पतिकी सेवा सर्वोच्च सेवा है

प्रवचन—दिनांक १८-६-१९३६, बृहस्पतिवार, दोपहर, गीताभवन, स्वर्गाश्रम

स्त्रियोंके लिये पतिसेवा ही सर्वोच्च सेवा है। पतिके माता-पिताकी भी सेवा पतिके पूज्य मानकर करनी चाहिये। स्त्रीको पतिकी प्रसन्नताके लिये ही गहना-कपड़ा आदि पहनना चाहिये। जिस स्त्रीका मन गहना, कपड़ा, गोटे, किनारीमें रहता है, वह स्त्री महामूर्ख है। अपने किसी कार्यके लिये पतिको कष्ट न दे, कभी गुस्सा न करे, न कभी रूठे, न कभी कड़े वचन बोले। पातिव्रतधर्मके पालनसे सब बातें आ सकती हैं।

एक पतिव्रता स्त्री थी। वह पतिकी प्रसन्नतामें ही प्रसन्न रहती थी। एक दिन भोजन करने बैठी, तब उसके पतिने आकर थालीमें एक अंजलि धूल डाल दी और हँसने लगा, वह भी हँसने लगी। तब पतिने पूछा तू क्यों हँसती है। तब उसने कहा पता नहीं, आप ही जानें। पतिने कहा मैं तो तेरी थालीमें धूल डालकर हँसता हूँ, तब उसने कहा मैं तो आपको हँसते हुए देखकर हँसती हूँ। मेरी हँसी तो आपकी हँसीमें ही है। ऐसे ही पतिकी प्रसन्नतामें प्रसन्न रहना चाहिये। इसी प्रकार लड़केका भी कर्तव्य है कि अपने माँ, बापके अनुकूल कार्य करे। उनके अनुकूल कार्य करनेसे प्रतिकूल वृत्ति नष्ट हो जाती है। उसके द्वेषभाव नष्ट हो जाते हैं। उसे भगवत्प्राप्ति हो जाती है।

संसारमें जितने महात्मा हैं और हो चुके हैं, उनकी यादगिरी भी हम इसीलिये करते हैं कि उन्होंने संसारमें कैसे-कैसे कार्य किये हैं, हम भी वैसा ही बर्ताव करें।

विधवा स्त्रियाँ भजन-ध्यानमें अपना समय बितायें, ब्रह्मचर्यसे रहें, घरमें सबकी सेवा करें। दूसरोंकी आत्माको सुख पहुँचाना ही धर्म है। जिसकी आत्मामें दूसरेका हित वास करता है, उसको संसारमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

परहित बस जिन्ह के मन माहीं।

तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥

हमलोग जल्दी जानेका विचार कर रहे हैं। जहाँ जाओ, वहाँ सबको यहाँ सुनी हुई बातें बतानी चाहिये। जैसे लोग तीर्थोंसे आकर प्रसाद बाँटते हैं, उसी तरहसे यहाँकी सुनी हुई बातोंको उन्हें सुनाना चाहिये, यही असली प्रसाद है। भक्तिकी, सेवाकी बातें ऐसी हैं, जिनको धारण करनेसे परम गति हो जाती है। ऐसी बातोंको ग्रहण करे, इस बातका खूब खयाल रखे कि दूसरोंका भला हो तथा बिगाड़ किसीका न हो।

स्त्रियोंको लुक-छिपकर काम नहीं करना चाहिये, इससे बहुत पतन होता है। घरमें छिपाकर कोई दान न दे। पहनने-ओढ़नेके लिये छिपाकर कोई चीज न मँगाये। यह आत्माको कलंक लगानेवाला है और पतन करानेवाला है। कोई भी चीज चाहिये, वह अपने पतिसे मँगानी चाहिये, चोरी नहीं करनी चाहिये। जैसे थर्ड क्लासकी टिकट ली और बैठे इण्टर, सेकेण्ड या फर्स्ट क्लासमें, न पहुँचनेतक मनमें धड़कन रहती है, यह नहीं करना चाहिये। इससे आत्माका पतन है। मालूम पड़नेपर इस लोकमें दुर्दशा होती है, परलोकमें तो है ही। इसलिये चोरीका काम कभी नहीं करना चाहिये। शरीरको हर समय पवित्र रखे। शौच करनेके बाद जल-मिट्टीसे खूब साफ करना चाहिये। घरको साफ रखना चाहिये।

सत्य कमाईका पैसा अर्जित करना चाहिये, उसीसे बुद्धि शुद्ध होती है। हमलोगोंको न्यायसे पैसा कमाकर निर्वाह करना चाहिये।

स्त्रियोंको चाहिये कि घर स्वच्छ रखें, सबसे प्रेम रखें। हृदय, शरीर, व्यवहार सब साफ रखें। हृदयके काम, क्रोध, लोभ निकालकर खूब स्वच्छता रखें। सबसे प्रेमसे बातचीत करें। कोई गुस्सा भी करे उससे प्रेमसे बोलें तो उसका गुस्सा भी शान्त हो जाय। हँसकर बोलें, ऐसे प्रसन्नचित्त रहनेवाली स्त्रीके दोनों कुल तर जाते हैं। भजन-ध्यान करे। प्यारे वचन बोले। मनको पवित्र बनावे। छल, कपटसे दूर रहे। उत्तम-उत्तम भाव करे। समता-सन्तोष रखे, अपना पति जो दे उसीमें सन्तोष रखे, उसीमें आनन्द माने। जैसे हमलोग ठाकुरजीके प्रसादको थोड़ा ही लेते हैं वैसे ही सास चीज देवे तो थोड़ी लेवे, इस प्रसादीको गाँव और घरमें बाँटे तो सबका कल्याण हो। निष्कामभावसे जो इस प्रकार काम करता है उसका कल्याण हो जाता है।