निराकारका ध्यान

प्रवचन—दिनांक १४-६-१९३६, रविवार, प्रात:, गीताभवन, स्वर्गाश्रम

आजके प्रवचनमें देहके अभिमानका नाश और निराकारके ध्यानका विषय है। जबतक देहमें अभिमान है तबतक साधन नहीं हो सकता। जब देहमें अभिमान नष्ट हो जाता है, तभी साधन सुगम हो जाता है। देहाभिमान ईश्वरकी भक्तिसे नष्ट हो सकता है। ईश्वरकी भक्तिको समझनेका विषय अत्यन्त सूक्ष्म है। नित्य सत्संग करनेसे समझमें आता है। नारायणका नाम उच्चारण करनेसे सारे विक्षेपोंका नाश हो जाता है और बाहरका वातावरण भी साफ होकर बड़ा पवित्र हो जाता है तथा स्वाभाविक शान्ति प्राप्त होती है। सभी शास्त्र-ग्रन्थ इस बातको मानते हैं। सच्चिदानन्दका ध्यान और भगवन्नामका जप इन दो बातोंसे सब विक्षेप एवं अहंकारका नाश होकर भगवत्प्राप्ति हो जाती है। भगवन्नाम उच्चारण करनेसे जिस नामका स्मरण किया जाय, उधर ही लक्ष्य बँधेगा। आज निराकार भगवान‍्के ध्यानका विषय है। साकारका ध्यान रखते हुए भी निराकारका साधन हो सकता है। निर्गुण निराकार ब्रह्मका ध्यान दो प्रकारसे होता है—भेदरूपसे और अभेदरूपसे। ऐसे ही साधनकी कई युक्तियाँ हैं। भगवान् कहते हैं जो श्रद्धासे मेरा ध्यान करते हैं, वे ही सबसे उच्च योगी हैं।

आनन्द, बोध, शान्ति निराकार परमात्माका स्वरूप है। इनकी स्थापनाके लिये ध्यान करना चाहिये।

हमलोग भविष्यकी स्थितिके बारेमें नहीं सोचते कि शरीरका अन्तमें क्या होगा? हम धन कमा रहे हैं मरनेपर यह क्या काम आयेगा? ये सारी बातें अज्ञानपूर्ण हैं। हम उन्मत्तकी तरह चल रहे हैं। जो हमारे लाभकी वस्तु है उसे ही छोड़ रहे हैं, भोगकालमें सुख माना जाता है, परन्तु उसका परिणाम दु:ख ही है, इससे सिद्ध हुआ कि संसारमें दु:ख-ही-दु:ख है। केवल सुख तो परमात्माकी प्राप्तिमें है। परमात्माको प्राप्त करनेवाला आदमी करोड़ोंमें कोई एक ही मिलता है, बाकी सब दु:खी ही हैं। विद्या पढ़े-लिखे भी बहुत कम हैं। आजकलकी विद्यामें पास लोग बी०ए०, एम०ए० तो हो गये, किन्तु उन्हें पता नहीं मरनेपर उनके शरीरका क्या होगा? कहाँसे आया था? आत्मा क्या है? इसका कुछ भी पता नहीं है। यह मूर्खता ही है। फिर विद्याका मूल्य क्या हुआ। जिस विद्यासे सब बातें अपने-आप मालूम हो जाती हैं, वह विद्या नहीं पढ़ी। खाना, भोगना आदि सब कार्य तो पशुको भी मालूम है। पशुसे पूछनेपर वह कुछ नहीं बता सकता, किन्तु उसको अपने स्वार्थका पूरा ज्ञान है। इसी तरह वह पढ़ा-लिखा मनुष्य भी है, उसमें और पशुमें कुछ अन्तर नहीं है। इससे यही मालूम हुआ कि संसारमें ज्ञान नहीं है, सुख नहीं है, प्रकाश नहीं है, अपितु इससे विपरीत बातें ही पूर्णरूपसे भरी पड़ी हैं।

यह स्थूल शरीर है, इसके अन्दर एक सूक्ष्म शरीर है, उसके निकल जानेकी स्थितिको मरना कहते हैं। जो स्वप्न देखते हैं, वह सूक्ष्म शरीरसे ही देखा जाता है। ध्यान करते समय सूक्ष्म शरीरको स्थूल शरीरसे बाहर निकाले, बाहर आकर सब कुछ देखे, अपने स्थूल शरीरको भी दूसरा ही देखे। जब इस शरीरको पृथक् देखेंगे तो शरीरकी बीमारी दु:ख नहीं दे सकती। आत्मा चेतन है, और शरीर जड़ है। आत्मासे शरीर अलग है और जड़ है। जिस तरह कटे पैरको शरीरसे अलग देखते हो, उसी प्रकार शरीरको आत्मासे अलग देखो। सूक्ष्म शरीरसे बाहर आ जानेपर फिर अन्दर न जाओ। इसके पश्चात् ज्ञानद्वारा सूक्ष्मरूपको भी छोड़ दो और निराकार-रूपमें आ जाओ। ज्ञान हमारा स्वरूप है, चेतन हमारा स्वरूप है, आनन्द हमारा स्वरूप है ऐसा ही देखे। देखनेवाला ही चिन्मय चेतन है। दोनों शरीर छोड़ देनेपर कैसे देख रहे हैं? सारे ब्रह्माण्डोंको संकल्पमात्रसे देख रहे हैं। देखनेवाला ही चिन्मय चेतन है। इस तरह आकाशके सहित सारे ब्रह्माण्डमें स्थित होकर संकल्पमात्रसे देख रहा है। आकाश निराकार है, किन्तु जड़ है। वह चेतन ज्ञानस्वरूप है और सारा ब्रह्माण्ड गेंदकी तरह है। गेंदके आसपास आकाशरूपमें निराकाररूपमें भगवान् हैं।

एक स्त्री है, वही एकको बाधक है और एकको साधक है। राग-द्वेष ही हमें सुख-दु:खके देनेवाले हैं। सुषुप्ति अवस्थामें राग-द्वेष नहीं रहता। राग-द्वेष तो जाग्रत् अवस्थामें ही होता है। जिस अवस्थामें राग-द्वेषका ज्ञान है, वही राग-द्वेष है, वही बाधक है। कल्पनाकी वस्तुका मूल्य नहीं रहता। जैसे आँख बंद करनेसे कुछ नहीं दीखता, उसी तरह मनको रोको। आँख बन्द करनेपर नहीं देख सकते, मौन रहनेसे नहीं बोल सकते, उसी तरह मनको रोकनेसे वह दूसरी बातका चिन्तन नहीं कर सकता। ये सब तुम्हारे अधिकारकी बातें हैं और हो सकती हैं। आँखें तुम्हारी हैं, स्त्रीकी तरफ जाती हों तो उन्हें सजा दो, मन यदि विषयका चिन्तन करता है तो उसे भी दण्ड दो, धीरे-धीरे सभी कामनाओंका त्याग कर दो। मनको खूब समझाओ। साम-दामसे नहीं समझे तब दण्ड दो। बार-बार प्रयत्न करो और यही विश्वास रखो कि मेरी विजय होगी। काम-क्रोधको मार डालो। ऐसा सदा विश्वासपूर्वक खयाल रखो।

परमात्मा सत्य है, चेतन है, साक्षी है, नित्य है, अचिन्त्य है, इस प्रकार निराकार-स्वरूपका ध्यान करनेसे वह परमात्माको प्राप्त हो जाता है। सावधानी रखे, ज्ञानको नहीं भूले, ज्ञानको जहाँ भूले वहीं अज्ञान आ पकड़ेगा। जहाँ पूरा आनन्द नहीं आता है वहाँ समझना चाहिये कि अभी अज्ञानका परदा पूरा नहीं हटा है। जैसे घटाकाश छोटा होता है, फूटनेपर बड़ा भारी आकाश-ही-आकाश शेष रह जाता है, उसी तरह आनन्द-ही-आनन्द रह जाता है। शान्त चित्तसे बैठकर ध्यान करे। अपने चारों तरफ भगवान्-ही-भगवान् हैं। भगवान‍्का स्वरूप आकाशके समान निराकार है, भगवान् आनन्दस्वरूप हैं, ज्ञानस्वरूप हैं, जैसे बरफ पानीके आधारपर है, उसी प्रकार तुम भगवान‍्के आधारपर हो। भगवान‍्के आनन्दका कोई ठिकाना नहीं। आनन्द-ही-आनन्द दीखता है। फिर संसारका संकल्प क्यों किया जाय। मूर्ख ही संसारका संकल्प करते हैं। जहाँ आनन्दका ठिकाना ही नहीं सभीमें वही विराजमान हैं, उन्हें देखता ही रहे। जो कुछ भी है सब आनन्दमय ही है।