प्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा
तस्या: साधनानि गायन्त्याचार्या:॥३४॥
३४-आचार्यगण उस भक्तिके साधन बतलाते हैं।
कर्म और ज्ञानकी अपेक्षा भक्तिकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करके अब देवर्षि नारद भक्तिशास्त्रके प्रधान प्रवर्तक और भक्ति-तत्त्वके अनुभवी आचार्यों एवं सन्त-भक्तोंद्वारा गान किये हुए उस श्रेष्ठतम भक्तिके साधनोंका वर्णन करते हैं।
तत्तु विषयत्यागात् संगत्यागाच्च॥३५॥
३५-वह (भक्ति-साधन) विषयत्याग और संगत्यागसे सम्पन्न होता है।
जीवके मनमें स्वाभाविक ही प्रेमका स्रोत है, क्योंकि जीव परमानन्दस्वरूप परमप्रेमरूप भगवान्का ही सनातन चिदंश है। परन्तु विषयोंके प्रति प्रवाहित होनेसे उसके प्रेमकी धारा दूषित हो गयी है और इसीसे वह प्रेम दु:ख उत्पन्न करनेवाले कामके रूपमें परिणत हो रहा है और इसी कारण उसके परमात्ममुखी दिव्य स्वरूपका प्रकाश नहीं होता। प्रेमके दिव्य स्वरूपके प्रकाशके लिये उसकी विषयाभिमुखी गतिको पलटकर ईश्वराभिमुखी करनेकी आवश्यकता है। इसके लिये दो उपाय हैं—१-विषयोंका स्वरूपसे त्याग और २-विषयोंकी आसक्तिका त्याग। जो लोग यह मानते हैं कि विषयोंमें आसक्त रहते और यथेच्छ अमर्यादित विषयोंका संग्रह एवं उपभोग करते हुए ही भगवान्की भक्ति प्राप्त हो जायगी अथवा भगवद्भक्तिके मार्गमें विषय और विषयासक्तिके त्यागकी कोई आवश्यकता ही नहीं है, वे बहुत बड़ी भूलमें हैं। भक्तिमें तो अपने भोगके लिये कोई वस्तु रह ही नहीं जाती; जब भोक्ता ही कोई नहीं रहता, तब भोग्य वस्तु कहाँसे रहे? वहाँ तो एकमात्र प्राणाधार भगवान् ही सर्वभोक्ता हैं और हम अपने समस्त अंगों एवं समस्त सामग्रियोंसहित भगवान्के भोग्य हैं। एकमात्र वे ही पुरुष हैं और सब उनकी भोग्या प्रकृति हैं। ऐसी अवस्थामें भक्तका अपना कोई भोग्य विषय रह ही नहीं जाता। इसको यदि ऊँची स्थिति कहकर कोई इससे बचना चाहे तो उसे भी साधनकालमें विषयोंका और विषयासक्तिका यथासाध्य उत्तरोत्तर त्याग करना ही पड़ता है। शरीर विषयभोगमें लगा होगा और मन विषयोंमें आसक्त रहेगा, तो फिर प्रियतम भगवान्की सेवा किस तन-मनसे होगी? अतएव विषय-त्यागकी बड़ी भारी आवश्यकता है। बाह्य भोग तो क्या, मनसे भी विषयोंका चिन्तन छोड़ना पड़ेगा; क्योंकि यह नियम है कि मन जिस वस्तुका चिन्तन करेगा, उसीमें उसकी आसक्ति होगी। भगवान्ने श्रीमद्भागवतमें कहा है—
विषयान् ध्यायतश्चित्तं विषयेषु विषज्जते।
मामनुस्मरतश्चित्तं मय्येव प्रविलीयते॥
अर्थात् ‘विषयोंका चिन्तन करनेसे मन विषयोंमें आसक्त होता है और मेरा बार-बार स्मरण करनेसे वह मुझमें लीन हो जाता है।’
मनको जहाँ लगाओ वहीं लग जाता है और वह लगाना होता है इन्द्रियोंके द्वारा ही; हम बार-बार जिस प्रकारके दृश्योंको देखेंगे, जैसी बात सुनेंगे, जैसी चीज खायँगे, जो कुछ सूँघेंगे, जैसी वस्तुका स्पर्श करेंगे, उन्हींका मनमें बार-बार चिन्तन होगा और जिस वस्तुका अधिक चिन्तन होगा, उसीमें आसक्ति होगी। नाटक देखेंगे, वेश्याका गाना सुनेंगे, उनमें आसक्ति होगी; भक्त-लीला देखेंगे, कीर्तन सुनेंगे तो उनमें आसक्ति होगी। अतएव भक्तिकी अभिलाषा रखनेवालोंको भगवान्के प्रतिकूल तमाम विषयोंका त्याग करना चाहिये। वास्तवमें इस सूत्रमें विषयत्यागमें उन्हीं विषयोंका त्याग समझना चाहिये जो हमारे मनको भगवान्से हटाकर भोगोंमें—जगत्-प्रपंचमें लगा देते हैं। ध्यान, चिन्तन, कीर्तन, भगवत्सेवा, साधुसत्कार, सत्संग आदि जो भगवदनुकूल विषय हैं, उनमें तो तन-मनको चाह करके लगाना चाहिये और जिन विषयोंके संग्रह और सेवनकी शरीरयात्रा या कुटुम्बपोषणके लिये नितान्त आवश्यकता हो, उनका भी यथासम्भव बहुत ही थोड़े परिमाणमें संग्रह और सेवन करना चाहिये और वह भी शास्त्रानुकूल तथा ईश्वरकी आज्ञा समझकर अन्य किसी भी फल-कामनाको मनमें स्थान न देते हुए केवल ईश्वर-प्रीत्यर्थ ही। इस प्रकारसे किया हुआ विषय-सेवन भी विषयत्यागके ही तुल्य समझा जाता है। केवल बाहरसे किसी विषयका त्याग कर दिया जाय और मनमें उसका स्मरण बना रहे, तो वह यथार्थ त्याग नहीं है; इसीलिये सूत्रमें विषयत्यागके साथ-ही-साथ आसक्तित्यागकी भी आवश्यकता बतलायी गयी है। महाभारतमें कहा है—
त्याग: स्नेहस्य यत्त्यागो विषयाणां तथैव च।
(शान्तिपर्व१९२।१७)
‘विषयासक्ति और विषय दोनोंके त्यागका नाम ही त्याग है।’ इसीसे विषयानुरागका त्याग होगा और विषयानुरागसे रहित हृदय ही भगवत्प्रेमका दिव्य धाम बन सकता है। भगवत्प्रेमकी प्राप्ति होनेपर तो विषयका त्याग स्वाभाविक ही रहता है। श्रीरामचरितमानसमें कहा है—
रमा बिलासु राम अनुरागी।
तजत बमन जिमि जन बड़ भागी॥
अमृतके स्वादको चख लेने और उसके गुणसे लाभ उठा लेनेपर फिर विषकी ओर किसीकी नजर ही क्यों जाने लगी! परन्तु उस अमृतकी प्राप्तिके लिये भी—उसकी ओर गति होनेके लिये भी विषयविषके त्यागकी आवश्यकता है। विषयासक्तिका त्याग करके भगवान्में आसक्त होनेमें ही परम सुख है। भगवान् कहते हैं—
मय्यर्पितात्मन: सभ्य निरपेक्षस्य सर्वत:।
मयाऽऽत्मना सुखं यत्तत्कुत: स्याद्विषयात्मनाम्॥
(श्रीमद्भा०११।१४।१२)
‘मुझमें चित्त लगानेवाले और समस्त विषयोंकी अपेक्षा छोड़नेवाले भक्तको आत्मस्वरूप मुझसे जो परम सुख मिलता है, वह सुख विषयासक्तचित्त लोगोंको कहाँसे मिल सकता है?’
अव्यावृतभजनात्॥३६॥
३६-अखण्ड भजनसे (भक्तिका साधन सम्पन्न होता है)।
भजन भक्तिका प्रधान अंग है, यह साध्य और साधन दोनों है। जो भगवत्प्रेमको प्राप्त कर चुके हैं, उनके लिये अखण्ड भजन स्वाभाविक हो जाता है और जिनको भगवत्प्रेमकी प्राप्ति करनी है उनको अखण्ड भजनका अभ्यास करना चाहिये। जो मनुष्य भजन बिना मुक्ति और भगवत्प्रेमकी प्राप्ति चाहता है वह भूलता है। गोसाईं श्रीतुलसीदासजी महाराज कहते हैं—
बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥
‘जलके मन्थनसे चाहे घी निकल आवे, बालूसे चाहे तेल निकले; परन्तु भगवान्के भजन बिना भवसागरसे मनुष्य नहीं तर सकता, यह सिद्धान्त अकाट्य है।’ अतएव भजन तो अनिवार्य साधन है। फिर भक्तिके साधकके लिये तो यही एक खास वस्तु है। विषयसे मन हटाकर यदि भगवान्में न लगाया जाय तो वह वापस दौड़कर वहीं चला जायगा। विषयत्याग वैराग्य है और भगवत्-भजन अभ्यास। इन्हीं अभ्यास-वैराग्यसे विशुद्ध भगवत्प्रेमकी प्राप्ति होती है। परन्तु जो भजन अभी होता है, घड़ीभर बाद नहीं होता; आज किया, कल नहीं—वह प्रेम और आदरयुक्त अखण्ड भजन नहीं है। भजनरूपी अभ्यास तो वही सिद्ध होता है जो सदा होता रहे। सतत होता रहे और सत्कारपूर्वक हो। योगदर्शनमें महर्षि पतंजलि कहते हैं—
स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमि:।
(१।१४)
‘दीर्घकालपर्यन्त निरन्तर सत्कारके साथ करनेपर ही अभ्यास दृढ़ होता है।’ इस नित्य-निरन्तरके अखण्ड स्मरणसे भगवान्की प्राप्ति सहज ही हो जाती है। स्वयं भगवान्ने भी गीतामें कहा है—
अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥
(८।१४)
‘हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्यचित्त होकर नित्य-निरन्तर मुझको स्मरण करता है, उस निरन्तर मुझमें लगे हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ।’
अतएव अखण्डरूपसे भगवान्का प्रेमपूर्वक चिन्तन करते हुए ही स्नान, भोजन, व्यापार आदि सब काम करने चाहिये। भगवत्-स्मरणयुक्त होनेसे प्रत्येक कार्य ही भजन हो जायगा। इस प्रकार भजनका ताँता क्षणभर भी नहीं टूटना चाहिये। स्वरूपका चिन्तन न हो सके तो निरन्तर भगवान्का नामस्मरण ही करना चाहिये। भगवान्के नामस्मरणसे मन और प्राण पवित्र हो जायँगे और भगवान्के पावन पदकमलोंमें अनन्य प्रेम उत्पन्न हो जायगा। नाम-जपकी सहज विधि यह है कि अपने श्वास-प्रश्वासके आने-जानेकी ओर ध्यान रखकर श्वास-प्रश्वासके साथ-ही-साथ मनसे और साथ ही धीमे स्वरसे वाणीसे भी भगवान्का नाम-जप करता रहे। यह साधन उठते-बैठते, चलते-फिरते, सोते, खड़े रहते, सब समय किया जा सकता है। अभ्यास दृढ़ हो जानेपर चित्त विक्षेपशून्य होकर निरन्तर भगवान्के चिन्तनमें अपने-आप ही लग जायगा। प्राय: सभी प्रसिद्ध भक्तों और सन्तोंने इस साधनका प्रयोग किया था। महात्मा चरणदासजी कहते हैं—
स्वासा माहीं जपे तें दुबिधा रहे न कोय।
इसी प्रकार कबीरजी कहते हैं—
साँस साँस सुमिरन करौ, यह उपाय अति नीक।
मतलब यह कि भगवान्के स्वरूप, प्रभाव, रहस्य, गुण, लीला अथवा नामका चिन्तन निरन्तर तैलधाराकी भाँति होते रहना चाहिये। यही अखण्ड भजन है।
लोकेऽपि भगवद्गुणश्रवणकीर्त्तनात्॥३७॥
३७-लोकसमाजमें भी भगवत्-गुण-श्रवण और कीर्तनसे (भक्ति-साधन सम्पन्न होता है)।
मनसे तो नित्य भगवान्का चिन्तन करना ही चाहिये, परन्तु कान और वाणीसे भी सदा-सर्वदा लोगोंके बीचमें भी भगवान्का गुण ही सुनना और कहना चाहिये। मनसे भगवत्-चिन्तनकी चेष्टा तभी सफल होती है, जब हमारी इन्द्रियाँ भी भगवत्सम्बन्धी कार्योंमें ही लगी रहें। सभी कार्योंका प्राय: आधार होता है सुनना और बोलना। यदि कानोंमें सदा विषयोंकी चर्चा आती रहेगी और वाणीसे सदा विषयोंकी बातें की जायँगी तो मनसे भगवान्का चिन्तन होना असम्भव-सा ही समझना चाहिये। परन्तु यदि कान और जबान भगवान्में लगे रहेंगे—उन्हें दूसरे कार्यके लिये फुरसत ही नहीं मिलेगी, तो अन्यान्य इन्द्रियाँ और मन भी स्वत: ही भगवत्परायण हो जायँगे। अतएव कान और जीभको भगवान्के नाम-गुण-लीलादिके सुनने और गानेमें ही निरन्तर लगाये रखना चाहिये। यही जीवनको सफल बनानेके साधन हैं। केवल जीवित रहने, श्वास लेने, खाने और मैथुन करने आदिमें ही जीवनकी सफलता मानी जाय तो क्या वृक्ष जीवित नहीं रहते? क्या लोहारकी धोंकनी श्वास नहीं लेती और क्या पशु भोजन या मैथुन नहीं करते। इसीलिये श्रीमद्भागवतमें कहा गया है—
श्वविड्वराहोष्ट्रखरै: संस्तुत: पुरुष: पशु:।
न यत्कर्णपथोपेतो जातु नाम गदाग्रज:॥
बिले बतोरुक्रमविक्रमान् ये
न शृण्वत: कर्णपुटे नरस्य।
जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत
न चोपगायत्युरुगायगाथा:॥
(२।३।१९-२०)
‘जिसके कर्णपथमें भगवान्के नाम-गुणोंने कभी प्रवेश नहीं किया वह मनुष्यरूपी पशु कुत्ते, विष्ठाभोजी सूअर, ऊँट और गदहेकी अपेक्षा भी अधिक निन्दनीय है। हे सूतजी! जो कान भगवान्की लीलाका श्रवण नहीं करते, वे सर्पादिके बिलके समान हैं और जो दुष्टा जिह्वा भगवान्की लीला-कथाका गान नहीं करती वह मेंढककी जीभके समान व्यर्थ बकवाद करनेवाली है।’ इसीका अनुवाद गोस्वामी तुलसीदासजीने किया है—
जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना।
श्रवन रंध्र अहि भवन समाना॥
जो नहिं करइ राम गुन गाना।
जीह सो दादुर जीह समाना॥
श्रीमद्भागवतके अन्तमें कहा गया है—
मृषा गिरस्ता ह्यसतीरसत्कथा
न कथ्यते यद् भगवानधोक्षज:।
तदेव सत्यं तदुहैव मंगलं
तदेव पुण्यं भगवद्गुणोदयम्॥
तदेव रम्यं रुचिरं नवं नवं
तदेव शश्वन्मनसो महोत्सवम्।
तदेव शोकार्णवशोषणं नृणां
यदुत्तमश्लोकयशोऽनुगीयते॥
(१२।१२।४८-४९)
‘जिस वाणीसे अधोक्षजभगवान्की कथा न कही जाकर विषयोंकी बुरी बातें कही जाती हैं, वह वाणी असत् और व्यर्थ है। जिन वचनोंमें भगवान्के गुणोंको प्रकट किया जाता है, पुण्यकीर्ति भगवान्का यश वर्णन किया जाता है, वास्तवमें वही वचन सत्य हैं, वही मंगलरूप हैं, वही पुण्य हैं, वही मनोहर हैं, वही रुचिर हैं, वही नित्य नये-नये रसमय हैं, वही सदा मनको महान् आनन्द देनेवाले हैं और वही मनुष्योंके शोकरूपी समुद्रको सुखानेवाले हैं।’
अतएव कानोंसे भगवान्के गुण और नामोंका श्रवण और वाणीसे उनका कीर्तन करना चाहिये। इसीसे भगवान्का निर्मल प्रेम उदय होता है।
श्रीमद्भागवतमें कहा गया है—
ता ये शृण्वन्ति गायन्ति ह्यनुमोदन्ति चादृता:।
मत्परा: श्रद्दधानाश्च भक्तिं विन्दन्ति ते मयि॥
(११।२६।२९)
य एतद्देवदेवस्य विष्णो: कर्माणि जन्म च।
कीर्तयेच्छ्रद्धया मर्त्य: सर्वपापै: प्रमुच्यते॥
इत्थं हरेर्भगवतो रुचिरावतार-
वीर्याणि बालचरितानि च शन्तमानि।
अन्यत्र चेह च श्रुतानि गृणन्मनुष्यो
भक्तिं परां परमहंसगतौ लभेत॥
(११।३१।२७-२८)
भक्तिं लब्धवत: साधो: किमन्यदवशिष्यते।
मय्यनन्तगुणे ब्रह्मण्यानन्दानुभवात्मनि॥
(११।२६।३०)
भगवान् कहते हैं—‘जो लोग मुझमें मन लगाकर श्रद्धा और आदरके साथ मेरी नाम-गुण-लीला-कथाको सुनते, गाते और उनका अनुमोदन करते हैं उनकी मुझमें अनन्य भक्ति हो जाती है।’
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—‘हे राजन्! जो मनुष्य देवदेव भगवान्के दिव्य जन्म-कर्मोंका श्रद्धापूर्वक कीर्तन करता है, वह समस्त पापोंसे छूट जाता है। भगवान् श्रीहरिके अति मनोहर कल्याणकारी अवतार, पराक्रम तथा बाल-लीलाओंको सुनने तथा उनका गान करनेसे मनुष्य परमहंसोंकी गतिस्वरूप भगवान्में परा भक्तिको प्राप्त होता है।’
भगवान् कहते हैं—‘इस प्रकार मुझ अनन्तगुणसम्पन्न सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें भक्ति हो जानेपर फिर उस साधु पुरुषको और कौन-सी वस्तु प्राप्त करनी बाकी रह जाती है? अर्थात् वह कृतार्थ हो जाता है।’
भगवान्के नाम-श्रवण और कीर्तनका महान् फल होता है। जहाँतक भगवान्के नामकी ध्वनि पहुँचती है, वहाँतकका वातावरण पवित्र हो जाता है। मृत्युकालके अन्तिम श्वासमें भगवान्का नाम किसी भी भावसे जिसके मुँहसे निकल जाता है उसको परमपदकी प्राप्ति हो जाती है। भगवान्के नामका जहाँ कीर्तन होता है वहाँ यमदूत नहीं जा सकते। अतएव दस नामापराधोंसे* बचते हुए भगवान्के नामका जप-कीर्तन और श्रवण अवश्य ही करना चाहिये।
श्रीमद्भागवतमें कहा है—
सांकेत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा।
वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदु:॥
अज्ञानादथवा ज्ञानादुत्तमश्लोकनाम यत्।
संकीर्तितमघं पुंसो दहेदेधो यथानल:॥
(६।२।१४,१८)
‘पुत्रादिके नामसंकेतसे, परिहासमें, स्तोभ या अवहेलनासे भी भगवान्का नाम लेनेसे समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। अज्ञान अथवा ज्ञानपूर्वक लिया हुआ पुण्यश्लोक भगवान्का नाम मनुष्यके पापको उसी प्रकार जला देता है जैसे अग्निमें किसी प्रकारसे भी डाला हुआ ईंधन भस्म हो जाता है।’
सभी सद्ग्रन्थों और संतोंकी वाणियोंमें भगवन्नामकी महिमा गायी गयी है। श्रीमद्भागवतके निम्नलिखित श्लोक मनन करनेयोग्य हैं। देवी देवहूतिजी भगवान् कपिलदेवसे कहती हैं—
अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान्
यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।
तेपुस्तपस्ते जुहुवु: सस्नुरार्या
ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥
(३।३३।७)
‘अहो, जिसकी जिह्वापर तुम्हारा पवित्र नाम रहता है वह चाण्डाल भी श्रेष्ठ है; क्योंकि जो तुम्हारे नामका कीर्तन करते हैं उन श्रेष्ठ पुरुषोंने तप, यज्ञ, तीर्थस्नान, वेदाध्ययन सब कुछ कर लिया।’
पतित: स्खलितश्चार्त: क्षुत्त्वा वा विवशोब्रुवन्।
हरये नम इत्युच्चैर्मुच्यते सर्वपातकात् ॥
संकीर्त्यमानो भगवाननन्त:
श्रुतानुभावो व्यसनं हि पुंसाम्।
प्रविश्य चित्तं विधुनोत्यशेषं
यथा तमोऽर्कोऽभ्रमिवातिवात:॥
(१२।१२।४६-४७)
‘कोई भी मनुष्य गिरते, पड़ते, छींकते और दु:खसे पीड़ित होते समय परवश होकर भी यदि ऊँचे स्वरसे ‘हरये नम:’ पुकार उठता है तो वह सब पापोंसे छूट जाता है। जैसे सूर्य पर्वतकी गुफाके अन्धकारका भी नाश कर देता है और जैसे प्रचण्ड वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न करके लुप्त कर देता है, इसी प्रकार अनन्तभगवान्का नाम-कीर्तन अथवा उनके प्रभावका श्रवण हृदयमें प्रवेश करके समस्त दु:खोंका अन्त कर देता है।’
यह तो विवश होकर नाम लेनेका फल है। प्रेमसे लेनेपर तो कहना ही क्या। इसीसे गोसाईंजी कहते हैं—
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं।
जनम अनेक रचित अघ दहहीं॥
सादर सुमिरन जे नर करहीं।
भव बारिधि गोपद इव तरहीं॥
अतएव भक्तिकी प्राप्तिके लिये नित्य-निरन्तर भगवान्के नाम-गुण-यशका कीर्तन, श्रवण और चिन्तन नि:सन्देह परम साधन है।
मुख्यतस्तु महत्कृपयैव भगवत्कृपालेशाद्वा॥३८॥
३८-परन्तु (प्रेमभक्तिकी प्राप्तिका साधन) मुख्यतया (प्रेमी) महापुरुषोंकी कृपासे अथवा भगवत्कृपाके लेशमात्रसे होता है।
विषय और विषयासक्तिका त्याग करके अखण्ड भजन और श्रवण-कीर्तनका साधन बतलाया जानेके बाद अब एक ऐसा साधन बतलाया जाता है, जिस एकके प्रतापसे ही पहले तीनों अपने-आप हो जाते हैं—वह साधन है ‘महापुरुषोंकी कृपा’। महापुरुष तो कृपालु ही होते हैं, परन्तु श्रद्धा-विश्वासपूर्वक उनका संग करना बड़ा कठिन है। महापुरुषोंका संग प्राप्त होनेपर विषय तो आप ही छूट जाते हैं। उनके संगसे श्रवण-कीर्तन भी करना ही पड़ता है और रात-दिन जो कुछ सुनने, कहने और देखनेमें आता है, उसका स्मरण अनिवार्य है ही। परन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि यहाँ जिन महापुरुषोंकी कृपामात्रसे ही फलरूपा प्रेमभक्तिकी प्राप्ति बतलायी है, वे महापुरुष केवल शास्त्रज्ञानी और सदाचारी ही नहीं होते, भगवान्के स्वरूप-तत्त्वको यथार्थरूपसे जानकर उनमें अनन्य प्रेम करनेवाले भक्त होते हैं। ऐसे प्रेमी भक्तोंके संगकी बड़ी महिमा है। इसीसे यज्ञ-धूमसे जिनके शरीर धुमैले हो गये हैं, ऐसे कर्मकाण्डी विज्ञानविद् ऋषि भगवच्चरणकमलरसामृतका पान करानेवाले प्रेममूर्ति सूतजीसे कहते हैं—
तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिष:॥
(श्रीमद्भा०१।१८।१३)
‘हे सौम्य! भगवत्संगी प्रेमियोंके निमेषमात्रके संगकी तुलना, स्वर्गादिकी तो बात ही क्या, पुनर्जन्मका नाश करनेवाली मुक्तिके साथ भी नहीं की जा सकती; फिर मर्त्यलोकके राज्यादि सम्पत्तिकी तो बात ही क्या है? इसीके आधारपर रामचरितमानसमें कहा गया है—
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥
यह उस सत्संगकी महिमा नहीं है जो अन्त:करणकी शुद्धि करके मोक्षप्राप्ति करवाता है। क्योंकि यहाँ तो मोक्षके साथ लवमात्रके ऐसे सत्संगकी तुलना करना भी असंगत बतलाया गया है। अतएव यहाँ उन भगवत्तत्त्वके ज्ञाता होकर भगवत्-प्रेमके रंगमें रँगे हुए मोक्षसंन्यासी भगवत्संगी (सर्वैश्वर्यपूर्ण मधुरतम लीलाविहारी भगवान्के नित्य लीलासंगी) प्रेमी सन्तोंकी उस कृपाका उल्लेख है, जो केवल मुक्ति ही नहीं, भगवान्के प्रेमरूपी भक्तिकी प्राप्ति भी सहज ही करवा देती है। क्योंकि मुक्तिको तो ऐसे प्रेमी चाहते ही नहीं। वरं मुक्तिकी चाहको ही वे प्रेमरूपा भगवद्भक्तिकी उत्पत्तिमें बाधा देनेवाली पिशाचिनी समझकर उसका तिरस्कार किया करते हैं। ऐसे प्रेमी भक्तोंकी कृपा जिनपर होती है, जो पुरुष ऐसे भक्तोंका संग प्राप्त कर लेता है, योग और ज्ञान आदिसे भी वशमें न होनेवाले भगवान् (सहज ही) उसके वशमें हो जाते हैं। इसीलिये स्वयं भगवान् अपने प्रेमी भक्त उद्धवसे कहते हैं—
न रोधयति मां योगो न सांख्यं धर्म एव च।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा॥
व्रतानि यज्ञश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमा:।
यथावरुन्धे सत्संग: सर्वसंगापहो हि माम्॥
(श्रीमद्भा० ११।१२।१-२)
‘दूसरे समस्त संगोंका निवारण करनेवाले ‘सत्संगसे’ मैं जैसा वशीभूत होता हूँ वैसा योग, ज्ञान, धर्म, वेदाध्ययन, तप, त्याग, इष्टापूर्त, दक्षिणा, व्रत, यज्ञ, वेद, तीर्थ, यम और नियम किसीसे नहीं होता।’
इसका कारण यह है कि अन्यान्य सब साधन, सकामभावसे होनेपर भोग और स्वर्गादिकी और निष्कामभावसे होनेपर अन्त:करणकी शुद्धि और मुक्तिकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं। लीलाविहारी भगवान्को सीधा वशमें करनेवाला तो केवल एक सर्वतन्त्रस्वतन्त्र, अनन्य और विशुद्ध प्रेम ही है, जो इन साधनोंमेंसे किसीसे नहीं मिलता; वह तो केवल भगवत्संगी प्रेमी महापुरुषोंकी महती कृपासे ही मिलता है।
भगति सुतंत्र सकल सुख खानी।
बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥
हाँ, यदि श्रीभगवान् चाहें तो स्वयमेव अपना प्रेम दे सकते हैं; उनकी कृपाके लेशमात्रसे ही प्रेम मिल सकता है। गोसाईंजीने कहा है—
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।
पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ॥
परन्तु नित्य कृपावर्षा करनेवाले भगवान्का कृपाबिन्दु भी भगवदीय महात्माओंकी कृपासे ही जीवोंको मिल सकता है। अतएव ऐसे प्रेमी सन्तोंका संग ही प्रधान साधन है, परन्तु ऐसा संग प्राप्त होना अपने वशकी बात नहीं! इसीसे देवर्षि नारदजी अगले सूत्रमें महत्संगको दुर्लभ बतलाते हैं—
महत्संगस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च॥३९॥
३९-परन्तु महापुरुषोंका संग दुर्लभ, अगम्य और अमोघ है।
संसारमें स्वधर्मपरायण, सदाचारी, साधुस्वभाव, दैवी सम्पत्तिवान् पुरुषोंकी प्राप्ति बहुत दुर्लभ है। सच्चे हीरोंकी भाँति जमातों और उपदेशकोंमें सच्चे साधु थोड़े ही होते हैं; पर खोज करनेपर संसारमें सदाचारी, कर्मकाण्डी और कुछ ज्ञानी पुरुष तो मिल भी सकते हैं। परन्तु ऐसे सच्चे प्रेमी महात्मा बहुत ही कम मिलते हैं, जिनकी कृपामात्रसे परमदुर्लभ योगि-ज्ञानि-जनवांछित भगवत्प्रेमकी प्राप्ति हो जाती हो। इसीलिये ऐसे महात्माओंका मिलन बहुत दुर्लभ माना जाता है। यदि कहीं ऐसे महापुरुष मिल भी जाते हैं तो उनका पहचानना बहुत कठिन होता है। क्योंकि बाह्य आचार तो ढोंगी और नाटकके पात्र भी किसी अंशमें वैसा ही दिखला सकते हैं। आँखोंसे आँसुओंका बहना, रोना, हँसना और चिल्लाना ही प्रेमीके लक्षण नहीं हैं। अनेक बाह्य कारणोंसे भी ऐसा हो सकता है। फिर कोई-कोई सच्चे प्रेमी ऐसे भी हो सकते हैं, जो इन लक्षणोंवाली स्थितिसे भी आगे बढ़ चुके हों और जिनके बाह्य आचार साधारण समझसे बाहर हों। प्रेमीजन तो किसीको कहने जाते ही नहीं कि हमें प्रेमी मानो और कहनेसे मानता भी कौन है। अतएव ऐसे नि:स्पृही भगवज्जनोंकी पहचान बहुत ही कठिन है, इसीसे उनके संगको दुर्गम बतलाया गया है। परन्तु सौभाग्यसे यदि कहीं ऐसे महात्मा पुरुष मिल जाते हैं तो उनका बिना जाने मिल जाना भी कभी व्यर्थ नहीं हो सकता; क्योंकि वह अमोघ है। जब साधारण सदाचारी, विद्वान् साधुओंका समागम ही अन्त:करणकी शुद्धिका कारण होकर पाप, ताप और दैन्यका निवारण करनेमें समर्थ होता है; तब जिनका हृदय भगवत्प्रेमसे छलकता है, जो प्रेम और आनन्दकी मूर्ति हैं, जिनके स्मरणमात्रसे ही पापोंका नाश होता है, उन भगवदीय प्रेमी महात्माओंके दर्शनका महान् फल अवश्य ही प्राप्त होता है।
जैसे अमावस्याकी अँधेरी रातमें सोया हुआ आदमी यदि सूर्योदय होनेपर भी सोता ही रहे तो उसको न जागनेतक प्रकाशका अनुभव नहीं होता, परन्तु प्रकाश तो सूर्योदयके साथ-साथ हो ही जाता है। और जैसे कोई धनी पुरुष अपने किसी प्रेमी दरिद्र आदमीके नामपर अपनी करोड़ोंकी सम्पत्ति ट्रांसफर करवा देता है, तो वह दरिद्र उसी समयसे धनी तो हो जाता है; परन्तु जबतक उसको इस बातका पता नहीं लगता तबतक वह अपनेको दरिद्र ही समझता है। इसी प्रकार किन्हीं भगवत्प्रेमी महापुरुषके अज्ञात संगसे भी पाप और अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश होकर ज्ञानरूप सूर्यका प्रकाश और प्रेमरूप परमनिधि तो मिल जाती है, परन्तु जबतक इस बातका पता नहीं लगता तबतक इस लाभसे अपरिचित रहनेके कारण मनुष्य आनन्दको प्राप्त नहीं होता। अवश्य ही इस स्थितिका परिचय मिलनेमें अधिक विलम्ब नहीं होता। इसीसे महत्संगको अमोघ (अवश्य फलदायी) बतलाया गया है।
लभ्यतेऽपि तत्कृपयैव॥ ४०॥
४०-उस (भगवान्)-की कृपासे ही (महत्पुरुषोंका) संग भी मिलता है।
अवश्य ही ऐसे सन्तका मिलन हरि-कृपासे ही होता है। भगवान् जिसपर कृपा करके अपनाना चाहते हैं, उसीके पास, प्रेमपाशमें अपनेको बाँध रखनेकी शक्तिवाले, अपने ही स्वरूपभूत प्रेमी भक्तको भेजते हैं। वस्तुत: भगवत्कृपा और महान् पुरुषोंका संग एक-दूसरेके आश्रित हैं। महत्पुरुषोंके संग बिना भगवत्कृपाका अनुभव नहीं होता और भगवत्कृपा बिना ऐसे महापुरुष नहीं मिलते। श्रीविभीषणको भी श्रीहनूमान्जीके मिलनेपर ही भगवत्कृपाका अनुभव हुआ, इसीसे उन्होंने कहा—
अब मोहि भा भरोस हनुमंता।
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहि संता॥
तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात्॥४१॥
४१-क्योंकि भगवान्में और उनके भक्तमें भेदका अभाव है।
भगवान्के भक्त भगवत्स्वरूप ही हैं (ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति) जो भक्तोंका सेवन करते हैं वे भगवान्का ही सेवन करते हैं। भक्त भगवान्के हृदयमें बसते हैं और भगवान् भक्तके हृदयमें। भगवान्ने कहा है—
साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्।
मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥
(श्रीमद्भा०९।४।६८)
‘साधु मेरे हृदय हैं और मैं उनका हृदय हूँ। वे मेरे सिवा और किसीको नहीं जानते तथा मैं उन्हें छोड़कर और किसीको नहीं जानता।’ भरत रामको भजते हैं और राम भरतको—
भरत सरिस को राम सनेही।
जगु जप राम रामु जप जेही॥
श्रीभगवान्ने प्रेमस्वरूपा गोपियोंके सम्बन्धमें कहा है—
मन्माहात्म्यं मत्सपर्यां मच्छ्रद्धां मन्मनोगतम्।
जानन्ति गोपिका: पार्थ नान्ये जानन्ति तत्त्वत:॥
‘हे अर्जुन! मेरा माहात्म्य, मेरी पूजा, मेरी श्रद्धा और मेरे मनकी बात तत्त्वसे केवल गोपियाँ ही जानती हैं और कोई नहीं जानता।’
ऐसे प्रेमी भक्तोंमें और भगवान्में क्या अन्तर है? भगवान्ने कहा ही है—
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥
(गीता९।२९)
‘जो प्रेमसे मुझको भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ।’ ऐसे भक्त भगवत्प्रेममें इस प्रकार तल्लीन रहते हैं कि वे अपने बाह्य रूपको भूलकर साक्षात् भगवत्-स्वरूपका अनुभव करने लगते हैं। गोपियाँ भगवान्को ढूँढ़ती हुई ऐसी तन्मय हो गयीं कि वे उन्हींकी लीला करने लगीं—
मोहन लाल रसालकी लीला इनहीं सोहैं।
केवल तन्मय भई कछु न जानैं हम को हैं॥
(नन्ददासजी)
तदेव साध्यतां तदेव साध्यताम्॥४२॥
४२-(अतएव) उस (महत्संग)-की ही साधना करो, उसीकी साधना करो।
अतएव भगवत्प्रेमकी प्राप्तिके लिये ऐसे भगवत्प्रेमी महापुरुषोंके संगकी ही प्रबल इच्छा करो। भगवत्कृपासे प्रेमी सन्त मिल जायँगे और सन्त-मिलनके प्रतापसे ही हम पाप-तापसे छूटकर निर्मल भगवत्प्रेमको प्राप्त कर सकेंगे। इसमें एक बड़ा रहस्य है। मान लीजिये, एक महान् प्रतापी राजा है और साथ ही वह बड़ा भारी प्रेमी भी है; परन्तु प्रेम हरेकके साथ नहीं होता। राजा राजसभामें और अपने राज्यमें अपना प्रभाव और ऐश्वर्य तो खूब दिखला सकता है, परन्तु अपने मुँहसे अपने प्रेमका रहस्य किसीके सामने नहीं कह सकता। हम प्रजाके रूपमें विधिके अनुसार उससे मिलकर विधिवत् बातें कर सकते हैं, परन्तु न तो प्रेमका रहस्य पूछ सकते हैं और न वह हमें बतला ही सकता है। उसके प्रेमका गुह्य रहस्य जानना या उसके प्रेमराज्यमें प्रवेश करना हो तो उसके किसी अनन्य प्रेमीका—जिसके साथ राजाका व्यक्तिगत प्रेमका निर्मल (राज्यविधिसे अतीत) सम्बन्ध है और जिसके साथ वह परस्पर खुली प्रेमचर्चा करता है—संग करना होगा और उसके हृदयमें अपना विश्वास पैदा करके उसके द्वारा राजाके प्रेमका रहस्य जानना होगा और उसीके द्वारा राजाके निकट अपना प्रेमसन्देश पहुँचाना होगा तथा अपनी पात्रता सिद्ध करनी होगी। जब राजा हमें पात्र समझ लेगा तो हमें भी उसीकी भाँति प्रेमगोष्ठीमें शामिल कर लेगा। इसी प्रकार भगवान् भी अपने प्रेमका रहस्य अपने मुँहसे नहीं बतलाते। भगवान्ने उद्धवको प्रेमशिक्षा दिलानेके लिये गोपियोंके पास भेजा था। प्रियतमका प्रेमरहस्य और उसके प्रेमकी गुह्यतम बातें जैसे उसकी प्रियतमाके द्वारा ही उसकी विश्वस्त सखियोंको मिलती है, इसी प्रकार भगवान्के प्रेमका रहस्य भी भगवत्प्रेमी भक्तोंके द्वारा ही साधकको मिलता है और मिलता भी है उसीको, जिसको भगवान् पात्र समझकर कृपा करके अपने प्रेमका भेद देना चाहते हैं। क्योंकि प्रेमी भक्त प्रेमास्पद प्रियतम भगवान्की इच्छा या आज्ञा बिना उनके प्रेमका रहस्य किसीके सामने नहीं खोल सकते। पहले साधकको पात्र बनना होता है। जब भगवान्के निर्मल अत्युच्च प्रेमकी एकान्त आकांक्षा उसके मनमें उत्पन्न हो जाती है तब उसका हृदय भगवत्प्रेमके लिये रोने लगता है। उसके हृदयका आर्तनाद अन्तर्यामी आनन्दमय प्रभु सुनते हैं और तब कृपा करके वे अपने किसी प्रेमी भक्तको आदेश या संकेत करके उसके समागममें भेज देते हैं। वहाँ पहले उसके प्रेमकी परीक्षा होती है। यदि उसका प्रेम कामनाशून्य और अनन्य होता है और वह अपने आचरण और व्यवहारसे उस प्रेमी भक्तके हृदयमें पात्रताका विश्वास पैदा कर देता है, तब वे उसका सन्देश भगवान्के पास पहुँचाते हैं और भगवान्की आज्ञा प्राप्त करके क्रमश: प्रेमका रहस्य उसके सामने खोलते हैं और धीरे-धीरे, ज्यों-ज्यों उसकी पात्रता बढ़ती है, त्यों-ही-त्यों भगवान्की आज्ञासे वे उसे भगवान्के प्रेमराज्यमें उत्तरोत्तर आगे बढ़ाकर ले जाते हैं और अन्तमें उसपर भगवान्की पूर्ण कृपा होनेसे वह भगवत्प्रेमको प्राप्त कर लेता है। राजा या उसका प्रेमी तो अन्तर्यामी न होनेसे किसीके धोखेमें भी आ सकता है, परन्तु भगवान् और भगवान्की इच्छासे नियुक्त होनेवाले प्रेमी भक्त कभी धोखा नहीं खाते। अतएव जिसको भगवत्प्रेमकी प्राप्तिकी इच्छा हो, उसे देवर्षिके बतलाये हुए साधनोंमें तत्पर होकर पहले पात्र बनना चाहिये, जिससे उसपर भगवान्की कृपा हो और वह भगवत्प्रेमी पुरुषोंके संगका पात्र समझा जाय। साथ ही ऐसे भगवत्प्रेमी पुरुषोंके संगकी इच्छा प्रबलरूपसे बढ़ानी चाहिये, क्योंकि इनके संग बिना भगवत्प्रेमकी प्राप्ति महान् कठिन है। इसीसे भगवान् अपने निर्मल प्रेमके प्रचारार्थ ऐसे भक्तोंको, मुक्तिके पूर्ण अधिकारी होनेपर भी, उनके मनमें प्रेमकी वासना जागृत रखकर उन्हें सायुज्य मुक्ति नहीं देते, और इसीसे प्रेमी भक्तगण इस प्रेम-लीला-सुखको छोड़कर मुक्तिकी कभी चाह नहीं करते। वे मुक्त होकर भी केवल प्रेमवितरणके लिये ही संसारमें आया करते हैं या निवास करते हैं। वे अहैतुक कृपालु होते हैं। हमारी तीव्र इच्छा पावेंगे तो भगवत्कृपासे भगवान्का संकेत प्राप्तकर अपने पुण्यमय दर्शन-स्पर्श-भाषण और अपनी महती कृपासे हमें अवश्य प्रेमदान करेंगे। क्योंकि वे तो प्रेमी जनोंकी खोजमें ही रहते हैं। उनका काम ही प्रेमदान करना है। अतएव उन्हीं भगवत्संगी प्रेमी महानुभावोंका संग प्राप्त करो, उन्हींकी कृपाकी इच्छा करो।