स्मृतिकी महिमा

प्रवचन—दिनांक १३-६-१९३६, बुधवार, प्रातःकाल, गीताभवन, स्वर्गाश्रम

एकान्तमें भजन-ध्यान करते समय आलस्य नहीं आना चाहिये। उत्तम कार्य भजन-सत्संग आदिमें आलस्य और विक्षेप बड़े बाधक हैं।

ध्यानमें आसन प्रधान चीज है, गीतामें जहाँ ध्यानका विषय आया है, वहाँ आसनके विषयमें चर्चा हुई है। इस प्रकार बैठना चाहिये ताकि किसीका स्पर्श न हो। संकल्प साक्षात् नरक है। अन्तसमयमें यदि कुछ भी संकल्प रह जायगा तो पीछे बहुत तकलीफ उठानी पड़ेगी। आगमें कूदनेसे जो मृत्यु होती है, उससे भी अधिक खराब मृत्यु संकल्प रहते हुए होना है। भगवान् इसीलिये कहते हैं कि हर समय मेरा स्मरण रख, मैं सुगमतासे प्राप्त हो सकूँगा। विश्वास कम होनेसे संसारका चिन्तन होता है। विश्वास होनेपर सारे पाप नष्ट होकर भगवत्-चिन्तनमें मन लग जाता है।

संसारमें जितना परिश्रम सेवा, दान, पुण्यमें किया है, वह सब थोड़ा-सा संकल्प रहनेसे भी व्यर्थ हो जाता है।

भगवान‍्का ध्यान प्रधानरूपसे सदा करता रहे तो अन्त-समयमें भगवान‍्का स्मरण हो जायगा। जो कल्याण करनेवाली वस्तु है, उसको छोड़ना साक्षात् फाँसी लगकर मरना ही है। चिंतन ही ध्यानरूपमें आकर प्राप्त होता है। कुछ भी हो जाय ध्यान न छोड़े। यही जीवन है, यही प्राण है। निरन्तर चिन्तन करनेवालेके लिये परमात्माकी प्राप्ति अत्यन्त सुलभ है। जो मनुष्य इस प्रकार चिन्तन करता है, उसको अन्तसमयमें भगवान् अवश्य याद आयेंगे।

विश्वास करना चाहिये। विश्वास एक बड़ी चीज है। विश्वास पक्‍का हो गया कि आज भगवान् आयेंगे तो उनको आना ही पड़ेगा।

मनुष्य सोच ले कि मरनेपर चौरासी लाख योनियोंमें घूमनेपर भी किसी प्रकारसे कल्याण होनेका उपाय नहीं है, अन्य योनियोंमें उद्धार नहीं हो सकता। यह पूर्ण रीतिसे समझमें आनेपर मनुष्य साधनमें तत्परतासे लग सकता है, जितना भी मकान, रुपया, घर, कुटुम्ब है, कुछ भी साथ नहीं जायगा।

ऐसा पूर्ण विश्वास होनेपर मनुष्यसे कल्याणके लिये बड़ी तत्परता हो सकती है। इसलिये ऐसा सोचकर साधनमें संलग्न हो जाना चाहिये। उसका सहज ही कल्याण हो सकता है। जिस कार्यसे परमात्मा मिलें, उसीमें अपना धन लगावे। उसी कार्यमें अपने मित्रसे, स्त्रीसे, पुत्रसे, सभीसे सहायता ले, यदि वे सहायता न दें तो बाधा भी न देवें यही प्रार्थना करे।

कल्याणके लिये सबसे बढ़कर दो ही उपाय हैं। एक तो प्रभुकी अनन्य शरण होकर, उनके स्वरूपको याद रखना है। दूसरे संसारके सारे जीवोंकी सेवा करना, सभी जीवोंका उपकार करना है। ध्यान और सेवा ये दो कार्य हैं। दोनों हों तो और उत्तम है। ध्यान नहीं कर सके तो सेवा करनी चाहिये। सेवा न कर सके तो ध्यान करना चाहिये। ध्यान करना पहले नम्बरपर है, सेवा पीछे है। ध्यानसे निश्चिन्त होनेपर सेवा और सेवाके बाद ध्यान करे, किन्तु प्रभुकी स्मृति तो कभी छोड़े ही नहीं। मृत्युको उत्तम समझकर अपना लें परन्तु स्मृति न छूटे।

शास्त्रोंमें जो परमेश्वरके बारेमें बताया गया है, उनका नाम और रूप तुम अपनी इच्छानुसार पकड़ सकते हो। श्रद्धा और विश्वास होना चाहिये। खम्भेमेंसे भी भगवान् प्रकट हुए थे। मार्कण्डेय मुनिने प्रभु शंकरजीकी प्रतिमाको पकड़ लिया तो उनका यमराज कुछ भी नहीं बिगाड़ सका। यह विश्वासकी बात है। नाम एवं स्वरूप कोई भी हो विश्वास होना चाहिये। यदि साकारमें प्रेम न हो तो ज्ञानद्वारा निराकार चिन्मय आनन्दका ध्यान करे। आनन्द ही भगवान् हैं। शास्त्रोंका तो कहना है श्रद्धा-विश्वाससे किसीमें भी परमात्माकी भावना करनेसे भगवत्प्राप्ति हो सकती है। इसीलिये संसारकी सारी वस्तुओंमें भगवद्भाव ही रखना चाहिये।

किसी भी तरह ध्यान करो, ध्यान ही अपना लक्ष्य बना लो। भगवान् कहते हैं सब भूतोंमें जो बीज है, चेतन है, वह मैं ही हूँ।

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।

बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥

(गीता ७। १०)

हे अर्जुन! तू सम्पूर्ण भूतोंका सनातन बीज मुझको ही जान। मैं बुद्धिमानोंकी बुद्धि और तेजस्वियोंका तेज हूँ।

सारा ब्रह्माण्ड मेरे एक अंशमें स्थित है। ऐसे भगवान‍्का ध्यान करना कोई कठिन काम नहीं है। जितने नाम भगवान‍्के हैं, उनके अलावा अलग नाममें भी उनकी भावना करके श्रद्धा करनेसे वह प्राप्त हो सकते हैं। ध्यान किसीका भी करो, साकार, निराकार, राम, कृष्ण सभी एक ही हैं। जिसका जिसमें श्रद्धा- विश्वास है उसीको सर्वोच्च समझे, उसीमें महत्त्व बुद्धि रखे, उसे उसीसे शीघ्र साक्षात्कार हो सकता है। आग और मृत्युमें भी ईश्वरकी भावना होनेसे मुक्ति हो सकती है।

परमात्माका स्वरूप दिव्य है, उनके शरीरकी धातु दिव्य है, भगवान‍्के शरीरकी छाया नहीं पड़ती। उनके शरीरमें रोग नहीं होता, वे स्वयं प्रकट होते हैं। उनके शरीरको छूनेसे बड़ा आनन्द प्राप्त होता है। परमात्मा सुन्दरतामें कामदेवसे बढ़कर हैं, उनमें अत्यन्त कोमलता है। पीताम्बर पहने हुए हैं, पीताम्बरमेंसे उनके शरीरकी चमक आ रही है। चार भुजाएं हैं, भुजाओंमें शंख, चक्र, गदा, पद्म हैं। प्रभु मन्द-मन्द हँस रहे हैं, नेत्रोंमें प्रत्यक्ष समता प्रकट हो रही है, काले केश हैं, सिरपर अति सुन्दर मुकुट शोभायमान है प्रभुके अंग बड़े ही आनन्द और शान्तिदायक हैं।