उदारता ही सार है
आज हमारे भाइयोंकी क्या दशा हो रही है, हृदय फटता है, जवाब नहीं दिया जाता है। आज एक भाई कमाता है और उसके तीन लड़कियाँ हैं वह उनका विवाह कैसे करे, क्या करे।
जिनके न कोई व्यापार है, न दलाली है और घरमें चार लड़कियाँ हैं, वे कैसे करें। गरीबोंकी दशा भयंकर है। आज एक बाड़ीमें बीस घर हैं और एक घरमें रसोई नहीं बनी, पर हमें क्या फिकर है, कोई मरे। ऐसी अवस्थामें हमें धिक्कार है। राजा रन्तिदेव अड़तालीस दिन सपरिवार भूखे रहे। अड़तालीस दिन बाद कुछ अन्न-जल मिला; किन्तु अतिथियोंके आनेपर उन्हें दे दिया।
आज हमारे भाई भूखे हैं और हम माल उड़ाते हैं। मैं तो कहता हूँ कि धूल है, ऐसी मौजको धिक्कार है। दस दिन मौज कर लो, बादमें हिसाब देना होगा।
कबिरा नौबत आपनी
दिन दस लेहु बजाय।
यह पुर पट्टन यह गली
बहुरि न देखहु आय॥
हाड जले ज्यों लाकड़ी
केश जले ज्यों घास।
सब जग जलता देखकर
भया कबीर उदास॥
इस तरफ खयाल कर हमलोगोंको जो कुछ करना है, वह जल्दी कर लेना चाहिये। इस समय गंगा बह रही है, बस हाथ धो लें। जिसके पास धन है, वह धनसे और जिसके पास तन है, वह तन देवे। इसके लिये मैंने कायस्थकी एक कहानी बतायी थी, उस उदाहरणपर ध्यान देना चाहिये।*
संसारमें ऐसा कुछ नहीं है जो मनुष्य नहीं कर सके। कायस्थका उदाहरण देनेका तात्पर्य यही है कि यह मनुष्यकी पदवी थोड़े दिनकी है। इसमें जो कुछ उदारता कर ले, वही अपनी है। यह पदवी रहनेकी नहीं है। जबतक जीवन है, तबतक दूसरोंका उपकार कर लें। भगवान् रामने कहा है—
परहित बस जिन्ह कें मन माहीं।
तिन्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥
आपके हाथ जो लग जाय वह दूसरोंकी सेवामें लगा दो। घरवाले अलबत्ता ‘पागल’ कहेंगे, उन्हें कहने दो। पागल तो वे हैं जो धन इकट्ठा करते हैं। बुद्धिमान् तो वही है जो धनको साथ ले जानेका उपाय कर ले। यह दशा सबकी होगी। समय पूरा हो जानेपर यमराजके दूत ले जायँगे, मार पड़ेगी। इस राज्यके नोट वहाँ नहीं जाते। क्या जायगा? शरीर तो जायगा नहीं, प्राण जायँगे।
‘दया’ ही नोट है। वाणीके द्वारा, मनके द्वारा, धनके द्वारा, तनके द्वारा, जैसे भी हो, दूसरोंके हितमें लगा दो। घरवाले मना करें तो उन्हें मालूम न होने दो। जैसे स्त्रीके हाथमें जो कुछ लगता है वह बेटीके यहाँ भेज देती है। वैसे ही यह विद्या उससे सीखनी चाहिये। शरीरके द्वारा कोशिश करके दूसरोंका उपकार, भगवद्भक्ति आदि करने चाहिये।
क्षमा, शान्ति और तेजकी वृद्धि करनी चाहिये। सब कुछ खर्च कर दें, फिर देखें। आपको कितना आनन्द मिलेगा। सबको नारायण समझकर सबकी सेवा करें, फिर मानो आनन्द और शान्तिकी लूट हो रही है। संसार परमात्माका स्वरूप है—लीला हो रही है, हम भी उनके साथ खेलने आये हैं। प्रभु नानारूप धरकर खेल दिखा रहे हैं। यह एक ही अनेक रूप धरकर अनेक लीला कर रहे हैं। हम भी उनके साथमें होकर शामिल हो जायँ। जैसे ग्वालबाल साथ रहते, जब कोई आपत्ति आती तब भगवान्के पास आ जाते।
अपने भी लीला मानकर देखो कि कितना आनन्द आता है। अपने तो प्रत्यक्षमें लूट हो रही है। ‘भजन’ भी लूट है।
राम नामकी लूट है
लूट सकै तो लूट।
अन्तकाल पछतायगा
जब प्राण जायँगे छूट॥
आज कहे मैं काल भजूँ
काल कहै फिर काल।
आज कालके करत ही
अवसर जासी चाल॥
यह दशा होनेवाली है। भगवान्ने हमें जीभ दी है, फिर दरिद्रता क्यों? खूब मीठा बोलना चाहिये। हाथ दिये हैं अच्छे काम करो। कान दिये हैं अच्छे-अच्छे शब्द भरो। नेत्र दिये हैं, अच्छे-अच्छे चित्र देखो, इससे अन्तमें नारायणका ही ध्यान होगा। साँप आदिके चित्र देखोगे तो साँप आदिका ही भाव रहेगा।
पद-पदमें, जर्रे-जर्रेमें ध्यान होना चाहिये। भगवान् कहते हैं सारे भूतोंमें मैं हूँ, जो उन सबको भजता है, वह मुझे ही भजता है।
हर समय आनन्दमें ही परिपूर्ण रहना चाहिये। आनन्दमें ही चलना-फिरना चाहिये। चलते समय समझे मानो महान् आनन्दमें विचर रहे हैं फिर चिन्ताकी क्या मजाल है कि माया फैला दे। माया पास भी नहीं आ सकती। हमलोगोंको ऐसा अभ्यास डालना चाहिये। इसमें खर्चका कुछ काम भी नहीं है।
मनुष्यका जन्म पाकर अगर यह गाँठ न खुली तो फिर कभी न खुलेगी, इसलिये हमलोगोंको कोशिश करनी चाहिये। पद-पदमें भगवान् हैं, ऐसा विश्वास हमें करना चाहिये। और करना ही क्या है?