अनित्य सुखकी रुचि मिटानेकी आवश्यकता
श्रोता—अखण्ड साधन कैसे हो?
स्वामीजी—अखण्ड साधन होगा सांसारिक सुखकी आसक्ति छोड़नेसे। सांसारिक वस्तुओंके संग्रहकी और उनसे सुख लेनेकी रुचिका अगर आप नाश कर दें तो निहाल हो ही जाओगे, इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है। मैं रुपयोंका त्याग करनेकी बात नहीं कहता हूँ, साधु बननेकी बात भी नहीं कहता हूँ। मैं आपसे हाथ जोड़कर विशेषतासे प्रार्थना करता हूँ कि संग्रहकी और भोगकी जो रुचि है, उस रुचिका आप किसी तरहसे नाश कर दें। अगर उस रुचिका नाश हो जाय तो बहुत बड़ा लाभ होगा। रुचिसे आपका और दुनियाका पतन होगा, इसके सिवाय कुछ नहीं मिलेगा। संग्रह और भोगकी रुचि बड़ा भारी पतन करनेवाली चीज है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। नाशवान्की तरफ रुचि महान् अनर्थका हेतु है। विष खा लेनेसे इतनी हानि नहीं है, जितनी हानि इससे है—‘हा हन्त हन्त विषभक्षणतोऽप्यसाधु’। अष्टावक्रगीतामें लिखा है—
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान्वििषवत्त्यज।
(१। २)
‘यदि मुक्तिकी इच्छा रखते हो तो विषयोंका विषके समान त्याग कर दो।’
एक ही बात है कि संसारकी रुचि नष्ट होनी चाहिये। उस रुचिकी जगह भगवान्की रुचि हो जाय, तत्त्वज्ञानकी रुचि हो जाय, मुक्तिकी रुचि हो जाय, भगवत्प्रेमकी रुचि हो जाय, भगवद्दर्शनकी रुचि हो जाय तो निहाल हो जाओगे, इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है। जीनेकी रुचिसे आप जी नहीं सकते। जीनेकी रुचि रखते हुए भी मरना पड़ेगा। अगर जीनेकी रुचिका त्याग कर दो तो कोई हानि नहीं होगी, प्रत्युत बड़ा भारी लाभ होगा। रुचिको कम कर दिया जाय तो भी बहुत लाभ होता है। रुचिके वशमें न हों तो भी बड़ा भारी लाभ होता है—‘तयोर्न वशमागच्छेत्’ (गीता ३। ३४)। अगर इसको नष्ट कर दो, तब तो कहना ही क्या है!
श्रोता—रुचि नष्ट नहीं होती है महाराज!
स्वामीजी—रुचि नष्ट नहीं होती है—यह आपके वर्तमानकी दशा है। रुचि नष्ट न होती हो—ऐसी बात है ही नहीं। यह रहनेकी चीज नहीं है। बालकपनमें खिलौनोंमें जो रुचि थी, वह आज है क्या? कंकड़-पत्थरोंमें, काँचके लाल-पीले टुकड़ोंमें जो रुचि थी, वह रुचि आज है क्या? रुचि मिटती नहीं—यह बात नहीं है, रुचि तो टिकती ही नहीं, ठहरती ही नहीं। आप नयी-नयी रुचि पैदा कर लेते हो और कहते हो कि मिटती नहीं! रुचि टिक सकती नहीं। नाशवान्की रुचि नाशवान् ही होती है। परमात्माकी रुचि हो तो वह मिटेगी नहीं, प्रत्युत परिणाममें परमात्माकी प्राप्ति करा देगी। गीता कहती है—
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥
(६।४४)
‘योगका जिज्ञासु भी वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंका अतिक्रमण कर जाता है।’
ऐसी जिज्ञासा न हो तो कोई बात नहीं। संसारकी रुचि हट जाय तो योगकी जिज्ञासा भी हो जायगी। रुचि हटती नहीं—यह बिलकुल गलत बात है। रुचि मिटती नहीं—यह तो आपकी अभीकी दशा है, जिसको लेकर आप बोल रहे हो।
भोग और संग्रहकी रुचि महान् अनर्थकारक है। सन्तोंके संगको मुक्तिका दरवाजा और भोगोंकी रुचिवाले पुरुषोंके संगको नरकोंका दरवाजा बताया गया है—‘महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्तेस्तमोद्वारं योषितां सङ्गिसङ्गम्’ (श्रीमद्भा० ५। ५। २)। भोगोंका संग इतना नुकसानदायक नहीं है, जितना भोगोंकी रुचिवालोंका संग नुकसानदायक है। कोढ़ीके संगसे कोढ़ हो जाय, इस तरहकी बात है। अत: भोगोंकी रुचि रखनेमें आपका और दुनियाका बड़ा भारी नुकसान है और इसका त्याग करनेमें बड़ा भारी हित है। इसलिये कृपा करके दुनियाका हित करो। हित न कर सको तो कम-से-कम अहित तो मत करो।
भोगोंकी रुचिकी पूर्ति कभी नहीं होगी। इसकी तो निवृत्ति ही होगी। रुचिकी पूर्ति असम्भव है। ज्यों-ज्यों भोग भोगोगे, रुपयोंका संग्रह करोगे, त्यों-त्यों उनकी रुचि बढ़ती जायगी— ‘जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई’।
न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥
(श्रीमद्भा०९।१९।१४)
विषयोंके उपभोगसे यह रुचि शान्त नहीं होती। आगमें सुहाता-सुहाता घी डालते रहें तो क्या आग बुझ जायगी? वह तो और बढ़ेगी। ऐसे ही भोगोंकी और संग्रहकी रुचि आगे-आगे बढ़ती रहेगी। अन्तमें सब छोड़कर मरना पड़ेगा। यह जो मनमें आदर-सत्कारकी, मान-बड़ाईकी रुचि है कि लोग मेरेको अच्छा कहें, बड़ा कहें, आराम दें, सुख दें, मेरे अनुकूल बन जायँ, यह बहुत ही घातक है। साधकके लिये तो महान् ही घातक है। इस रुचिसे केश जितना भी फायदा नहीं है और नुकसान महान् है।
यह बात बिलकुल नहीं है कि रुचि नष्ट नहीं होती। अगर रुचि नष्ट न होती तो किसीकी भी नष्ट नहीं होनी चाहिये। आजतक किसीकी भी रुचिकी पूर्ति नहीं हुई, पर यह हटी है सैकड़ोंकी—‘बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता:’ (गीता ४।१०)। रुचिका नाश करनेवाले इतिहासमें सैकड़ों-हजारों आदमी मिलेंगे, पर रुचिकी पूर्ति करनेवाला एक भी आदमी नहीं मिलेगा। जिसकी पूर्ति होती ही नहीं, उसको छोड़नेमें क्या हानि है आपको?
श्रोता—महाराजजी, बालकपनमें जो रुचि थी, वह तो खत्म हो गयी। बालकपनतक तो वह रुचि रहेगी।
स्वामीजी—बालकपनवाली रुचिमें फर्क नहीं पड़ेगा, चाहे आप बूढ़े हो जाओ। विषय बदल गया, स्थान बदल गया, पर रुचि वही (पहलेवाली) है, मिटी नहीं है। अब आप मिटाओगे तो टिकेगी नहीं, रखोगे तो मिटेगी नहीं। आप रखोगे तो उसको मिटानेकी ताकत ब्रह्माजीमें भी नहीं है। बड़े-बड़े सन्त-महात्मा, जीवन्मुक्त महापुरुष भी आपकी रुचिको मिटा नहीं सकते। आप मिटाओ तो मिट जायगी। आप नहीं छोड़ोगे तो वे कैसे छुड़वायेंगे? आप चाहो तो छूट सकती है और नहीं छूटे तो प्रार्थना करो, रोओ, भगवान्से कहो कि यह छूटती नहीं तो भगवान्की कृपासे छूट जायगी। खास बात है कि आप इसको छोड़नेका विचार ही नहीं करते। एक बहुत ही मार्मिक बात है कि सांसारिक रुचिके त्यागकी जितनी महिमा है, उतनी दया, क्षमा, उदारता आदि अच्छे-अच्छे गुण धारण करनेकी भी नहीं है। यह जो निषेधात्मक साधन है, यह विध्यात्मक साधनसे ऊँचा है, पर लोग इस तरफ ध्यान कम देते हैं। निषेधात्मक साधन करनेसे विध्यात्मक साधन स्वत: होता है। जो साधन स्वत: होता है, उसका अभिमान नहीं होता।
गीताने सुखकी रुचिको ज्ञानियों (विवेकियों)-का नित्य वैरी बताया है—‘ज्ञानिनो नित्यवैरिणा’ (३। ३९)। अज्ञानीको तो भोगोंमें सुख दीखता है, पर ज्ञानी सुखकी रुचि पैदा होते ही समझता है कि यह मेरा पतन करनेवाली चीज है। इसकी कभी पूर्ति नहीं होगी। यह आग है, आग—‘दुष्पूरेणानलेन च’! इससे बड़ा भारी नुकसान है। इसलिये सज्जनो! कम-से-कम इतना तो करो कि रुचिके वशमें होकर कोई कार्य मत करो। उसके वशीभूत होकर कार्य करते रहोगे तो वह कभी मिटानेवाली नहीं है। हजारों, लाखों, करोड़ों, अरबों जन्मोंतक भी वह मिटेगी नहीं।
आप कितने ही पढ़ जाओ, कितने ही व्याख्यान देनेवाले बन जाओ, कितनी ही पुस्तकें लिख दो, कितने ही बड़े बन जाओ, पर जबतक संयोगजन्य सुखकी रुचि रहेगी, तबतक शान्ति नहीं मिलेगी। यह सुखकी रुचि आपका पतन करेगी ही। जितना नुकसान हो रहा है, सब इसीसे हो रहा है। संसारमें जितने कराह रहे हैं, दु:ख पा रहे हैं, रो रहे हैं, कष्ट पा रहे हैं, चिल्ला रहे हैं, नरकोंमें पड़े हैं, चौरासी लाख योनियोंमें पड़े हैं, सब इस रुचिका ही फल है। इस रुचिके रहते हुए आपको किसी तरहसे शान्ति नहीं मिलेगी। इसलिये कृपा करके इस रुचिका नाश करो। आपसे न हो तो भगवान्से प्रार्थना करो कि हे नाथ! इस रुचिका नाश हो जाय!
आपके भीतर रुचिका नाश करनेकी रुचि पैदा हो जाय अर्थात् आपका पक्का विचार हो जाय कि इसको मिटाना है तो यह मिट जायगी।