सत्संगका दुरुपयोग न करें
प्रवचन—दिनांक २०-६-१९३६, शनिवार, प्रातःकाल, गीताभवन, स्वर्गाश्रम
संसारमें जितने भगवत्प्राप्तिके साधन हैं सब ध्यानके लिये ही हैं। ध्यान परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है। सबसे बढ़कर परमात्माका ध्यान है। इसलिये हर एक भाई-बहिनको ध्यानकी ओर ध्यान देना चाहिये। ध्यानसे पाप और विक्षेपका नाश होता है और ध्यानसे परम शान्तिकी प्राप्ति प्रत्यक्ष होती है। ध्यान हर समय रहे तो उसके कल्याणमें शंका नहीं है। मनुष्यसे और कोई साधन नहीं हो सके, केवल ध्यान ही करे तो उसका भी कल्याण है।
सत्संगका दुरुपयोग—सत्संगका दुरुपयोग यह है कि हमलोग सत्संग तो करते ही हैं, ऐसा मानकर अपना साधन ढीला कर दें। अपना कल्याण तो इससे हो ही जायगा। जैसे काशीमें रहकर यह मान ले कि मेरी मुक्ति तो हो ही जायगी, साधन ढीला कर दे और मान ले कि यहाँ पाप करनेमें क्या हर्ज है, मुक्ति तो हो ही जायगी।
कोई आदमी नामका आश्रय लेकर पाप करता है कि भजन करके पाप नाश कर लेंगे, जो आदमी भजनके सहारे पाप करता है वह भजनको कलंक लगाता है, उसका पाप भोगे बिना कभी भी नष्ट नहीं होता।
जो आदमी सत्संगका सहारा लेकर मान बैठे कि कल्याण तो हो ही जायगा, भजन-ध्यान करो चाहे मत करो, वे लोग भूलमें हैं, यह सत्संगका दुरुपयोग है।
अन्तकालमें भगवान्के नामसे पाप नष्ट हो जायँगे, यह मानना ठीक है। साधक सत्संग करता ही रहे, कभी छोड़े ही नहीं। हमलोग राजी-खुशी चल रहे हैं, चलते-चलते ही मर सकते हैं, ऐसा समझकर सावधान रहना चाहिये। परमात्माकी प्राप्ति सब कुछ देकर भी करनी चाहिये। आज हमारी मृत्यु हो जाय तो कौन रक्षा करनेवाला है। माता, पिता, धन, स्त्री, पुत्र ये सब हमारे क्या काम आ सकते हैं? इसलिये परमात्माकी शरण हो जाओ। परमात्मासे प्रार्थना करो कि हे प्रभो! मेरा नित्य-निरन्तर आपका ध्यान बना रहे। हमलोगोंको ध्यान रखनेकी चेष्टा करनी चाहिये। निरन्तर ध्यान रहा तो अन्तकालमें भी रहना सम्भव है। जिसके निरन्तर ध्यान रहेगा उसको स्वप्नमें भी ध्यान रहेगा।
भगवान् कहते हैं जो मनुष्य अनन्यचित्तसे मेरा ध्यान करता है उसके लिये मैं सुलभ हूँ—
अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥
(गीता ८। १४)
ध्यानसे बढ़कर संसारमें कोई चीज नहीं है। ध्यानसे पाप और अवगुणका नाश होकर परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये हम सबको अधिक-से-अधिक समय ध्यानमें लगाना चाहिये। ऐसा प्रयत्न करना चाहिये कि एक क्षण भी ध्यान नहीं छूटे।
ध्यानका रस जब आने लग जायगा, तब ध्यान छूट ही नहीं सकता। यहाँ तो वैराग्य भूमि है, यहाँ वैराग्यकी वृत्तियाँ स्वाभाविक बनती हैं। जिस जगह भगवान्की चर्चा होती है, वहाँकी तो बात ही क्या है। यहाँ तो ध्यान लगना स्वाभाविक बात है।
आनन्दके समुद्रमें खूब डूब जाना चाहिये। समुद्रमें डूबे हुएको जैसे जल-ही-जल दीखता है, वैसे ही अपने चारों ओर आनन्द- ही-आनन्द देखना चाहिये।
हमारे पास तीनों समय कम हैं। एक तो अभी ग्यारह बजने-वाले हैं, दूसरे स्वर्गाश्रमसे जानेका भी समय कम रहा है, तीसरे संसारसे शीघ्र जानेका नम्बर है। समय बीता जा रहा है समय बड़ा ही मूल्यवान् है। घरमें जाकर खूब जोरसे साधन करना चाहिये, प्राणपर्यन्त चेष्टा करनी चाहिये। मन जहाँ-जहाँ जाय, वहाँ वैराग्य उत्पन्न कर देना चाहिये। इस वट वृक्षके दृश्यको याद कर लेना चाहिये। एकान्तमें बैठकर ध्यानके लिये विशेष चेष्टा करनी चाहिये। मनको वीरताके साथ वशमें करना चाहिये। जैसे अकेला अर्जुन ही सारी सेनाको परास्त कर दिया करता था, इसी प्रकार वीरता, धीरता और गम्भीरताके साथ काम, क्रोधकी सेनाके साथ युद्ध करे तो विजय पा सकता है। अर्जुनकी शंखध्वनि सुनकर लोग काँपने लग जाते थे। वैसे ही यहाँ परमात्माके नामकी ध्वनि है। नामकी ध्वनिसे ये काम-क्रोध काँपने लग जायँगे। ऐसा न हो तो बाण चला देवे। बाणसे वे काम, क्रोध आदि सब चले जाते हैं। ध्यान ही बाण है। वीरताके साथ रहनेपर किसकी सामर्थ्य है जो उसके पास आ सके। वीरता, धीरताके सामने दुर्गुण दुराचार आ ही नहीं सकते। घर जाकर रात-दिन साधन-ही-साधन करना चाहिये।
ध्यानके लिये बैठे तब पहले प्रेम और श्रद्धासे भगवान्के नामका जप कर ले, फिर ध्यान करे। ध्यानके समय खूब सावधानीसे रहे। कहीं आलस्य, विक्षेप आदि शत्रु न आ जायँ। विक्षेपके नाशके लिये श्वासका जप है या गुंजाहटसे भगवान्के नामका जप करे, उससे भी विक्षेपका नाश होता है। आलस्यके नाशके लिये आसनसे बैठे, ग्रीवाको सीधी रखे, नेत्रोंको खुला रखे, शास्त्रोंमें प्रविष्ट होकर बुद्धि लगावे, उससे बुद्धि तीक्ष्ण होकर फिर आलस्य नहीं आता।
भजन, ध्यान, सत्संग और गंगास्नान इनके पूर्व ऐसी भावना करनी चाहिये कि इससे हमारा सब पाप नष्ट हो ही जायगा, ऐसी श्रद्धा-विश्वास करें।
ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
य: स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:॥
चाहे कैसा भी पापी क्यों न हो, भगवान् पुण्डरीकाक्षका स्मरण करनेसे तुरन्त पवित्र हो जाता है। इसी प्रकार गंगास्नान करनेसे भी पापोंका नाश हो जाता है। जैसी भावना करेंगे, वैसे ही बन जायँगे।
नामके उच्चारणके साथ-साथ नामीका ध्यान करना चाहिये। यह दामी जप है। इसका बड़ा भारी प्रभाव है, इसमें कोई परिश्रम नहीं है।
जैसे मूढ़ आदमी अपने चारों तरफ आकाशको देखता है, वैसे ही साधकको आनन्द-ही-आनन्द समझना चाहिये। देखो शरीरके बाहर-भीतर सब ओर आनन्द-ही-आनन्द प्रतीत हो रहा है। काम, क्रोध, लोभ, मोहकी तो बात ही क्या है? सात्त्विक वृत्तियाँ भी इस समय उत्पन्न नहीं हो सकतीं।
ज्ञान ही आनन्द है और आनन्द ही ज्ञान है, अमृतका पान हो रहा है। यह विश्वास करे कि मैं हर समय इसी प्रकार आनन्दमें डूबा रहूँ, इस आनन्दका कोई क्या वर्णन कर सकता है?
आनन्दके अनुभवमें आँख बंद करनेपर जो प्रकाश दीख रहा है, उसीमें भगवान् साकाररूपसे प्रकट हो जाते हैं। आँख खोलनेपर भी साक्षात्-रूपसे प्रकट हो सकते हैं। साकाररूपका आवाहन करे।
गोविन्द गोविन्द गोविन्द कृष्ण
गोविन्द गोविन्द गोविन्द हरे।
कृष्ण मुरारे दीन पियारे
गोविन्द गोविन्द गोविन्द हरे॥
इस प्रकार प्रार्थना करें हे नाथ! आप साक्षात् प्रकट होना नहीं चाहते हैं तो ध्यानमें तो प्रकट हो जाइये।
नाथ सकल साधन मैं हीना।
कीन्ही कृपा जानि जन दीना॥
हे नाथ! मैं सम्पूर्ण साधनोंसे हीन हूँ, आपने बड़ी कृपा की। भगवान् श्रीकृष्णजी सामने खड़े हैं, मुखारविन्द बड़ा सुन्दर है, शक्तिमय है। प्रेमसे मेरी ओर देख रहे हैं। वंशी बजा रहे हैं। लगभग ग्यारह-बारह वर्षकी आयु है, भगवान् मंद-मंद हँस रहे हैं। भगवान्का महान् तेज स्वरूप है, आनन्दकी मूर्ति हैं, श्याम रंग है। चरण मुलायम, चमकीले और सुन्दर हैं। प्रभु पीताम्बर पहने हैं, वह चमक रहा है। प्रभुकी नाभि गम्भीर और हाथ बड़े लम्बे हैं। हाथमें कड़े आदि पहने हुए हैं, गलेमें कई प्रकारकी माला पहने हैं, सारा शरीर चमक रहा है, छाती चौड़ी है, शरीर बड़ा चिकना और मुलायम है। ओष्ठ लाल हैं। भगवान्के कपोल बड़े सुन्दर हैं, भगवान्के कान बड़े सुन्दर हैं, जिनमें मकराकृत कुण्डल पहने हुए हैं। प्रभु प्रेमसे देख रहे हैं। मनुष्य एक बार भी प्रभुकी तरफ देख लेगा तो फिर नजर हटाना चाहकर भी नहीं हटा सकता। भगवान्के मस्तकपर तिलक शोभायमान है। रत्नजड़ित मुकुट भगवान्के मस्तकपर शोभायमान है। गलेमें एक दुपट्टा डाल रखे हैं। सारे आभूषण चमक रहे हैं। भगवान्का स्वरूप बहुत सुन्दर है। भगवान्के स्वरूपको देखकर पशु-पक्षी सभी चकित हो जाते हैं। प्रभुका रूप-लावण्य अलौकिक है, प्रभुके तलवेमें कैसी सुन्दर लाली है। प्रभु दयाके सागर हैं, प्रभुमें क्षमा भी अपार है। शान्तिके भण्डार हैं। प्रभु प्रेमके अवतार हैं। एक बार जिनका प्रभुके साथ प्रेम हो जाता है, फिर उसको सारा संसार फीका मालूम पड़ता है, क्योंकि आप रसराज हैं। आपकी मूर्ति बड़ी सुन्दर है, मधुर है, आप प्रेमसे कुछ तिरछे खड़े हैं। प्रभुका सारा शरीर बाँका हो जाता है, इसलिये आपको बाँकेबिहारी कहते हैं। आपका ध्यान करनेसे मनुष्य परम पवित्र हो जाता है।
ध्यानके समय शरीरको भूल जाय, मनको एकदम परमात्मामें लगा दे। यह स्थिति सदा बनी रहे। मेरा तो ऐसा शरीर हो रहा है कि शामतक बैठा ही रहूँ। किसीका चिन्तन तो हो ही नहीं सकता।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥
(गीता ४। २७)
दूसरे योगीजन इन्द्रियोंकी सम्पूर्ण क्रियाओंको और प्राणोंकी समस्त क्रियाओंको ज्ञानसे प्रकाशित आत्मसंयमयोगरूप अग्निमें हवन किया करते हैं।
संयमसे स्वयं प्राणोंका निरोध हो जाता है।