श्रद्धाकी महिमा
प्रवचन—दिनांक १६-६-१९३६, मंगलवार, रात्रि, गीताभवन, स्वर्गाश्रम
पूर्ण श्रद्धा होनेपर भगवान् मिलनेमें विलम्ब नहीं करते, यदि थोड़ी कमी भी रह जाय तो भी मिल सकते हैं। उनके मिलनेमें प्रेम और करुणभावकी अत्यन्त आवश्यकता है। भगवान्में प्रेम करनेके उद्देश्यसे पहले सबसे प्रेम करे। सबसे प्रेम करनेसे भगवान् प्रसन्न होते हैं। भगवान्के सभी नाम बराबर प्रेम बढ़ानेवाले हैं, परन्तु जिसकी जिस नाममें श्रद्धा हो, उसका उसीसे अधिक प्रेम बढ़ सकता है। करुणभाव हो जानेपर तो क्षणभरमें भगवान् दर्शन दे सकते हैं। क्षणभरमें सारे पाप नष्ट कर वे प्रकट हो जाते हैं, ईश्वरके सिवाय हमारा कोई है ही नहीं। समय बीतनेपर कुत्तेकी मौत मारा जाऊँगा—ऐसा सोचनेसे करुणभाव बढ़ सकता है। परमेश्वरके यहाँ हरेक जीवके हरेक पलका हिसाब है।
सत्संग, भजन, ध्यान तो भगवान्की स्मृति बनी रहनेके लिये असाधारण उपाय है ही, किन्तु उनके साथ-साथ समयकी अमूल्यता सोचते हुए नाम-जप करता रहे। पूर्ण स्मृति बनी रहनेके लिये कम-से-कम एक लाख नामका जप नित्यप्रति करता रहे तथा मृत्यु निकट है ऐसा भी सोचता रहे। इन दो बातोंको भूलना ही नहीं चाहिये—
दो बातनको भूल मत जो चाहत कल्यान।
नारायण एक मौत को, दूजे श्रीभगवान॥
एक आदमी काशीमें रहता है, उसे यह बात मरते समय मालूम हो जाय कि काशीजीमें मरनेसे मुक्ति होती है तो यह बात बहुत उत्तम है। उसकी मुक्ति हो ही जायगी, किन्तु कुछ वर्ष पहले मालूम होनेसे उसके साधनमें ढीलापन आ सकता है, वह भजन-ध्यान छोड़ सकता है। उसी बातसे उसे हानि भी हो सकती है। जो बात अन्तसमयमें माननेयोग्य है, वह बात पहले मान ली जाय तो हानि हो सकती है। परमात्माने यह तो एक प्रकारसे छूट दे रखी है, उसकी ओर तो खयाल ही नहीं करना चाहिये। इस समय तो हमें प्रयत्न करना चाहिये। छूटकी नीयत अच्छी नहीं है। वह तो कमजोर आदमियोंकी बातें हैं। प्रेमके बराबर शरणागति नहीं है। ईश्वर सबको समानभावसे सहायता पहुँचाते हैं, किन्तु सहायता माँगनेपर विशेष सहायता भी मिल सकती है।
अग्नि देवताकी उपासना करनेसे वह कल्याण भी कर सकते हैं। स्वाभाविक फल तो छूनेमात्रसे मालूम पड़ सकता है। पैरपर पड़ गया जला देते हैं, हटा लेनेपर जितना जल गया सो जल गया, बाकी बचा सो रह गया। उसी प्रकार भगवन्नाममें भी वही बात है। जबतक भगवान्का नाम लेते रहोगे, तबतक पाप जलते रहेंगे, लेना छोड़नेपर पाप जलने बन्द हो जायँगे।
श्रद्धा-विश्वाससे श्रीकृष्ण भगवान्को एक ही प्रणाम करनेसे दस अश्वमेध यज्ञका फल होता है।
एकोऽपि कृष्णस्य कृत: प्रणामो
दशाश्वमेधाऽवभृथेन तुल्य:।
दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म
कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय॥
भगवान् श्रीकृष्णके लिये किया गया एक बारका भी प्रणाम दस अश्वमेधयज्ञके अनुष्ठानकी समाप्तिपर किये जानेवाले अवभृथस्नानके बराबर फलप्रद है। सच पूछा जाय तो एक बार किया गया यह प्रणाम दस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर होता है; क्योंकि दस अश्वमेध करनेवाला व्यक्ति फिरसे जन्म ग्रहण करता है, किंतु भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम करनेवाला फिर जन्म ग्रहण नहीं करता अर्थात् मुक्त हो जाता है।
इसी प्रकार गंगाजीमें साधारण फल तो सभीको मिलता ही है, किन्तु श्रद्धा-विश्वासवालेको अधिक फल मिलता है। भगवान्के भक्तोंकी यह विशेषता है कि वह नहीं चाहने-वालोंको भी चाहने लग जाते हैं, किन्तु भगवान् चाहनेवालोंको ही चाहते हैं।
भगवत्प्राप्तिवाले पुरुष दूसरेको भी भगवत्प्राप्ति करा सकते हैं, किन्तु उनके अन्त:करणमें यह भावना नहीं आनी चाहिये कि मैं भगवद्दर्शन करा सकता हूँ।
जब-जब संसारमें धर्मकी हानि और पापकी वृद्धि होती है तब-तब देवतालोग भगवान्से अवतार लेनेकी प्रार्थना करते हैं। यदि अवतार लेनेका समय नहीं होता है तो भगवान् अपनी शक्ति देकर दूसरे जीवको भेज देते हैं।