परमपितासे प्रार्थना

जीवमात्र भगवान‍्का ही अंश है—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५।७), ‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥’ (मानस, उत्तर० ११७।१)। अत: भगवान् पिता हैं और जीवमात्र उनका पुत्र है। पिताका स्वाभाविक ही पुत्रमें प्रेम, अपनापन होता है। परन्तु जीव अपने परमपिताको भूलकर मायाके वशमें हो जाता है—‘सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥ (मानस, उत्तर० ११७।२)। अब वह अपने परमपिता भगवान‍्की कृपासे ही इस मायासे छूट सकता है। हमारे परमपिता सर्वसमर्थ हैं। हमें मायाके वशसे छुड़ानेके लिये उनके समान कोई दूसरा है ही नहीं। इसलिये हमें अपने परमपितासे प्रार्थना करनी चाहिये—

हे परमपिता! हे परमेश्वर! आप इस मायासे मेरेको छुड़ाओ। मैं अपनी शक्तिसे छूट नहीं सकता। आप कहते हैं कि तुम्हारेमें शक्ति है, पर हमें ऐसी शक्ति दीखती नहीं। आपमें अपार, अनन्त, असीम शक्ति है, जिसका कोई पारावार नहीं है। ऐसी शक्तिके होते हुए मैं मायाके परवश हो गया! आप जरा सोचो। आप पिता हो न? पिताको सोचना चाहिये न? पुत्रकी सहायता पिता ही करेगा, और कौन करेगा? दूसरेको दया क्यों आयेगी? परमपिताको ही तो दया आयेगी। इसलिये दया करके मेरेको बचाओ प्रभो! आपके होकर और किसको कहें? आपसे अधिक समर्थ कौन है? आपकी दृष्टिमें कोई हो तो बता दो। हमारेको तो कोई दीखता नहीं। गीतामें भी लिखा है कि आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर आपसे अधिक तो हो ही कैसे सकता है—‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिक: कुतोऽन्य:’ (गीता ११।४३)। इसलिये यह काम तो आपको ही करना पड़ेगा। ‘काम हमारो जमत है, रमत तिहारी राम’! आपका तो खेल होगा, हमारा काम हो जायगा!

महाराज! हमारे एक मुश्किल हो गयी है। आप कहते हो कि तुम्हारेमें शक्ति है, पर शक्ति हमें याद नहीं है। फँसना तो हमें दीखता है, पर छूटनेकी शक्ति हमें नहीं दीखती। हमारेमें शक्ति हो तो आपको क्यों कहें? हम ही अपना काम कर लें। हमारेमें शक्ति नहीं है, अगर है तो उसको आप जगा दो। होना होगा तो आपकी कृपासे ही होगा। विचार करें तो आपकी कृपाको छोड़कर और कोई दीखता नहीं।

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये

सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।

भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे

कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥

(मानस, सुन्दर०)

‘हे रघुनाथजी! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सबके अन्तरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं)कि मेरे हृदयमें दूसरी कोई इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दीजिये और मेरे मनको काम आदि दोषोंसे रहित कीजिये।’

हे प्रभो! यह काम आपको ही करना होगा। आपको छोड़कर हम कहाँ जायँ? किसको कहें? कौन सुनेगा? क्यों सुनेगा? हम आपके हैं। आपने कहा है—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५।७)। आपका अंश होकर हम दु:ख पायें? आपकी सामर्थ्य अपार है, अनन्त है, असीम है—इसमें कोई सन्देह नहीं है। परन्तु ऐसी सामर्थ्यके होते हुए भी हम दु:ख पा रहे हैं? आपके सिवाय हमारा कौन है?

संसार साथी सब स्वार्थ के हैं,

पक्‍के विरोधी परमार्थ के हैं।

देगा न कोई दु:ख में सहारा,

सुन तू किसी की मत बात प्यारा।

इसलिये हे मेरे नाथ! हे मेरे स्वामी! हे मेरे प्रभो! आपके सामने तो मामूली चीज है। आप थोड़ी-सी कृपा कर दो तो इतनेमें हमारा काम हो जायगा! आपका अंश होकर, दास होकर हम दूसरे किसीको कहें तो यह बड़े शर्मकी बात है। आपके लिये यह कोई बड़ा भारी काम नहीं है। बहुत छोटा, तुच्छ काम है। आपके सामने तो मामूली बात है, पर हमारी सब आफत छूट जायगी। हम जैसे होने चाहिये, वैसे नहीं हैं, यह बात ठीक है, हम स्वीकार करते हैं; परन्तु हम कैसे ही हों, हैं तो आपके ही। हम किसी दूसरेके तो हो नहीं सकते। अब ऐसी कृपा करो कि आपकी निर्भरा भक्ति मिल जाय। हम आपपर ही निर्भर हो जायँ। आपके ही चरणोंके शरण हो जायँ। आपके तो कोई घाटा पड़ेगा नहीं, पर हमारा बड़ा भारी काम हो जायगा। यह हम अपनी शक्तिसे नहीं कर सकते। आप देखते हैं कि हम पात्र नहीं हैं तो पात्र भी आपकी शक्तिसे ही बनेंगे। आपकी शक्तिसे ही मनुष्य योग्य बनता है। आपकी जो अपार, अनन्त शक्ति है, उसीसे सब काम होता है। नहीं तो फिर आप जानो, आपका काम जाने! हमने तो अपनी बात कह दी, अब जैसी आपकी मरजी, वैसा करो। जिसमें आपकी प्रसन्नता हो, वह करो। हमारा कोई आग्रह नहीं है। हम तो समझते नहीं महाराज! हमारी अक्लमें बात नहीं आती। हमारे अधिकारकी बात नहीं दीखती। आपको दीखती हो तो वैसे कर लीजिये।

आप कृपा को आसरो,

आप कृपा को जोर।

आप बिना दीखै नहीं,

तीन लोक में और॥

हम अयोग्य हैं। जो अयोग्य होते हैं, वे ही आपकी कृपाके अधिकारी होते हैं। जो योग्य हैं, वे कृपाकी चाहना क्यों करेंगे? वे अपना काम खुद कर लेंगे। परन्तु हमारेसे ऐसा नहीं होगा। आप ही कृपा करके अपनी निर्भरा भक्ति दीजिये। निर्भरा भक्ति पाकर हम कृतार्थ हो जायँगे! आपके चरणोंकी निर्भरा भक्ति मिल जाय तो फिर ‘कामादि दोषोंसे रहित कीजिये’—ऐसा कहनेकी जरूरत ही नहीं। हमारे मनमें तो आती है कि आपको कुछ नहीं कहें। आप सब जानते हो। आपसे अपरिचित कुछ नहीं है। हम आपकी जानकारीमें हैं। आप जानते हो कि हम कैसे हैं। हम जैसे भी हैं, आपके ही हैं।

गायका बच्चा मलसे भरा होता है तो गाय मुखसे चाटकर उसको साफ कर देती है। आप नहीं करो तो आपकी मरजी। आपकी जैसी प्रसन्नता हो, वैसा करो। हम उसमें ही राजी हैं। हमारी इस अवस्थामें ही आप राजी हों तो कोई बात नहीं। फिर परवाह ही नहीं। फिर हमारे चित्तमें बहुत आनन्द है। क्यों आनन्द है? कि आपकी ऐसी ही मरजी है। हमने तो अपनी बात कह दी, अब आप जानो, आपका काम जाने। आपको छोड़कर और किसको अपनी बात कहें? और कौन सुनेगा? सुनकर भी वह क्या करेगा बेचारा! दूसरेमें वह शक्ति नहीं है। सन्तोंने कहा है—

घर घर लागो लायणो,

घर घर दाह पुकार।

जनहरिया घर आपणो,

राखै सो हुसियार॥

अपना घर रखनेकी शक्ति भी हमारेमें नहीं है! हमें तो केवल आपकी कृपाका ही भरोसा है। और हमें क्या करना है महाराज! आप ही बताओ। हम तो जैसे हैं, आपके सामने हैं। अब आपकी जैसी मरजी हो, वैसे करो। परन्तु आपकी मरजीमें हम सन्तोष करें, वह सन्तोष भी आप दे दीजिये। फिर हमारे आनन्दका ठिकाना नहीं है!

हे प्रभो! हे दीनानाथ! हे पतितपावन! हे अशरणशरण! आप पापियोंका भी उद्धार कर देते हो, अयोग्यको भी योग्य बना देते हो। सब आपकी मरजी है। आप ही जानो महाराज! हे नाथ! अगर हम घोर पापी हैं तो आपके हैं, कम पापी हैं तो आपके हैं और पापरहित हैं तो आपके हैं। हमारा उद्धार आपको ही करना है। आपके ऊपर ही हमारा भार है। हम जैसे हैं, वैसे ही आपके हैं। अगर हम भक्त हैं तो आप भक्तवत्सल हो, हम पतित हैं तो आप पतितपावन हो। भक्तोंका उद्धार करनेवाले भी आप ही हो और पापियोंका उद्धार करनेवाले भी आप ही हो। आपके सिवाय और कौन है हमारा? हम शुद्ध हो जायँ तो कई हमारे हो जायँगे। परन्तु अशुद्धको कोई अपनाता नहीं। आप तो सबके हो। हम शुद्ध हैं तो आपके हैं, अशुद्ध हैं तो आपके हैं। अच्छे हैं तो आपके हैं, मन्दे हैं तो आपके हैं। आपके सिवाय और किसके शरण जायँ? सिवाय आपके अपना कोई नहीं है। हमारा उद्धार तो आपको ही करना है। महान् अशुद्धको शुद्ध बनानेवाले आप ही हो। घोर पापीका उद्धार करनेवाले भी आप ही हो। हम आपके ही अंश हैं, आपसे ही पैदा हुए हैं; अत: हम जैसे हैं, वैसे-के-वैसे आपके हैं। शबरीने कहा—

अधम ते अधम अधम अति नारी।

तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥

(मानस, अरण्य०३५।२)

ऐसोंका उद्धार भी आप ही करते हो। आपके सिवाय अधमोंका उद्धार करनेवाला और कोई नहीं है। अधमोंकी उपेक्षा करनेवाले बहुत मिल जायँगे। अधमोंसे, पापियोंसे सब घृणा करते हैं, पर आप उनको शुद्ध करनेवाले हो। उनको शुद्ध करनेकी जिम्मेवारी आपपर है; क्योंकि वे पापी आपके ही हैं। आप पतितपावन हैं। इसलिये हम ज्यादा पापी हैं या कम पापी हैं, इसका विचार हम क्यों करें?

एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास।

एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास॥

(दोहावली २७७)

बड़े-बड़े पापियोंका भी आपने उद्धार किया है, कसाइयोंका भी उद्धार किया है, महान् चोर-डाकुओंका भी उद्धार किया है। यह तो आपका स्वभाव है। इसलिये हे नाथ! हमारा उद्धार आपको ही करना है। हम कैसे ही हैं, हैं तो आपके ही। हम आपकी दयाके भरोसे आपकी शरणमें आये हैं, जैसा कि विभीषणने कहा है—

श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।

त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥

(मानस, सुन्दर०४५)

आपके सिवाय और कोई भी सुननेवाला नहीं है। ऐसी दयालुता किसीमें नहीं है। आपके समान दयालु हमने दूसरा कोई सुना नहीं है। सुनें कैसे? है ही नहीं। इसलिये हम आपके चरणोंमें आकर पड़ गये हैं। बस, अब और विचार ही क्यों करें? विचार करनेकी आवश्यकता ही नहीं। कहीं जानेकी जरूरत ही नहीं है। किसीसे पूछनेकी जरूरत ही नहीं। हमारे तो जो कुछ हो, सब आप ही हो। एक आपपर ही विश्वास है। एक आपकी ही आशा है।

सुर नर मुनि सब कै यह रीती।

स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती॥

हेतु रहित जग जुग उपकारी।

तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥

(मानस, किष्किंधा०१२।१,उत्तर०४७।३)

बिना हेतु उद्धार करनेवाले दो ही हैं—एक आप और एक आपके प्यारे भक्त। इनके हृदयमें स्वाभाविक ही दूसरोंका उद्धार करनेकी बात रहती है। आपके भक्तोंमें तो आपसे भी अधिक उत्साह रहता है। आपके भक्तोंमें यह स्वभाव आपसे ही आया है। परंतु आपमें यह स्वभाव पहलेसे ही स्वत:-स्वाभाविक है। अधमोंका उद्धार करना आपका स्वभाव है, आपकी आदत है। अधमोंका उद्धार करते-करते आपकी कृपामें कमी नहीं आती—‘जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती’ (मानस, बाल० २८।२)। आपकी कृपा आपके स्वभावको लेकर ही है—‘अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ। केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ॥’ (मानस,उत्तर०१२४।२)। ऐसा स्वभाव कहीं सुना नहीं, कहीं देखा नहीं। आपके समान कौन है? आपने पहलेसे ही बिना हेतु कृपा करनेका स्वभाव स्वत: बना रखा है। इसलिये आपको कहनेकी हिम्मत होती है। आपके सिवाय और किसीको कहनेकी हिम्मत ही नहीं होती! अब मारो चाहे तारो, कुछ भी करो, हम तो आपके हैं। अगर हम अनन्य शरण नहीं हैं तो आप अनन्य कर लो महाराज! आप जैसा चाहते हो, वैसा बना लो। हम तो वैसा बन नहीं सके, अपनेको शुद्ध कर नहीं सके! बालक कैसा ही हो, उसको स्नान तो माँ ही कराती है। परन्तु बालक रोता है कि माँ स्नान क्यों कराती है? हम तो ऐसे हैं महाराज!

हे नाथ! हे पतितपावन! हे अधम-उद्धारक! हे कृपासिन्धो! हे दयासिन्धो! आपके चरणोंका ही आश्रय है। और किसीको हम जानते ही नहीं हैं। जानें क्या, आपके सिवाय और कोई है ही नहीं, कोई हुआ ही नहीं, कोई होगा ही नहीं, हो सकता ही नहीं। जो दीन हैं, नीच हैं, वे आपको प्यारे लगते हैं। आपका ऐसा स्वभाव सुनकर ही हम आपकी शरणमें आये हैं—‘श्रवन सुजसु सुनि आयउँ।’ हमारेमें कमी हो तो आप दूर कर दो। हम तो कमीसे ही भरे हुए हैं। हम अच्छे-मन्दे जैसे हैं, आपके ही हैं। आपके चरणोंको छोड़कर हम कहाँ जायँ?

जाउँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे।

काको नाम पतित-पावन जग,

केहि अति दीन पियारे॥

(विनयपत्रिका१०१)