भक्तिके साधन और अन्तराय

लोकहानौ चिन्ता न कार्या निवेदितात्मलोकवेदत्वात्*॥६१॥

६१-लोकहानिकी चिन्ता (भक्तको) नहीं करनी चाहिये, क्योंकि वह (भक्त) अपने-आपको और लौकिक, वैदिक (सब प्रकारके) कर्मोंको भगवान‍्के अर्पण कर चुका है।

भक्त सब कुछ भगवान‍्के अर्पण कर चुकता है, इसलिये उनके सम्बन्धमें किसी प्रकारकी चिन्ता करनेकी उसे क्या आवश्यकता है? उसको तो केवल एक प्रियतम भगवान‍्के चिन्तनकी ही चिन्ता रहनी चाहिये। स्त्री, पुत्र, धन, जन, मानादि पदार्थ रहें या चले जायँ, उसे इनकी कोई परवा नहीं; क्योंकि वह तो इन्हें पहले ही भगवान‍्के समर्पण करके सर्वथा अकिंचन हो चुका है। फिर उसके पास इनकी चिन्ता करनेके लिये समय और चिन्ता करनेवाला चित्त भी कहाँ है? उसके चित्तको तो एकमात्र चिन्ताहरण चिन्तामणिकी चिन्ताने चुरा लिया है। वे चतुर चौरचूडामणि कभी उसके चित्तको वापस देना ही नहीं चाहते, फिर वह चित्तके अभावमें किसी हानिकी चिन्ता ही कैसे करे? अतएव इस पथके पथिकको लोकहानिकी कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिये। उसे तो सबके सार अर्थ श्रीभगवान‍्का ही चिन्तन करना चाहिये। और भक्तके हृदयमें ऐसा ही होता भी है।

न तदसिद्धौ* लोकव्यवहारो हेय: किन्तु फलत्यागस्तत्साधनं च कार्यमेव॥६२॥

६२-(परन्तु) जबतक भक्तिमें सिद्धि न मिले तबतक लोकव्यवहारका त्याग नहीं करना चाहिये, किन्तु फल त्यागकर (निष्कामभावसे) उस भक्तिका साधन करना चाहिये।

प्रेमकी प्राप्ति होनेपर लौकिक (और वैदिक) कर्म छूट जाते हैं, जान-बूझकर उनका स्वरूपसे त्याग नहीं करना पड़ता। समर्पणका अर्थ उनका मनसे समर्पण ही है। फिर जब प्रेमकी उच्च दशा प्राप्त होती है तब विधि-निषेधके परे पहुँच जानेके कारण ये सब कर्म स्वत: ही उसे विधिके बन्धनसे मुक्त कर अलग हो जाते हैं। उस स्थितिका यही नियम है। परन्तु जो जान-बूझकर प्रेमके नामपर शास्त्रविधिका त्याग करता है, उसे भक्तिकी सिद्धि सहजमें नहीं होती। इसलिये सूत्रकार कहते हैं कि लोकव्यवहारका त्याग जान-बूझकर मत करो। फलकी कामना छोड़कर कर्म करते रहो। निष्काम कर्म करनेवाला स्वयमेव ही लोकहानिकी चिन्तासे छूट जाता है और उसके वे भगवत्प्रीत्यर्थ निष्कामभावसे किये हुए लौकिक कर्म भक्तिकी प्राप्तिमें साधक बन जाते हैं।

स्त्रीधननास्तिकवैरिचरित्रं* न श्रवणीयम्॥६३॥

६३-स्त्री, धन, नास्तिक और वैरीका चरित्र नहीं सुनना चाहिये।

६२ वें सूत्रमें लोकव्यवहारका त्याग नहीं करनेकी आज्ञा दी गयी है, अतएव लोकव्यवहार तो करना चाहिये; परन्तु प्रेमपथके पथिकको लोकव्यवहारमें भी स्त्री, धन, नास्तिक और शत्रुके चरित्र-श्रवणसे तो बचना ही चाहिये।

(१) जिसका मन स्त्रीकी चिन्तामें लग गया, वह भगवान‍्की चिन्ता किसी प्रकार नहीं कर सकता। स्त्रीकी चिन्तासे कामकी उत्पत्ति होती है और काम प्रेममार्गमें सबसे बड़ा बाधक है। स्त्रीसम्बन्धी बातोंके सुनने, पढ़ने और देखनेसे ही स्त्रीचिन्तन होता है। अतएव साधकको चाहिये कि स्त्रीसम्बन्धी बातचीत न करे, स्त्रीसम्बन्धी बात या गान न सुने, स्त्रीसम्बन्धी चित्र न देखे, स्त्रीसम्बन्धी पुस्तक या अन्य साहित्य न पढ़े, नाटक, सिनेमा आदि न देखे, स्त्रीचरित्रपर कुछ भी आलोचना न करे, स्त्रियोंके सम्बन्धमें लेखादि न लिखे, स्त्रियोंमें रहे नहीं और स्त्रियोंसे अनावश्यक मिले नहीं। जो साधक गृहस्थ हों, उन्हें अपनी विवाहिता पत्नीके सिवा यथासाध्य अन्य स्त्रियोंसे मिलनेसे बचना चाहिये। स्त्रीसम्बन्धी चर्चा करना-सुनना, चित्रादि देखना तो सभीके लिये हानिकारक है। श्रीमद्भागवतमें तो कहा है—

न तथास्य भवेन्मोहो बन्धश्चान्यप्रसंगत:।

योषित्संगाद्यथा पुंसो यथा तत्संगिसंगत:॥

(३।३१।३५)

‘स्त्रियोंके संगसे और स्त्रियोंका संग करनेवालोंके संगसे मनुष्यको जैसा मोह और बन्धन प्राप्त होता है वैसा अन्य किसीके भी संगसे नहीं होता।’ आगे चलकर पंचम स्कन्धमें स्त्रियासक्त पुरुषोंकी संगतिको ‘नरकका द्वार’ बतलाया है। जैसे पुरुषोंके लिये स्त्रीका संग त्याज्य है, इसी प्रकार स्त्रियोंके लिये भी पुरुषोंका संग सर्वथा त्याज्य है।

(२) धनके चिन्तनसे लोभकी उत्पत्ति होती है। जहाँ चित्तमें धनका लोभ जागृत हुआ, वहीं न्यायान्यायकी बुद्धि मारी जाती है और मनुष्य सत्पथको त्यागकर अन्यायके मार्गपर चलने लगता है। अतएव धन और धनियोंकी भोग और गर्वभरी बातें नहीं सुननी-देखनी चाहिये।

(३) जिनका ईश्वर और शास्त्रोंपर विश्वास नहीं है, वे ही नास्तिक हैं। ईश्वरका अस्तित्व न माननेवाले नास्तिकोंके समान जगत‍्के जीवोंका शत्रु शायद ही कोई है। ‘इसमें क्या रखा है? उसमें क्या है? ईश्वर केवल ढोंग है, किसने ईश्वरको देखा है? आत्मा तो कल्पनामात्र है।’ ऐसी बातें बकनेवाले और ईश्वर तथा शास्त्रोंकी निन्दा करनेवाले कुतर्कियोंका संग करने तथा उनके चरित्र सुननेसे ईश्वरमें अश्रद्धा पैदा होती है और ईश्वरमें अश्रद्धाके समान पतनका साधन और कोई-सा भी नहीं है। अतएव नास्तिकोंसे सदा बचना चाहिये।

(४) वास्तवमें भक्तके मन उसका कोई भी शत्रु नहीं है। जो सब जगत‍्में अपने प्राणाराम परमात्माको व्याप्त देखता है, जो जगत‍्को श्रीकृष्णमय देखता है, वह कैसे किसको अपना वैरी मान सकता है। देवदेव श्रीमहादेवजीने कहा है—

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।

निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥

परन्तु जबतक भक्तिकी सिद्धि न हो, तबतक साधकको ऐसी भावना करनी चाहिये और मन-ही-मन यह निश्चय करना चाहिये कि सब कुछ मेरे प्रभुका ही स्वरूप है। ऐसी अवस्थामें यदि कोई दूसरा मनुष्य भ्रमवश साधकसे द्वेष या वैर रखे तो उसकी उन वैरसम्बन्धी बातोंको, जहाँतक हो, सुनना ही नहीं चाहिये। क्योंकि उनके सुननेसे क्रोध उत्पन्न होनेकी सम्भावना रहती है। अतएव अपनी ओरसे तो अपने न जीते हुए मनके सिवा किसीको शत्रु माने ही नहीं और दूसरा कोई शत्रुता रखता हो तो उसपर भी विचार न करे।

स्त्रीके चिन्तनसे काम, धनके चिन्तनसे लोभ, नास्तिकके चिन्तनसे ईश्वरमें अविश्वास और वैरीके चिन्तनसे क्रोध उत्पन्न होता है। अतएव इन चारोंके चरित्रोंको यथासाध्य सुनना ही नहीं चाहिये।

अभिमानदम्भादिकं त्याज्यम्॥६४॥

६४-अभिमान, दम्भ आदिका त्याग करना चाहिये।

इससेके पहले सूत्रमें स्त्री, धन, नास्तिक, वैरीका चरित्र न सुननेका आदेश दिया गया है। परन्तु वैसा करके यह नहीं मान लेना चाहिये कि मैं कामिनी-कांचनका त्यागी हूँ, मैं परम आस्तिक हूँ, मैं अजातशत्रु हूँ। अभिमान सर्वथा पतनका हेतु है। सम्पत्ति, सन्तति, शक्ति, स्वास्थ्य, विद्या, बुद्धि, कुल, वर्ण, आश्रम, आचार, रूप, पद, पुरुषार्थ आदि किसी भी वस्तुका अभिमान नहीं होना चाहिये। जो कुछ सद्वस्तु या सद्‍गुण प्राप्त हों अथवा साधन ठीक चलता रहे तो उसमें भगवान‍्की कृपाको ही कारण समझना चाहिये। अभिमानसे बहुत बड़ी हानि होती है। अतएव अभिमानका सर्वथा त्याग करना चाहिये। यहाँतक कि निरभिमानताके अभिमानको भी छोड़ देना चाहिये। अभिमाननाशका एक उत्तम उपाय दीनता, विनय और नम्रता है। नमनभक्तिसे भी अभिमानका नाश होता है। इसी प्रकार दम्भका भी त्याग करना चाहिये। अपनेमें जो गुण न हों, धनमानके लोभसे या स्वभावदोषसे उन गुणोंको दिखानेकी चेष्टा करना; बाहरसे धर्मात्मा, भक्त, त्यागी बननेका ढोंग करना दम्भ कहलाता है। दाम्भिक पुरुषका साधनपथ बहुत बुरी तरहसे रुक जाता है। वह ऊपरसे अपना कपटवेश बनाये रखनेमें ही अपनी समस्त विद्या, बुद्धि और क्रियाकुशलताको समाप्त कर देता है। निरभिमानता और सरलता ये दो भक्तिके साधनमें परम सहायकरूप हैं और अभिमान एवं दम्भ महान् बाधक। ये दोनों आसुरी सम्पदाके दुर्गुण हैं। इनके साथ ‘आदि’ शब्द जोड़कर सूत्रकारने आसुरी सम्पदाके* अन्यान्य दुर्गुणोंकी तरफ इशारा किया है। अतएव सभी आसुरी दुर्गुणोंका त्याग करना चाहिये।

तदर्पिताखिलाचार: सन् कामक्रोधाभिमानादिकं तस्मिन्नेव करणीयम्॥६५॥

६५-सब आचार भगवान‍्के अर्पण कर चुकनेपर यदि काम, क्रोध, अभिमानादि हों तो उन्हें भी उस (भगवान्)-के प्रति ही करना चाहिये।

जब सब कुछ भगवान‍्के अर्पण कर दिया तो फिर काम, क्रोधादिका अर्पण दूसरे किसको किया जाय। प्रियतम भगवान् जैसे अपने प्रेमी भक्तके प्रेमके पात्र हैं, वैसे ही उसके काम, क्रोधादिके पात्र भी वही हैं। दूसरा तो कोई उसके मन है ही नहीं, तब इनका पात्र और कौन हो? इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान‍्के प्रेमी भक्तोंमें भी विषयी पुरुषों-जैसे ही काम, क्रोध, अभिमान रहते हैं। आसुरी सम्पदाके दुर्गुणस्वरूप काम, क्रोध, अभिमानादिके त्यागकी बात तो पहले ही कही जा चुकी है। फिर प्रेमी भक्त महात्माओंमें यह दूषित काम कहाँ। उनमें विषयासक्ति, हिंसा, द्वेष और क्रोध कहाँ। उन अमानियोंमें मानकी गन्ध भी कहाँ। इनका तो उनमें बीज ही नहीं है। अपने सुखकी जब कोई वासना ही नहीं, तब ये दोष कहाँसे आवें? उन भक्तोंके जीवनका उद्देश्य तो बस एक प्रियतमको सुखी करना ही है—‘कृष्णसुखैकतात्पर्य गोपीभाववर्य।’ उनके चित्तमें जगत‍्का संस्कार ही नहीं है; वे तो लज्जा, घृणा, कुल, शील, मान, देह, गेह, भोग, मोक्ष सबकी सुधि भुलाकर केवल अपने प्रियतम भगवान् पर ही न्योछावर हो चुके हैं। अतएव जैसे ये भक्त स्वयं दिव्य भाववाले होते हैं, वैसे ही इनके काम, क्रोध, अभिमान भी दिव्य होते हैं। इसीलिये परम विरागी जीवन्मुक्त मुनियोंने इस प्रकारके भगवत्-रंग-रँगीले प्रेमियोंकी ऐसी लीलाएँ गाने और सुननेमें अपनेको कृतार्थ माना है। जिनका चित्त सब ओरसे हट गया है, एकमात्र भगवान् ही जिनकी कामनाकी वस्तु रह गये हैं, वे भक्त अपने उन भगवान‍्के दर्शनकी कामनाके वेगसे पीड़ित होकर रो-रोकर पुकारते हैं—

हे देव हे दयित हे भुवनैकबन्धो

हे कृष्ण हे चपल हे करुणैकसिन्धो।

हे नाथ हे रमण हे नयनाभिराम

हा हा कदा नु भवितासि पदं दृशोर्मे॥

(श्रीकृष्णकर्णामृत)

‘हे देव! हे प्रियतम! हे विश्वके एकमात्र बन्धु! हे हमारे मनोंको अपनी ओर बरबस खींचनेवाले! हे चपल! हे करुणाके एकमात्र सिन्धु! हे नाथ! हे रमण! हे नयनाभिराम! हा! हा! तुम कब हमारे दृष्टिगोचर होओगे?’

श्रीकृष्णगतप्राणा श्रीरुक्मिणीजी कहती हैं—

श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर शृण्वतां ते

निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम्।

रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थलाभं

त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे॥

का त्वा मुकुन्द महती कुलशीलरूप-

विद्यावयोद्रविणधामभिरात्मतुल्यम्।

धीरा पतिं कुलवती न वृणीत कन्या

काले नृसिंह नरलोकमनोऽभिरामम्॥

यस्याङ्घ्रिपंकजरज:स्नपनं महान्तो

वाञ्छन्त्युमापतिरिवात्मतमोऽपहत्यै।

यर्ह्यम्बुजाक्ष न लभेय भवत्प्रसादं

जह्यामसून् व्रतकृशाञ्छतजन्मभि: स्यात्॥

(श्रीमद्भा० १०।५२।३७,३८,४३)

‘हे अच्युत! हे त्रिभुवनसुन्दर! जो कानोंके द्वारा हृदयमें प्रवेश करके सुननेवालोंके अंगतापको हरण कर लेते हैं, वे आपके दिव्य गुण और जो नेत्रधारियोंकी दृष्टिका सबसे परम लाभ है वह आपका दिव्य रूप, इनकी प्रशंसा सुनकर मेरा चित्त सारी लोक-लाजको छोड़कर आपपर अत्यन्त आसक्त हो गया है। हे मुकुन्द! कुल, शील, रूप, विद्या, वय, द्रव्य और प्रभावमें आपके समान बस आप ही हैं। हे पुरुषोत्तम! आप नरलोकके मनको मोहनेवाले हैं। हे पुरुषसिंह! विवाहकाल (आपसे मिलनका अवसर) उपस्थित होनेपर ऐसी (कौन प्रेमी भक्तरूपी) कुलवती, गुणवती और बुद्धिमती कन्या है जो आपके साथ गँठजोड़ी करनेकी इच्छा न करेगी? हे कमललोचन! उमापति शंकरके समान महान् देव अपने हृदयका तम दूर करनेके लिये आपकी जिस चरणधूलिमें स्नान करनेकी प्रार्थना करते रहते हैं, यदि वह चरणधूलि मुझे प्रसादरूपमें नहीं मिली तो यह निश्चय समझिये कि मैं व्रतादिके द्वारा शरीरको सुखाकर इन व्याकुल प्राणोंको त्याग दूँगी और ऐसे करते-करते कभी सौ जन्मोंमें तो आपका प्रसाद मुझको प्राप्त होगा ही।’

भगवान् श्रीकृष्णकी पटरानियाँ द्रौपदीसे कहती हैं—

न वयं साध्वि साम्राज्यं स्वाराज्यं भौज्यमप्युत।

वैराज्यं पारमेष्ठ्यं च आनन्त्यं वा हरे: पदम्॥

कामयामह एतस्य श्रीमत्पादरज: श्रिय:।

कुचकुंकुमगन्धाढ्यं मूर्ध्ना वोढुं गदाभृत:॥

(श्रीमद्भागवत१०।८३।४१-४२)

‘हे साध्वी! हमें पृथ्वीके साम्राज्य, इन्द्रके राज्य, भौज्यपद, सिद्धियाँ, ब्रह्माके पद, मोक्ष या वैकुण्ठकी भी इच्छा नहीं है। हम तो केवल यही चाहती हैं कि भगवान् श्रीकृष्णकी कमलाकुच-कुंकुमकी सुगन्धसे युक्त चरणधूलिको ही सदा अपने मस्तकोंपर लगाती रहें।’ मुक्ति तो ऐसे भक्तोंके चरणोंपर लोटा करती है—

यदि भवति मुकुन्दे भक्तिरानन्दसान्द्रा

विलुठति चरणाग्रे मोक्षसाम्राज्यलक्ष्मी:॥

‘जिसकी श्रीमुकुन्दके चरणोंमें परमानन्दरूपा भक्ति होती है, मोक्षसाम्राज्यश्री उसके चरणोंमें लोटती है।’

आदर्श प्रेममयी भक्तशिरोमणि गोपियाँ प्रियतम भगवान‍्के आँखोंसे ओझल हो जानेपर विलाप करती हुई कहती हैं—

विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते

चरणमीयुषां संसृतेर्भयात्।

करसरोरुहं कान्त कामदं

शिरसि धेहि न: श्रीकरग्रहम्॥

व्रजजनार्तिहन् वीर योषितां

निजजनस्मयध्वंसनस्मित।

भज सखे भवत्किंकरी: स्म नो

जलरुहाननं चारु दर्शय॥

प्रणतकामदं पद्मजार्चितं

धरणिमण्डनं ध्येयमापदि।

चरणपंकजं शन्तमं च ते

रमण न: स्तनेष्वर्पयाधिहन्॥

(श्रीमद्भागवत१०।३१।५-६,१३)

‘हे यदुकुलशिरोमणि! जो लोग संसारके भयसे तुम्हारे चरणोंकी शरण लेते हैं, तुम्हारे करसरोज उन्हें अभय देकर उनकी अभिलाषाओंको पूर्ण करते हैं। हे प्रियतम! अपने उन्हीं करकमलोंको, जिनसे आपने लक्ष्मीका हाथ पकड़ा है, हमारे सिरपर रखिये। हे व्रजवासियोंके दु:खोंको हरनेवाले वीर! आपकी मन्द मधुर मुसकान भक्तोंके गर्वको हरनेवाली है। हे सखे! हम आपकी किंकरी हैं, कृपा करके हमें स्वीकार कीजिये और अपना सुन्दर मुखकमल हमें दिखाइये। हे रमण! हे आर्तिनाशन! तुम्हारे चरणारविन्द प्रणत जनोंकी कामना पूरी करनेवाले हैं, लक्ष्मीजीके द्वारा सदा सेवित हैं, पृथ्वीके आभूषण हैं, विपत्तिकालमें ध्यान करनेसे कल्याण करनेवाले हैं, हे प्रियतम! उन परम कल्याणमय सुशीतल चरणोंको हमारे तप्त हृदयपर स्थापित कीजिये।’

इस प्रकार प्रेमी भक्त श्रीकृष्णके कामसे पीड़ित हुए सदा उन्हींके लिये रोया करते हैं और उन्हें पुकारा करते हैं; और आँखमिचौनीकी-सी लीला करनेवाले लीलाविहारी भगवान् जब उनकी प्रेम-पुकार सुनकर त्रिभुवन-कमनीय, योगिजनदुर्लभ, देवदेवप्रत्याशित, ऋषि-महर्षि-महापुरुषचित्ताकर्षक, निखिलसौन्दर्यमाधुर्य-रसामृतसारभूत, आनन्दकन्द मदनमोहन मन्मथमन्मथरूपमें मन्द-मन्द मुसकाते हुए और मुरलीमें अपना दिव्य मोहन सुर भरते हुए सहसा प्रकट होकर अपनी प्रेमानन्दरसमाधुरी चारों ओर बिखेर देते हैं, जब अपने सौन्दर्यमाधुर्यसुधासुशीतल वदनविधुकी शुभ्र ज्योत्स्ना चारों ओर छिटका देते हैं, तब वहाँ उन भाग्यवान् दिव्यचक्षु दिव्यभावापन्न भक्त महात्माओंके चित्तोंकी क्या अवस्था होती है, इसका वर्णन करनेकी शक्ति किसीमें भी नहीं है। यह अनिर्वचनीय रहस्य है।

उस समय भक्तका अपना सब कुछ उनके चरणोंमें स्वयमेव न्योछावर हो जाता है और वह आनन्दोल्लासमें मत्त होकर सारे जगत‍्की परवा छोड़कर पुकार उठता है—

घर तजौं, बन तजौं, नागर नगर तजौं,

वंसीबट-तट तजौं, काहूपै न लजिहौं।

देह तजौं, गेह तजौं, नेह कहो कैसे तजौं,

आज राजकाज सब ऐसे साज सजिहौं॥

बावरो भयो है लोक बावरी कहत मोकौं,

बावरी कहेते मैं काहू ना बरजिहौं।

कहैया सुनैया तजौं, बाप और भैया तजौं,

दैया तजौं मैया! पै कन्हैया नाहिं तजिहौं॥

जीना और मरना तुम्हारे ही लिये होगा और तुम्हारे ही चरणोंमें होगा। मेरे हृदयकी यही एकमात्र कामना है। जब सब कुछ न्योछावर हो गया तो फिर मरनेके बाद शरीरके ये पाँचों भूत अलग-अलग बिखरकर भी तुम्हारी ही सेवा करेंगे।

कहीं ये पंचभूत जब मुझे छोड़कर अलग हों तब प्रियतमकी सेवासे हट न जायँ, इसीलिये विह्वलचित्तसे भक्त विधातासे प्रार्थना करता है—

पंचत्वं तनुरेतु भूतनिवहा:

स्वांशे विशन्तु स्फुटं

धातारं प्रणिपत्य हन्त शिरसा

तत्रापि याचे वरम्।

तद्वापीषु पयस्तदीयमुकुरे

ज्योतिस्तदीयांगन-

व्योम्नि व्योम तदीयवर्त्मनि धरा

तत्तालवृन्तेऽनिल:॥

इसीका अनुवाद करते हुए एक कविने कहा है—

मरिबे डरौं न बिधिहिं बस, पंचभूत करि बास।

पी-बापी, मारग, मुकुर, बीजन, अँगन अकास॥

पाँचों तत्त्व तो अलग-अलग होंगे ही, हे प्रभो! आप इतना कर दीजिये कि जलका भाग उस कुएँमें जाकर मिल जाय जिसके जलको मेरे प्रियतम नहाने और पीनेके काममें लेते हों, अग्नितत्त्व उस दर्पणमें जा मिले जिसमें प्रियतम अपना मुख देखते हों, पृथ्वीतत्त्व उस मार्गमें मिल जाय जिस मार्गसे प्रियतम आते-जाते हों, वायुतत्त्व उस भाग्यवान् पंखेमें जा मिले जिससे प्रियतम हवा लेते हों और आकाशतत्त्व उस आँगनमें जाकर मिल जाय जिसमें प्रियतम बैठते हों।

और जीव? वह तो प्रभुके चरणोंसे कभी अलग हो ही नहीं सकता। उसको तो वे अपने हृदयमें ही छिपा रखेंगे! यह है भक्तोंके ‘काम’ का एक छोटा-सा दृश्य! अब उनका क्रोध देखिये।

एक दिन श्रीकृष्णकी किसी खिझानेवाली चालसे श्रीराधाजी खीझ गयीं, सखी समझाने लगीं तो वे क्रोधमें भरकर कहने लगीं—तू उनका नाम भी मेरे सामने मत ले; उनकी तो बात ही क्या है, मैं काले रंगकी चीजमात्रका त्याग कर दूँगी। जीवनभर उनके विरहतापसे जलती रहूँगी, परन्तु उनसे मिलूँगी नहीं।

मिलौं न तिनसों भूल, अब जौलौं जीवन जियौं।

सहौं बिरहको सूल, बरु ताकी ज्वाला जरौं॥

मैं अब अपने मन यह ठानी।

उनके पंथ पिऊँ नहिं पानी॥

कबहूँ नैन न अंजन लाऊँ।

मृगमद भूलि न अंग चढ़ाऊँ॥

सुनौं न स्रवननि अलि पिकबानी।

नील जलज परसौ नहिं पानी॥

जरा ध्यान देकर देखिये, इस खीझमें कितनी रीझ भरी है!

एक दिन लीलामयने भक्त सखाओंके प्रणयकोपका आनन्द लूटनेके लिये खेलमें गड़बड़ मचाकर सखाओंको खिझा दिया। सखाओंने मिलकर निश्चय किया कि इस नटखटको खेलसे अलग कर दो। श्यामसुन्दरका वियोग तो क्षणभरके लिये भी सहनेको उनमेंसे एक भी तैयार नहीं था, क्योंकि उसे अलग करते ही प्राण अलग हो जाते हैं; परन्तु ऊपरसे बात गाँठकर उन्होंने कहा—‘कृष्ण! तुम खुद ही गड़बड़ मचाते हो और फिर तनकर रूठ जाते हो; हटो यहाँसे, हम तुम्हें अपने साथ नहीं खेलने देंगे।’ बस, जहाँ फटकार मिली कि प्राणधन श्यामसुन्दर ढीले पड़ गये। लगे पैरों पड़ने और शपथ खा-खाकर क्षमा माँगने। सूरदासजीने गाया है—

खेलनमें को काको गुसैयाँ।

हरि हारे जीते श्रीदामा,

बरबस ही कत करत रुसैयाँ॥

जाति पाँति हमते बड़ नाहीं,

ना हम बसत तुम्हारी छैयाँ।

अति अधिकार जनावत ताते,

जाते अधिक तुम्हारे गैयाँ॥

रूठ करे ता सँग को खेलै,

हा हा खात परत तब पैयाँ।

‘सूरदास’ प्रभु खेल्यो ही चाहैं,

दाँव दियो करि नंद दुहैयाँ॥

यह है उनका क्रोध।

अब रही मानकी बात, सो दूषणरहित मान तो इस प्रेमाभक्तिका एक भूषण ही है। एक समय श्रीराधारानी रूठ गयीं, मान कर बैठीं और सखियोंसे बोलीं—

सखि नँदलाल न आवन पावैं।

भीतर चरन धरन जिन दीजो,

चाहे जिते ललचावैं॥

ऐसनको बिस्वास कहा री

कपट बैन बतियावैं।

‘नारायन’ इक मेरे भवन तजि

अनत चहे जहँ जावैं॥

भगवान् मनाते-मनाते थक गये और शेषमें बोले—

इतो श्रम नाहिंन तबहुँ भयो।

सुनु राधिका! जितो श्रम मोकौं

ते यह मानु दयो॥

धरनीधर बिधि बेद उधारो,

मधु सो सत्रु हयो।

द्विज नृप किए दुसह दुख मेटे,

बलिको राज लयो॥

तोर्यो धनुष सुयंबर कीनो,

रावन अजित जयो।

अघ बक बच्छ अरिष्ट केसि मथि

दावानल अँचयो॥

तिय बपु धरॺो असुर सुर मोहे,

को जग जो न द्रयो।

गुरुसुत मृतक ज्यायबे कारन

सागर सोध लयो॥

जानौं नाहिं कहा या रसमें

सहजहि होत नयो।

‘सूरस्याम’ बल तोहि मनावत

मोहि सब बिसरि गयो॥

धन्य तेरा मान! बड़े-बड़े काम किये, कहीं हार नहीं मानी, कहीं थकावट नहीं प्रतीत हुई। आज तुझे मनानेमें मेरा सारा बल बिला गया। यह भक्तोंकी और भगवान‍्की प्रणय-लीला है—इस लीलामें राग, काम, क्रोध, मान सभी हैं; परन्तु सभी दूसरे रूपमें हैं। सभी पवित्र प्रेमके नामान्तरमात्र हैं, यहाँका यह सर्वधर्मत्याग ही परम धर्म है। यहाँकी अविधि ही सर्वोपरि प्रेमकी विधि है।

यह तो हुई सिद्ध भक्तोंकी बात। भक्तिके साधनमें भी यदि काम, क्रोध, लोभ कभी सतावें तो उनको भगवान‍्के प्रति ही लगा देना चाहिये। जो बातें हमारे मार्गमें बाधक होती हैं, वे ही भगवान‍्के प्रति प्रयुक्त होनेपर साधक बन जाती हैं। यह निश्चय रखना चाहिये।

श्रीमद्भागवतमें परमहंसश्रेष्ठ श्रीशुकदेवजीके वचन हैं—

कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च।

नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥

(१०।२९।१५)

‘काम, क्रोध, भय, स्नेह, तादात्म्य एवं मित्रता, सभी कुछ जो श्रीहरिके प्रति ही करते हैं वे अवश्य ही भगवान‍्के साथ तन्मय हो जाते हैं।’

तीव्र काम उसी वस्तुके लिये उत्पन्न होता है जो सबसे श्रेष्ठ हो, अखिल ऐश्वर्यमय हो, महान् माधुर्यसे पूर्ण हो, सर्वांगसुन्दर हो, आनन्दमय हो; भगवान‍्में यह सब कुछ है। यह सोचकर सदा-सर्वदा एकमात्र श्रीकृष्णमिलनकी कामनासे पीड़ित रहे और यह कामवासना उत्तरोत्तर बढ़ती ही जाय। प्रेमभरा क्रोध इस प्रकार करे कि ‘तुम बड़े निठुर हो, इतना पुकारनेपर भी नहीं आते; याद रखो अभी तो मैं पुकारता हूँ—पीछे तुम्हें पीछे-पीछे भटकना पड़ेगा।’ आठों पहर चिन्तनमें लगे रहकर प्रेमभरा मान इस प्रकार करे कि ‘मेरे पास तो अटूट चिन्तन-धन है, मैं तुम्हारी कोई गरज नहीं रखता; तुम्हें सौ बार गरज हो तो आना।’ इत्यादि।

भगवान‍्के प्रति काम, क्रोध और अभिमान कैसे किया जा सकता है, इसका एक और सुन्दर उदाहरण मातृपरायण शिशु है। छोटे बच्चेको आप बहुमूल्य रत्न दीजिये, उसे बढ़िया-बढ़िया चीजें खानेको दीजिये, उसका खूब सम्मान कीजिये, उसका यश गाइये, उसे स्वर्ग-मोक्ष मिलनेकी बात कहिये, वह माता और मातृस्तनोंको छोड़कर और कुछ भी नहीं चाहता। चाहे क्या, वह और किसी वस्तुको जानता ही नहीं, उसके लिये जाननेकी और चाहनेकी एकमात्र वस्तु माँ है। माँके बदलेमें वह किसी वस्तुसे भी सन्तुष्ट नहीं हो सकता। इसी प्रकार भक्तकी कामना केवल भगवान‍्के लिये ही होनी चाहिये। एकमात्र भगवान् ही उसके काम्य होने चाहिये।

बच्चा कुछ बड़ा हुआ; इधर-उधर कुछ चलने लगा, चलते-चलते ठोकर खाकर गिर पड़ा, रोने लगा। बच्चेका रोना सुनकर माँ दौड़ी आयी। बच्चा खीझ गया; पड़ा स्वयं, परन्तु क्रोध उसका मातापर हुआ। वह अपनी तोतली बोलीमें बार-बार कहता है, तू मुझे अकेला छोड़ क्यों गयी? फिर अभिमान करके रूठ जाता है। कहता है, ‘जा मैं तुझसे नहीं बोलूँगा। तेरी गोदी नहीं आऊँगा।’ माँ मनाती है, गोद लेना चाहती है, स्तन पिलाना चाहती है, वह रोता हुआ आगे-आगे भागता है। वह ऐसा क्यों करता है, इसीलिये कि वह स्वाभाविक ही मातापर अपना अधिकार समझता है। माताको ही अपनी सब कुछ समझता है। वह भूखा रहे तो माँका दोष, वह गिर जाय तो माँका अपराध, वह सो न सके तो माताका अपराध और अपराधका दण्ड खीझना और रूठना—क्रोध और अभिमान! इसी प्रकार निर्भर भक्त भी अपने भगवान‍्के प्रति काम, क्रोध और अभिमानादि कर सकता है।