प्रेमरूपा भक्तिमें प्रधान बाधा कुसंगति है
दु:संग: सर्वथैव त्याज्य:॥४३॥
४३-दु:संगका सर्वथा ही त्याग करना चाहिये।
सत्संगका महत्त्व बतलाकर अब देवर्षि दु:संगका निषेध करते हैं। जिस प्रकार सत्संगसे भगवत्कथा, भगवच्चर्चा, भगवन्नाम, भगवत्प्रीति, सदाचार, शास्त्र, विवेक, वैराग्य, सत्-अभ्यास, सेवा, सरलता, नम्रता, क्षमा, तितिक्षा, शौच, दया, अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, निरभिमानता और शान्ति आदिके प्रति प्रवृत्ति होती है और मनुष्य सदाचारपरायण परमभक्त बन सकता है; इसी प्रकार इसके विपरीत दु:संगसे विषयवार्ता, जगच्चर्चा, लोकनिन्दा, भोगप्रीति, दुराचार, उच्छृंखलता, अविवेक, विषयलोलुपता, दुष्ट अभ्यास, मान, दम्भ, घमंड, क्रोध, असहिष्णुता, अपवित्रता, निर्दयता, हिंसा, असत्य, इन्द्रियलम्पटता, अभिमान और अशान्ति आदिके प्रति प्रवृत्त होकर मनुष्य पापपरायण और अत्यन्त विषयासक्त हो जाता है। दु:संगसे आसुरी सम्पत्तिके सभी दुर्गुण और दुराचारोंका विकास और विस्तार होता है। दु:संगसे मनुष्यके समस्त सद्गुणोंका विनाश होकर उसका सर्वनाश हो जाता है। परम सुशीला, स्नेहमयी, प्रेमप्रतिमा देवी कैकेयी मन्थराकी कुसंगतिके कारण ही महाराज दशरथके, भरतके, अपने और तमाम अयोध्यावासियोंके परम शोकका कारण बनी थीं और इसीसे उन्हें अन्तमें दु:खप्रद वैधव्यका सहन करना और प्राणप्रिय भरतका अप्रीतिभाजन होकर रहना पड़ा था। शकुनिकी कुसंगति ही महाभारतके भयानक संहारमें एक प्रधान कारण हुई। श्रीमद्भागवतमें भगवान् कपिलदेव माता देवहूतिजीसे कहते हैं—
यद्यसद्भि: पथि पुन: शिश्नोदरकृतोद्यमै:।
आस्थितो रमते जन्तुस्तमो विशति पूर्ववत् ॥
सत्यं शौचं दया मौनं बुद्धि: श्रीर्ह्रीर्यश: क्षमा।
शमो दमो भगश्चेति यत्संगाद्याति संक्षयम्॥
तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मस्वसाधुषु।
संगं न कुर्याच्छोच्येषु योषित्क्रीडामृगेषु च॥
(३।३१।३२—३४)
‘जो मनुष्य शिश्नोदरपरायण (स्त्री और धनमें ही आसक्त) नीच पुरुषोंका संग करके उनके अनुसार बर्ताव करने लगता है वह उन्हींकी भाँति अन्धकारमय नरकोंमें जाता है। क्योंकि दुष्टसंगसे सत्य, पवित्रता, दया, मननशीलता, बुद्धि, लज्जा, श्री, कीर्ति, क्षमा, मनका वशमें रहना, इन्द्रियोंका वशमें रहना और ऐश्वर्य आदि सब गुण नष्ट हो जाते हैं। अतएव उन अशान्तचित्त, मूर्ख, नष्टबुद्धि, स्त्रियोंके हाथके खिलौने बने हुए, शोचनीय, असाधु दुष्ट मनुष्योंका संग कभी नहीं करना चाहिये।’
अतएव दु:संगका त्याग तो सभीके लिये आवश्यक है, पर भगवत्प्रेमकी इच्छा करनेवालोंको तो दु:संगका त्याग बड़ी ही सावधानीसे करना चाहिये। भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणसे कहा है—
बरु भल बास नरक कर ताता।
दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
‘हे विभीषण! नरकमें रहना अच्छा है, परन्तु विधाता कभी दुष्टका संग न दे।’ दुष्ट-संगसे केवल दुराचारी मनुष्योंका ही संग नहीं समझना चाहिये। इन्द्रियोंका कोई भी विषय, जो हमारे मनमें असत् विचार तथा विषयोंकी लालसा उत्पन्न करे और भगवत्प्राप्तिके मार्गसे हमारे चित्तको चलायमान कर दे, दु:संग हो सकता है। हमें न कोई ऐसी चेतन वस्तु या जड दृश्य देखना चाहिये, न ऐसी बात सुननी चाहिये, न ऐसी चर्चा करनी चाहिये, न वैसे स्थानमें जाना चाहिये, न वैसी पुस्तक या पत्रिका पढ़नी चाहिये, न वैसा चित्र देखना चाहिये, न वैसी वस्तु खानी, सूँघनी या स्पर्श करनी चाहिये और न वैसा विचार ही करना चाहिये, जिससे हमारे चित्तमें विषयचिन्तनकी प्रबलता हो जाय। याद रखना चाहिये कि मनुष्यमें अच्छे और बुरे भावोंकी उत्पत्ति और वृद्धिमें कम-से-कम ये दस बातें प्रधान कारण होती हैं—स्थान, अन्न, जल, परिवार, अड़ोस-पड़ोस, दृश्य, साहित्य, आलोचना, आजीविकाका कार्य और उपासना। यदि ये सब सात्त्विक होते हैं तो इनके सेवनसे सात्त्विकता बढ़ती है। इन्हींका सेवन सत्संग है और यदि ये राजस या तामस हैं तो इनका सेवन दु:संग है और उससे अज्ञानकी वृद्धि होकर तमाम दोषोंका विकास हो जाता है। अतएव दु:संगका सब प्रकारसे सर्वथा त्याग करना चाहिये।
कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिनाशसर्वनाशकारणत्वात्॥४४॥
४४-क्योंकि वह (दु:संग) काम, क्रोध, मोह, स्मृतिभ्रंश, बुद्धिनाश एवं सर्वनाशका कारण है।
भगवत्सम्बन्धी तत्त्व-रहस्य तथा लीला-कथाओंको छोड़कर इन्द्रियोंको भोगके समय तृप्ति देनेवाले लौकिक विषयोंका चिन्तन ही सर्वनाशकी जड़ है। चित्त निरन्तर या अधिक समयतक जिस विषयका चिन्तन करता है, उसीमें उसकी आसक्ति होती है। दु:संगसे—सांसारिक विषयों और विषयी पुरुषोंके शरीर, वाणी और मनद्वारा किये हुए संगसे स्वाभाविक ही विषयासक्ति बढ़ती है। आसक्तिसे कामना होती है, यह कामना ही समस्त पापोंका मूल है; कामनाकी तृप्तिसे अधिक प्राप्तिके लिये लोभ उत्पन्न होता है और अतृप्तिसे वही कामना क्रोधके रूपमें परिणत हो जाती है। इसीलिये श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने राग या आसक्तिरूपी रजोगुणसे उत्पन्न कामको ही पापोंके होनेमें प्रधान कारण बतलाया है। अर्जुनने पूछा कि ‘भगवन्! मनुष्य न चाहता हुआ भी जबर्दस्ती पकड़ा-सा जाकर किसकी प्रेरणासे पाप करता है?’ इसके उत्तरमें भगवान् स्पष्ट कहते हैं—
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥
(श्रीमद्भगवद्गीता ३।३७)
‘रजोगुणसे उत्पन्न यह काम ही क्रोध है, इस महापापी कामका पेट कभी नहीं भरता; इस विषयमें तुम इस कामको ही (पाप करानेवाला) अपना शत्रु मानो।’ यद्यपि कामसे लोभ और क्रोध दोनों ही उत्पन्न होते हैं परन्तु संसारमें मनमानी थोड़ी ही कामनाओंकी पूर्ति होती है; अधिकांशमें तो विफलता ही प्राप्त होती है। विफलतामें क्रोध उत्पन्न होता है; क्रोधकी उत्पत्ति हो जानेपर मनुष्य विवेक-विचारशून्य हो जाता है। उसे हिताहित कुछ भी नहीं सूझता, वह पिशाचकी भाँति केवल विनाशका ही प्रयत्न करता है। इस मोहमें उसकी स्मृति नष्ट हो जाती है, और स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धि मारी जाती है। बुद्धिके नष्ट होनेपर वह इस लोक और परलोकके कल्याणपथसे गिर जाता है—उसका सर्वनाश हो जाता है। ठीक यही बात श्रीभगवान्ने भी गीताके अध्याय २, श्लोक ६२-६३ में कही है—
ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते।
संगात्संजायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
‘विषयोंके चिन्तनसे मनुष्यकी विषयोंमें आसक्ति होती है, आसक्तिसे कामना उत्पन्न होती है, (कामकी तृप्तिमें बाधा होनेसे) उस कामसे ही क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोधसे सम्मोह होता है, सम्मोहसे स्मृतिभ्रंश, स्मृतिभ्रंशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे (पुरुषका) सर्वनाश हो जाता है।’
सर्वनाशके कारणभूत विषयोंका चिन्तन होनेमें विषय और विषयी पुरुषोंका संग ही प्रधान है, यही दु:संग है; अतएव इसका सर्वथा त्याग करना चाहिये।
तरंगायिता अपीमे संगात्समुद्रायन्ति॥४५॥
४५-ये (काम-क्रोधादि) पहले तरंगकी तरह (क्षुद्र आकारमें) आकर भी (दु:संगसे विशाल) समुद्रका आकार धारण कर लेते हैं।
जबतक दोषोंका समूल विनाश न हो जाय, तबतक तनिक-से दोषसे डरते ही रहना चाहिये; जैसे ईंधनमें दबी हुई जरा-सी चिनगारी हवाके जोरसे विशाल अग्निका रूप धारण कर लेती है, इसी प्रकार दबा हुआ जरा-सा भी दोष कुसंग पाते ही पनपकर विशाल रूप धारण कर लेता है। पहले-पहल जब मनमें काम-क्रोधका विकार उत्पन्न होता है तो उसकी एक लहर-सी ही आती है, परन्तु कुसंग पाते ही वह लहर समुद्र बन जाती है; फिर चारों ओरसे सारे हृदयपर उसीका अधिकार हो जाता है, सद्विचारके प्रवेशकी भी गुंजाइश नहीं रह जाती; उससे सर्वनाश ही होता है। अतएव यह नहीं समझना चाहिये कि हमारे अन्दर सद्गुण अधिक हैं और दोष कम हैं, इससे कुसंगसे हमारी क्या हानि होगी! वरं सदा-सर्वदा अत्यन्त सावधानीके साथ सब प्रकारसे कुसंगका त्याग ही करना चाहिये।