प्रार्थना और निवेदन
नवजलधरवर्णं चम्पकोद्भासिकर्णं
विकसितनलिनास्यं विस्फुरन्मन्दहास्यम्।
कनकरुचिदुकूलं चारुबर्हावचूलं
कमपि निखिलसारं नौमि गोपीकुमारम्॥
मुखजितशरदिन्दु: केलिलावण्यसिन्धु:
करविनिहतकन्दु: वल्लवीप्राणबन्धु:।
वपुरुपसृतरेणु: कक्षनिक्षिप्तवेणु-
र्वचनवशगधेनु: पातु मां नन्दसूनु:॥
त्वां च वृन्दावनाधीश त्वां च वृन्दावनेश्वरि।
काकुभिर्वन्दमानोऽयं मन्द: प्रार्थयते जन:॥
योग्यता मे न काचिद्वां कृपालाभाय यद्यपि।
महाकृपालुमौलित्वात्तथापि कुरुतं कृपाम्॥
अयोग्ये सापराधेऽपि दृश्यन्ते कृपयाकुला:।
महाकृपालवो हन्त लोके लोकेशवन्दितौ॥
भक्तेर्वां करुणाहेतोर्लेशाभासोऽपि नास्ति मे।
महालीलेश्वरतया तथाप्यत्र प्रसीदतम्॥
यदक्षम्यं नु युवयो: सकृद्भक्तिलवादपि।
तदाग: क्वापि नास्त्येव कृत्वाशां प्रार्थये तत:॥
एष पापी रुदन्नुच्चैरादाय रदनैस्तृणम्।
हा नाथौ नाथति प्राणी सीदत्यत्र प्रसीदताम्॥
हाहारावमसौ कुर्वन् दुर्भगो भिक्षते जन:।
एतां मे शृणुत काकुं काकुं शृणुतमीश्वरौ॥
वाचेह दीनया याचे साक्रन्दमतिमन्दधी:।
किरत करुणस्वान्तौ करुणोर्मिच्छटामपि॥
मधुरा: सन्ति यावन्तो भावा: सर्वत्र चेतस:।
तेभ्योऽपि प्रेम मधुरं प्रसादीकुरुतं निजम्॥
नाथितं परमेवेदमनाथजनवत्सलौ।
स्वं साक्षाद्दास्यमेवास्मिन् प्रसादीकुरुतं जने॥
अंजलिं मूर्ध्नि विन्यस्य दीनोऽयं भिक्षते जन:।
अस्य सिद्धिरभीष्टस्य सकृदप्युपपाद्यताम्॥
(स्तवपुष्पांजलि)
सन् १९१६ ई० में सबसे पहले मैंने देवर्षि नारदके सूत्रोंकी एक बँगलामें छपी हुई पुस्तक देखी थी। उस समय मैं एकान्तवासमें था। भगवान्की कृपासे परमार्थ-साधनकी ओर कुछ मन लगता था, उसमें देवर्षिके सूत्रोंसे बड़ी सहायता मिली। वहीं सूत्रोंपर विचार करते-करते उनका भावार्थ लिखनेकी इच्छा हुई और कुछ समय बाद भावार्थ लिखा भी गया। छपानेकी न उस समय इच्छा थी और न सुविधा ही। लगभग सन् १९२० ई० में मैं बम्बईमें था, वहाँ एक दिन श्रीवेंकटेश्वर प्रेसके स्वामी स्व० सेठ खेमराजजीसे बातों-ही-बातोंमें सूत्रोंकी चर्चा चल गयी। उन्होंने बड़े आग्रहसे पाण्डुलिपि मुझसे ले ली और छापनेके लिये उसे प्रेसमें भी दे दिया; परन्तु असावधानतावश वहाँ पड़ी रह गयी। मुझे कोई विशेष आग्रह था नहीं, इससे मैंने कोई ताकीद नहीं की। सेठजीका स्वर्गवास हो गया। उसके अनन्तर कई वर्षों बाद मैं वहाँसे उस प्रतिको वापस माँग लाया। छपवानेका मन नहीं था। संकोच था कि भक्तिशास्त्रपर मैं टीका लिखनेवाला कौन? परन्तु ज्यों-ज्यों प्रसिद्धि बढ़ने लगी, वह सात्त्विक संकोच हटने लगा और अन्तमें छपानेकी बात स्थिर हो गयी। मैंने फिरसे उसे पढ़ा; उसमें कई जगह परिवर्तन-परिवर्द्धनकी आवश्यकता जान पड़ी, इससे छपानेका काम रुक गया। इस बार भगवत्-प्रेरणासे पुन: उसकी देख-भाल हुई और कुछ सुधार-बिगाड़ करनेके बाद कल्याणमें क्रमश: सब सूत्र छप गये। उसका कुछ परिवर्तित और परिवर्द्धित रूप इस पुस्तकमें है।
जिस समय सन् १९१६ में इसका भावार्थ लिखा गया था, उस समय हिन्दीमें शायद एक-दो टीकाएँ इसपर हुई होंगी। अब तो कई टीकाएँ हो चुकी हैं। इतना होनेपर भी इस टीकाको छपानेमें दो ही कारण हो सकते हैं—पहला तो मान-बड़ाईकी छिपी हुई कामना और दूसरा भक्तिशास्त्रकी आलोचनासे अपने कल्याणकी आशा। वस्तुत: भक्तिकी जितनी चर्चा हो उतना ही मंगल है। क्योंकि भगवत्प्रेमकी प्राप्तिके लिये भक्ति ही सर्वप्रधान साधन है और साध्यरूपमें वही भगवत्प्रेम है। आशा है कि भक्त और विद्वान् पाठकगण इस प्रकार विचारकर मेरे इस कार्यको नितान्त निन्दनीय नहीं समझेंगे और मेरी धृष्टतापर क्षमा करेंगे, साथ ही मेरी भूलोंके लिये क्षमा करेंगे। प्रेममें भाषाकी अपेक्षा भावका ही विशेष मूल्य हुआ करता है। यद्यपि भक्तिशास्त्रपर कुछ भी व्याख्यारूपसे लिखनेका मुझे अधिकार नहीं, तथापि आशा है कि इस कार्यमें मेरी जो प्रवृत्ति हुई, उसको विज्ञ महानुभाव भगवत्-प्रेरणा और भगवत्कृपा समझकर मुझपर प्रसन्न होंगे। क्योंकि भगवत्कृपा बिना मनुष्यकी उत्तम कार्यमें प्रवृत्ति नहीं होती। भक्तिशास्त्रकी आलोचना उत्तम-से-उत्तम कार्य है ही। कारण, इसमें भगवान्के दिव्य गुण, भगवान्के अलौकिक प्रेम, भगवान्की भक्ति, भगवत्प्रेम-प्राप्तिके साधन और अन्तत: भगवान्के पवित्र नामोंकी तो चर्चा हुई है। इससे अवश्य ही मेरे नीरस और भक्तिशून्य हृदयमें कुछ रसका और भक्तिका संचार हुआ होगा। एक महात्मा भक्तके इन वचनोंपर हमें दृढ़ विश्वास करना चाहिये कि भगवान्के पवित्र नाम-गुणोंके स्मरण और कीर्तनसे मनुष्यका कलुषित हृदय भी क्रमश: पवित्र होकर शिशुकी भाँति सरल हो जाता है। भगवान्के गुण और नामोंका कीर्तन हृदयकी सारी कालिमाओंको नि:शेषरूपसे धो डालता है और प्रेमावेशके कारण शुद्ध और शान्तिमय दिव्य भावोंकी उत्पत्ति होकर उसके जन्म और जीवनको सफल कर देती है।
महापातकयुक्तोऽपि ध्यायन्निमिषमच्युतम्।
पुनस्तपस्वी भवति पङ्क्तिपावनपावन:॥
‘महापातकी व्यक्ति भी यदि निमेषमात्र श्रीभगवान्का ध्यान करे तो वह पुन: पवित्र होकर पवित्र करनेवालोंको भी पवित्र कर सकता है।’
फिर इस ग्रन्थमें व्याख्यारूपसे जो कुछ लिखा गया है सो सभी सन्तोंकी जूठन-प्रसादी है। मेरा वस्तुत: इसमें कुछ है भी नहीं। इसलिये पाठकोंको मेरी ओर न देखकर सूत्रकार, सूत्र और सूत्रकी व्याख्यारूपमें लिखे हुए शास्त्रों और सन्तोंके भावोंपर ध्यान देना चाहिये।
षड्दर्शनोंकी भाँति भक्तिसूत्र भी एक दर्शन माना गया है। इसे भक्तगण सप्तम दर्शन कहते हैं। ज्ञान-विज्ञानसम्पन्न पुरुष ही वास्तवमें भगवत्प्रेमके प्रकृत अधिकारी होते हैं। देवर्षिने चौरासी सूत्रोंमें ही भक्तितत्त्वकी व्याख्या, भक्तिके अन्तराय, भक्तिके साधन, भक्तिकी महिमा और भक्तोंका महत्त्व भलीभाँति प्रकट कर दिया है। अवश्य ही इसमें भगवान्के सगुण साकार दिव्य स्वरूपकी भक्तिका वर्णन है, परन्तु यह नहीं समझना चाहिये कि ज्ञानसे इस भक्तिका कोई विरोध है। वरं स्वयं देवर्षिने व्रजगोपियोंका उदाहरण देकर उनके मनमें श्रीभगवान्के माहात्म्यका ज्ञान होना सिद्ध किया है। श्रीभगवान्का ज्ञान ही न हो तो प्रेम किसमें हो। और यह तत्त्व सत्य ही है कि अभिन्न अखण्ड अनन्य अविकारी प्रेम होनेपर ही हृदयके असली तत्त्वका—प्रियतमके मनकी बातका पता लगता है। अतएव ज्ञान और भक्तिका इसमें कोई विरोध नहीं समझना चाहिये। इसी प्रकार कर्मका भी विरोध नहीं है। भगवान्के लिये निष्काम कर्म करनेकी तो आज्ञा ही दी है। और कर्मोंका सर्वथा त्यागी भक्त भी अहर्निश भगवान्के प्रेममें मस्त होकर भगवच्चिन्तनरूपी कर्म तो छोड़ ही नहीं सकता। इसलिये देवर्षिकथित भक्तिमें ज्ञान और कर्म दोनों ही हैं, अवश्य ही वे होने चाहिये भक्तिके अनुकूल। शुष्क ज्ञान और कर्मको इसमें स्थान नहीं है। इसमें ऊपर-नीचे, बाहर-भीतर सर्वत्र रस-ही-रस है। भगवान् रसमय हैं ही और उसी रसमें परम आनन्द है।
श्रुति भी यही कहती है—
‘रसो वै स:। रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।’
भक्तिसे ही उस रसमय भगवान्के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। भक्तिसे ही वह ऋषि-मुनि-देवदुर्लभ परमानन्द मिलता है। अतएव भक्तिका ही आश्रय सबको लेना चाहिये। श्रीमद्भागवतमें कहा गया है—
सूर्यभगवान् रोज-रोज उदय और अस्त होते हैं, इसमें मनुष्योंकी आयु वृथा ही नष्ट होती है। बस, उतना ही समय सफल होता है जिसमें हरिचर्चा की जाती है। संसारमें जीते रहना और खाना-पीना कोई महत्त्वकी बात नहीं है। जैसे मनुष्य जीते हैं, वैसे ही क्या जड वृक्ष नहीं जीवित रहते? लोहारकी धौंकनी क्या मनुष्योंके समान ही साँस नहीं लेती? गाँवोंके पशु, कुत्ते, सूअर आदि क्या भोजन नहीं करते और मलमूत्रका त्याग नहीं करते? कुत्ते जिस प्रकार दर-दर भटकते हुए लाठियाँ खाते हैं, गाँवोंके सूअर जैसे असार वस्तु ग्रहण करते हैं, ऊँट जैसे काँटे खाता है और गदहा जैसे केवल बोझ ढोता है, ठीक वैसे ही भगवान्की भक्तिसे हीन मनुष्य कुत्तेके समान सब ओरसे तिरस्कार पाता है, सूअरके समान असार विषयोंको ग्रहण करता है, ऊँटके समान दु:खभरे विषयरूपी काँटोंको खा-खाकर सदा दु:खी रहता है और गदहेके समान संसारके भारको ढोता और रोता रहता है। मनुष्यके वे कान साँपके बिलके समान हैं, जिनमें भगवान् श्रीकृष्णकी लीला नहीं जाकर विषयवार्तारूपी साँप जाते हैं। वह जीभ मेंढककी जीभके समान है जो भगवान्के नाम-गुण नहीं गाती। वह सिर सुन्दर बालों और साजोंसे सजा हुआ होनेपर भी भाररूप है जो श्रीहरिके सामने नहीं झुकता। वे हाथ मुर्देके हाथोंके समान हैं जो सोनेके गहनोंसे सजे होनेपर भी कभी श्रीहरिकी सेवा नहीं करते। मनुष्यकी वे आँखें मोरकी पाँखोंमें दीखनेवाली आँखोंके समान वृथा हैं जो भगवान्की पवित्र मूर्तियोंका दर्शन नहीं करतीं। वे पैर पेड़ोंके समान व्यर्थ हैं जो भगवान्के पवित्र स्थानों (मन्दिरों और तीर्थों)-में नहीं जाते। वह मनुष्य जीता ही मरेके समान है जो श्रीभगवान्की चरणधूलिको सिरपर नहीं धारण करता या भगवान्के चरणोंपर चढ़ी हुई तुलसीकी गन्धको नहीं सूँघता। और वह हृदय तो वज्रका ही है जो श्रीहरिनामोंको सुनकर उमड़ नहीं आता, गद्गद नहीं होता, जिससे रोमांच नहीं होता और नेत्रोंमें आनन्दके आँसू नहीं भर आते।’
अन्तमें मैं अत्यन्त विनम्रभावसे भगवान्के प्रेमी समस्त भक्तोंके चरणकमलोंमें यही प्रार्थना करता हूँ कि आपलोग सब मिलकर मुझको कृपापूर्वक ऐसा आशीर्वाद दें, जिससे मेरा मन-मधुकर सदा श्रीभगवान्के चरणकमलोंमें ही विहरण करनेवाला बन जाय। क्योंकि मनुष्यको तभीतक भय, शोक, स्पृहा, परिभव या लोभ रहता है जबतक कि वह भगवान्के चरणोंका आश्रय नहीं ले लेता—
तावद्भयं द्रविणगेहसुहृन्निमित्तं
शोक: स्पृहा परिभवो विपुलश्च लोभ:।
तावन्ममेत्यसदवग्रह आर्तिमूलं
यावन्न तेऽङ्घ्रिमभयं प्रवृणीत लोक:॥
(श्रीमद्भागवत ३। ९। ६)
भक्तोंके चरणरजका दासानुदास
हनुमानप्रसाद पोद्दार