साधनमें श्रद्धाकी आवश्यकता
प्रवचन—दिनांक ४-१-१९३७, प्रातःकाल, गीतावाटिका, गोरखपुर
जितनी श्रद्धा होती है उतनी ही तत्परता होती है और जितनी तत्परता होती है, उतना ही मन और इन्द्रियोंका संयम होता है। कोई मनुष्य रुपयोंके लिये नौकरी करता है, उसे मालूम हो जाय कि इस तरहसे अधिक रुपये मिलेंगे तो वह वैसा ही करेगा। इसी प्रकार भगवद्विषयमें जितनी श्रद्धा होती है, उतनी ही तत्परता होगी। किसीकी गीतामें श्रद्धा है, पर वह उसे पढ़ता, सुनता नहीं और केवल कहता है कि मेरी गीतामें श्रद्धा है। किसी पुरुषमें मेरी श्रद्धा है, पर मैं उसके वचनोंका पालन नहीं करता, इसमें क्या श्रद्धा समझी जा सकती है। जितनी अधिक श्रद्धा होगी, उतनी अधिक तत्परता होगी। भगवान् कहते हैं—
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
(गीता ४। ३९)
हे अर्जुन! जितेन्द्रिय तत्पर हुआ श्रद्धावान् पुरुष ज्ञानको प्राप्त होता है। ज्ञानको प्राप्त होकर, तत्क्षण भगवत्प्राप्तिरूप परमशान्तिको प्राप्त हो जाता है।
सोचना चाहिये कि मन-इन्द्रियोंके वशमें होनेसे श्रद्धा होती है अथवा श्रद्धासे मन-इन्द्रियादि वशमें होते हैं। इसका उत्तर यह है कि श्रद्धासे मन-इन्द्रियाँ वशमें होती हैं, नहीं तो भगवान् श्रद्धाको ज्ञानसे नहीं मिलाते। यहाँ कर्ता श्रद्धावान् है, लभते क्रिया है और ज्ञान कर्म है। तीनोंको एक लाइनमें रखा है।
नित्य साधन करते हैं, उसे ही यदि श्रद्धाके साथ, तत्परताके साथ करें तो बहुत शीघ्र कल्याण हो सकता है। एक भाईको बीस वर्षके साधनसे जो लाभ नहीं हुआ, वही लाभ छ: महीनामें हो सकता है। उसे अधिक लाभ भी हो सकता है।
बहुत-से भाई गीताका अभ्यास करते हैं, पर खयाल नहीं करते कि भगवान् अर्जुनके किस प्रश्नका किस प्रकार समाधान करते हैं। प्रत्येक अध्यायका दूसरे अध्यायसे क्या सम्बन्ध है। एक श्लोकका दूसरे श्लोकसे क्या सम्बन्ध है, इसका विस्तारपूर्वक विचार करना चाहिये। अर्जुनके प्रश्न उठानेका क्या कारण है, फिर भगवान् उसका कैसा उत्तर देते हैं, इसका भी खयाल करना चाहिये। इसमें आपका समय उतना ही लगेगा, जितना अभी लगता है। एकलव्य भीलकी गुरुमें श्रद्धा ही प्रधान थी, गुरुने उसे आकर कभी भी विद्या नहीं सिखलायी।
जाबालाके पुत्रकी गुरुमें श्रद्धा ही प्रधान थी। वह चार सौ गायोंको ले जाकर एक हजार होनेपर वापस लौटे। एकलव्यको तो स्पष्ट उत्तर ही मिल गया था। गुरुने उसे शिष्य बनानेसे मना कर दिया। गुरु-शिष्यके सम्बन्धमें शिष्यकी ही प्रधानता है। कोई चाहे कि मैं सबका गुरु बन जाऊँ तो कैसे बन सकता है। गुरु कोई नहीं बन सकता, पर शिष्य बनना चाहे तो बन सकता है। उसने जंगलमें जाकर गुरुकी मिट्टीकी मूर्ति बनायी और उसीसे पूछ-पूछकर विद्या सीखनी आरम्भ की। जिस प्रकार भरतजी भगवान् रामकी पादुकाओंको राजसिंहासनपर रखकर राजकाज चलाते थे।
ऐसी ही बात जपकी है। हम जप कर रहे हैं, उस जपसे जो लाभ होता है, मैं कह सकता हूँ कि आपने बीस वर्षसे जो लाभ नहीं उठाया, उसे एक दिनमें प्राप्त कर सकते हैं। इसमें अत्युक्ति नहीं है, असम्भव नहीं है, शास्त्रसम्मत है। मनुने बतलाया है कि वाचिक जपसे दस गुणा लाभ उपांशुका और उपांशुसे दस गुणा मानसिक जपका लाभ है। उसे भी यदि अर्थके साथ यानि उसका ध्यान करते हुए किया जाय तो उसके सारे पाप नष्ट होकर वह भगवान्को प्राप्त हो जाता है।
इसी प्रकार गीताके पाठकी बात है। अर्थकी ओर, लक्ष्यकी ओर ध्यान रखनेसे ज्ञान मिलेगा और नामके अर्थकी ओर ध्यान रखनेसे नारायण मिलेंगे। यदि निष्कामभावसे किया जाय तो विशेष लाभ होता है।
एक नाम लेनेसे ही सब कुछ हो सकता है। पर एक लाख नाम-जपसे क्यों नहीं होता? यदि एक घंटा भी आप जो असावधानीसे करते हैं, उसे सावधानीसे करें तो हजार गुणा फल मिल सकता है। आप शास्त्रद्वारा, विचारद्वारा देख सकते हैं। आप भजनको इतना मूल्यवान् समझते ही नहीं, समझते तो इस प्रकार समय नहीं बीतता। हम जितना पैसेका आदर करते हैं, उतना भी भगवान्का नहीं करते। पैसेकी बात तो दूर रही, हम कौड़ियोंका जितना आदर करते हैं उतना भजनका नहीं करते। हमारी कौड़ीमें जितनी प्रीति है उतनी भी भगवन्नाममें नहीं है, इसपर भी हम फल चाहते हैं तो कैसे लाभ मिलेगा। भगवान्के एक नाममें इतना लाभ है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। हम पारसमणिको मामूली पत्थर समझते हैं। किसी महापुरुषने अपने शिष्यको पारसकी कीमत करानेके लिये भेजा, सागवालीने दो मूली कहा, बनियेने एक रुपया देनेको कहा, सुनारने दस रुपया कहा, दूसरे सुनारने एक लाख कीमत बतलायी, बड़े जौहरीके पास गया उसने कहा हमारे पास इसकी कीमत नहीं है, फिर राजाके पास गया, राजाने जौहरियोंको बुलाकर पूछा, उन्होंने एक करोड़ कीमत बतलायी। शिष्यने कहा बेचना नहीं है। महात्माके पास लौट आया। उसने कहा हमारी समझसे एक करोड़में बेच देना चाहिये। महात्माजीने कहा इसकी कीमत ही नहीं है, कीमत तो इसमेंसे निकलती है। महात्माने लोहा मँगाकर छुआकर सोना बनाकर बताया और कहा सारे संसारकी कीमत तो इसके पेटमें है। इसी प्रकार भगवन्नामकी कीमत पारस है, पर हम जानते नहीं। गीतामें कहा है—
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध: स्मृत:।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिता: पुरा॥
(गीता १७। २३)
ॐ, तत्, सत् —ऐसे यह तीन प्रकारका सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका नाम कहा है; उसीसे सृष्टिके आदिकालमें ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादि रचे गये।
ॐ यह सारे वेदोंका सार है। तीनों वेदोंसे गायत्री निकली, उससे तीन व्याहृतियाँ निकलीं और उन तीन व्याहृतियोंसे ॐ निकला। यही महिमा राम, कृष्ण, गोविन्द, हरि आदि नामोंकी है।
हमें जलकी आवश्यकता है उस समय चाहे पानी, वाटर, अप, जल आदि शब्दोंमेंसे किसी एकका भी उच्चारण करें तो उसका तात्पर्य एक ही है। इसी प्रकार भगवन्नाम सब एक ही है। वह कूंजड़ी उस पारसका मूल्य दो मूली समझती थी, पर हम तो भगवन्नामका मूल्य उतना भी नहीं समझते। भगवन्नाममें कितनी सामर्थ्य है, कितना लाभ है, हम बतला नहीं सकते। एक नामसे उद्धार हो जाता है। भगवान् कहते हैं—
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:॥
(गीता ८। ५)
जो पुरुष अन्तकालमें भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात् स्वरूपको प्राप्त होता है—इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
शास्त्रोंमें जैसा कहा है वैसा ही लाभ है। यह संक्षेपसे नाम-महिमा बतलायी।
इसी प्रकार सन्ध्याके विषयमें समझ लीजिये। सूर्यको अर्घ्य देते हैं, वह जाकर सारी दुनियामें बरसता है, उससे सारी दुनियाकी तृप्ति होती है। जो तीन अंजलि सूर्यको देता है, वह सारी दुनियाको सदावर्त जिमाता है, जो प्रेमसे और नियमसे सन्ध्या करता है, उसका एकमात्र सन्ध्यासे कल्याण हो सकता है।
मरनेपर जीव वायुसे प्रार्थना करता है, सूर्यसे प्रार्थना करता है कि अपनी रश्मियोंद्वारा ले जाकर भगवान्को मुझे दिखलाइये।
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥
(ईशावास्योपनिषद् १५)
हे सबका भरण-पोषण करनेवाले परमेश्वर सत्यस्वरूप आप सर्वेश्वरका श्रीमुख ज्योतिर्मय सूर्यमण्डलरूप पात्रसे ढका हुआ है आपकी भक्तिरूप सत्यधर्मका अनुष्ठान करनेवाले मुझको अपने दर्शन करानेके लिये उस आवरणको आप हटा लीजिये।
इसपर भगवान् सूर्यको ध्यान देना पड़ता है कि उसे भगवान्से मिलावें। कोई कहे चन्द्रमाको क्यों नहीं अर्घ्य दें, उससे मुक्ति मिल सकती है या नहीं। इसका उत्तर यह है कि इससे स्वर्ग तो मिलता है, पर मुक्ति नहीं।
धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण: षण्मासा दक्षिणायनम्।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥
(गीता ८। २५)
जिस मार्गमें धूमाभिमानी देवता है, रात्रि-अभिमानी देवता है तथा कृष्णपक्षका अभिमानी देवता है और दक्षिणायनके छ: महीनोंका अभिमानी देवता है, उस मार्गमें मरकर गया हुआ सकाम कर्म करनेवाला योगी उपर्युक्त देवताओंद्वारा क्रमसे ले गया हुआ चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होकर स्वर्गमें अपने शुभकर्मोंका फल भोगकर वापस आता है।
सन्ध्याका इस प्रकार नियम कर ले कि जिस दिन समयपर सन्ध्या न हो, उस दिन उपवास-भोजन न करे। नियम यह करे कि प्रात:कालकी सन्ध्या सूर्योदयके पहले और सायंकालकी सूर्यास्तके पहले हो जाय।
जिस प्रकार कोई महात्माके पधारनेपर हम उनका स्वागत करनेके लिये पहलेसे तैयार रहते हैं, उसी प्रकार सूर्यभगवान् तो महात्माके भी महात्मा हैं, वे सब प्राणियोंका कल्याण करते हैं। इसी प्रकार उन्हें प्रकट होते समय जलांजलि दे और उन्हें देखकर मुग्ध होवे। सूर्यको भगवान् मानकर दर्शन करनेसे भगवान्के दर्शनका फल मिलेगा। इसी प्रकार प्राणायामकी बात है—हमें उसमें प्रेम-श्रद्धा है और विधिपूर्वक करते हैं तो यथार्थ लाभ हो सकता है। यदि बेगार मानकर बेमनसे करते हैं तो उतना लाभ नहीं होता, पर नहीं करनेसे तो ठीक है और करते-करते कभी लाभ हो सकता है।
जितना काम हम कर रहे हैं उसका लाभ इसीलिये नहीं हो रहा है कि हममें उसके प्रति आदर, श्रद्धा और प्रेम नहीं है। मुक्ति तो एक हरे राम मंत्रसे ही हो सकती है। इसी प्रकार सन्ध्यासे मुक्ति हो सकती है। अभी हम जो सन्ध्या, नाम-जप आदि करते हैं, वह ठीक है। उसमें कोई नयी बात नहीं करनी है। केवल उसमें श्रद्धाका समावेश कर दें। चाहे किसीका भी ध्यान करें, गणेश, विष्णु, कृष्ण, राम, शंकर आदि किसीका भी ध्यान करें, उत्तम बात है।
आप जितना समय लगाते हैं, वह समय व्यर्थ नहीं जाना चाहिये। जीवनको अमूल्य समझकर बर्बाद नहीं करना चाहिये। समय बेकार जा रहा है, इसीलिये लाभ नहीं होता। श्रद्धाकी आवश्यकता है, जितनी श्रद्धा होगी, उतना ही लाभ होगा।
आप श्रद्धाकी रक्षा करेंगे तो श्रद्धासे सबकी रक्षा होगी। जैसे कौरवोंमें भीष्मकी रक्षा करनेसे सबकी रक्षा हो सकती थी, यहाँपर श्रद्धा ही भीष्म है।