नीति और साधुता
प्रवचन—दिनांक १५-६-१९३६, मंगलवार, दोपहर, गीताभवन, स्वर्गाश्रम
यह बात तो ठीक ही है कि सब देवताओंको किया हुआ नमस्कार परमात्माको ही प्राप्त होता है, किन्तु यह अविधिपूर्वक है। उनको परमात्मा मानकर प्रणाम करना विधिपूर्वक है।
यदि कोई जीव हमें काटे, ऐसी अवस्थामें उसे मारनेमें विशेष पाप नहीं होता, किन्तु वे पशु हैं, अज्ञानी हैं, इसलिये उनका अपराध क्षमा करना चाहिये। वास्तवमें तो हमें दण्ड देनेका अधिकार है ही नहीं। यदि कोई हमें बिना कारण ही कष्ट पहुँचाता है, उसको मारना नीति है, धर्म नहीं, यदि न मारे तो साधुता ही है। बिच्छूने काटा तो उसे मारनेकी अपेक्षा उसका डंक काटना ठीक रहेगा, उसमें कोई पाप नहीं है। यदि वह न काटे तो डंक भी नहीं काटना चाहिये और काटा है तो उसे मारनेमें थोड़ा पाप लगता है। डंक काट लेनेमें नीति है और वैसे ही छोड़ देना साधुताका व्यवहार है।
हम सभी लोगोंका यहाँसे जल्दी जानेका विचार है, इसलिये जाते समय सब बातें समझ लें तो ठीक है। घरमें कोई बीमार है तो उसकी सेवाके लिये सतत चेष्टा करनी चाहिये और यदि मर जाय तो चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह वापस तो आ नहीं सकता।
अपने घरमें जितने भी व्यक्ति हैं, सबके साथमें समताका व्यवहार करनेसे भगवान् प्रसन्न होते हैं, कोई नौकर भी घरमें भोजन करे तो उसको भी समानभावसे भोजन कराना चाहिये। यह दोष अधिकतर स्त्रियोंमें रहता है उसे निकालना चाहिये। व्यवहारकी बात तो पशु भी समझ जाता है कि यह मुझसे कैसा व्यवहार करता है। समताका व्यवहार करनेसे सभी प्रसन्न होंगे। विषमताका व्यवहार ऐसा करना चाहिये जिससे परमेश्वरकी प्राप्ति हो। वह विषमता कैसी है? घरमें कोई मेहनतका काम हो तो स्वयं अधिक करे और दूसरोंको थोड़ा-थोड़ा दे। पहनने, ओढ़ने एवं ऐश-आरामकी सामग्री दूसरोंको पहले दे और अधिक दे तथा स्वयं पीछे ले और कम ले। ऐसा विषमताका व्यवहार कल्याणका मार्ग है, यही यज्ञ है। यदि घरमें अच्छी-अच्छी पाँच चीज बनी हैं तो पहले सबको अच्छी चीजें परोसे, अन्तमें जो बच जाय या कम खानेको मिले तो उससे बड़ा पुण्य मिलता है और यदि भूखे रह गये तो एकादशीके उपवाससे भी कई गुना अधिक फल मिलता है।
घरमें किसी व्यक्तिविशेषके द्वारा यज्ञ करानेपर उसका फल घरके सब लोगोंको बराबर ही मिलेगा, सकामभावसे हो या निष्कामभावसे। घरमें जो बड़ा है उसीके हाथसे काम कराना उत्तम रहता है। दान-पुण्यका काम घरमें पुरुषोंके हाथमें ही रहना चाहिये, क्योंकि स्त्रियोंमें बुद्धि कम रहती है, यदि उन्होंने कुपात्रको दान दे दिया तो पाप भी हो सकता है। त्यागी ब्राह्मणोंको दान देना उत्तम है, यदि वे अपने उपयोगमें लावें तो अति उत्तम है और वे दूसरेको भी देंगे तो अच्छे कार्यमें ही लगायेंगे।
यह समझनेकी बात है कि घरमें कोई संकट आवे तो अपने ऊपर लेना चाहिये। जैसे राक्षस बकके यहाँ जानेके लिये उस ब्राह्मणके घरमें सब कहते थे कि मैं जाऊँगा, ऐसी अवस्थामें दूसरा ही गया। माता कुन्तीने भीमसेनको भेज दिया, उससे सारे नगरका लाभ ही हुआ। ऐसे समताके बर्तावसे तुरन्त ही प्रत्यक्ष फल हुआ। कोई-सा भी भाव हो समता, प्रेम, दया यह सब हृदयसे होना चाहिये, दिखावामात्र नहीं।
शास्त्रोंकी कथाओंमें जो रहस्य भरा है वह समझना चाहिये। इस प्रकारसे नीतिका, धर्मका, न्यायका बर्ताव करना चाहिये। अन्यायीका नाश हो ही जाता है। पाँचों पाण्डव बड़े धर्मात्मा थे, उनकी स्त्री द्रौपदी एवं माता कुन्ती थी। जिस समय कौरवोंने सभाके बीचमें द्रौपदीको नग्न करना चाहा, उस समय पाण्डवोंने तो न्याय एवं साधुताका व्यवहार किया, इसलिये उनके रक्षक भगवान् हुए। इसमें द्रौपदीका आर्तभाव भी कारण था। जब पाण्डवोंको वनवासमें जाना पड़ा, तब माता कुन्ती विदुरके घर रहीं। उनके तेरह वर्ष बाद लौटकर आनेपर भी कौरवोंने कुछ भी राज्य नहीं दिया एवं अन्यायका बर्ताव किया, उसका फल यह हुआ कि दुर्योधन अपने सारे भाइयोंसहित मारा गया। पाण्डव राजा हुए। द्रौपदी रानी हुई एवं कुन्ती राजमाता हुई। तब भी माता कुन्तीने अपने जेठ जेठानीके साथ कैसा अच्छा बर्ताव किया। बहुत दिनोंतक तो धृतराष्ट्र घरमें ही रहे। तत्पश्चात् तपस्या करनेके लिये वे वनमें गये, तब माता कुन्ती सारा राजसुख छोड़ अपने जेठ और जेठानीकी सेवा करनेके लिये उनके साथ गयीं। उन्होंने उनके पूर्वमें किये हुए खराब बर्तावको एकदम भुला दिया। ऐसा विचार सभी स्त्रियोंको रखना चाहिये। तभी तीर्थ आना सफल हुआ समझना चाहिये।
दूसरेका अपने साथ जो खराब बर्ताव हुआ है, उसको भुला देना चाहिये। जो सभी भूतोंमें निर्वैर है, वह मुझको प्राप्त होता है—ऐसा भगवान्ने गीतामें कहा है।
निर्वैर: सर्वभूतेषु य: स मामेति पाण्डव॥
(गीता ११। ५५)
जो दूसरोंको कष्ट देता है, वह परमात्माको ही कष्ट देता है। यदि मरते समय एकसे भी वैर रह गया तो वह चौरासी लाख योनियोंमें अपने कर्मानुसार भुगतना पड़ेगा। जैसे एक आदमी एक महात्माका पूर्ण रीतिसे पूजन करता है। सारे शरीरमें चन्दन लगाता है, हर रोज सेवा करता है। हर रोज पैर पड़ता है और साथ ही उनकी एक अंगुलीमें आग लगाता है, उनके पूछनेपर उत्तर देता है कि मैं सारे शरीरका तो पूजन करता हूँ, यदि एक अंगुलीमें आग भी लगा दी तो क्या हुआ, किन्तु उन्हें तो कष्ट ही हुआ। उसका प्रभु कैसे उद्धार कर सकते हैं।
किसीको कष्ट दिया है तो उसका फल हमें तबतक भोगना पड़ेगा, जबतक वह प्रसन्न न हो जाय। एक समय राजा अम्बरीषने द्वादशीके दिन दुर्वासा मुनिको निमन्त्रण दिया, किन्तु मुनिको आनेमें विलम्ब हो गया, राजाका द्वादशीमें ही पारण करनेका नियम था तथा द्वादशीका समय पूरा होनेवाला था एवं राजाके भोजन न करनेसे प्रजा भी भूखी बैठी थी। राजाके गुरुजीने कहा कि तुलसीदल ले लो, इससे पारण भी हो जायगा एवं सब प्रजा भोजन कर लेगी। राजाने वैसा ही किया। दुर्वासा मुनि आये, नाराज हुए। उन्होंने राजाको मारनेके लिये कृत्या पैदा की। सुदर्शनचक्रको यह सहन नहीं हुआ। चक्रने कृत्याका वध किया तथा दुर्वासा मुनिके पीछे लग गया। मुनि शिव, ब्रह्मा, इन्द्र सबके पास गये, किसीने रक्षा नहीं की। फिर विष्णु भगवान्के पास गये। भगवान्ने कहा तुम अम्बरीषको प्रसन्न कर लो तो पीछा छूट सकता है। मुनि राजा अम्बरीषके पास गये। सुदर्शनने पीछा छोड़ दिया। भगवान् कहते हैं, मेरे भक्तका जो अपराध करेगा, उसको क्षमा करना मेरे अधिकारकी बात नहीं है।
जो अपने साथ भलाईका बर्ताव करता है उसके साथ तो सभी भलाईका व्यवहार करते हैं, किन्तु बुराईका व्यवहार करने-वालेके साथ भी भलाईका व्यवहार करना साधुताका काम है।
राजा युधिष्ठिरको उनके सत्यके लिये याद किया जाता है। युधिष्ठिरजी बड़े धर्मात्मा थे। उन्होंने चित्रसेन गन्धर्व नामक अपने मित्रसे लड़ाई करके अपने शत्रुओंको बचाया। जब चित्रसेनको अर्जुन पकड़कर लाये, तब युधिष्ठिरजीने पूछा कि मेरे भाइयोंको छोड़ दिया क्या? तबतक उसने छोड़ा नहीं था, जब उसने छोड़ दिया, तब उससे बातचीत की। इस समय दुर्योधन बड़ा लज्जित हुआ। फिर भी उसने उनके साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया। उसका फल यही हुआ कि दुर्योधन सकुटुम्ब नष्ट हो गया। राजा युधिष्ठिरका नाम अमर हो गया। इन सब बातोंको ध्यानमें रखकर किसीसे भी वैर नहीं करना चाहिये।
एकादशीसे भी बढ़कर यह बात है कि यदि मौकेसे दो मेहमान घरपर आ गये तो उनको प्रेमपूर्वक समभावसे भोजन करानेपर स्वयंको यदि भूखा रहना पड़े तो उसका फल बारह महीनोंकी एकादशीके उपवासके बराबर होता है, घरमें कोई कठिन काम आनेपर अपने ऊपर ले। तीसरी बात अच्छी-अच्छी चीजें घरमें दूसरोंको दे और आप कम ले। चौथी बात दूसरोंकी बुरी बात, बुरा व्यवहार भूलकर उनकी सेवा करना ही अपना धर्म समझे और किसीसे वैर नहीं करे। घरमें कोई नाराज हो, गाली दे तो भी स्वयं कुछ न बोले और प्रसन्न ही रहे।
अतिथि उसे कहते हैं जिसका कोई जान-पहचानका न हो। जो व्यवहार आदिके लिये आते हैं वे आधे तो मित्र हैं और आधे अतिथि हैं। उनका भी अतिथिके समान सत्कार करना चाहिये। जहाँ स्वार्थकी सिद्धि है, वहाँ कर्तव्य है।