सिद्धके स्वप्नमें भी दोष नहीं घट सकता

प्रवचन—दिनांक १९-६-१९३६, शुक्रवार, दोपहर, गीताभवन, स्वर्गाश्रम

जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तीनों अवस्थाओंमें परमात्माकी प्राप्तिके निकट पहुँचा हुआ साधक सुषुप्तिसे जागनेपर अपनी स्थिति पकड़ता है। सिद्ध पुरुष तो पकड़ने और छोड़नेसे अलग ही है। साधक कभी द्रष्टा भी हो सकता है। सिद्धके लिये जाग्रत् , स्वप्न, सुषुप्ति, तीनों अवस्थाएँ स्वप्नवत् हैं। ऊँचे साधकको भी ये सब स्वप्नवत् हैं, किन्तु साधकके स्वप्नमें क्रोध आदि घट सकते हैं, सिद्धमें नहीं। ऊँचे साधकमें दोष आनेकी गुंजाइश है।

ऊँचे साधकमें पानीमें लकीर खींचनेकी तरह क्रोध प्रतीत होता है और नष्ट हो जाता है। केवल लकीर प्रतीत-सी होती है। ऊँचे साधकमें क्रोधकी आकृतिमात्र रहती है। सिद्ध पुरुषके आकाशमें लकीर खींचनेकी तरह अंगुली हिलती-सी दीखती है। उस जगह आकृतिमात्र भी नहीं है।

ऊँचे साधकमें यदि जाग्रत् में थोड़ा भय होगा तो स्वप्नमें भी थोड़ा भय होगा। सिद्धके स्वप्नमें भी भय नहीं हो सकता। ऊँचे साधकमें यदि जाग्रत् में दोष नहीं घटते हैं तो स्वप्नमें घट सकते हैं। जैसे रेलमें जा रहे हैं, जाग्रत्-अवस्थामें नीचा व्यवहार किसीसे नहीं होता है, पर स्वप्नमें हो सकता है। जिसके स्वप्नमें होता है, उसके जाग्रत् में भी होनेकी गुंजाइश है।

स्वप्नमें किसीको सिंह मिले और डरसे हृदय धड़कने लग जाय तो वह साधक ही है। स्वप्न मनुष्यकी असली स्थिति बताता है। जाग्रत् में तो मनुष्यको धोखा भी हो सकता है।

बारहवें एवं चौदहवें अध्यायमें जो समताकी बात कही गयी है, उस जगह सोने और मिट्टीमें समता, निन्दा-स्तुतिमें, शत्रु-मित्रमें समताकी बात कही गयी है, इसमें और ब्रह्मकी समतामें क्या अन्तर है। इन सबकी समता तो जड़ प्रतीत होती है और परमात्माका स्वरूप चेतन है। समतामें जिसकी स्थिति है, उसीकी ब्रह्ममें स्थिति है। इस समता और उस समतामें क्या अन्तर है।

इस जड़ समतासे ही ब्रह्ममें स्थिति है, इसका पता चलता है। इस जड़ समतामें दोष घटे तो वहाँ परमात्मामें भी समता नहीं है। जैसा बिम्ब होता है, उसका प्रतिबिम्ब भी वैसा ही होगा। इस कार्यसे यह बात पकड़ी जाती है। परमात्माका स्वरूप सम है, वह विलक्षण सम है, निर्दोष है। इस जड़के कार्यसे ही चेतनका कार्य सिद्ध होता है। स्वप्नमें किसी प्रकारका दोष घटता है तो जाग्रत् में भी घट सकता है। यहाँके जो विकार हैं वे वहाँके साक्षी हैं। मनुष्यमें यदि कोई दोष है और वह जाग्रत् अवस्थामें नहीं पकड़ा जाता है तो स्वप्नावस्थामें पकड़ा जा सकता है।

यह जो समता है वह जड़ है। यह जड़ समता चेतन समतामें स्थित है। सूक्ष्म चीज ही मोटी चीजमें प्रवेश कर सकती है।

आकाशकी निराकारता भगवान‍्की निराकारता नहीं है। भगवान‍्की निराकारता बहुत बड़ी है। परमात्मा शाश्वत हैं, अनन्त हैं, अनादि हैं, नित्य हैं। शाश्वत आदि ये कालवाचक शब्द हैं।

परमात्माके कालमें भेद नहीं होता। बर्फका देश जल है, संसारका देश प्रकृति और प्रकृतिका देश परमात्मा है। परमात्माका देश विलक्षण है। प्रकृतिमें भूत, भविष्य और वर्तमान मालूम पड़ते हैं, पर प्रकृतिका अंत ही काल है।

परमात्मा इस कालको भी खा जाता है। वहाँ प्रकृति भी नहीं रही। अब वह कैसा काल है इसको कैसे समझें? उसके बीचमें अद‍्भुत समता है, वह महाकाल है।

संसारका आनन्द क्षणिक है और नाशवान् है, किन्तु परमात्मारूप आनन्द अपार है। उसका कभी नाश नहीं होता। एक आदमीने स्वप्नमें चोरी की तो समझना चाहिये कि अभीतक उसके चोरीके संस्कार नहीं गये।

जाग्रत् में हमलोग जो कार्य कर रहे हैं वह स्वप्नके लिये ही तैयार कर रहे हैं। जितना सुधार हमने अपने जाग्रत् का कर लिया, स्वप्नमें भी वह सुधार होता चला जाता है।

जितना दम्भ-पाखण्ड हम जाग्रत् में करते हैं, वह स्वप्नमें होगा ही। इसी तरह आदमीका वश स्वप्नमें नहीं चलता। स्वप्न एक कसौटी है। इसी प्रकार समता भी परमात्माके स्वरूपकी कसौटी है।