प्रेमरूपा भक्ति फलरूपा है

सा तु कर्मज्ञानयोगेभ्योऽप्यधिकतरा॥ २५॥

२५-वह (प्रेमरूपा भक्ति) तो कर्म, ज्ञान और योगसे भी श्रेष्ठतर है।

कर्म, ज्ञान और योग तीनों ही भगवत्प्राप्तिके साधन हैं, परन्तु भक्ति इन तीनोंमें सबसे श्रेष्ठ है। उनमें वर्ण, आश्रम, अधिकार आदिका विचार है; साथ ही गिरनेका भय भी है, परन्तु सच्ची भक्तिमें भगवान‍्की पूरी सहायता रहनेके कारण कोई भी भय नहीं है तथा इसमें स्त्री, पुरुष, ब्राह्मण, शूद्र आदि सभीका अधिकार है। गोसाईं तुलसीदासजी महाराज कहते हैं—

जे असि भगति जानि परिहरहीं।

केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं॥

ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी।

खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥

सुनु खगेस हरि भगति बिहाई।

जे सुख चाहहिं आन उपाई॥

ते सठ महासिंधु बिनु तरनी।

पैरि पार चाहहिं जड़ करनी॥

उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम।

राम कृपा नहिं करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम॥

पन्नगारि सुनु प्रेम सम भजन न दूसर आन।

यह बिचारि मुनि पुनि पुनि करत राम गुन गान॥

स्वयं श्रीभगवान् कहते हैं—

न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव।

न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता॥

भक्त्याहमेकया ग्राह्य: श्रद्धयात्मा प्रिय: सताम्।

भक्ति: पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात्॥

(श्रीमद्भा०११।१४।२०-२१)

‘जिस प्रकार मेरी दृढ़भक्ति मुझे वश करती है, उस प्रकार मुझको योग, ज्ञान, धर्म, स्वाध्याय, तप और त्याग वशमें नहीं कर सकते। सन्तोंका प्रिय आत्मारूप मैं केवल श्रद्धायुक्त भक्तिके द्वारा वशमें हो सकता हूँ, मेरी भक्ति चाण्डाल आदिको भी पवित्रहृदय बनानेमें समर्थ है।’

इसी प्रकार श्रीभगवान‍्ने गीतामें भी कहा है—

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।

शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।

ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप॥

(११।५३-५४)

‘हे अर्जुन! जैसा तुमने मुझको देखा है, ऐसा वेद, तप, दान, यज्ञ आदिसे मैं नहीं देखनेमें आता। हे परंतप अर्जुन! अनन्यभक्तिके द्वारा ही इस प्रकार मेरा देखा जाना, मुझे तत्त्वसे जानना और मुझमें प्रवेश पाना सम्भव है।’

फलरूपत्वात्॥२६॥

२६-क्योंकि (वह भक्ति) फलरूपा है।

वस्तुत: यह भक्ति फलरूपा है, साधन नहीं है। जो भक्ति ज्ञानका साधन मानी जाती है, वह गौणी भक्ति साधारण उपासना है, प्रेमरूपा भक्ति नहीं है। प्रेमरूपा भक्ति तो समस्त साधनोंका फल है।

तीर्थाटन साधन समुदाई।

जोग बिराग ग्यान निपुनाई॥

नाना कर्म धर्म ब्रत दाना।

संजम दम जप तप मख नाना॥

भूत दया द्विज गुर सेवकाई।

बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई॥

जहँ लगि साधन बेद बखानी।

सब कर फल हरि भगति भवानी॥

ईश्वरस्याप्यभिमानद्वेषित्वाद् दैन्यप्रियत्वाच्च॥२७॥

२७-ईश्वरको भी अभिमानसे द्वेषभाव है और दैन्यसे प्रियभाव है।

कर्म, ज्ञान और योगके साधकोंको अपने बलका और साधनका अभिमान हो सकता है। भगवान‍्का तो नाम ही दर्पहारी है। यद्यपि वस्तुत: भगवान‍्का न किसीमें द्वेष है, न राग है। उनके लिये सभी समान हैं। वे सभीका उद्धार करते हैं। हाँ, उद्धारके साधन भिन्न-भिन्न हैं। अभिमानीका उद्धार उसे दण्ड देकर करते हैं और दीन सेवकका उसे प्रेमसे गले लगाकर। इसीसे भगवान‍्के क्रोधको भी वरके तुल्य बतलाया गया है। अभिमानीके प्रति भगवान् द्वेषीकी-सी लीला करते हैं और दीनके साथ प्रेमीकी-सी। इसीसे दीनबन्धु, अशरण-शरण और ‘कंगालके धन’ आदि उनके नाम हैं। यथार्थमें तो अभिमानीके प्रति भी उनके हृदयमें प्रेम ही होता है, इसीलिये तो वे उसका अभिमान नष्ट करते हैं।

सुनहु राम कर सहज सुभाऊ।

जन अभिमान न राखहिं काऊ॥

संसृत मूल सूलप्रद नाना।

सकल सोक दायक अभिमाना॥

ताते करहिं कृपानिधि दूरी।

सेवक पर ममता अति भूरी॥

इतना होनेपर भी दण्डमें द्वेष दीखता ही है, परन्तु दीन अमानी गरीबको तो आप हृदयसे लगा लेते हैं। उसका छोटे-से-छोटा काम करनेमें भी नहीं सकुचाते। भक्तजन तो स्वाभाविक ही अपनेको किंकर समझते हैं, वे कहते हैं—

सर्वसाधनहीनस्य पराधीनस्य सर्वथा।

पापपीनस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम॥

‘हे प्रभो! मुझ समस्त साधनोंसे हीन, मायाके सर्वथा पराधीन हुए, पापोंसे लदे हुए दीनकी तो केवल तुम ही गति हो।’

जाउँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे।

काको नाम पतितपावन जग,

केहि अति दीन पियारे॥

यह दीनता उस अभावकी स्थितिका नाम नहीं है, जिसमें मनुष्य धन, मान, वैभव आदिके अभावसे ग्रस्त होकर उनकी प्राप्तिके लिये व्याकुल रहा करता है। यह दीनता तो उस निरभिमानता और अहंकारशून्यताका नाम है, जो बड़े-से-बड़े वैभवशाली सम्राट्को भी भगवत्कृपासे प्राप्त हो सकती है। इस दीनताका अर्थ है अभिमान और कर्तृत्व-अहंकारका नाश हो जाना। यह समझना कि मैं और मेरा कुछ भी नहीं है, जो कुछ है सो सब भगवान् है और सब भगवान‍्का है, सब कुछ उन्हींकी शक्ति और प्रेरणासे होता है, करने-करानेवाले वे ही हैं।

परन्तु भगवान‍्की प्यारी यह सच्ची दीनता सहज ही नहीं प्राप्त होती। अभिमानका सारा भूत उतरे बिना दीनता नहीं आती। वर्ण, जाति, धन, मान, विद्या, साधन, स्वास्थ्य आदिका अभिमान और कर्तापनका अहंकार मनुष्यमें ऐसी दीनता उत्पन्न नहीं होने देता; ऊपरसे मनुष्य दम्भपूर्वक दीन बनता है, भगवान‍्के सामने अपनेको दीन कहता है, रोनेका स्वाँग भरता है; परन्तु उसकी दीनताकी परीक्षा तो तभी होती है, जब बड़े-से-बड़े सांसारिक पदार्थों और साधनोंकी प्राप्तिमें भी स्वाभाविक दीनता ज्यों-की-त्यों बनी रहे। जो सब लोगोंके सामने अपनेसे हीन स्थितिके दूसरे मनुष्योंद्वारा दीन और पापी कहा जाना केवल सह ही नहीं लेता, वरं उसे सत्य समझकर प्रसन्न होता है और प्रभु-प्राप्तिके लिये सदैव जिसका चित्त खिन्न रहा करता है, ऐसे ही खिन्न—दीन भगवान‍्को प्यारे होते हैं। सच्ची भक्तिमें अपने पुरुषार्थ या साधनका अभिमान आ ही नहीं सकता, इसीलिये भक्ति श्रेष्ठ है।

तस्या ज्ञानमेव साधनमित्येके॥२८॥

२८-उसका (भक्तिका) साधन ज्ञान ही है, किन्हीं (आचार्यों)-का यह मत है।

यद्यपि भक्तिमें इस ज्ञानकी तो परम आवश्यकता है कि मैं जिसकी भक्ति करता हूँ वे ही सबके स्वामी, सबके आधार, सबके महेश्वर, जगत‍्के उत्पन्न, पालन और संहार करनेवाले, मायाके पति, अज, अविनाशी, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वात्मा, निर्गुण, निर्विकार, निराकार, सगुण, साकार भगवान् हैं, उनसे श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं। क्योंकि इतना ज्ञान भी यदि न होगा तो श्रद्धा नहीं होगी; श्रद्धा बिना प्रीति नहीं होगी और प्रीति बिना भक्ति दृढ़ नहीं होगी।

जानें बिनु न होइ परतीती।

बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥

प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई।

जिमि खगपति जल कै चिकनाई॥

परन्तु इसमें अद्वैतज्ञानके साधनकी आवश्यकता नहीं होती। केवल श्रद्धा और भावसे ही परमात्माकी भक्ति प्राप्त हो जाती है। गृध्रराज, गजेन्द्र, ध्रुव, शबरी आदिने केवल भगवान‍्की ऐसी ही भक्तिसे भगवान‍्को प्राप्त किया था।

अन्योन्याश्रयत्वमित्यन्ये॥ २९॥

२९-दूसरे (आचार्यों)-का मत है कि भक्ति और ज्ञान परस्पर एक-दूसरेके आश्रित हैं।

ऐसा भी होता है। गौणी भक्तिसे भगवान‍्के तत्त्वका ज्ञान होता है और तत्त्वके जाननेसे भगवान‍्में अत्यन्त प्रेम उत्पन्न होता है। परन्तु केवल भक्तिके प्रेमीजन इस मतकी परवा नहीं करते। क्योंकि वे इस बातको जानते हैं कि जब निर्मल प्रेमस्वरूपा भक्तिका पूर्ण उदय होता है तब किसीका ज्ञान अलग रह ही नहीं जाता। प्रेमी और प्रेमास्पद दोनों एक हो जाते हैं। फिर किसका ज्ञान किसको होगा?

स्वयं फलरूपतेति ब्रह्मकुमारा:*॥३०॥

३०-ब्रह्मकुमारोंके (सनत्कुमारादि और नारदके) मतसे भक्ति स्वयं फलरूपा है।

अतएव यह भक्ति ही साधन है और भक्ति ही साध्य है। मूल भी वही और फल भी वही। भक्तगण भक्तिके लिये ही भक्ति करते हैं। क्योंकि भक्ति स्वयं फलरूपा है। वह न किसी साधनसे मिलती है और न कोई उससे श्रेष्ठ वस्तु है जिसकी प्राप्तिका वह साधन हो।

सो सुतंत्र अवलंब न आना।

तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥

राजगृहभोजनादिषु तथैव दृष्टत्वात्॥ ३१॥

३१-राजगृह और भोजनादिमें ऐसा ही देखा जाता है।

यह पूर्वकथित भक्तिकी फलरूपताको समझनेके लिये उदाहरण है।

न तेन राजपरितोष: क्षुधाशान्तिर्वा॥३२॥

३२-न उससे (जान लेनेमात्रसे) राजाकी प्रसन्नता होगी, न क्षुधा मिटेगी।

केवल राजमहलका वर्णन सुनने और जान लेनेसे काम नहीं चलता। राजा धर्मात्मा है, शक्तिशाली है, प्रजाहितैषी है, रूपगुणसम्पन्न है, यह बात भी जान ली; परन्तु इससे क्या हुआ, इस जाननेमात्रसे राजा प्रसन्न थोड़े ही हो गया। इसी प्रकार जान लिया कि हलवा मीठा होता है, घी और शक्‍करसे बनता है, बड़ा स्वादिष्ट है; परन्तु इससे भूख तो नहीं मिटती। इसी तरह केवल शब्दज्ञानसे न तो भगवान‍्की प्रसन्नता होती है और न हमें शान्ति ही मिलती है। यद्यपि भगवान‍्के लिये सभी समान हैं तथापि उनकी प्रसन्नता तो भक्तिसे ही मिलती है। वे स्वयं कहते हैं—

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।

ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥

(गीता९।२९)

‘मैं सब भूतोंमें सम हूँ, न कोई मेरा द्वेष्य है और न प्रिय है; परन्तु जो मुझको भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ।’

तस्मात्सैव ग्राह्या मुमुक्षुभि:॥३३॥

३३-अतएव (संसारके बन्धनसे) मुक्त होनेकी इच्छा रखनेवालोंको भक्ति ही ग्रहण करनी चाहिये।

भक्तिसे भवबन्धन तो अनायास कट ही जाता है, साक्षात् भगवान् उसके प्रेमास्पद बनकर उसके साथ दिव्य लीला करते हैं।

अति दुर्लभ कैवल्य परम पद।

संत पुरान निगम आगम बद॥

राम भजत सोइ मुकुति गोसाईं।

अनइच्छित आवइ बरिआईं॥

अन्यान्य बड़े-बड़े साधनोंसे भी सहजमें न मिलनेवाली अति दुर्लभ मुक्ति बिना ही माँगे बलात् आती है, परन्तु वह भक्त तो—

मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥

मुक्तिकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखता। ऐसी सुलभ और सर्वोपरि स्थितिरूप भक्तिको छोड़कर दूसरे साधनको कोई क्यों करे? श्रद्धालु और बुद्धिमान् पुरुषोंको केवल भक्ति ही करनी चाहिये।