निवेदन
आज जिधर दृष्टि डालते हैं उधर ही कलह, अशान्ति, संघर्षका बोलबाला दीख रहा है। भौतिक सुखकी इच्छा ही इनके होनेमें प्रधान हेतु है। भौतिकताका ही प्रचार हो रहा है। मनुष्यजन्म हमें किसलिये मिला है? हम यहाँ क्या कर रहे हैं? हमें यहाँ इस संसारमें सुख, शान्ति कैसे प्राप्त हो सकती है तथा हम जन्म-मरणके चक्रसे छूटकर परमानन्दकी प्राप्ति कैसे कर सकते हैं? इन बातोंकी ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता।
गीताप्रेसके संस्थापक परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका के मनमें यह भाव बड़ा प्रबल था कि हमलोगोंको गृहस्थाश्रममें सुख, शान्ति कैसे रहे तथा हमें भगवत्प्राप्ति हो सके। या तो इसी जन्ममें हम भगवत्प्राप्ति कर लें नहीं तो कम-से-कम भविष्यमें हमें जन्म न लेना पड़े। इस उद्देश्यको लेकर उनके सभी सत्संग, प्रवचन होते थे। ऐसी सरल भाषामें वे प्रवचन होते थे कि सभी भाई, बहिन, बालक भी उनको समझ लें। ऐसी कीमती बातें दैनिक व्यवहारमें लानेसे घरमें कलह और अशान्ति न रहे।
ये प्रवचन लगभग सन् १९४३ ई० के पहले प्राय: गीताभवनमें दिये गये थे, जिन्हें किसी सज्जनने लिख लिया था। उन प्रवचनोंसे हम, आप लाभ ले लें इस उद्देश्यसे इन प्रवचनोंको पुस्तकरूपमें प्रकाशित किया जा रहा है। यदि हम एक प्रवचनकी बातोंको भी जीवनमें ला सकें तो हमारा कल्याण निश्चित है। अत: पाठक, पाठिकाओंसे विनम्र निवेदन है कि इस पुस्तकको अवश्य पढ़ें, औरोंको पढ़नेकी प्रेरणा दें तथा अपने जीवनमें इन बातोंको लाकर हम सुख, शान्तिसे रहते हुए परमानन्दकी प्राप्ति कर लें।