपवाला मैं न वेदोंसे, न तपसे, न दानसे और न यज्ञसे ही देखा जा सकता हूँ।
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप॥
(गीता ११। ५४)
परन्तु हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्तिके द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज रूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखनेके लिये, तत्त्वसे जाननेके लिये तथा प्रवेश करनेके लिये अर्थात् एकीभावसे प्राप्त होनेके लिये भी शक्य हूँ।
ऐसा सोचकर हरेक भाईको साधनमें लग जाना चाहिये। हमारी आत्माका कल्याण तो गीताके एक श्लोकसे ही हो सकता है।
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥
(गीता १०। ९)
निरन्तर मुझमें मन लगानेवाले और मुझमें ही प्राणोंको अर्पण करनेवाले मेरी भक्तिकी चर्चाके द्वारा आपसमें मेरे प्रभावको जनाते हुए तथा गुण और प्रभावसहित मेरा कथन करते हुए ही निरन्तर सन्तुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेवमें ही रमण करते हैं।
इस श्लोकको धारण करनेवालेकी बड़ी भारी महिमा भगवान्ने गायी है। आगे इसका फल कहा है—
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥
(गीता १०। १०)
उन निरन्तर मेरे ध्यान आदिमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजनेवाले भक्तोंको मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।
भजन, ध्यान, सत्संग इन सबमें स्त्री-पुरुष सबका समान अधिकार है। बुद्धि देना, न देना भगवान्का काम है। वे चाहे दर्शन दें, चाहे न दें, यह भगवान् ही जानें। अपना कार्य तो भजन, ध्यान, सेवा, सत्संग आदि करनेका है। मुक्तिकी इच्छा भी नहीं करनी चाहिये। मुक्तिकी इच्छा भी सकाम भाव है।
सगुणका ध्यान करते समय आसनसे बैठना चाहिये। ध्यानके पहले वैराग्यकी आवश्यकता है। पवित्र स्थान यह है ही। भागीरथीका तट है, तीर्थ है और भगवच्चर्चा चल रही है। ऐसे समयमें वैराग्य होना स्वाभाविक-सी बात है।
नाम-नामी एक ही वस्तु है, जहाँ कीर्तन होता है वहाँ भगवान्का नाम ही भगवान् है। भगवान् गुप्तरूपसे प्रकट रहते हैं, साक्षात् प्रकट होनेमें श्रद्धाकी कमी है।
ध्यानके समय सारे संसारसे वृत्तियोंको हटाकर बैठना चाहिये। मनको समझाकर भगवान्की ओर लगाना चाहिये। भगवान्के सिवाय और किसीमें आनन्द नहीं है, इसलिये भगवान्से ही प्रेम करना चाहिये। भगवान्से प्रार्थना करनी चाहिये—हे नाथ! आप ऐसी बुद्धि दीजिये, जिससे मैं आपको क्षणभर भी न बिसार सकूँ, आपकी आज्ञाओंका पालन करता रहूँ। मैं कहता हूँ और चाहता हूँ कि आपका बनूँ, परन्तु नहीं बन पाता हूँ। संसारके विषयोंमें लिपायमान होनेके कारण मैं अभीतक अनन्य शरण नहीं हो सका हूँ। आप ही मेरे कल्याणका मार्ग बताइये, मैं आपकी शरण हूँ।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव:
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता:।
यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥
(गीता २।७)
इसलिये कायरतारूप दोषसे उपहत हुए स्वभाववाला तथा धर्मके विषयमें मोहितचित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिये कहिये; क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिये।
हे नाथ! संसारमें मेरा जितना प्रेम है, वह सब हटकर आपमें हो जाय। प्रभु इतना तो होना चाहिये कि आपका ध्यान तो बना रहे। आपके नाम-गुणका कीर्तन आपके भक्तोंद्वारा सुनता रहूँ, स्वयं करता रहूँ। बस फिर मेरा जन्म घोर नरकोंमें हो तो भी कोई आपत्ति नहीं है। भगवान् प्रसन्न होकर वरदान माँगनेके लिये कहें तो यही माँगना चाहिये कि आप मुझे सदा अपने चरणोंमें ही रखें, आपसे मेरा कभी वियोग न हो, मैं आपके मुखारविन्दका दर्शन करता रहूँ, मैं आपकी सेवासे अलग न होऊँ। सेवाके दो पात्र हैं एक तो महान् सुखी, दूसरे महान् दु:खी, सबसे महान् सुखी आप हैं और सबसे महान् दु:खी संसारके नरक भोगनेवाले जीव हैं। मुझे आप या तो आपकी सेवामें ही रखिये या उनकी सेवामें रखिये। उनको आपके गुण-प्रभावकी बातें बताकर उन्हें भी आपकी शरणमें ला सकूँ। युधिष्ठिरजीके थोड़ी देर नरकके जीवोंके पास जानेसे उन जीवोंको कितना आनन्द हुआ, उन्होंने स्वर्गमें जानेसे इन्कार कर दिया, कहा कि मैं यहीं रहना चाहता हूँ। इन जीवोंको मेरे यहाँ रहनेसे सुख है तो मैं इन्हें यहाँ दु:खी छोड़कर स्वर्गमें जाकर क्या लाभ उठा सकता हूँ? ऐसे भक्त तो भगवान्से यही वरदान माँगते हैं कि हम नरकोंके जीवोंको उपदेश करें, उनकी सेवा करें, उनको आपका गुण-प्रभाव बतायें, आपकी ओर आकर्षित करें, यही वरदान दीजिये।
नामजपसे बड़ा आनन्द प्राप्त होता है। जो जप करता है वह मुग्ध हो जाता है। जिनमें प्रेम है उन्हें सर्वोच्च आनन्द आता है।
जबहिं नाम हिरदे धरॺो
भयो पापको नास।
जैसे चिनगी अग्निकी
परी पुरानी घास॥
नामको हृदयमें रखते ही सारे पापोंका नाश हो जाता है। पूर्ण विश्वासकी आवश्यकता है। भगवान्का नाम केवल पापके नाशके लिये ही नहीं लिया जाना चाहिये। नामका उच्चारण तो प्रेमकी प्राप्तिके लिये करना चाहिये। पाप तो भक्तोंकी मुग्धता देखनेसे ही नष्ट हो जाते हैं। इसलिये नामजपके लिये सर्वोच्च ध्येय प्रेम ही होना चाहिये। प्रेमका हेतु तो प्रेम ही है। जब प्रेम हो जायगा तो भगवान्के दर्शन हो जायँगे। इससे कई जीवोंका कल्याण हो सकता है। ऐसे भक्त यदि अतीर्थमें भी जायँ तो वे भी तीर्थ बन जाते हैं।
हमारेमें जितना लोभ है, सब भगवान्का दर्शन होनेकी ओर लगा देना चाहिये और क्रोधके द्वारा अपनी इन्द्रियोंपर विजय करनी चाहिये, उनको संयममें लाना चाहिये। केवल भगवान्की ओर ही प्रेम बढ़ाना चाहिये। भगवत्प्रेमके समान कुछ भी नहीं है, भजन तो साधन है और प्रेम है साध्य, साध्य वस्तु भगवत्प्रेम ही है।
जब रामजीका ध्यान करते हैं तो रामजीकी मूर्ति सामने आ ही जाती है। ध्यान लगाते समय यह श्लोक ध्यानमें लानेसे सुगमता होती है—
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थित:।
मन: संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्पर:॥
(गीता ६। १४)
ब्रह्मचारीके व्रतमें स्थित, भयरहित तथा भलीभाँति शान्त अन्त:करणवाला सावधान योगी मनको रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होवे।
एकान्तमें बैठकर ध्यान करना चाहिये। ध्यानसे आलस्य, स्फुरणा, अशान्तिका एकदम अभाव हो जाता है और चित्तको शान्ति प्राप्त होती है।
भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करनेसे भगवान् श्रीकृष्ण साक्षात् रूपमें प्रकट हो जाते हैं। भगवान् मुसकरा रहे हैं, कितना अद्भुत प्रकाश है, नेत्रोंमें कितना प्रेम है। जिनको आपका दर्शन हो गया, वह भी आपके समान प्रेममय दिव्य हो गया। भगवान्का मस्तक कैसा चमक रहा है, तिलक कितना सुन्दर है, काले-काले बाल कितने सुन्दर हैं, मोरका मुकुट कितना सुन्दर है। प्रभुकी कमर भी टेढ़ी, नाक भी टेढ़ी, मुकुट भी टेढ़ा है, इसीलिये आपका नाम बाँकेबिहारी है। प्रभुका अमृतमय रूप है। मन करता है कि देखते ही रहें। प्रभुमें कितनी दया, शान्ति और प्रकाश है, कितना प्रेम है। भगवान् कहते हैं कि मैं पवित्रोंसे पवित्र हूँ, मंगलोंका भी मंगल हूँ, ऐसा मंगलमय स्वरूप हमारे ध्यानमें प्रकट है। ऐसे भगवान्को निरन्तर देखते रहें, मुग्ध होते रहें।