नेत्रोंमें भगवान‍्को बसा लें

प्रवचन—दिनांक २८-१२-१९३६, दोपहर, गोरखपुर

राजा साहबने कहा—मेरी स्थिति कभी तो ठीक रहती है, कभी नहीं भी रहती, पर सत्संग करना मेरे हाथमें नहीं, मुझे गोरखपुर अधिक पसन्द आया है, ऋषिकेशको आपने इसलिये पसन्द किया होगा कि वह एकान्त और पवित्र भूमि है। आपका कहना वस्तुत: बहुत हितकर है, मैं तो बेगार काट रहा हूँ, भजन तो होता नहीं, असली भजन तो वही है जिससे मन उसमें लगा रहे।

उत्तर—तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥

(गीता ६।३०)

जबतक भगवान् अणु-अणुमें न दीखने लगें, तभीतक उनके जप और स्मरणके लिये चेष्टा करनेकी आवश्यकता है, फिर तो भगवान् एकदम प्रत्यक्ष ही हो जाते हैं। अग्निके उदाहरणसे भी बढ़कर भगवान् प्रकट हैं। वहाँ तो अग्निके प्रकट होनेका निश्चय है और यहाँ तो भगवान् साक्षात्-रूपसे प्रकट हैं ही।

प्रश्न—आपका यह कथन कि भगवान् सभी जगह हैं तभी माननेमें आ सकता है जब आपमें पूर्ण श्रद्धा हो जायगी। घूम-फिरकर प्रश्न श्रद्धापर ही आकर अटक जाता है।

उत्तर—एक बालकको किसीने कह दिया कि दियासलाईमें अग्नि है, उससे अग्नि प्रकट हो सकती है। पर वह आवश्यकताका अनुभव करनेपर भी यदि प्रयत्न न करे तो उसके विश्वासमें कमी ही समझनी चाहिये, यदि दियासलाईसे अग्नि प्रकट करके बालकको समझा दिया जाय तो उसे भी अग्निका विश्वास हो सकता है।

भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनसे कह रहे हैं कि हे अर्जुन! ‘तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर:’ (गीता २। ६१) उन सब इन्द्रियोंको रोककर मेरे परायण हो। इसमें परम भक्ति भावकी झलक है। ‘रथं स्थापय मेऽच्युत’(गीता १। २१)में भी अच्युत शब्द जना रहा है कि अर्जुन भगवान‍्को अच्युत मानकर ही उन्हें सम्बोधन कर रहे हैं।

‘मयि सर्वाणि कर्माणि’ (गीता ३। ३०)में कहते हैं कि सब कर्मोंको मेरे अर्पण कर दे, किन्तु मैं परमेश्वर हूँ यह बात नहीं कही। चौथे अध्यायमें और खुले—

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप॥

(गीता ४।५)

श्रीभगवान् बोले—हे परन्तप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। उस सबको तू नहीं जानता, किंतु मैं जानता हूँ।

‘भूतानामीश्वरोऽपि सन्’(गीता४।६)में धर्मके लिये प्रकट होनेका रहस्य बतलाया। फिर पाँचवें अध्यायमें और कहा, अन्तमें कहा कि मैं सबका सुहृद् हूँ। छठे अध्यायमें अपने भजन करनेवालोंकी श्रेष्ठता बतलायी है। सातवेंमें बतलाया कि मुझ समग्रको किस प्रकार जाना जा सकता है। पृथ्वीमें गन्ध, जलमें रस आदि कहकर अपनी सगुणता बतलायी। आगे चलकर अपनी समग्रता बतलायी, फिर निराकारकी व्याख्या बतलायी। ‘मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना’ (गीता ९।४) तथा ‘पश्य मे योगमैश्वरम्’ (गीता ११।८) आदिमें अधिक खुले। दसवेंमें अपनी विभूतियाँ बतलायी और अन्तमें कहा कि सारा संसार मेरे एक अंशमें है। ग्यारहवेंमें विश्वरूपमें समस्त ब्रह्माण्डको दिखला दिया। फिर चतुर्भुजरूप दिखलाकर मनुष्यरूपमें होकर वैसी ही बातें करने लगे। बारहवें अध्यायमें निराकारकी अपेक्षा साकारको सुगम बतलाते हुए उसकी उपासना करनेके लिये कहा।

राजा साहब—आज तो ऐसे ही प्रश्न होने लग गये। वैसे आपके द्वारा कथन की हुई सभी बातोंमें लाभ है। पर अधिक-से-अधिक लाभ तो भगवान‍्के गुण, प्रभाव, रहस्य आदिके वर्णनमें है। मुझे तो आपका सत्संग अधिक कहाँ मिलता है। मैं तो आपकी तत्त्वचिन्तामणि, परमार्थ-पत्रावली और पोद्दारजीकी पुस्तकें तुलसीदल, नैवेद्य आदिको देखा करता हूँ, दुबारा फिर इन्हीं पुस्तकोंके पन्ने उलटने शुरू कर देता हूँ, क्योंकि हर समय सब बातें याद नहीं रहतीं। द्रष्टापनका ध्यान निरन्तर बना रहे इसलिये उसको भी मैं बार-बार देखता हूँ।

उत्तर—निष्कामभाव सोना है, दूसरे कर्म कूड़ा, कचराके स्थानपर हैं। निष्काम कर्म अग्नि है, वह सबको जला देती है। सोनेको नहीं जलाती, कूड़ा, कचरा आदि वस्तुएँ जल जायँगी। निष्काम कर्मकी आगको खूब तेज करना चाहिये। उसे प्रज्वलित करनेके लिये धौंकनी सत्संगरूपी वायु है। असली प्रेम वही है जो भगवद्विषयक है, वह होता है श्रद्धासे।

यदि केवल भगवान‍्की आकृतिसे उद्धार होता तो जिस समय भगवान‍्का यहाँ अवतार हुआ था उस समय सबका उद्धार हो जाता, पर ऐसी बात नहीं मालूम होती। केवल भक्तोंको ही उनमें विशेषता दीखती थी। दूसरोंको तो वे साधारण मनुष्य ही दिखायी पड़ते थे।

भगवान् दो रूपमें दीखते हैं, एक तो जिस रूपमें दीख रहे हैं, वैसे दीखेंगे और प्रार्थना करनेपर राम, कृष्ण आदि जिस रूपमें प्रार्थना की जायगी, उस रूपमें दीखा करेंगे। जैसे गोपियोंको सब जगह सदैव श्रीकृष्णरूपसे दीखते थे। जैसे काँचके महलमें हर जगह देखनेपर अपनी ही परछाईं दीखेगी। इसके अतिरिक्त एक बात यह है कि जिसके नेत्रोंमें भगवान् बस जाते हैं, उसे सदा सर्वदा भगवान्-ही-भगवान् दीखते हैं। जैसे किसीकी आँखमें कोई दोष हो, उससे जाला दीखता है तो वह जहाँ देखता है, वहाँपर जाला ही दीखता है। इसी तरह जिसके नेत्रोंमें भगवान् बस जाते हैं, उसे जहाँ नेत्र जाते हैं, वहीं भगवान् दृष्टिगोचर होते हैं और मनसे भी इसी तरह दीखते हैं।

प्रह्लादजीको धातुके रूपमें भगवान् सब जगह दीखते थे, उन्होंने दर्शनकी भी इच्छा नहीं की, फिर भी भगवान‍्ने कई बार कई रूपोंमें दर्शन दिये।

प्रेम, गुण, नाम, रूप, धाम, तत्त्व, रहस्य इन सबकी चर्चा यदि भगवान‍्का तत्त्व जाननेवाले भक्तोंद्वारा हो तो वे प्रकट हो जाते हैं।

प्रश्न—पापके नाश होनेका जो क्रम है वह उत्तरोत्तर किस तरह बढ़ता है? जैसे मैंने सत्संग किया उससे मेरा कुछ पाप नाश हुआ, फिर सत्संग किया उससे थोड़ा नाश हुआ। उसका क्रम इसी प्रकार एक-सरीखा रहे, तब तो बहुत देर लग सकती है।

उत्तर—दोनों ही तरहसे होता है, आगे जाकर बहुत तेज हो जाता है। यह उदाहरण बिलकुल ठीक है। यह बिलकुल नयी बात है, क्योंकि ऐसा प्रश्न पहले किसीने किया ही नहीं था, यह बात कहीं भी देखनेपर मेरे लिखे ग्रन्थोंमें भी नहीं मिलेगी।

एक गाँवमें दस हजार फूसके मकान हैं। एक झोपड़ेमें आग लगा दो, वहाँसे चिनगारी उड़ी तो पासके तीन झोपड़ोंपर पड़ी। तीनों जलने लगे। अग्निका और अधिक विस्तार हुआ। इससे और भी ज्यादा फैली तो भयंकररूपमें प्रज्वलित हो उठी। उसका क्रम बिलकुल ही बदल गया। ऐसे अवसरपर हवा जोरकी चाहिये। हवा जोरकी नहीं होगी तो तीन घर जलकर ही बुझ गये। फिर आग लगेगी तब देखा जायगा। चारों तरफसे खूब आग लग जाय तो फिर कितने भी आदमी हों उसे बुझा नहीं सकते। ज्ञानाग्निकी शास्त्रोंमें कई जगह बात आयी है—

यस्य सर्वे समारम्भा: कामसंकल्पवर्जिता:।

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा:॥

(गीता ४।१९)

जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्पके होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्निके द्वारा भस्म हो गये हैं, उस महापुरुषको ज्ञानीजन भी पण्डित कहते हैं।

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।

ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥

(गीता ४।३७)

जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनको भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको भस्ममय कर देता है।

कोई पूछे कि जिस प्रकार ज्ञानीके संगसे अज्ञानी ज्ञानी हो जाता है, इसी प्रकार क्या अज्ञानीके परमाणु भी ज्ञानीपर कुछ असर करते हैं या नहीं? इसका उत्तर यह है कि जिस प्रकार अग्निमें घास मिले या घासमें अग्नि मिले, दोनों तरहसे अग्नि ही बनेगा, घास नहीं। उसी तरह दोनोंके संगसे ज्ञान ही बढ़ेगा।

जहाँ अग्निका वास होता है, वहाँ सब परमाणु गर्म हो जाते हैं। अग्नि प्रत्यक्ष भले ही न दीखे, पर अनुमानद्वारा निश्चय किया जा सकता है कि वहाँ अग्नि है। जहाँ ज्ञानरूपी अग्नि प्रत्यक्षरूपसे धधक रही हो, वहाँ जानेसे पाप प्रत्यक्ष नष्ट होते प्रतीत होते हैं।

जहाँ कसाईखाना है, वहाँ जाकर देखें तो हिंसावृत्ति जागृत होगी, क्योंकि वहाँ हिंसाके परमाणु रहते हैं। इसी प्रकार महापुरुषके संगसे उनके परमाणुद्वारा हमारे परमाणु (क्रियात्मक पाप) जलकर नष्ट हो जाते हैं। उन्हें हम नेत्रोंसे देखते हैं तो जो कुछ भी उनकी बात नेत्रोंसे घुसती है वह नेत्रोंको पवित्र करती हुई हृदयके बुरे चित्रोंका नाश करती है। कानोंसे उनकी वाणी प्रवेश करती है तो कानोंको पवित्र करके भीतरी निंदा-स्तुति आदि दोषोंको जला देती है और उनका स्पर्श करनेपर स्पर्शके पाप दूर होते हैं। अब गंध और स्वादकी बात रही। उन्होंने भोजन कराया या उनका भोजन प्रसाद खा लें तो हमारा दु:ख नष्ट हो सकता है। प्रसादके कई अर्थ हैं—प्रसन्नता, रोगोंका नाश, अन्त:करणकी स्वच्छता आदि। इसका ऐसा नाम क्यों पड़ा? अन्त:करणकी स्वच्छता प्रसादसे कैसे होती है? उत्तर यह है कि ठाकुरजीके प्रसादमें हमारी श्रद्धा है, प्रेम है, अत: उससे अन्त:करणके दोषोंका नाश होता है। भगवत्कृपाको भी प्रसाद बतलाया गया है; क्योंकि भगवत्कृपासे भी सारे पापोंका नाश होकर मनुष्य तर जाता है—‘मत्प्रसादात्तरिष्यसि’ (गीता १८। ५८)।

महापुरुषोंकी कृपासे भी तर जाते हैं, इसलिये उनकी कृपाको भी प्रसाद कहा जाता है। दुनियाके भीतर प्रसाद सबके प्रति जुड़ जाता है, महापुरुषोंका दर्शन, स्पर्श, वाणी, भोजन आदि सभी प्रसाद हैं।

महात्माके समीप बैठे हैं वहाँ मिथ्यावादी भी मिथ्या नहीं बोल पाता। वह कह देगा कि आपके सम्मुख असत्य कभी नहीं बोलूँगा। धर्मात्मा राजा होनेपर प्रजामें भी कोई पापी नहीं रह सकता। यह बात शास्त्रोंमें आती है। राजा अश्वपतिके यहाँ बड़े-बड़े त्यागी बैठे हैं। राजाने कहा आप धन नहीं लेते, मेरा धन अपवित्र नहीं है, मेरे राज्यमें वेश्या नहीं है, क्योंकि उनका गुजारा नहीं होता। कोई मदिरालय नहीं है, क्योंकि कोई शराब नहीं पीता है। कसाई नहीं है, क्योंकि कोई मांस नहीं खाता है। कोई चोर नहीं है, क्योंकि किसीको आवश्यकता ही नहीं पड़ती। उन्होंने कहा हम यहाँ इस धनके लिये नहीं आये हैं। हम मोक्षरूपी धन लेने आये हैं। कहनेका तात्पर्य यह है कि हमलोग भी राजा अश्वपति-जैसे बन सकते हैं।