कर्मयोग तथा भक्तियोग
प्रवचन—दिनांक ७-१-१९३७, गोरखपुर
आज कर्मयोग और भक्तियोगके विषयमें कुछ कहनेका विचार है। ये दोनों उत्तम होते हुए भी भक्तियोग प्रधान है, भक्तियोगकी ही महिमा भगवान्ने गायी है, पर खयाल करना चाहिये कि भक्तियोगमें कर्म गौणरूपमें और कर्मयोगमें भक्तियोग गौणरूपसे मौजूद है। दोनोंका फल एक ही है, फिर भी भक्तिकी श्रेष्ठता है।
जैसे ज्ञानयोग और भक्तियोगमें भक्तियोगको विशेष बताया गया है। इसी प्रकार कर्मयोग और भक्तियोगका समान फल होनेपर भी एक विशेषता है। जैसे एक पिताके चार पुत्र हैं, सभीको सम्पत्ति बराबर-बराबर मिलेगी, फिर भी जो पिताकी अधिक सेवा करता है, उसपर पिताका अधिक प्रेम होता है, यह विशेषता है। इसी प्रकार कर्मयोगी और भक्तियोगी दोनों ही मुक्तिको प्राप्त करेंगे, पर भक्त प्रभुको विशेष प्यारा है। जैसे पिताका सेवक और प्रेमी पुत्र पिताकी गुप्त बातोंको, रहस्यको अधिक बतला सकता है। इसी तरह भक्त भी प्रभुके प्रेम, रहस्य, मर्मकी बातोंको अधिक बतला सकता है। पिताका सम्पत्तिके अतिरिक्त प्रेमका स्वतन्त्र अधिकार होता है, वह अपने प्रिय पुत्रको ही बताता है। इसी प्रकार प्रेमी भक्तको परम पिता परमेश्वर अपना स्वतन्त्र अधिकार, संसारके उद्धारका अधिकार दे देते हैं। यह उसमें विशेषता है। इसीलिये भगवान्ने कहा है—
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिक:।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥
(गीता ६। ४६)
योगी तपस्वियोंसे श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियोंसे भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करनेवालोंसे भी योगी श्रेष्ठ है; इससे हे अर्जुन! तू योगी हो। आगे कहते हैं—
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मत:॥
(गीता ६। ४७)
सम्पूर्ण योगियोंमें भी जो श्रद्धावान् योगी मुझमें लगे हुए अन्तरात्मासे मुझको निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है।
भक्तियोगका क्या अभिप्राय है। भज धातुसे भक्ति बनती है। भजका अर्थ है सेवा करना, सेवाका अभिप्राय है प्रभुके अनुकूल हो जाना। दूसरा अर्थ यह है कि ईश्वरमें परम अनुराग, परम प्रेमका नाम ही भक्ति है।
ईश्वरकी सेवा और प्रेम दोनोंको लेना चाहिये। प्रभुका प्रेम और उनकी आज्ञापालन—इसका नाम भक्ति है। सकामभावसे कर्मोंका करना कर्मयोग नहीं है। निष्कामभावसे कर्मोंका करना कर्मयोग है।
भक्तिमार्गमें कर्मोंका त्याग नहीं है। विशेष प्रेममें आज्ञापालन न हो वह बात दूसरी है, पर वह जान-बूझकर आज्ञाका उल्लंघन नहीं करता। जब उसे प्रेमातिरेकके कारण तन-मनका ज्ञान ही नहीं रहता, उस अवस्थामें उसने कर्मोंका त्याग नहीं किया, कर्म स्वयं छूट जाते हैं। ऐसी दशामें प्रभु अधिक प्रसन्न होते हैं। इसे देखकर कोई इसकी नकल करने लगे, यह ठीक नहीं है।
एक समयकी बात है श्रीकृष्ण विदुरजीके यहाँ गये, उस समय विदुरजी घरपर नहीं थे, उनकी पत्नी थीं। उन्हें इतना आनन्द आया कि शरीरकी सुधि नहीं रही। प्रभुको केले खिलाते समय छिलका खिलाने लगी और गूदा फेंकने लगी। इतनेमें विदुरजी आ गये और कहा क्या कर रही है। उसे होश हुआ और कहा कि मैंने बड़ा अपराध किया। बादमें केलेके अन्दरका गूदा खिलाया। नारायणने कहा इसमें वह आनन्द नहीं आया, जितना छिलकोंमें आया था। छिलकोंमें आनन्द आया था यह बात नहीं थी, वह तो प्रेमकी परिस्थितिका ही स्वाद था। नकल करनेमें तो अवहेलना हो जाती है। भक्तिमें कर्मोंकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। भक्तिमें प्रेम ही प्रधान है। जितना अधिक प्रेम होगा, उतनी ही जल्दी प्राप्ति होती है। प्रेम सारे कर्मोंका और सारे भावोंका फल है।
यहाँ विचार करना है कि अनन्य प्रेम निष्काम ही होता है। सकाम प्रेम अनन्य नहीं होता। किसी अन्यमें प्रेम नहीं हो वही अनन्य है। किसी और चीजकी कामना है तो अनन्य कहाँ हुआ। जैसे धन आदिकी कामनाको लेकर प्रभुमें जो प्रेम है वह तो वास्तवमें धन आदिमें ही प्रेम है, प्रभुमें नहीं। उसका मुख्य उद्देश्य तो धन ही है।
उद्देश्य दूसरी वस्तुका न हो, पर आपत्ति पड़नेपर प्रभुको आपत्ति-निवारणार्थ स्मरण करे—यह दूसरी बात है। इसे मुख्य प्रेम कहा जा सकता है। पर अनन्य प्रेम नहीं, जैसे द्रौपदी, गजेन्द्र आदि।
अनन्यप्रेममें कामनाकी जरा भी गुंजाइश नहीं है। द्रौपदी एवं गजेन्द्रका प्रेम अनन्य नहीं है। अनन्य प्रेम तो प्रह्लादका है, जो भारी-से-भारी आपत्ति पड़नेपर भी प्रभुसे कुछ भी नहीं कहते।
प्रभु तो एक प्रेमका नाता ही जानते हैं। तभी तो वे कहते हैं—
जानहुँ एक भगति कर नाता।
प्रह्लाद ज्ञानी, निष्काम और अनन्य प्रेमी हैं। हिरण्यकशिपुने लोभ भी दिखाया, डर भी दिखाया, पर उन्होंने भजनको नहीं छोड़ा—इसीको अनन्य प्रेम कहते हैं। भगवान् उनसे कहते हैं बेटा प्रह्लाद मैं तुम्हारा अपराधी हूँ, मुझे यहाँ तुम्हारे पास पहुँचनेमें अति विलम्ब हो गया, इस अपराधके लिये मैं तुमसे क्षमा चाहता हूँ।
प्रह्लादका तो विशुद्ध प्रेम था, इसलिये भगवान्ने ऐसा कहा, पर जो धनके लिये भगवान्को बुलाते हैं, वहाँ भगवान् ऐसा नहीं कहते। अर्थार्थी और आर्त भक्तका अन्तर देखिये—
चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥
(गीता ७। १६)
चार प्रकारके सुकृतिजन मुझे भजते हैं, उनमें भी ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्यारा है। जिस प्रेमकी सीमा नहीं रहती, उसे अत्यन्त कहते हैं और मैं ज्ञानीको अत्यन्त प्रिय हूँ। ज्ञानी किसे कहते हैं यह समझना चाहिये। जो परमात्माको प्राप्त हो चुका है, वह तो ज्ञानी है ही, पर भगवान्से मिलनेसे पूर्व जो निष्काम भक्त है, वह भी ज्ञानी है। जैसे प्रह्लाद भगवद्दर्शनसे पूर्व भी निष्काम ज्ञानी भक्त थे। उन्हें जिज्ञासु भक्त नहीं मान सकते, क्योंकि उसके कोई जिज्ञासा नहीं थी। यहाँ ज्ञानी शब्द इस बातको बतला रहा है कि ज्ञानीसे पहलेके तीनों भक्त ज्ञानी नहीं थे। ज्ञानी होते तो भगवत्तत्त्वके ज्ञाता होते और भगवान्के तत्त्वका ज्ञानी होनेसे दु:ख-निवारणकी प्रार्थना नहीं करते।
अर्थार्थी—जो सांसारिक पदार्थोंके लिये, अर्थके लिये भजे।
आर्त—जो दु:ख-निवृत्तिके लिये प्रार्थना करे।
जिज्ञासु—वह बड़े-से-बड़ा दु:ख या संकट आनेपर भी यहाँतक कि मर जानेपर भी प्रभुसे कोई वस्तु नहीं माँगता। वह तो केवल प्रभुको जानना चाहता है।
ज्ञानी—उसे तो मुक्तिसे भी कोई प्रयोजन नहीं है, वह तो अपना कर्तव्य करता रहता है।
कोई अर्थार्थीका अर्थ इस प्रकार कहते हैं कि प्रभुके दर्शनरूपी अर्थका अर्थी है, अर्थात् प्रभुके दर्शनोंको चाहता है। स्त्री, पुत्र, धनादिके लिये भगवान्को जो भजता है उसे भगवान् यह नहीं कह सकते कि यह हमारा भक्त नहीं है। वे तो बड़े दयासागर हैं। जरासेमें भी भक्त समझने लगते हैं।
जैसे ध्रुवका उद्देश्य था राज्यप्राप्ति, उसने राज्यके लिये ईश्वरकी भक्ति की। इसलिये उसे भगवान् भी मिल गये और राज्य भी मिल गया। भगवान् कहते हैं—कोई मुझे किसी भी प्रकार भजे, वह मुझे ही प्राप्त होता है। उसे भगवान् उदार कहते हैं। कोई कहे यह कैसे? उत्तर दिया जाता है—संसारके भोगोंकी सिद्धि प्रभुसे होती है, यह समझकर भक्ति करता है। इसी विश्वासपर ध्रुवने भी प्राणोंकी परवाह छोड़कर भक्ति की। प्रभु कहते हैं जिसे मेरे अस्तित्वमें, मेरे होनेपनमें ही विश्वास हो, उसे भगवान् भक्त कहते हैं। वह आस्तिक है। आगे चलकर भगवान्की भक्तिमें वृद्धि हो जाती है।