सर्वस्व देकर भी भगवत्प्रेम प्राप्त करें

एक बात बहुत महत्त्वकी है। भगवान‍्की शरण ले लेनेसे फिर अपनेमें दुर्गुण-दुराचार आ ही नहीं सकते। जैसे सूर्यकी शरण ले लेनेसे अन्धकार और शीत पास आ ही नहीं सकते, इसी प्रकार भगवान् जिनके हृदयमें विराजमान हैं, वहाँ दुर्गुण-दुराचार आ ही नहीं सकते, सद‍्गुण-सदाचार आते हैं। सूर्यके आश्रयमें गर्मी और प्रकाश स्वाभाविक आते हैं—ऐसे ही भगवान‍्की शरण लेनेपर बिना प्रयास स्वाभाविक ही सद‍्गुण-सदाचार आ जाते हैं, दुराचार-दुर्गुण आ ही नहीं सकते। ऐसा भाव, दृढ़ निश्चय परमात्माके आश्रयसे ही आते हैं। यदि दुराचार-दुर्गुणके भाव आवें तो हे नाथ! हे नाथ! पुकारनेके साथ ही चले जायँगे। शरणागतिकी कमीके कारण, भूल या मान्यताके कारण ऐसा प्रतीत होने लगे कि दुर्गुण-दुराचारके भाव आ रहे हैं तो हे नाथ! हे नाथ! पुकारना चाहिये। भगवान‍्की शरण हो जानेपर चिन्ता, भय, शोक, दुर्गुण, दुराचारका मूलसहित नाश हो जाता है। सद‍्गुण, सदाचार, शान्ति और आनन्द स्वभावसिद्ध हो जाते हैं।

भगवान‍्की शरण लेनेपर ये सब हो जायँ इसमें तो कहना ही क्या है, भगवान‍्के प्रेमियोंके संगसे ही ये हो जाते हैं। भगवत्संगिसंगिनाम् उनकी शरणसे, प्रेमसे, उनकी दयासे यह सब हो सकता है। भगवान‍्की दयाके तत्त्वको जो समझ जाता है, उसमें दया, गम्भीरता, शान्ति, सरलता अपने-आप आ जाते हैं। आनन्द, शान्ति समाती नहीं। हमलोग लायक होंगे तो प्रभु स्वत: ही प्रकट हो जायँगे। जब खूब प्रेम होता है, तब कहींसे भी कीर्तनकी ध्वनि आती है तो हृदयमें प्रेमकी जागृति हो जाती है। जैसे कामिनीकी झंकारसे कामीके हृदयमें कामकी जागृति हो जाती है।

साधु-महात्माके दर्शनसे नेत्र खिल जाते हैं, जैसे गुलाबका पुष्प। नेत्र चूने लग जाते हैं, यह नेत्रोंका झूमना है। हमलोग तो प्रेमके नामपर यत्किंचित् चेष्टा करते हैं, परन्तु वास्तवमें असली प्रेम तो अलौकिक है। प्रेम अनिर्वचनीय कहा गया है। वहाँ वाणीकी, मनकी पहुँच नहीं है, बुद्धि और मन उसको छू सकते हैं, पर उसका पता नहीं लगा सकते।

जो प्रेमसे घायल हो जाता है, उसकी कोई औषधि नहीं। भगवत्-प्रेमसे घायल हो जाना चाहिये। स्वप्नमें भी भगवान् मिल जायँ तो उसके आनन्दकी क्या सीमा है।

एक बड़ी गोपनीय बात

स्वप्नमें भगवान‍्के मिलनेपर और जाग्रत् में भगवान‍्के मिलनेमें जो आनन्द होता है उन दोनोंमें बहुत अन्तर होता है। वर्तमानमें स्त्रीका दर्शन, भाषण होता है, उसीके अनुसार स्वप्नमें होता है, पर भगवान् अबतक प्रत्यक्ष तो मिले नहीं। स्वप्नमें जो भावनासे भगवान् दीखते हैं, जाग्रत् में वास्तवमें मिलनेपर वे बहुत ही विलक्षण दीखते हैं। जिस पदार्थका हमने अनुभव नहीं किया है, उसके स्वप्नसे वह असली वस्तु विलक्षण होती है।

हमलोगोंको प्रेम करना सीखना चाहिये। एक-दूसरेसे उत्तरोत्तर प्रेम बढ़ाना चाहिये। इतना प्रेम बढ़ाना चाहिये कि बाध्य होकर प्रभुको आना पड़े। भगवान‍्के निमित्तसे हमलोग जो प्रेम बढ़ावेंगे, उसका फल भगवान् देंगे। भगवान् प्रेमीका त्याग नहीं कर सकते। उन्हें प्रेमियोंकी बड़ी आवश्यकता है, प्रेमी बहुत कम मिलते हैं, मिलते ही नहीं। सर्वस्व देनेपर यदि एक रत्ती प्रेम मिले तो सर्वस्व दे डालना चाहिये, वही सच्चा पुरुष है।

रत्नका वास्तविक मूल्य जौहरी ही जानता है। लाख रुपयोंके हीरे-माणिकका भीलनी चार पैसा नहीं देती, क्योंकि वह सोचती है कि ये काँचके टुकड़े क्या काम आयेंगे।

एक रत्ती भगवत्प्रेमके लिये जौहरीलोग सर्वस्व दे डालते हैं। जो जितना कम मूल्य देना चाहता है, वह उतना ही भगवान‍्के प्रेमके तत्त्वको नहीं जानता।

जिस क्रियाके करनेसे भगवान‍्में प्रेम हो, वही क्रिया वह करता है। स्वार्थके त्यागसे प्रेम मिलता है। भगवत्प्रेमीके अनुकूल बननेमें ही उसे आनन्द होता है।