जीवकृत सृष्टिसे बन्धन

भगवान् कहते हैं—

मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनंजय।

मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥

(गीता ७।७)

‘हे धनंजय! मेरेसे बढ़कर इस जगत‍्का दूसरा कोई किंचिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओत-प्रोत है।’

तात्पर्य है कि जैसे सूतकी मणियाँ हैं, सूतका ही धागा है, सब सूत-ही-सूत है, ऐसे ही संसारमें मैं-ही-मैं हूँ अर्थात् मेरे सिवाय कुछ नहीं है। अत: भगवान‍्की दृष्टिसे भी संसार भगवत्स्वरूप है और महात्माओंकी दृष्टिसे भी संसार भगवत्स्वरूप है— ‘वासुदेव: सर्वमिति’ (गीता ७। १९)। फिर यह संसार कहाँ है? भगवान् कहते हैं कि जो अपरा प्रकृति है, उससे एक विलक्षण मेरी परा प्रकृति है, जिसको जीव कहते हैं। उस जीवने जगत‍्को धारण कर रखा है—‘ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७। ५)। अत: जगत‍्से सम्बन्ध-विच्छेद करनेका दायित्व जीवपर ही है। जीवका धारण किया हुआ जगत् ही इसके दु:खका हेतु है। अब इसको समझानेके लिये एक बात कहता हूँ, आप ध्यान दें।

शास्त्रोंमें आया है कि सृष्टि दो तरहकी है। एक भगवान‍्की रची हुई सृष्टि है और एक जीवकी रची हुई सृष्टि है। भगवान‍्की रची हुई सृष्टि कभी किसीको दु:ख नहीं देती। उसने कभी दु:ख दिया नहीं, कभी दु:ख देगी नहीं और कभी दु:ख दे सकती भी नहीं। भगवान‍्की रची हुई सृष्टि अगर जीवको दु:ख देगी तो जीव दु:खसे कभी छूट सकेगा ही नहीं। तो फिर दु:ख कौन देता है? जीवकी बनायी हुई सृष्टि ही दु:ख देती है। जीवकी बनायी हुई सृष्टि क्या है? यह मेरी माँ है, मेरा बाप है, मेरी स्त्री है, मेरा बेटा है, मेरा भाई है, मेरी भौजाई है; ये हमारे पक्षके हैं, ये दूसरोंके पक्षके हैं; ये हमारी जातिके हैं, ये हमारी जातिके नहीं हैं—यह जो ममता-परताका भेद बनाया हुआ है, राग-द्वेष किया हुआ है, यह जीवकी रची हुई सृष्टि है। शरीर भगवान‍्का रचा हुआ है और उसके साथ सम्बन्ध जीवका रचा हुआ है। यह सम्बन्ध जीवकी सृष्टि है, जो दु:ख देती है। जीव जिनके साथ अपना सम्बन्ध नहीं जोड़ता, उनसे दु:ख नहीं होता। राग और द्वेष ही जीवके शत्रु हैं—‘तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ’ (गीता ३। ३४)। जीव राग और द्वेष कर लेता है, मेरा और तेरा कर लेता है, यही वास्तवमें जीवको दु:ख देता है। यह मेरा और तेरा, ठीक और बेठीक, अनुकूल और प्रतिकूल, ये हमारे हैं और ये तुम्हारे हैं—यह दशा जीवने धारण की है और इसीसे इसको दु:ख पाना पड़ता है।

ईश्वरके रचित तो स्त्री-पुरुषोंके शरीर हैं। सबके शरीर ईश्वरकी प्रकृतिसे बने हुए हैं। इनके मालिक तो हैं परमात्मा और धातु चीज है प्रकृति। अत: यह सृष्टि न दु:ख देनेवाली है और न सुख देनेवाली है। अगर देखा जाय तो यह सृष्टि इसके व्यवहारको सिद्ध करती है, इसकी मदद करती है। दु:ख तो वहीं होता है, जहाँ राग-द्वेष (मेरा-तेरा पैदा) कर लेते हैं और यह मनुष्यका बनाया हुआ है—‘ययेदं धार्यते जगत्’(गीता ७। ५)। जीव जगत‍्को धारण करता है, इसीसे सुख होता है, दु:ख होता है, बन्धन होता है, चौरासी लाख योनियोंकी प्राप्ति होती है—‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३।२१)। सत्त्व, रज, तम—तीनों गुण तो बेचारे पड़े रहते हैं, कोई बाधा नहीं देते। परन्तु इनका संग करनेसे जीव ऊर्ध्वगति, मध्यगति अथवा अधोगतिमें जाता है अर्थात् सत्त्वगुणका संग करनेसे ऊर्ध्वगतिको, रजोगुणका संग करनेसे मध्यगतिको और तमोगुणका संग करनेसे अधोगतिको जाता है। गुणोंका संग यह स्वयं करता है। अपरा प्रकृति किसीके साथ कोई सम्बन्ध नहीं करती। सम्बन्ध न प्रकृति करती है, न गुण करते हैं, न इन्द्रियाँ करती हैं, न मन करता है, न बुद्धि करती है। यह स्वयं ही सम्बन्ध करता है, इसीलिये सुखी-दु:खी हो रहा है, जन्म-मरणमें जा रहा है। जीव स्वतन्त्र है; क्योंकि यह परा (श्रेष्ठ) प्रकृति है। वह तो बेचारी अपरा प्रकृति है। वह कुछ नहीं करती। उससे सम्बन्ध जोड़कर, उसका सदुपयोग-दुरुपयोग करके ऊँच-नीच योनियोंमें जाते हैं, भटकते हैं। यह ‘ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७। ५)-का अर्थ हुआ।

अपनेको सुख-दु:ख किसका होता है? हमारा कोई सम्बन्धी है, प्रेमी है, वह मर जाता है तो दु:ख होता है और जी जाता है, अच्छा हो जाता है तो सुख होता है। यह मेरापन और तेरापन मनुष्यका बनाया हुआ है। यदि मनुष्य निर्मम और निरहंकार हो जाय, न प्रकृतिके साथ ममता रखे, न अहंता रखे तो दु:ख मिट जायगा और शान्ति प्राप्त हो जायगी—‘निर्ममो निरहंकार: स शान्तिमधिगच्छति’ (गीता २। ७१)। यह कर्मयोगकी दृष्टिसे है। ज्ञानयोगकी दृष्टिसे निर्मम-निरहंकार होनेपर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जायगा— ‘अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥’ (गीता १८।५३)। भक्तियोगकी दृष्टिसे निर्मम-निरहंकार होनेपर सुख-दु:खमें सम हो जायगा, क्षमावान् हो जायगा और भगवान‍्का प्यारा हो जायगा—‘निर्ममो निरहंकार: समदु:खसुख: क्षमी’ (गीता १२।१३)। इस तरह कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनोंसे मनुष्य निर्मम और निरहंकार हो जाता है।

यह ममता और अहंता हमारी बनायी हुई है। यह जीवकृत सृष्टि है। जीवकृत सृष्टि ही जीवको दु:ख देती है, बाँधती है। जीव स्वयं ही सृष्टि बनाकर बँधता है। जैसे रेशमका कीड़ा रेशम बनाकर उसमें बँध जाता है, उसमें ही फँसकर मर जाता है, इसी तरहसे जीवने अपना जाल बुन लिया, राग और द्वेष कर लिया। इसीसे यह फँसा हुआ है, बँधा हुआ है। इसीने जगत‍्को धारण कर रखा है। जगत‍्की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। कारणरूपसे देखें तो प्रकृति है और मालिकरूपसे देखें तो परमात्मा है। बाँधनेवाला जगत् तो जीवने ही बना रखा है। यदि यह निर्मम और निरहंकार हो जाय तो निहाल हो जाय! भगवान‍्ने बड़ी कृपा करके दो बात कह दी कि तुम ‘निर्ममो निरहंकार:’ हो जाओ, केवल अपनी बनायी हुई अहंता और ममताको मिटा लो तो ज्ञान हो जायगा, पूर्णता हो जायगी। यह अहंता-ममता आपकी बनायी हुई है। पहले जन्ममें और जगह ममता थी, इस जन्ममें और जगह ममता है। इस शरीरमें रहते हुए भी आप मकान बदल देते हो, सम्बन्ध बदल देते हो, दुकान बदल देते हो, अपना बना लेते हो और फँस जाते हो। अत: आपने ही इसको जगत्-रूपसे धारण कर रखा है। परमात्माकी दृष्टिमें यह जगत् नहीं है। महात्माकी दृष्टिमें भी यह जगत् नहीं है। अगर अहंता-ममता छोड़ दो तो जगत् नहीं रहेगा, दु:ख मिट जायगा।

श्रोता—स्वयंमें कर्तापनका भाव आ जाता है!

स्वामीजी—हाँ, उसको आप ही स्वयंमें लाते हैं। यह मेरा है, यह तेरा है; यह मेरे अनुकूल है, यह मेरे प्रतिकूल है; यह हमारे पक्षका है, यह दूसरे पक्षका है; यह हमारे सम्प्रदायका है, यह दूसरे सम्प्रदायका है—यह अपना खुदका ही बनाया हुआ है। इसलिये इसका त्याग करनेका दायित्व जीवपर है। अगर यह परमात्माका बनाया हुआ होता तो इसके त्यागका दायित्व परमात्मापर होता।

परमात्माकी बनायी सृष्टिमें उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय आदि जो कुछ होता है, वह आपमें बिलकुल दखल नहीं देता। वस्तुएँ आपके व्यवहारमें काम आती हैं, आपपर कोई बन्धन नहीं करतीं, आपको परवश नहीं करतीं, परतन्त्र नहीं करतीं। आप खुद ही उनमें अहंता-ममता करके फँस जाते हैं। अत: ‘ययेदं धार्यते जगत्’ का तात्पर्य है कि बन्धन आपका ही बनाया हुआ है।

सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे जीव मोहित हो जाता है—‘त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभि: सर्वमिदं जगत्’ (गीता ७।१३)। सात्त्विकी, राजसी और तामसी वृत्तियोंसे मोहित होकर जीव उनमें फँस जाता है। परन्तु न सात्त्विकी वृत्ति हरदम रहती है, न राजसी वृत्ति हरदम रहती है और न तामसी वृत्ति हरदम रहती है। गुणोंका तो नाशवान् स्वभाव है, उनका नाश होता ही रहता है। आप कितना ही अच्छा मानो, मन्दा मानो; भला मानो, बुरा मानो, कैसा ही मानो, वे गुण तो नष्ट होते ही हैं। उनमें परिवर्तन तो होता ही रहता है। आप ही सम्बन्ध जोड़ करके उनको पकड़ लेते हो। परा, श्रेष्ठ प्रकृति होते हुए भी आपने अपरा प्रकृतिको धारण कर रखा है, जन्म-मरणको धारण कर रखा है, महान् दु:खको धारण कर रखा है। आप छोड़ दो तो छूट जायगा। प्रत्यक्ष उदाहरण है कि आपकी कन्या बड़ी हो जाती है तो चिन्ता होने लगती है और जब घर-वर अच्छा मिल जाता है तथा आप कन्यादान कर देते हो तो आपकी वह चिन्ता मिट जाती है। कन्या वही है, आप वही हो, सृष्टि वही है, पर आपको चिन्ता नहीं है। कारण कि जबतक ‘मेरी है’, तबतक चिन्ता है और अब ‘मेरी नहीं है’ तो अब चिन्ता नहीं है। तात्पर्य है कि अपनी अहंता और ममतासे ही दु:ख होता है।

अहंताको लेकर ‘मैं साधु हूँ, मैं ऐसा हूँ, मेरेको ऐसा कह दिया, मेरेको ऐसा कर दिया’—यह आफत किसने पैदा की है? हम ऐसे-ऐसे हैं, हम पढ़े-लिखे हैं; हम कौन हैं, समझते हो आप?— यह आफत आपने ही बनायी है। आपने ही अपमान पकड़ लिया, मान पकड़ लिया, महिमा पकड़ ली, निन्दा पकड़ ली, अनुकूलता पकड़ ली, प्रतिकूलता पकड़ ली। यह आपकी ही पकड़ी हुई है। आप न पकड़ो तो कोई दु:ख देनेवाला है नहीं, हुआ नहीं, होगा नहीं, हो सकता नहीं। अपनी सृष्टि बनाकर आप ही फँस गये। आपने ही जगत‍्को धारण कर लिया, नहीं तो भगवान् कहते हैं कि सब कुछ मेरेसे ही व्याप्त है—‘मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना’ (गीता९।४), ‘येन सर्वमिदं ततम्’ (गीता ८। २२; १८। ४६)। ये बातें याद कर लेनेमात्रकी नहीं हैं। याद करोगे तो जैसे मैं व्याख्यान देता हूँ, वैसे आप भी दे दोगे, पर उससे कल्याण नहीं होगा। ये बातें मूलमें समझनी हैं कि हमें इसमें फँसना नहीं है, मैं-मेरा नहीं करना है। ‘मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥’ (मानस३।१५।१)। मैं और मेरा, तू और तेरा, यह और इसका, वह और उसका—यही बन्धन है, जो जीवका बनाया हुआ है। इसको वह छोड़ दे तो निहाल हो जाय।

जबतक मैं और मेरेपनको धारण किये रहोगे, तबतक दु:ख नहीं मिटेगा। यह मैं-मेरापन ही खास बन्धन है।

मैं मेरे की जेवरी, गल बँध्यो संसार।

दास कबीरा क्यों बँधे, जाके राम अधार॥

सब बन्धनोंकी एक ही चाबी है—मैं-मेरेका त्याग। मैं-मेरेको त्याग दो तो बन्धन है ही नहीं।

श्रोता—पहले ममताका त्याग होगा या अहंताका?

स्वामीजी—आपकी मरजी आये सो कर लो। ममताका सर्वथा त्याग कर दो तो अहंताका त्याग हो जायगा और अहंताका सर्वथा त्याग कर दो तो ममताका त्याग हो जायगा। जो आपको सुगम पड़े, वह कर लो। एकका त्याग करो तो दूसरेका त्याग अपने-आप हो जायगा। अहंताके साथ ममता और ममताके साथ अहंता रहती है। ममताका त्याग करो तो अहंता सर्वथा चली जायगी और अहम् ही छोड़ दो ममता कहाँ टिकेगी? आप करके देख लो।