संसार परमात्मस्वरूप ही है
प्रवचन—दिनांक १२-६-१९३६, रात्रि, गीताभवन, स्वर्गाश्रम
संसारमें विषयासक्त एवं पापी पुरुष परमार्थी पुरुषसे बिलकुल विपरीत हैं। मान-बड़ाईको चाहनेवाला मार्ग पतनका मार्ग है। हरेक काममें स्वार्थ देखना अपने परमात्मारूपी ध्येयसे विपरीत नीचे गिरानेवाला मार्ग है। परमार्थका मार्ग उत्तम है। अपने शरीर और रुपयोंकी हानि भी होकर दूसरोंका लाभ होता है, वही असली लाभ है। हम हरेक आदमीके साथ स्वार्थका व्यवहार करते हैं, ऐसा न होकर स्वार्थ-त्यागका व्यवहार करना चाहिये। यह असली सेवाकी बात हुई।
जिस समय भगवच्चर्चा चलती है, मुर्दा जलाया जाता है, वैराग्यकी बातें होती हैं, ऐसे समयमें जैसी वृत्तियाँ रहती हैं, ऐसी वृत्तियाँ सदा ही बनी रहें तो उद्धार होनेमें कोई सन्देह नहीं। यह शरीर शान्त हो जायगा तो इसकी राख भी किसीके काममें नहीं आयेगी। जो व्यक्ति ऐसा सोचकर इसके रहते हुए ही इसे दूसरेके काममें लाये वही बुद्धिमान् है। हमें इस बातका पता नहीं कि कब मृत्यु होगी। शरीर शान्त हो जायगा, किसीसे सम्बन्ध नहीं रहेगा, फिर क्या काम आयेगा, इसलिये शीघ्र ही अपना काम बना लेना चाहिये। केवल शरीरका पालन और पोषण तो धनका नुकसान ही है। ऐसा न कर हमको अपनी आत्माका उद्धार कर लेना चाहिये। शरीरको भोजन इसलिये देते हैं कि इससे हमें अभी काम लेना है, आरामके लिये नहीं। जितने भी जीव मनुष्य देखता है, सबको आराम पहुँचानेमें ही अपना हित समझना चाहिये। ऐसा जिसका सिद्धान्त है वही मनुष्य है। जो मनुष्य, मनुष्य-शरीर पाकर दूसरोंकी सेवा नहीं करता है, वह चौरासी लाख योनियोंमें कष्ट पाते हुए भटकता फिरता है। सकामभावसे भी कर्म करना न करनेसे उत्तम है। यदि वह कर्म निष्काम है तो उत्तम-से-उत्तम बात है।
जिसका चींटीसे देवतापर्यन्त सभी प्राणियोंकी सेवा करनेका भाव है, वह परमपदको यानि भगवान् विष्णुके धामको प्राप्त होता है। उसे वही पदवी प्राप्त हो जाती है जो भगवान् विष्णुको प्राप्त है। जो मनुष्य मनुष्योंको भी सुख नहीं देता, उस नीच पुरुषका आगेका भविष्य कण्टकमय हो जाता है। इस बातको खयाल करके स्वार्थ त्यागकर सबकी सेवा करनी चाहिये।
ऐसे ही स्त्री भी पतिकी सेवाकर परमधामको प्राप्त हो जाती है। जो स्त्री भगवान्को ही भजती है उससे भगवान् शीघ्र प्रसन्न नहीं होते, क्योंकि वह कहते हैं कि मैं पतिके रूपमें घरमें ही मौजूद हूँ, इसलिये उसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। ब्रह्मचर्यका पालन स्त्री-पुरुष दोनोंकी प्रसन्नतासे ही करना चाहिये। माहमें एक समय सहवास करना चाहिये, इससे अधिक करना पशुवत् कार्य ही है। स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर यदि एक वर्षतक ब्रह्मचर्यसे रहें तो कितने ही अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्यके पालनसे वीर्य और तेजकी वृद्धि होती है।
सायंकाल सन्ध्या करते समय तो बैठे-बैठे ही अर्घ्य देनेकी आवश्यकता है, अर्घ्य देते समय मुँह पश्चिमकी ओर ही रहना चाहिये।
हम सब लोगोंको त्यागका व्यवहार सीखना चाहिये। यदि रत्न भी मिलें तो उनकी परवाह नहीं करनी चाहिये। दीखनेके लिये हमें संसारमें साधारण वेश रखना चाहिये और मनमें महापुरुषोंके लक्षणको अक्षरश: पालनेकी चेष्टा करनी चाहिये। जो ऐसे नियमोंका पालन करते हैं उनका ही जन्म लेना धन्य है। मनुष्य-जीवन पाकर अपना ध्येय सिद्ध न किया तो फिर पशु ही हमसे अच्छे हैं। जिन पुरुषोंमें शील, विद्या, दान, तप आदि नहीं हैं, वे पशुवत् ही विचर रहे हैं।
येषां न विद्या न तपो न दानं
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्म:।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥
हरेक मनुष्यको अपनी उन्नति एवं परमात्माको प्राप्त करनेकी चेष्टा करनी चाहिये। परमात्माके मिलनेके पश्चात् संसारके लोगोंको भी उस ओर बढ़ानेकी चेष्टा करनी चाहिये। साधक इतनी उच्च कोटिको प्राप्त हो सकता है कि जहाँ वह जाता है वह स्थान पवित्र हो जाता है और तीर्थ बन जाता है। ये सारी बातें श्रद्धा-विश्वासपर निर्भर हैं। जब हम चलते हैं तब सदा सारे पशु-पक्षी आदिमें प्रभुका अनुभव करते रहना चाहिये। सारा संसार परमात्माका स्वरूप ही है। ऐसा देखनेसे सारा संसार चेतनमय दीखने लगेगा, चिन्मय दीखने लगेगा, यह सर्वोच्च भाव है।
तुलसीदासजी कहते हैं—
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥
ऐसा भाव होनेका उपाय यह है कि सारे संसारको हर समय भगवद्रूप देखे। ये वृक्ष, पत्ते, सारी दीखनेवाली चीजें भगवान्के रूपमें दीखेंगी। यहाँ भगवान् पहाड़रूपमें, यहाँ भगवान् पत्थररूपमें हैं, सभी भगवान्-ही-भगवान् हैं। यहाँ शान्ति और आनन्द-ही-आनन्द दीखेगा। उसके अलावा शेष कुछ रहेगा ही नहीं। जो मुर्दा है उसमें भी जान आ सकती है। जब पशु, पक्षी, पत्थर भी परमेश्वररूप दीखनेपर उनमें चेतनता आ जाती है तो मुरदा क्या चीज है? पत्थर तो पत्थर था, किन्तु मुरदेमें जान थी। उसमें जान आना कठिन बात नहीं है। मूढ़ आदमीका संकल्प जब सिद्ध हो जाता है तो ज्ञानवान्का संकल्प पूरा होनेमें कौन बड़ी बात है। जिस मनुष्यसे मित्रका बर्ताव था, उसीसे एक समय शत्रुका भाव हो जाता है यह भी जाननेकी बात है। ऐसा भाव अज्ञानी मनुष्यका ही होता है, किन्तु ज्ञानवान् तो सबको परमात्मा समझ सकता है। इसलिये सब कुछ परमात्माका स्वरूप है ऐसी भावना करनी चाहिये। पवित्र आत्माकी की हुई भावना सत्य होती है, ये भगवान्के वचन हैं—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
(गीता ६।३०)
जो मुझे सर्वत्र देखता है उससे मैं अलग नहीं होता। जो मनुष्य जिस भावनासे संसारको देखता है उसको उसी प्रकार संसार दीखता है। सारी बातें भावनासे ही जैसी देखना चाहे वैसे देख सकता है। वह महात्मा सबसे दुर्लभ है जो संसारमें सब जगह भगवान्को ही देखता है।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:॥
(गीता ७।१९)
हमारे लिये यह संसार साक्षात् नारायणका रूप बन जाय इसमें कौन-सी बड़ी बात है। भगवान् सब जगह विराजमान हैं, यह भावना ही नहीं है, अपितु सच्ची बात है।
अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे। जो व्यक्ति इस तरह देखता है वह प्रेममय बन जाता है। वृक्ष, पत्थर, पशु, पक्षी, सबको प्रभु ही प्रभु देखता है। उनसे गले लगकर आनन्दसे मिलना चाहता है, उस व्यक्तिका भाव अद्भुत हो जाता है। सारा संसार उसे नारायणरूपमें दीखने लगता है, इसलिये सब लोगोंको परमात्ममय समझकर व्यवहार करना चाहिये।