मनुष्यका कर्तव्य

श्रीतुलसीदासजीके वचन हैं—

कबहुँक करि करुना नर देही।

देत ईस बिनु हेतु सनेही॥

भगवान‍्ने हमें मनुष्य बनाया यह विशेष कृपा की है। इसपर भी कल्याण नहीं होता, इसमें मनुष्यकी मूढ़ता है। गंगा-स्नानसे कल्याण हुआ, इसमें गंगाकी कृपा ही माननी चाहिये, अन्यथा नदियाँ तो और भी बहुत-सी हैं, पर हमें गंगातक तो जाना ही पड़ेगा।

इसमें प्रश्न होता है कि पुरुषार्थ तो हमारा ही हुआ? कहा जा सकता है कि गंगाने कृपा की जो धरतीपर आयीं। नहीं आतीं तो क्या हम गंगासे लाभ ले पाते, इसलिये सिद्ध हुआ कि पुरुषार्थमें भी गंगा ही हेतु है।

सूर्य=ईश्वर, प्रकाश=दया, नेत्र=बुद्धि है। बुद्धिसे देखेंगे तो पता चलेगा कि पद-पदपर ईश्वरकी दया है। हमें सभी पदार्थ ईश्वरकी दयासे मिलते हैं।

मनके विपरीतमें क्रोध आता है अनुकूलमें नहीं। इसे ऐसा समझे कि जो कुछ विपरीत होता है उसे भगवान् ही कर रहे हैं। ऐसे मौकेपर हम क्रोध नहीं करेंगे, परीक्षामें पास हो जायँगे तो आगे चलकर भगवान् मिलेंगे ही।

केवल अहंकार न आये इसीलिये ईश्वरकी दयाको माने, यह तो गौण बात है, पर वास्तवमें पुरुषार्थमें भी ईश्वरकी दया ही है।

प्रश्न—जिसे परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है, उसके नास्तिकोंका संग हो और भगवान् नहीं हैं, नहीं हैं—ऐसा सुनता रहे तो उसकी भी यह धारणा हो सकती है क्या कि भगवान् नहीं हैं?

उत्तर—नहीं, क्योंकि मैं किसीको जानता हूँ, उसके कुटुम्बको देख चुका हूँ, फिर कोई कहे कि वह नहीं है तो क्या उसको मैं मान सकता हूँ।

आत्माके प्रत्यक्ष जो है, उसमें कभी सन्देह नहीं हो सकता। इदम‍्का तो अभाव हो जाता है, किन्तु अहम‍्का अभाव कभी नहीं होता। जाग जानेपर स्वप्नके संसारमें कभी हम जा सकते हैं क्या? प्राप्तिके बाद नास्तिकोंके संगसे परमात्मा नहीं हैं, ऐसी धारणा कभी नहीं हो सकती। परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अप्राप्ति हो ही नहीं सकती। इसमें शंका बन ही नहीं सकती।

मनुष्यका क्या कर्तव्य है? यदि शास्त्रको माने तो गीतामें लिखा हुआ माने, महात्मापर विश्वास हो तो वह कहे वैसे करे, यदि बुद्धिपर विश्वास हो तो उसका आसरा ले।

प्रत्यक्षपर तो विश्वास करना ही होगा। वृक्षोंका क्या उपयोग हो सकता है। फल खानेके काम आता है। छाया बैठनेके काममें आती है, देखते हो तो क्या विचारते हो, घोड़ा चढ़नेके काम आ जाता है, कुत्ता तो चढ़नेके लायक भी नहीं है, गायसे दूध मिलता है। सबके लिये सोचा, किन्तु अपने विषयमें नहीं सोचा-विचारा कि हमारा शरीर किस कामके योग्य है। दुनियामें जितने जीव हैं, सबसे श्रेष्ठ जो तुम देखते हो उनमें देवता-पितरोंको छोड़ दो, क्योंकि वे दीखते नहीं। दीखनेवालोंमें कौन श्रेष्ठ है? गदहा है? नहीं। सूअर है? नहीं। गाय है? ठीक-ठीक है। सबसे उत्तम क्या है? मनुष्य। मनुष्यसे भी उत्तम कोई लगता है?

देवता, पितरोंके बारेमें सुना है, किन्तु उन्हें कभी देखा नहीं। मनुष्य, पशु, पक्षी तो देखनेमें आते हैं। उनमें श्रेष्ठ मनुष्य लगता है।

इन सबका प्रबन्ध कौन कर सकता है? पशु-पक्षी नहीं कर सकते, मनुष्य कर सकता है, अत: यह तुम्हारा कर्तव्य हुआ, यदि तुम इन्हें सुख नहीं पहुँचाते हो तो भविष्यमें यदि तुम पशु-पक्षी होओगे तब तुम्हें कौन सुख पहुँचायेगा।

खाद्यपर विचार करो। पशु-पक्षी खाद्य नहीं हैं। गरीबपर कोई अत्याचार करे तो क्या करे बेचारा। तुम्हारे दाँत, नाखून आदिसे यही पता लगता है कि तुम्हारा आहार मांस नहीं है। बन्दरके-से दाँत हैं। बन्दर कभी मांस नहीं खाता, फल, अन्न खाता है, यही तुम्हारा खाद्य है। मनुष्यतासे अपनेको सँभालोगे तो तुम्हें अपने-आप अपना कर्तव्य समझमें आ जायगा। महात्मा, शास्त्रकी बात मानो तो शीघ्र ही समझमें आ जायगा। तुमसे कोई-न-कोई तो श्रेष्ठ है ही। उनकी बात मानोगे तो शीघ्र काम बन जायगा। अपनी बुद्धिपर निर्भर होनेसे कभी धोखा भी हो जाता है।