नियमपालन और विश्वासकी महिमा
प्रवचन—दिनांक २९-६-१९३६, दोपहर, गोरखपुर
कोई भी मनुष्य यदि आज दृढ़ निश्चय कर ले कि आज भगवान् अवश्य मिलेंगे तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसे भगवान् आज ही मिलेंगे। ऐसा निश्चय करना तो अपना काम है। पर इसमें भगवान्की दयाको भी निमित्त बना लें। जैसे कोई परम मित्रके पहुँचनेका तार आ जाय तो हम उसके स्वागतके लिये कितनी व्यवस्था करते हैं और प्रतीक्षा करते हैं। प्रभुके लिये ऐसी ही व्यवस्था करे और प्रतीक्षा करता रहे। प्रभु इस बातको जानते हैं कि कौन उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। आज उसे सच्चे मनसे पुकारेंगे तो उसे बहुत फुरसत है।
उस समय आपकी दो प्रकारकी दशाएँ होंगी—एक तो आर्तभाव, परम व्याकुलता जैसे मछलीको जलसे अलग होनेपर होती है। जल तो जड़ है, प्रभु चैतन्य हैं, वे बड़े दयालु हैं। इस प्रकारका भाव होना बहुत अच्छा है। दूसरा भाव प्रेमका है। जैसे हमारे मित्रके आनेका दृढ़ निश्चय होता है, उसमें प्रसन्नता एवं प्रतीक्षा होती है, इसी प्रकार प्रभुमें प्रेम होनेपर वे अवश्य पहुँच जाते हैं। नियम और प्रेम दोनों रखें। नियम पपीहेका होता है, वह स्वातिकी बूँदसे ही अपनी प्यास बुझाना चाहता है, बादल बरसे तब भी उसका नियम नहीं टूटता। प्रेममें कमी नहीं आती। यहाँतक कि उसके प्राण भी चले जायँ तब भी नियम नहीं तोड़ता। इसमें बादल तो जड़ है, वैसे ही बरस जाता है। प्रभु तो चैतन्य हैं और बड़े दयालु हैं, वे अपने प्रेमीको मरने नहीं देते।
इसी प्रकार हम भी नियम कर लें कि सिवाय प्रभुके और किसीका चिन्तन नहीं करेंगे। इसपर कोई कहे कि नियम निभेगा नहीं। हमें यह विश्वास कर लेना चाहिये कि प्रभु ही निभावेंगे, फिर भी हम कहें कि निभेगा नहीं तो इसमें कमी तो हमारी ही है। हम कैसे कहते हैं कि नहीं निभेगा। पहलेसे ही ऐसा विपरीत निश्चय कर लेते हैं कि प्रभु नहीं मिलेंगे। कोई कहे कि यदि मैं कह दूँ कि आज तुमको भगवान् अवश्य मिलेंगे तो मिल जायँगे। इस बातमें मुझे इतना विश्वास नहीं है कि मैं ऐसा कह दूँगा तो तुम्हें विश्वास हो जायगा। मुझको भी ऐसा विश्वास बढ़ाना चाहिये कि तुम्हें दर्शन हो जायँगे और तुम्हें मेरी बातपर विश्वास बढ़ाना चाहिये। कोई कहे कि हमारी मन बुद्धिमें विचारसे ऐसा मालूम होता है कि आप कह दें कि हमें भगवान् मिल सकते हैं तो मिल सकते हैं। प्रथम तो मुझमें ऐसी योग्यता नहीं और दूसरे आपमें वैसा विश्वास नहीं दिखायी पड़ता, क्योंकि यदि वैसा विश्वास होता तो जैसा आचरण, जैसा बर्ताव मेरे प्रति होना चाहिये था, वैसा नहीं होता और मेरे कहनेसे भगवान् मिलते हों तो फिर ऐसी अवस्थामें भगवान्से मिलनेकी आवश्यकता क्यों रखे। जिसके वशमें भगवान् हों उसीसे मिले, क्योंकि अपने तो भगवान्को वशमें करना है। लोग मुझे प्रसन्न करनेके लिये कह देते हैं और मैं भी समझ लेता हूँ कि ये विनोद कर रहे हैं।
करोड़ोंमें कोई एक भगवत्प्राप्त मनुष्य होता है और उनमें भी कोई विरला ही होता है जो भगवान्को मिला सके। कोई कहे कि भगवत्प्राप्त पुरुष मार्ग तो बतला सकते हैं। यह ठीक है तो फिर लोग इतने अच्छे मार्गपर क्यों नहीं चलते? इसका उत्तर यही है कि इस विषयमें विश्वास नहीं है। इसी कारण समस्त संसारकी यह दशा हो रही है, इसपर कोई कहे कि ऐसा प्रभुकी दया और महापुरुषोंकी दयासे हो सकता है। महापुरुष तथा प्रभुकी दया तो है ही, फिर भी काम नहीं होता। या तो उनकी दयासे काम नहीं होता अथवा उनकी दया नहीं है अथवा यह मानना होगा कि उनकी दया है, उससे काम भी बनता है, पर हमें उनकी दयामें विश्वास नहीं है। हमने उनकी दयाको माना नहीं है, बात वास्तवमें यही है।
इसमें रुक्मिणीजीका उदाहरण लिया जा सकता है। उन्होंने प्रतिज्ञा की और भगवान् मिले। इसमें कोई कहे कि मिले तो सही, पर बहुत विलम्बसे मिले। ऐसा उदाहरण भी है जिसमें भगवान् भक्तोंके समीप अति शीघ्र पहुँच गये। गोपियाँ, गजेन्द्र और द्रौपदीके उदाहरण हैं। ये भी सटीक उदाहरण नहीं हैं, क्योंकि यहाँ तो दु:ख निवारणकी ही आवश्यकता थी।
केवल भगवान्से मिलनेके लिये ही भगवान्को चाहे तो उस जातिका विरह दूसरा ही है। गोपियोंका उदाहरण इस विषयमें कुछ ठीक है, पर उन्होंने भगवान्को पहले देखा था। कब मिलेंगे इसका उन्हें पक्का निश्चय नहीं था।
भगवान् ठीक समयपर आयेंगे ही, इस आशाका कैसा भाव रहता है यह नहीं कहा जा सकता। उनके वियोगमें भी अत्यन्त विलक्षणता, आशा और आनन्द रहता है और साथ ही विह्वलता भी रहती है। जैसे हमारा कोई परम प्रिय मित्र आनेवाला होता है तो कितनी आशा-विह्वलता होती है? उससे करोड़ों गुणा भगवान्के मिलनेकी दृढ़ आशामें होता है, पर यह उदाहरण भी इसी तरहका है जैसे सूर्यकी उपमा करोड़ों जुगनुओंके साथ दी जाय।
कोई अर्जुनकी प्रतीक्षाकी बात कहे तो इसमें भी आनेकी आशा तो है पर भगवान्के आनेका समय बिलकुल ठीक निश्चित नहीं है। अब सुतीक्ष्णजीका उदाहरण लेकर देखें तो उसमें भी यही बात है। उनके प्रभुके आनेका निश्चय तो है पर ठीक-ठीक निश्चित समयसे वह भी अनभिज्ञ हैं। जहाँ उन्हें समाचार मिला प्रभु पधारे हैं, सुनते ही उस ओर दौड़े, आगे चलकर प्रेममें उनकी यहाँतक दशा हो गयी, वह इतने मगन हो गये कि उन्हें स्वयंका भान नहीं रहा। रास्तेमें अचल होकर बैठ गये। भगवान् उनके समीप आकर जगाने लगे, पर वह ध्यानमें इतना मग्न थे कि उन्हें जरा भी पता नहीं चला। भगवान्ने देखा कि उन्हें मेरी भी परवाह नहीं है। कोई इस उदाहरणको ठीक बताये तो इसमें भी जरा-सी कमी है। उसे ज्ञात नहीं था कि भगवान् घंटे-दो-घंटेमें कब मिलेंगे, आज भगवान्के मुझे दर्शन होंगे, यही समझकर उनकी ऐसी दशा हुई थी।
हम किसीकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। उस समय जैसी आशा होती है वैसी होनी चाहिये। जैसी कि अयोध्यामें हनुमान्जी द्वारा निश्चित खबर पहुँचनेपर आकाशमें दूरसे विमान दीखनेपर अयोध्यावासियोंकी थी। उनके विषयमें स्वयं भगवान् श्रीरामचन्द्रजी अपने श्रीमुखसे बड़ाई करते हैं—
जद्यपि सब बैकुण्ठ बखाना।
बेद पुरान बिदित जगु जाना॥
अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ।
यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ॥
मेरे लिये कितना उत्साह है, कितनी आशा प्रतीक्षा कर रहे हैं और कितनी चाह हो रही है, इसीलिये प्रभुने अयोध्यामें ग्यारह हजार वर्षोंतक निवास किया। भगवान् जब लंकासे अवधमें पधारे, उस समयका कैसा सुन्दर तथा विलक्षण वर्णन है।
अमित रूप प्रगटे तेहि काला।
जथा जोग मिले सबहि कृपाला॥
छन महिं सबहि मिले भगवाना।
उमा मरम यह काहुँ न जाना॥
किसी मनुष्यसे यदि सब मिलना चाहें तो एक ही समयमें सभी नहीं मिल सकते, पर प्रभु सबसे मिल सकते हैं। उस समय सबको यही प्रतीत हो रहा था कि प्रभु सबसे पहले मुझसे ही मिल रहे हैं।
कोई इस उदाहरणको ठीक बतावे तो कहा जा सकता है कि मिलनके पूर्वकी स्थिति इससे भी बढ़कर हो सकती है; क्योंकि अवधवासियोंने पहले तो प्रभुके दर्शन किये थे।
यह विलक्षण स्थिति होती है, उस दशाको कोई समझ नहीं सकता। तभी तो शिवजी कह रहे हैं—उमा मरम यह काहुँ न जाना॥ इस रहस्यको कोई विरले ही जानते हैं।
जैसे अच्छे पुरुषका यह भाव रहता है (वास्तवमें तो उनका कोई भाव नहीं रहता, पर उनमें प्रतीति होती है इसलिये कहा जाता है) कि उनके-जैसी स्थिति सबकी हो जाय। इसके लिये वह बहुत प्रयत्न भी करते रहते हैं और किसी अंशमें उन्हें अपने प्रयत्नमें सफलता भी मिलती है और किसी अंशमें नहीं भी मिलती, परन्तु प्रभु तो उनसे भी अधिक चेष्टा करते हैं। इसपर कोई कह सकता है कि प्रभु इतना प्रयत्न करते हैं तो फिर मिलते क्यों नहीं? इसका कारण यही है कि हमें उनके प्रयत्नमें विश्वास नहीं है, यह बड़े मर्मकी बात है। इसलिये ऐसा समझना चाहिये कि प्रभुकी इच्छा तो पूरी होगी ही। हमारी इच्छा पूरी हो इसमें हम लाचार हैं, पर प्रभुकी इच्छा पूरी न हो ऐसा नहीं हो सकता। जब हमारी इच्छा उनसे मिलनेकी हो जायगी तो इस कमीके दूर होनेपर सारा भार भगवान्पर आ जायगा, क्योंकि हम तो लाचार रहते हैं। अब प्रश्न यह है कि चाहना कैसे हो? किसी कविने कहा है—
लगन लगन सब कोइ कहे
लगन कहावे सोय।
नारायण जा लगनमें
तन मन दीजै खोय॥
मनका खोना यही है कि प्रभुके सिवाय किसीका ज्ञान न रहे और तनका भी भान न रहे। लगन ऐसी होनी चाहिये, जैसी पपीहेकी होती है।
भक्तके प्रेमके वशमें होकर जब उससे भगवान् मिलते हैं, तब प्रभुको बड़ा आनन्द होता है। हमें तो ऐसा बन जाना चाहिये कि हम केवल प्रभुको देख-देखकर मुग्ध हो जायँ। हम ऐसे बन जायँ कि प्रभु हमें छोड़कर कहीं जायँ ही नहीं।
गोपियोंसे भी बढ़कर मनुष्य बन सकता है। हमलोगोंमेंसे जो यहाँ बैठे हैं, जो नीच-से-नीच हैं, वह पुरुष भी गोपियोंसे अधिक प्रेमी बन सकते हैं, क्योंकि संसारमें हमसे भी नीच थे, वे भी ऊँचे-से-ऊँचे बन गये। जब यह बात है कि भगवान् दयालु हैं परम प्रेमी हैं, फिर हम प्रेमी क्यों नहीं बन सकते। यह शंका है कि बन सकते हैं या नहीं? ऐसी शंका अज्ञान तथा अविश्वाससे ही उत्पन्न होती है। जब हम उन्हें सबसे बढ़कर समझने लगेंगे, उस समय इन बातोंकी याद भी नहीं रहेगी कि हम क्या खायेंगे, घरवालोंका क्या होगा? उस समय तो वह दर्शनीय व्यक्ति बन जाता है। उनके दर्शन करनेवालेकी भी वैसी दशा हो जाती है। जैसे भरतजीको भगवान्के चरण चिह्न मिल जानेपर उनकी विचित्र दशा हो गयी थी और उनकी दशा देखकर पशु-पक्षियोंकी अद्भुत दशा हो गयी थी।
भरतजी जब प्रभुकी ओर देखते हैं तो उन्हें विश्वास होता कि प्रभु अवश्य मिलेंगे, पर जब अपनी ओर तथा माँकी करनीकी ओर देखते तो निराश होने लगते। जब प्रभुके चरण-चिह्नोंके दर्शन हुए तो उन्हें विश्वास हो गया कि प्रभु अवश्य मिलेंगे। उनकी सारी दुविधा मिट गयी।
ऐसा नहीं समझना चाहिये कि भरतजीसे ऊँची अवस्था नहीं हो सकती। इनकी दशा सराहनीय माननी चाहिये, पर यदि इससे बढ़कर भी उनका प्रेम होता तो उनकी क्या अवस्था होती। प्रथम तो वे ननिहाल ही क्यों जाते और यदि चले भी गये तो पहले कैकयीके भवनमें प्रवेश क्यों करते? यह बात ठीक है कि भरतजी-जैसा आदर्श भातृप्रेम संसारमें नहीं है। पिताकी और भाईकी आज्ञासे राज्यका कार्यभार लाचारीसे देख रहे थे। पर वे भगवान्के साथ लंकामें और किष्किंधामें भी जा सकते थे। कोई कहे कि इससे भी बढ़कर प्रेम हो सकता है क्या? यदि हो सकता है तो उसका उदाहरण कैसा होगा। उदाहरण तो मिलनेपर ही पता चलेगा, पहले कैसे कहा जाय। भगवान् बोलीमें बड़े चतुर हैं, कहते हैं कि भरत-जैसा भाई नहीं हुआ अर्थात् कोई भाई भरत-जैसा नहीं है, पर प्रेमी इससे बढ़कर हो सकता है।
अभी हम यहाँ बैठे हैं, यहाँपर भगवान् किसी मनुष्यके रूपमें छिपे बैठे हों और हमारी सारी बातोंको देख रहे हों तथा सुन रहे हों। कोई कहे कि इसका प्रमाण क्या है? प्रमाण नीचे है—
सर्वत:पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वत:श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥
(गीता १३। १३)
वह सब ओरसे हाथ-पैरवाला एवं सब ओरसे नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओरसे श्रोत्रवाला है, क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है।
हो सकता है कि भगवान् यह भी सोच रहे हों कि कोई पुरुष मुझसे मिलना चाहे तो मैं उससे मिलूँ। लौकिक उदाहरण देखिये—कोई आदमी मुझसे मिलना चाह रहा है, क्षण-क्षणमें खूब प्रतीक्षा कर रहा है, ऐसी अवस्थामें मैं पहुँच जाऊँ तो मुझको उससे भी अधिक आनन्द आयेगा। दोनोंमें जो अधिक प्रेमी होता है उसे अधिक आनन्द आता है, प्रभुमें तो हमसे अधिक प्रेम है ही, इसलिये उन्हें अधिक आनन्द आयेगा।
एक महापुरुषद्वारा लोगोंको अपने ऊपर श्रद्धा करानेका मौका देना महापुरुषकी दृष्टिसे अपने-आपपर कलंक लगाना है। इस दृष्टिसे कि मान-बड़ाईको शूकरी-विष्ठाके समान बताया गया है। शूकरी-विष्ठा इसलिये कि दूसरी विष्ठाएँ तो अन्न आदिका विकार हैं, पर वह तो विष्ठाका ही विकार है। वे दूसरेके कल्याणके लिये कलंक समझते हुए भी अपने ऊपर कलंक ले लेते हैं, इतनी उनकी हमपर असीम दया है। कोई महापुरुष किसीकी सेवा स्वीकार कर लेता था तो लोग अपनेको धन्य मानते थे। ऐसी बातें शास्त्रोंमें कई जगह आती हैं। किसीके माँगनेपर कोई दस हजार रुपये दे दे तो उसकी दया मानते हैं, क्योंकि उसे दस हजारका घाटा हो गया, महात्माके इस प्रकारका कोई घाटा नहीं होता, किन्तु उसके महात्मापनमें जो कलंक लग गया, यही घाटा हो गया।
आपलोगोंने आज प्रात: कहा था कि आज लोग कम आये। आपकी दृष्टिसे वैसा कहना ठीक है, पर मैं ऐसा खयाल दिलाना चाहता हूँ कि मेरी दृष्टिको छोड़ दीजिये। महात्मा तो ऐसा चाहते नहीं और चाहते भी तो विशुद्धभावसे ही चाहते हैं।
राजाजी—कई बार हृदयके भावोंको प्रकट करनेमें बड़ाई हो जाती है, पर इस भावको लेकर नहीं कहा जाता कि आपकी प्रशंसा की जाय।
उत्तर—यह खयाल रखना चाहिये कि जो महान् पुरुषमें श्रद्धा-प्रेम रखते हैं, उनके चरणस्पर्श, चरणरज आदिसे लाभ होता है, पर उनकी इच्छासे यदि उसका भी त्याग कर दें तो और अधिक लाभदायक है। यह उससे भी अधिक महत्त्वकी बात है और जो बने हुए महात्मा होते हैं, वे तो इन बातोंका खयाल ही नहीं करते हैं। सच्चे महात्माओंके चरणस्पर्श आदिका त्याग मुक्तिका त्याग है, वहाँ फिर कामिनी, कंचनकी तो बात ही क्या है।