सच्चिदानन्दकी एकता

प्रवचन—दिनांक १२-६-१९३६, शुक्रवार, प्रात:, स्वर्गाश्रम

आजका विषय सत्-चित्-आनन्दकी एकताका है। सच्चिदानन्दकी एकता किस तरह करनी चाहिये? बुद्धिमिश्रित परमात्माके स्वरूपका या ज्योतिस्वरूपका या विश्वरूपका ध्यान करना चाहिये। सबका एक ही फल बतलाया गया है। जिस देशमें जो पदार्थ नहीं होता, उस देशमें उसे समझाना बड़ा कठिन है। साधकके लिये ज्ञान-घनका साधन ही सबसे सुगम है। सत्-चित्-आनन्दकी एकताका जिस व्यक्तिको अनुभव हो वही ठीक तरहसे समझा सकता है। वास्तवमें वही सत् है, वही चित् है और आनन्द है। शास्त्रोंमें सत्-चित्-आनन्द परमात्माका स्वरूप ही बतलाया है। सत् जो परमात्माका स्वरूप है, वही परमात्मा है। परमात्मा सत्य है। जब यह बात स्वीकार कर ली जाती है कि परमात्मा हैं, तभी उनकी प्राप्ति हो जाती है। हमलोगोंमें जिसने परमात्माको स्वीकार कर लिया है उसे ही परमात्माकी प्राप्ति हो गयी है। जिस प्रकार हमने मकानको स्वीकार कर रखा है, परमात्मा उससे भी कई गुने अधिक प्रत्यक्ष स्वीकार करनेयोग्य हैं। मकान तो अनित्य है और वह परमात्मा नित्य हैं। जैसे हम दूसरी वस्तुओंको स्वीकारकर मिलते हैं, वैसा स्वीकार करना एवं मिलना परमात्माका नहीं है, वहाँ भूत, भविष्य एवं वर्तमान भी नहीं है। ये भी अपनी बुद्धिके अन्तर्गत ही है। उसका होनापन अद‍्भुत है, विलक्षण है। हम जितने पदार्थोंको प्रत्यक्ष देख रहे हैं, वह परमात्मा तो उनसे बहुत अधिक विलक्षणरूपसे प्रत्यक्ष हैं। वह परमात्मारूपी देश अत्यन्त विलक्षण है। इसलिये वह बताया भी नहीं जा सकता है। वह तो संकेतके द्वारा ही बतलाया जा सकता है। वह परमात्मा कैसे हैं, यह चिन्तनमें भी नहीं आता। हम जो पदार्थ देख रहे हैं, वे नाश होते दीखते हैं, वे नाशवान् हैं, अनित्य हैं, असत्य हैं। परमात्माकी सत्यता और चेतनता दूसरी ही है। आज दो बातोंपर विचार करना है—

१.सच्चिदानन्दकी एकता किस प्रकार हो सकती है?

२.उनका ध्यान किस प्रकार हो सकता है?

परमात्माका होनापन प्रत्यक्ष है। जैसे जो पदार्थ हम अपनी दृष्टिसे प्रत्यक्ष देख रहे हैं, उससे कई गुना अधिक आत्माका प्रत्यक्ष होना है। ये पदार्थ तो अनित्य हैं और आत्मा नित्य है। शरीर छूटनेके बाद भी आत्माका अभाव नहीं होता।

जैसी आत्माकी सत्ता है, वैसी सत्ता और किसीकी नहीं है। आत्मा चेतन है। आत्मासे सत्-चित् अलग नहीं है। बुद्धिके द्वारा जो सत्य-असत्य समझते हैं, उससे भी आत्मा विलक्षण है। आत्माके होनेमें कोई प्रमाण देनेकी आवश्यकता नहीं है। जहाँ आत्मा है, वहाँ दूसरी वस्तु हो सकती है। जहाँ आत्मा है ही नहीं, वहाँ दूसरी वस्तु कैसे हो सकती है। समाधिका भी अभाव होता है। पर जिसकी अवस्था कही जाती है, उसका अभाव नहीं होता, वह आत्मा है। वह सुखका अनुभव करता रहता है। वह सत्य और चेतन है, साथ ही सुखका अनुभव कर रहा है। वह सुख चेतन सुख है, चेतन आनन्द है। वह आनन्द बुद्धिसे परे है, सबका साक्षी वही चेतन आत्मा है, वह आनन्दमय है। इसलिये उसे सच्चिदानन्दघन कहा है। सत्-चित्-आनन्द कोई अलग-अलग वस्तु नहीं है। आत्माके होनेपनमें आत्मा चेतन है, ऐसा समझमें आया, वहाँ अचेतन हो ही नहीं सकता, वह सत्य है। सत्यता और चेतनता एक ही है। जो माननेवाला है वह आनन्दमय है। परमात्माके स्वरूपका आनन्द विलक्षण आनन्द है। जैसे घड़ा भरनेपर उसमें और पानी नहीं समा सकता, वैसी ही हालत उस आनन्दमें है। वाणीकी शक्ति नहीं कि उसका वर्णन कर सके, बुद्धिकी शक्ति नहीं कि वह उसे जान सके। व्यक्ति इन्द्रियोंका सुख छोड़कर, तामसी और राजसी आनन्द छोड़कर, सात्त्विक वृत्ति ग्रहणकर सात्त्विक बुद्धिसे सात्त्विक आनन्दका ध्यानमें अनुभव करता है। जैसे आँख खुलनेपर स्वप्नकी सीमा आ जाती है। परन्तु परमात्मरूपी आनन्दकी सीमा नहीं है, वह तो अपार है। आकाशका भी आकार है, किन्तु उस आनन्दका आकार नहीं है। वह तो आकाशसे कहीं बहुत बड़ा है। उसे कैसे पकड़े। सात्त्विक आनन्दसे भी वह विलक्षण है। आत्मबुद्धिसे जो प्रसन्नता होती है वह सात्त्विक आनन्द है। सात्त्विक आनन्द भी बाँधता है। सात्त्विक आनन्दके बीचमें मालूम होता है कि आज बड़ा आनन्द है। इससे समझमें आता है कि आनन्द जिसे भासता है, वह वस्तु अलग और आनन्द अलग है। इसीलिये वह परमात्मरूपी आनन्द दूसरा ही है। वहाँ ज्ञाता और ज्ञेय अलग-अलग नहीं होते। वहाँ तो दोनों एक ही हैं, वहाँ यह कहनेकी गुंजाइश नहीं है कि आज बड़ा आनन्द है, बड़ी शान्ति है। यह कहना सात्त्विक आनन्दमें ही हो सकता है। वह आनन्द किसीका ज्ञेय नहीं, ध्येय नहीं। वह आनन्द स्वयं ज्ञाता है, स्वयं ही द्रष्टा है। वह आनन्द ही ज्ञान है। उस आनन्दका स्वरूप ज्ञान है। यानि वह ज्ञानस्वरूप आनन्द है। उस आनन्दको ही ज्ञान है कि ज्ञानस्वरूप आनन्द है, हमको नहीं, क्योंकि आनन्द स्वयं ज्ञाता है, चेतन है। आनन्दको जाननेवाला वहाँ नहीं रहता। वहाँ ज्ञान और आनन्द एक ही है, बतलानेमें जाति दो है। उस आनन्दमें कोई विकार नहीं है, वह नित्य है, अचिन्त्य है। उससे भिन्न कोई सत्ताकी स्थापना नहीं हो सकती। वहाँ तो मैं हूँ आदि शब्दोंके उच्चारण करनेकी आवश्यकता नहीं रहती। वहाँ आनन्द ही स्वरूप है। जहाँ आनन्दका होना कायम हो गया वहाँ आनन्दसे अलग कोई वस्तु नहीं है। इस लौकिक आनन्दमें असत्यता है, अचेतनता है, परन्तु वह परमात्मरूपी आनन्द तो स्वयं सत्य है, स्वयं चेतन है। इस तरह सच्चिदानन्द एक ही है।

चेतनका ध्यान किस तरह किया जाय?

चिन्मय चेतनको पकड़ लेना ही उसका ध्यान करना है। ध्यान करनेवाला अलग और चेतन अलग है—ऐसी बात नहीं है, वह एक ही है। सबको त्यागनेपर त्यागी तो है, किन्तु वहाँ चिन्मय चेतन ही त्यागी है और त्यागी ही चिन्मय चेतन है, दोनों एक हैं।

जहाँ ज्ञान है वहाँ निद्रा कहाँ? चेतनताका बाहुल्य होगा, विलक्षण बाहुल्य होगा। आगे पूर्ण आनन्द प्राप्त होगा। वहाँ यह कहनेवाला भी नहीं रहेगा कि तृप्ति हो गयी या नहीं हुई, वहाँ आनन्द-ही-आनन्द है और बढ़ता ही जाता है। जिसको परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है वह फिर लौटकर नहीं आता। जितनी बातें बतलायी गयी हैं, इससे भी कहीं अधिक परमात्माके विषयकी सत्यता, चेतनता और आनन्दकी बातें हैं।