साधनाको गुप्त रखें
विचारद्वारा हम चाहते हैं कि भगवान्का भजन करें, पर मनके पाजीपनके कारण नहीं कर पाते हैं। बुद्धिद्वारा विचार करते हैं कि संसारके पदार्थ बुरे हैं, पर मनको सांसारिक पदार्थ अच्छे लगते हैं। अब इसे संसारसे हटाकर भगवान्में कैसे लगाया जाय। सबसे उत्तम बात यह है कि प्रभुमें श्रद्धा-प्रेम बढ़ावे, फिर अपने-आप स्वाभाविक ही चिन्तन होगा। वास्तवमें साधनका फल श्रद्धा और प्रेम ही है और उपाय भी यही है। श्रद्धा और प्रेम ही प्रभुसे भेंट करा सकते हैं।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
(गीता ९। २२)
जो मेरा अनन्य चिन्तन करता है उसका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ। प्रभुकी प्राप्तिके मार्गमें जहाँतक पहुँच गया है, वहाँसे गिरने नहीं देते, वहाँतककी रक्षा करते हैं और जितना भगवान्को प्राप्त करना बाकी रहा है, उसकी प्राप्ति करा देते हैं। कैसे?
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥
(गीता १०। १०)
ऐसा बुद्धियोग देते हैं जिससे भगवत्प्राप्ति हो जाती है।
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥
(गीता १२। ७)
हे अर्जुन! उन मेरेमें चित्त लगानेवाले प्रेमी भक्तोंका मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसारसागरसे उद्धार करनेवाला होता हूँ।
अब प्रश्न यह उठता है कि श्रद्धा-प्रेम कैसे हो? प्रभु तो बहुत दयालु हैं, प्रथम श्रेणीकी बात तो यह है कि प्रभुके नाम, गुण, तत्त्व, रहस्य आदिको प्रभुके प्यारे प्रेमी भक्तोंद्वारा सुनकर, मननद्वारा प्रेमको भीतर बढ़ावे। उसे गुप्त रखे, बाहर प्रकाशित न होने दे। गुप्त प्रेमका मूल्य बहुत अधिक होता है। छोटी नदीमें थोड़ा-सा जल आनेपर वह बह निकलती है, पर समुद्रमें कितनी ही बड़ी नदियाँ गिरें, वह अचल रहता है। एक लौकिक दृष्टान्तसे किसी अंशको समझाता हूँ।
एक कन्या है, उसकी एक लड़केके साथ सगाई कर दी गयी। कोई उसके ससुरालसे आकर यदि उसके पतिके गुणोंका, आचरणोंका वर्णन करने लगता है तो वह सुननेकी चेष्टा करती है, पर उसे गुप्त रखती है। ससुरालकी चीजोंको आयी हुई सुन-सुनकर प्रसन्न होती है। वर जब दुल्हेके रूपमें घर आता है, तब उसे कितना उत्साह रहता है। इसी प्रकार प्रभुके लिये भक्तको उत्साह रहता है। विरह व्याकुलता भी रहती है कि प्रभु कब मिलेंगे।
यहाँ दृष्टान्तको घटाइये, ईश्वर हमारा वर है, महात्मा सम्बन्ध करानेवाले हैं। वे भगवान्के गुणोंका बखान करते रहते हैं, प्रशंसा करते हैं। कन्याके लिये पाँच-पाँच चूड़ियाँ आती हैं, यह सुहागका चिह्न है। प्रभुका दरबार ससुराल है। यहाँ दस चूड़ियाँ हैं, पाँच यम और पाँच नियम। पाँच दाहिनेमें तथा पाँच बाँये हाथमें पहननेके लिये हैं।
पाँच यम हैं—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह।
१-अहिंसा—किसीकी हिंसा नहीं करनी, किसी प्रकार भी किसीको कष्ट न पहुँचाना।
२-सत्य—जैसा मनमें समझा हो, उसे प्रिय शब्दोंमें सरलताके साथ समझा देना।
३-अस्तेय—किसी प्रकार भी किसीकी वस्तु बिना पूछे नहीं लेनी।
४-ब्रह्मचर्य—किसी प्रकार भी वीर्यको स्खलित न होने देना।
५-अपरिग्रह—आवश्यकतासे अधिक संचय न करना।
पाँच नियम हैं—सन्तोष, शौच, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान।
१-सन्तोष—यथा लाभमें, प्राप्ति-अप्राप्तिमें सन्तोष रखे।
२-शौच—बाहर-भीतरकी शुद्धि।
३-तप—इन्द्रियोंको धर्मपर चलानेके लिये कष्टसहिष्णु बनाना।
४-स्वाध्याय—भगवान् और उनके नामका गुणगान।
५-ईश्वर-प्रणिधान—परमेश्वरकी शरणागति।
इनका पालन प्रभुके यहाँकी भेजी हुई दस चूड़ियोंको पहनना है। इन्हें बड़े चावसे धारण करें, जैसे कन्या करती है।
ससुरालसे दो वस्त्र आते हैं, उत्तरीय और अधो वस्त्र। मस्तक, गले, छाती आदिके आभूषण भी आते हैं।
मस्तकके तीन आभूषण सबसे बढ़कर हैं—विनय—सबको मस्तक नवाना, निष्कामभाव और सबमें समता। यह तीसरा आभूषण दूसरे सारे आभूषणोंका सिरमौर है।
कानोंमें कुण्डल या कर्णफूल हैं अपनी निंदा सुननेकी सहनशक्ति। अपनी निंदा तथा दूसरोंकी प्रशंसा तथा प्रभुकी प्रशंसा सुनकर जो प्रसन्नता होती है और अपनी स्तुति सुनकर जो संकोच होता है, यह कानोंका आभूषण है।
मुखका आभूषण है दाँतोंमें सोनेकी चोप लगाना। यह प्रिय, सत्य और हितकर मधुर वचनोंका बोलना है।
गलेका आभूषण है कंठा। प्रभुके प्रभाव, प्रेम रहस्यकी बातें कण्ठस्थ होना कण्ठके आभूषण हैं। चन्द्रहार जो हृदयका गहना है वह प्रभुको अपने हृदयमें बसा लेना है। हाथोंका आभूषण कंगन है। अपने सत्त्वका परके लिये त्याग, दान, सेवा, उपकार आदि हाथोंका आभूषण है।
पैरोंसे चलना होता है। किसी महापुरुषके दर्शन, सत्संगके लिये गमन करना और मन्दिरोंमें प्रभुके विग्रहके दर्शनके लिये जाना पैरोंका आभूषण है।
इन उपरोक्त आभूषणोंको जो प्रेमसे धारण करता है, उसका समाचार प्रभुके पास पहुँचता रहता है। प्रभु एकदम मुग्ध हो जाते हैं। अत: भक्तके समीप वे ही चलकर आते हैं। लड़कीको जैसे वरके आनेसे प्रसन्नता होती है, पर वह गुप्त रखती है। इसी प्रकार हमें भी प्रभुके लिये गुप्त प्रेम-भक्ति करनी चाहिये। यह संक्षेपसे समझाया गया है।
प्रभुके प्रेम, गुण, प्रभाव, रहस्य, तत्त्व, मर्मकी चर्चा, श्रवण और कथन करनेसे प्रभुमें प्रेम होता है।
गुण—ज्ञान, क्षमा, समता, शान्ति, सरलता, दया, प्रेम, आदि गुण हैं। ये सब बातें प्रभुमें अतिशय हैं।
प्रभाव—जैसे कोई महापुरुषके आनेपर जो असर होता है, जैसे सूर्यका प्रकाश आता है, यह सूर्यका प्रभाव है। इसी प्रकार प्रभुमें अपरिमित प्रभाव है, उसे किसी प्रकार बतला नहीं सकते तथापि बतलाया जाता है। वे असम्भवको भी सम्भव कर सकते हैं। कोई कहे कि क्या वे सारे संसारका उद्धार भी कर सकते हैं? क्यों नहीं कर सकते? अवश्य कर सकते हैं। करते क्यों नहीं? इसका उत्तर यह है कि हम कहनेवाले कौन होते हैं। कोई कहे जबतक नहीं करते हैं, तबतक नहीं करते। ऐसा भले ही कोई समझा करे कि प्रभु ऐसा नहीं कर सकते। ऐसा समझनेवालेपर प्रभु नाराज नहीं होते, न अप्रसन्न होते हैं। वे तो गाली देनेवालेको भी भोजन देते हैं। वे ब्रह्माको मामूली कीट और एक तुच्छ कीटको ब्रह्मा बना सकते हैं। पर यह तो उनके लिये मामूली बात है। इसे जाननेके लिये गीताका श्लोक देखिये—
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्॥
(गीता १०। ४१)
हे अर्जुन! जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त एवं कान्तियुक्त और शक्तियुुक्त वस्तु है, उस-उसको तू मेरे तेजके अंशसे ही उत्पन्न हुई जान।
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥
(गीता ९। ११)
इस बहुत जाननेसे तेरा क्या प्रयोजन है। मैं इस सम्पूर्ण जगत्को अपनी योगमायाके एक अंशमात्रसे धारण करके स्थित हूँ, इसलिये मेरेको ही तत्त्वसे जानना चाहिये।
स्वरूप—प्रभुके कई प्रकारके स्वरूप हैं, साकार, निराकार, गुणातीत, द्विभुज, चतुर्भुज, सहस्रभुज और अव्यक्त।
द्विभुजकी महिमा—
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥
(गीता ९। ११)
सम्पूर्ण भूतोंके महान् ईश्वररूप मेरे परम भावको न जाननेवाले मूढ़ लोग मनुष्यका शरीर धारण करनेवाले मुझ परमात्माको तुच्छ समझते हैं। अर्थात् अपनी योगमायासे संसारके उद्धारके लिये मनुष्यरूपमें विचरते हुएको साधारण मनुष्य मानते हैं।
चतुर्भुजरूप—
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त-
मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन
सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥
(गीता ११।४६)
हे विष्णो! मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किये हुए तथा गदा और चक्र हाथमें लिये हुए देखना चाहता हूँ। इसलिये हे विश्वरूप! हे सहस्रबाहो! आप उसी चतुर्भुजरूपसे युक्त होइये।
कोई कहे कि चतुर्भुजरूपसे भगवान् अर्जुनको रथपर सदा दीखते होंगे, ऐसी बात नहीं थी। रथपर ऐसा रूप नहीं दीखता था। वहाँ तो उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि मैं युद्धमें चक्र, गदा आदि धारण नहीं करूँगा। पहले अर्जुनने इस रूपमें देखा था, तभी कहा कि वह चतुर्भुजरूप दिखलाइये। यह रूप अर्जुनको ही दिखलाया था, दूसरोंको नहीं। विश्वरूप भी दिखलाया यह उपरोक्त श्लोकसे ही स्पष्ट हो रहा है।
निराकार स्वरूप—
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित:॥
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन:॥
(गीता ९।४-५)
मुझ निराकार परमात्मासे यह सब जगत् जलसे बर्फके सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अन्तर्गत संकल्पके आधार स्थित हैं, किन्तु वास्तवमें मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।
वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं; किन्तु मेरी ईश्वरीय योगशक्तिको देख कि भूतोंका धारण-पोषण करनेवाला और भूतोंको उत्पन्न करनेवाला भी मेरा आत्मा वास्तवमें भूतोंमें स्थित नहीं है।
निराकार-साकार—
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥
(गीता ९। १९)
सूर्यरूपसे मैं ही तपता हूँ तथा वर्षाको वर्षाता हूँ। मैं ही अमृत और मृत्यु एवं सत्-असत् भी सब कुछ मैं ही हूँ।
सर्वत:पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वत:श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥
(गीता १३। १३)
वह सब ओरसे हाथ-पैरवाला एवं सब ओरसे नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओरसे श्रोत्रवाला है, क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है।
सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है, परन्तु वास्तवमें सब इन्द्रियोंसे रहित है तथा आसक्तिरहित और गुणोंसे अतीत हुआ भी अपनी योगमायासे सबको धारण-पोषण करनेवाला और गुणोंको भोगनेवाला है।
साकार स्वरूप—ब्रह्मा, विष्णु आदिके रूपमें प्रकट होता हूँ, यह बतलाया। तत्त्व, रहस्य और मर्मकी बातें भी भगवान्ने अर्जुनको बतलायीं। अपना परिचय दिया, अपने घरका तलपट, घरकी स्थिति उसीको बतलायी जाती है जो अत्यन्त प्यारा होता है। भगवान् अपने मर्मकी बात कहते हैं—
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥
(गीता ४। ६)
मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ।
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
(गीता ४। ७)
हे भारत! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूपको रचता हूँ अर्थात् साकाररूपसे लोगोंके सम्मुख प्रकट होता हूँ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
(गीता ४। ८)
साधु पुरुषोंका उद्धार करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी अच्छी तरहसे स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥
(गीता ४। ९)
हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् निर्मल और अलौकिक हैं—इस प्रकार जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता है, वह शरीरको त्यागकर फिर जन्मको प्राप्त नहीं होता, किंतु मुझे ही प्राप्त होता है।
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता:।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता:॥
(गीता ४। १०)
पहले भी, जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गये थे और जो मुझमें अनन्यप्रेमपूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे मेरे आश्रित रहनेवाले बहुत-से भक्त उपर्युक्त ज्ञानरूप तपसे पवित्र होकर मेरे स्वरूपको प्राप्त हो चुके हैं।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:॥
(गीता ४। ११)
हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं।
इन श्लोकोंमें भगवान्ने अपना रहस्य बतलाया। जैसे भीष्मपितामहने अपनी मृत्युका रहस्य स्वयं खोल दिया था, इसी प्रकार भगवान्ने अपनेको जीतनेका, अपनेको वशमें करनेका उपाय अर्जुनको स्वयं बतलाया। इसके पहले भगवान् अर्जुनको अपना प्यारा भक्त स्वीकार करते हैं। ‘भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।’ (गीता ४।३) उत्तम-से-उत्तम गुह्यतम रहस्य बता देता हूँ। इसीको मैंने सृष्टिके आदिमें सूर्यको बतलाया था। जहाँ भगवान्ने ऐसा रहस्य बताया वहाँ पहले गुह्य अवश्य कहा है। गीतामें राजगुह्य बताकर रहस्य खोला।
पत्र, पुष्प, फल, जल इत्यादि जो कोई प्रेमसे अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्तका प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ मैं प्रकट होकर प्रीतिसहित खाता हूँ।