व्यापारसे भगवत्प्राप्ति
प्रवचन—दिनांक १३-६-१९३६, शनिवार, दोपहर, गीताभवन, स्वर्गाश्रम
आज प्रवचनके लिये व्यापारका विषय रखा गया है कि सत्यतासे व्यापार कैसे करना चाहिये तथा व्यापारमें क्या सुधार करना चाहिये? प्रारब्धमें जो कुछ पैदा होना होगा सो तो होगा ही, फिर झूठ क्यों बोलते हैं। प्रारब्ध भी कोई चीज है ऐसा विश्वास रखना चाहिये। हजारों व्यक्तियोंमें कोई एक उस परमात्माकी प्राप्तिके लिये उपाय करता है और उन उपाय करनेवाले हजारोंमें एकको भगवत्प्राप्ति होती है।
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत:॥
(गीता ७। ३)
हजारों मनुष्योंमें कोई एक मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले योगियोंमें भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्त्वसे अर्थात् यथार्थरूपसे जानता है।
व्यापार भगवत्प्राप्ति करनेका एक हथियार है। इस हथियारसे संसारकी सेवा करनी चाहिये। रुपया कमाना ध्येय न रखकर भगवत्प्राप्तिका ही ध्येय रखना चाहिये। रुपये तो जितने पैदा होने होंगे, उतने होंगे ही। न्याययुक्त अच्छा कार्य करनेमें घाटा लगता है तो ध्यान रखना चाहिये कि घाटा न लगे। जिस रास्तेसे भगवान् मिलते हैं उसमें घाटा भी लगे तो भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। भगवान् मिल गये यह क्या कम लाभ रहा। भगवत्प्राप्तिके लिये व्यापार करनेमें किसी प्रकारका व्यवहार नहीं बदलना है, केवल उद्देश्य बदलकर ही कार्य करना चाहिये। भगवान्के लिये झूठ बोलना, चोरी करनी पड़े तो ये कार्य तो भगवत्-कार्यमें सर्वथा बाधक ही हैं, इसलिये इनका त्याग अत्यन्त आवश्यक है। धर्मयुक्त और न्याययुक्त व्यापार करनेका फल स्वर्ग तो मिल सकता है, मुक्ति नहीं मिल सकती, मुक्ति तो निष्कामभावसे ही कार्य करनेपर मिल सकती है। रुपयोंको आदर न दे, स्वार्थ त्याग करके कर्म किये बिना मुक्ति कठिन है।
वैश्यके लिये व्यापारसे बढ़कर धर्म ही नहीं है, जैसे गीतामें अर्जुनके लिये लड़ाई धर्म बतलाया है। अर्जुनने लड़ाई की, कई आदमियोंको मारा, परन्तु उद्देश्य परमेश्वरप्राप्ति ही रखा। व्यापार धर्म समझकर करना चाहिये। न्यायालयमें कर्तव्य समझकर जाना चाहिये। हारना-जीतना, लाभ-हानि, जन्म-मृत्यु ये ईश्वरके हाथ ही हैं।
सबको आराम किस तरह मिले, उसीकी चेष्टा करे। चमड़ा, चरबी, हाड़, माँस आदिका व्यापार न करे। आपलोगोंको सोचना चाहिये कि आजतक तो लक्ष्मी (धन)-की प्राप्तिके लिये व्यापार किया, अब उनके पतिकी प्राप्तिके लिये व्यापार करना चाहिये। सब आदमियोंमें लोभका दोष आता है, एक तो रुपयोंका लोभ, दूसरा मान-बड़ाईका लोभ। इन दोनों दोषोंको निकाल देनेपर फिर कोई दोष पास नहीं फटकता। इन दोको सुधारनेसे सब दोष सुधर जाते हैं, किन्तु ध्यान रहे कि इन दोषोंको निकालनेमें दिखावामात्र न होवे। दूसरोंको आराम पहुँचानेके उद्देश्यसे ही कल्याण हो सकता है। वैश्यके लिये व्यापार करना कर्म बतलाया गया है, इसलिये व्यापारद्वारा दुनियाको आराम पहुँचाना ही ध्येय रखे।
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥
(गीता १२।२२)
मर्मको न जानकर किये हुए अभ्याससे ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञानसे मुझ परमेश्वरके स्वरूपका ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यानसे भी सब कर्मोंके फलका त्याग श्रेष्ठ है; क्योंकि त्यागसे तत्काल ही परम शान्ति होती है। सबसे ध्यान नहीं बन सकता है और व्यापारका काम सबसे हो सकता है, व्यापारके द्वारा ही परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है।
सूर्य समुद्रसे जल उठाकर खेतोंमें वर्षा करता है, उसी तरह बड़ी कम्पनीसे रुपया उठाकर गरीबकी सहायता करे अर्थात् उन्हें मजदूरी करवाकर लाभ पहुँचाये। गरीब आदमीसे अत्यन्त दयाका बर्ताव करे। रुपयोंका संग्रह करे किन्तु उनमें ममता न रखे, यही सोचे कि परमेश्वरका ही है। वास्तविक त्यागसे विश्वको भी जीतनेवाला यज्ञ हो सकता है। विश्वजित्-यज्ञ उसीका नाम है। जो अपना तन, मन, धन परमात्माके अर्पण कर दे, उसने भगवान्को जीत लिया यानि भगवान् उसके अधीन हो गये या उसे भगवत्प्राप्ति हो गयी।
दूसरेके हितके लिये अपना सर्वस्व देना बड़ी अच्छी बात है, त्यागका भी बड़ा भारी महत्त्व है, किन्तु मामूली बातके लिये दैवी शक्ति खर्च करना मूर्खता है।
झूठ बोले बिना व्यवहार नहीं होता, ऐसी बात नहीं है। सत्यसे व्यवहार हो सकता है। उस जमानेमें तुलाधार वैश्य था; उसका व्यापार अच्छी तरह चलता था। इन सारी बातोंको सोचते हुए न्याययुक्त, धर्मयुक्त, दूसरोंको लाभ हो तथा सबकी सेवा हो ऐसा ही व्यापार करना चाहिये, ध्येय भगवत्प्राप्तिका रखना चाहिये।