प्रेमी भक्तोंकी महिमा
त्रिरूपभंगपूर्वकं नित्यदासनित्यकान्ताभजनात्मकं वा प्रेमैव कार्यम्, प्रेमैव कार्यम्॥६६॥
६६-तीन (स्वामी, सेवक और सेवा) रूपोंको भंगकर नित्य दासभक्तिसे या नित्य कान्ताभक्तिसे प्रेम ही करना चाहिये, प्रेम ही करना चाहिये।
स्वामी, सेवक और सेवा; अथवा पति, पत्नी और पतिसेवा—इन तीन-तीन रूपोंको मिटाकर नित्य दास्यभक्तिके द्वारा अथवा कान्ताभक्तिके द्वारा भगवान्से प्रेम ही करना चाहिये। दास्यभाव और कान्ताभाव इन दोनोंमें ही आगे चलकर भगवान्के साथ तन्मयता हो जाती है। निष्कामभावसे शरीर, मन, वाणी, सब कुछ स्वामीके अर्पण कर, एक अपने स्वामीको छोड़कर जगत्में दूसरे किसीको भी न जानना—यह दास्यभक्तिका आदर्श है। और पति ही मेरा तन, मन, धन, गति, मति, आश्रय, जीवन, प्राण, धर्म, मोक्ष और भगवान् है; एक पतिके सिवा अन्य कोई पुरुष ही जगत्में नहीं है; पतिका धन मेरा धन, पतिका तन मेरा तन, पतिका मन मेरा मन, पतिकी सेवा मेरी सेवा, पतिका ऐश्वर्य मेरा ऐश्वर्य, पतिका मान मेरा मान, पतिका अपमान मेरा अपमान, पतिके प्राण मेरे प्राण—इस प्रकार एकमात्र पतिपरायणा पतिगत-प्राणा होकर निष्काम अनन्यभावसे निरन्तर सेवामें लगे रहना, यह कान्ताभक्तिका आदर्श है। वास्तवमें दोनों एक ही हैं। दोनोंमें ही समता है। दोनोंमें ही अभिन्नता है। दास्यभक्तिमें भी सेवक अपना सब कुछ भुलाकर स्वामीके नाम-गोत्रवाला बन जाता है और कान्ताभक्तिमें तो अपने नाम-गोत्रको पतिके नाम-गोत्रमें मिलानेपर ही कान्ताभावकी प्राप्ति होती है। दास्यभावके सम्बन्धमें श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं—
मेरे जातिपाँति न चहौं काहूकी जातिपाँति,
मेरे कोऊ कामको न हौं काहूके कामको।
लोक परलोक रघुनाथहीके हाथ सब,
भारी है भरोसो तुलसीके एक नामको॥
अति ही अयाने उपखाने नहीं बूझैं लोग,
साहहीको गोत गोत होत है गुलामको।
साधु कै असाधु, कै भलो कै पोच, सोच कहा,
का काहूके द्वार परौं जो हौं सो हौं रामको॥
स्वामी और सेवकका कुल-गोत्र एक हो गया। इस दास्यभावकी महिमा गाती हुई भगवती श्रीराधिकाजी भक्तवर उद्धवजीसे कहती हैं—
कृष्णभक्ति: कृष्णदास्यं वरेषु च वरं वरम्।
श्रेष्ठा पंचविधामुक्तेर्हरिभक्तिर्गरीयसी॥
ब्रह्मत्वादपि देवत्वादिन्द्रत्वादमरादपि।
अमृतात् सिद्धिलाभाच्च हरिदास्यं सुदुर्लभम्॥
(ब्रह्मवैवर्त०कृ०९७।८-९)
‘सब वरोंमें श्रेष्ठतम वर श्रीकृष्णभक्ति या श्रीकृष्णदास्य ही है। पाँच प्रकारकी श्रेष्ठ मुक्तियोंसे हरिभक्ति ही श्रेष्ठ एवं गुरुतर है। ब्रह्मत्व, देवत्व, अमरत्व, अमृतप्राप्ति, सिद्धिलाभ—इन सभीसे श्रीहरिका दासत्व प्राप्त होना सुदुर्लभ है।’
कान्ताभक्तिमें तो एकात्मता है ही—
प्रीति जो मेरे पीवकी, बैठी पिंजर माहिं।
रोम रोम पिउ पिउ करै, ‘दादू’ दूसर नाहिं॥
प्रीतमको पतियाँ लिखूँ, जो कहुँ होय बिदेस।
तनमें, मनमें, नैनमें, ताको कहा सँदेस॥
कान्ता और कान्त तो घुल-मिलकर एक हो जाते हैं—अतएव वहाँ त्रिरूपका भंग आप ही हो जाता है। सूत्रकार कहते हैं, इस एकात्मताके आदर्शको सामने रखकर, इस भावको मनमें स्थान देकर दास्यभाव या कान्ताभावसे भगवान्के प्रति केवल प्रेम ही करो।
भक्ता एकान्तिनो मुख्या:॥६७॥
६७-एकान्त (अनन्य) भक्त ही श्रेष्ठ हैं।
इससे पूर्व सूत्रके अनुसार भक्ति करनेवाला भगवान्का अनन्य भक्त ही सबमें श्रेष्ठ है। क्योंकि उसका तन, मन, धन सब कुछ परमात्माका हो जाता है। वह परमात्माका यन्त्रवत् होकर संसारमें रहता है। उसका आत्मा परमात्मासे मिल जाता है, उसका मन परमात्माके मनमें रम जाता है, उसके नेत्र सब जगह सर्वदा परमात्माको ही देखते हैं—
प्रीतम छबि नैनन बसी, पर छबि कहाँ समाय।
भरी सराय ‘रहीम’ लखि, आप पथिक फिरि जाय॥
‘कबिरा’ काजर-रेखहू, अब तो दई न जाय।
नैननि पीतम रमि रहा, दूजा कहाँ समाय॥
आठ पहर चौंसठ घरी, मेरे और न कोय।
नैना माहीं तू बसै, नींदहिं ठौर न होय॥
कण्ठावरोधरोमांचाश्रुभि: परस्परं लपमाना: पावयन्ति कुलानि पृथिवीं च॥६८॥
६८-ऐसे अनन्य भक्त कण्ठावरोध, रोमांच और अश्रुयुक्त नेत्रवाले होकर परस्पर सम्भाषण करते हुए अपने कुलोंको और पृथ्वीको पवित्र करते हैं।
अनन्य भक्तगण जब इकट्ठे होकर अपने प्राणस्वरूप प्रियतमकी चर्चा करते हैं तो उनका प्रेमसागर उमड़ पड़ता है। तब वे चेष्टा करनेपर भी नहीं बोल सकते; उनके कण्ठ रुक जाते हैं, शरीर पुलकित हो जाता है, रोम-रोमसे प्रेमकी किरणधाराएँ निकलकर उस स्थानमें निर्मल प्रेमज्योति फैला देती हैं। वहाँका वातावरण अत्यन्त विशुद्ध और प्रेममय हो जाता है। उस समय वे भक्तगण प्रेमविह्वल होकर आँखोंसे प्रेमके आँसुओंकी धारा बहाते हुए परमानन्दमें मग्न हो जाते हैं। यह स्थिति बहुत ही दुर्लभ और परम पवित्र होती है, जिन भाग्यवानोंको यह अवस्था प्राप्त हो जाती है, उन सबके कुल तो पवित्र होते ही हैं—
सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत।
श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत॥
—वरं उनके अस्तित्वसे पृथ्वी भी पवित्र हो जाती है। उस समय उन पवित्र प्रेमस्वरूप भक्तके तनसे स्पर्श की हुई जरा-सी हवा जिसके शरीरको स्पर्श कर लेती है, वह भी पवित्र हो जाता है। शास्त्रमें कहा है—
कुलं पवित्रं जननी कृतार्था
वसुन्धरा पुण्यवती च तेन।
अपारसंवित्सुखसागरेऽस्मिँ-
ल्लीनं परे ब्रह्मणि यस्य चेत:॥
‘जिसका चित्त अपार संवित् एवं सुखके सागर परब्रह्ममें लीन हो गया है, उसके जन्मसे कुल पवित्र, जननी कृतार्थ और पृथ्वी पुण्यवती हो जाती है।’
श्रीमद्भागवतमें भगवान् कहते हैं—
वाग्गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं
रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।
विलज्ज उद्गायति नृत्यते च
मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति॥
(११।१४।२४)
‘प्रेमके प्रकट हो जानेसे जिसकी वाणी गद्गद और चित्त द्रवीभूत हो जाता है, जो प्रेमावेशमें बार-बार रोता है, कभी हँसता है, कभी लाज छोड़कर ऊँचे स्वरसे गाने और नाचने लगता है। ऐसा मेरा परम भक्त त्रिलोकीको पवित्र कर देता है।’
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि सुकर्मीकुर्वन्ति कर्माणि सच्छास्त्रीकुर्वन्ति शास्त्राणि॥६९॥
६९-ऐसे भक्त तीर्थोंको सुतीर्थ, कर्मोंको सुकर्म और शास्त्रोंको सत्-शास्त्र कर देते हैं।
तीर्थ पापी नर-नारियोंको निष्पाप और पवित्र करते हैं, परन्तु पापात्माओंके सतत समागमसे उनमें मलिनता आ जाती है। तीर्थोंकी वह मलिनता भक्तोंके समागमसे नष्ट होती है। दिलीपकुमार महाराज भगीरथके घोर तपसे प्रसन्न होकर वर देनेके लिये आविर्भूत हुई भगवती श्रीगंगाजीने उनसे कहा—‘भगीरथ! मैं पृथ्वीपर कैसे आऊँ! संसारके सारे पापी तो आ-आकर मुझमें अपने पापोंको धो डालेंगे। परन्तु उन पापियोंके अपार पाप-पंकको मैं कहाँ धोने जाऊँगी, इसपर आपने क्या विचार किया है?’ इसके उत्तरमें भगीरथने कहा—
साधवो न्यासिन: शान्ता ब्रह्मिष्ठा लोकपावना:।
हरन्त्यघं तेऽङ्गसंगात् तेष्वास्ते ह्यघभिद्धरि:॥
(श्रीमद्भागवत९।९।६)
‘हे माता! समस्त विश्वको पवित्र करनेवाले विषयोंके त्यागी, शान्तस्वरूप, ब्रह्मनिष्ठ साधु-महात्मा आकर तुम्हारे प्रवाहमें स्नान करेंगे तब उनके अंगके संगसे तुम्हारे सारे पाप धुल जायँगे; क्योंकि उनके हृदयमें समस्त पापोंका नाश करनेवाले श्रीहरि निवास करते हैं।’
प्रचेतागण भगवान्की स्तुति करते हुए कहते हैं—
तेषां विचरतां पद्भ्यां तीर्थानां पावनेच्छया।
भीतस्य किं न रोचेत तावकानां समागम:॥
(श्रीमद्भागवत ४।३०।३७)
‘आपके जो भक्तगण तीर्थोंको पवित्र करनेके लिये ही भूमिपर विचरण करते हैं, उनका समागम संसारभयसे भीत पुरुषको कैसे प्रिय नहीं होगा।’
धर्मराज युधिष्ठिर भक्तराज विदुरजीसे कहते हैं—
भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूता: स्वयं विभो।
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्त:स्थेन गदाभृता॥
(श्रीमद्भागवत१।१३।१०)
‘हे प्रभो! आप-सरीखे भगवद्भक्त स्वयं तीर्थरूप हैं, (पापियोंद्वारा कलुषित हुए) तीर्थोंको आपलोग अपने हृदयमें विराजित भगवान् श्रीगदाधरके प्रभावसे पुन: तीर्थत्व प्रदान करा देते हैं।’
इसी प्रकार जिन शास्त्रोक्त कर्मोंको भक्तगण करने लगते हैं, वे ही सत्कर्म हो जाते हैं और वे जिस शास्त्रको आदर देते हैं, वही सत्-शास्त्र माना जाता है। वरं यह कहना भी अत्युक्ति नहीं कि भक्त जिस जगह रहते हैं, जिस सरोवर या नदीमें स्नान करते हैं, वही तीर्थ बन जाता है; भक्त जो कुछ कर्म करते हैं, वही आदर्श सत्कर्म कहलाता है और भक्त जो कुछ उपदेश करते हैं, वही सत्-शास्त्र माना जाता है। उनका निवासस्थान ही तीर्थ, उनके कर्म ही सत्कर्म और उनकी वाणी ही सत्-शास्त्र है। तीर्थ, सत्कर्म और शास्त्रका रहस्य समझनेपर यह बात भलीभाँति समझमें आ जाती है।
तन्मया:॥७०॥
७०-(क्योंकि) वे तन्मय हैं।
जैसे नदी समुद्रमें मिलकर समुद्र बन जाती है, इसी प्रकार भक्त भी अपना तन-मन-बुद्धि-अहंकार सब कुछ प्रियतम भगवान्के समर्पण कर भगवान्के साथ तन्मय हो जाता है। ऐसा भक्त साक्षात् भगवत्स्वरूप ही होता है, वह जहाँ रहता है वहाँका तमाम सूक्ष्म और स्थूल वातावरण शुद्ध हो जाता है। इसीलिये उसके समागममात्रसे तीर्थ, कर्म और शास्त्र पवित्र हो जाते हैं। ऐसे ही भक्तोंके द्वारा भगवान्, भगवन्नाम, भगवद्भक्तिकी महिमा बढ़ती है और इनके समागममें आनेवाले पापी-से-पापी नर-नारी भी घोर संसार-सागरसे अनायास ही तर जाते हैं।
मोदन्ते पितरो नृत्यन्ति देवता: सनाथा चेयं भूर्भवति॥७१॥
७१-(ऐसे भक्तोंका आविर्भाव देखकर) पितरगण प्रमुदित होते हैं, देवता नाचने लगते हैं और यह पृथ्वी सनाथा हो जाती है।
भक्तोंका आविर्भाव सभीके लिये शुभ होता है, क्योंकि उनके सभी कर्म स्वाभाविक ही लोककल्याणकारी होते हैं। उनके प्रभावसे लोगोंमें धर्मके प्रति श्रद्धा बढ़ती है, पितृकार्य और देवकार्योंमें विश्वास उत्पन्न हो जाता है। इससे धर्मपथसे डिगे हुए लोग पुन: धर्ममार्गपर आरूढ़ होकर यज्ञ, दान, श्राद्ध, तर्पण आदि कर्म करने लगते हैं, जिससे देवता और पितरोंको बड़ा सुख मिलता है। भक्तिके प्रतापसे भक्तके आगे-पीछेके कई कुल तर जाते हैं, इसलिये अपने कुलमें भक्तको उत्पन्न हुआ देखकर पितरगण अपनी मुक्तिकी दृढ़ आशासे हर्षोत्फुल्ल हो जाते हैं। पद्मपुराणमें कहा है—
आस्फोटयन्ति पितरो नृत्यन्ति च पितामहा:।
मद्वंशे वैष्णवो जात: स नस्त्राता भविष्यति॥
‘पितृ-पितामहगण अपने वंशमें भगवद्भक्तका जन्म हुआ जानकर—यह हमारा उद्धार कर देगा, इस आशासे प्रसन्न होकर नाचने और ताल ठोकने लगते हैं।’
मचले हुए दर्शनाकांक्षी भक्त किसी भी बातसे सन्तुष्ट नहीं होते, अत: स्नेहमयी जननीकी भाँति उन्हें अपनी गोदमें खिलाकर सुखी करनेके लिये सच्चिदानन्दघन भगवान् दिव्यरूपमें साक्षात् प्रकट होते हैं। उनके प्रकट होते ही देवताओंका अहित करनेवाले असुरोंका विनाश आरम्भ हो जाता है। इस प्रकार भक्तके आविर्भावको ही भगवान्के प्राकट्यमें कारण समझकर देवतागण भी नाचने लगते हैं। जबतक भगवान् या भगवान्के प्यारे धर्मात्मा भक्तोंका आविर्भाव नहीं होता तबतक पृथ्वीदेवी अनाथा रहती हैं। और जब भक्त प्रकट होते हैं तब बछड़ेके पीछे स्नेहवश दौड़नेवाली गौकी तरह भगवान् भी प्रकट हो जाते हैं, अतएव भक्तके आविर्भावसे ही पृथ्वी सनाथा हो जाती है।
नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेद:॥७२॥
७२-उनमें (भक्तोंमें) जाति, विद्या, रूप, कुल, धन और क्रियादिका भेद नहीं है।
सूत्रकार यहाँ यह समझाते हैं कि भक्तिमें जाति, विद्या, रूप, कुल, धन और क्रियादिकी प्रधानता नहीं है। ब्राह्मण हो या शूद्र, पढ़ा-लिखा हो या बेपढ़ा-लिखा, सुन्दर हो या कुरूप, ऊँचे कुलका हो या नीच कुलका, धनवान् हो या दरिद्र और बहुत क्रियाशील हो या अक्रिय। जो अपना सर्वस्व प्रभुपर न्योछावर कर सतत उनका प्रेमपूर्वक स्मरण करनेमें अपने चित्तको तल्लीन कर देता है, उसीको भक्तिरूपी परम दुर्लभ धन मिल जाता है। निषादका जन्म नीच जातिमें हुआ था, सदन कसाई थे, शबरी गँवार स्त्री थी, ध्रुव अपढ़ बालक थे, विभीषण और हनुमानादि कुरूप और अकुलीन राक्षस तथा वानर थे, विदुर और सुदामा निर्धन थे, गोपीजन क्रियाहीन थीं, परन्तु इन सबने भक्ति और प्रपत्तिके प्रतापसे भगवान्का प्रेम प्राप्त किया और भगवान्के परमप्रिय हो गये। सर्व सत्कर्मोंकी फलरूपा भक्ति जिसके हृदयमें है, वही भक्त है, वही सर्वगुणसम्पन्न है, फिर चाहे वह कोई हो, यही बात श्रीरामचरितमानसमें कही गयी है—
सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता।
सोइ महि मंडित पंडित दाता॥
धर्म परायन सोइ कुल त्राता।
राम चरन जा कर मन राता॥
नीति निपुन सोइ परम सयाना।
श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना॥
सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा।
जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा॥
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता।
मानउँ एक भगति कर नाता॥
जातिपाँति कुल धर्म बड़ाई।
धन बल परिजन गुन चतुराई॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा।
बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥
इसका यह तात्पर्य नहीं कि भक्त अपनेको सबसे ऊँचा और सर्वगुणसम्पन्न समझकर सबसे अपनी पूजा कराता है या समाज, जाति, वर्ण और आश्रममें बड़ोंके साथ खान-पान, विवाह, व्यवहार, रहन-सहन, आचार-विचार और कुलपरम्परा आदिमें अपने लिये समान अधिकारका दावा करता है। भक्त तो अभिमानका सर्वथा त्यागी है, फिर वह नया झूठा अभिमान लादकर ऐसा क्यों करने लगा? जो ऐसा करते हैं वे भक्त नहीं हैं। वर्णाश्रम तथा भक्तिमें भेद है। जो भक्तिके नामपर वर्णाश्रमकी मर्यादा नाश करना चाहते हैं, वे तो भक्तिपर लांछन लगाते हैं। अतएव भक्तिमार्गपर चलनेवाले साधकोंको शास्त्र-त्यागकी कभी भावना ही नहीं करनी चाहिये। यह सत्य है कि प्रारब्धमें न होनेसे विद्या और धन नहीं मिल सकता और न इस जन्ममें रूप, जाति तथा कुल ही बदल सकते हैं। परन्तु इन सब वस्तुओंके होने-न-होनेसे अथवा कम-ज्यादा होनेसे भक्तमें ऊँचा-नीचा भाव नहीं करना चाहिये—भक्तिके नाते जातिभेद आदिके कारण भक्तको नीचा कदापि नहीं समझना चाहिये। वैष्णवशास्त्रोंमें इसीलिये भक्तोंमें जातिभेदबुद्धिको एक अपराध बतलाया है।*
यतस्तदीया:॥७३॥
७३-क्योंकि (भक्त सब) उनके (भगवान् के) ही हैं।
भक्त अपनी भक्तिके प्रभावसे भगवद्रूप ही हो जाते हैं, इसीलिये उनमें परस्पर भेदबुद्धि नहीं होती और उनमें कोई अपनेको किसी भी हेतुसे ऊँचा नहीं समझता।