प्रेममें अनन्यता
सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात्॥ ७॥
७-वह (प्रेमाभक्ति) कामनायुक्त नहीं है, क्योंकि वह निरोधस्वरूपा है।
यह प्रेमाभक्ति सर्वथा त्यागरूप है। इसमें धन, सन्तान, कीर्ति, स्वर्ग आदिकी तो बात ही क्या, मोक्षकी भी कामना नहीं रह सकती। जिस भक्तिके बदलेमें कुछ माँगा जाता है या कुछ प्राप्त होनेकी आशा या आकांक्षा है, वह भक्ति कामनायुक्त है, वह स्वार्थका व्यापार है। प्रेमाभक्तिमें तो भक्त अपने प्रियतम भगवान् और उनकी सेवाको छोड़कर और कुछ चाहता ही नहीं। श्रीमद्भागवतमें भगवान् कपिलदेव कहते हैं कि ‘मेरे प्रेमी भक्तगण मेरी सेवा छोड़कर सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य (इन पाँच प्रकारकी*) मुक्तियोंको देनेपर भी नहीं लेते।’
यथार्थ भक्तिके उदय होनेपर कामनाएँ नष्ट हो ही जाती हैं। क्योंकि वह भक्ति निरोधस्वरूपा यानी त्यागमयी है। वह निरोध क्या है?
निरोधस्तु लोकवेदव्यापारन्यास:॥ ८॥
८-लौकिक और वैदिक (समस्त) कर्मोंके त्यागको निरोध कहते हैं।
प्रेमा-भक्तिमें यह कर्मत्याग अपने-आप ही हो जाता है। प्रेममें मतवाला भक्त अपने प्रियतम भगवान्को छोड़कर अन्य किसी बातको जानता नहीं; उसका मन सदा श्रीकृष्णाकार बना रहता है, उसकी आँखोंके सामने सदा सर्वत्र प्रियतम भगवान्की छबि ही रहती है। दूसरी वस्तुमें उसका मन ही नहीं जाता। श्रीगोपियोंने भगवान्से कहा था—
चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु
यन्निर्विशत्युत करावपि गृह्यकृत्ये।
पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद्
याम: कथं व्रजमथो करवाम किं वा॥
(श्रीमद्भा०१०।२९।३४)
‘हे प्रियतम! हमारा चित्त आनन्दसे घरके कामोंमें आसक्त हो रहा था, उसे तुमने चुरा लिया। हमारे हाथ घरके कामोंमें लगे थे, वे भी चेष्टाहीन हो गये और हमारे पैर भी तुम्हारे पाद-पद्मोंको छोड़कर एक पग भी हटना नहीं चाहते। अब हम घर कैसे जायँ और जाकर करें भी क्या?’
जगत्का चित्र चित्तसे मिट जानेके कारण वह भक्त किसी भी लौकिक (स्मार्त) अथवा वैदिक (श्रौत) कार्यके करने लायक नहीं रह जाता। इससे वे सब स्वयमेव छूट जाते हैं। सुन्दरदासजी ऐसे प्रेमी भक्तकी दशाका वर्णन करते हुए कहते हैं—
न लाज तीन लोककी, न वेदको कह्यौ करै।
न संक भूत-प्रेतकी, न देव-जच्छते डरै॥
सुनै न कान और की, द्रसै न और इच्छना।
कहै न बात और की, सुभक्ति प्रेमलच्छना॥
कबहुँक हँसि उठि नृत्य करै रोवन फिर लागे।
कबहुँक गदगद कंठ सबद निकसें नहिं आगे॥
कबहुँक हृदै उमंग बहुत ऊँचे सुर गावै।
कबहुँक ह्वै मुख मौन गगन जैसो रहि जावै॥
चित्त बित्त हरिसों लग्यो सावधान कैसे रहै।
यह प्रेमलच्छना भक्ति है, शिष्य सुनो ‘सुन्दर’ कहै॥
तस्मिन्ननन्यता तद्विरोधिषूदासीनता च॥९॥
९-उस प्रियतम भगवान्में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषयमें उदासीनताको भी निरोध कहते हैं।
बाहरी ज्ञान बना रहनेकी स्थितिमें भी प्रेमी भक्त अपने प्रियतमके प्रति अनन्य भाव रखता हुआ उसके प्रतिकूल कार्योंसे सर्वथा उदासीन रहता है। इस प्रकार सावधानीसे होनेवाले कर्म भी निरोध कहलाते हैं। प्रेमी भक्तके द्वारा होनेवाली प्रत्येक चेष्टा अपने प्रियतमके अनुकूल होती है और अनन्य भावसे उसीकी सेवाके लिये होती है। प्रतिकूल चेष्टा तो उसके द्वारा वैसे ही नहीं होती जैसे सूर्यके द्वारा कहीं अँधेरा नहीं होता या अमृतके द्वारा मृत्यु नहीं हो सकती।
अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता॥१०॥
१०-(अपने प्रियतम भगवान्को छोड़कर) दूसरे आश्रयोंके त्यागका नाम अनन्यता है।
प्रेमी भक्तके मनमें अपने प्रियतम भगवान्के सिवा अन्य किसीके होनेकी ही कल्पना नहीं होती, तब वह दूसरेका भजन कैसे करे? वह तो चराचर विश्वको अपने प्रियतमका शरीर जानता है, उसे कहीं दूसरा दीखता ही नहीं—
उत्तम के अस बस मन माहीं।
सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥
रहीम कहते हैं कि आँखोंमें प्यारेकी मधुर छबि ऐसी समा रही है कि दूसरी किसी छबिके लिये स्थान ही नहीं रह गया—
प्रीतम-छबि नैनन बसी, पर छबि कहाँ समाय।
भरी सराय ‘रहीम’ लखि, आप पथिक फिरि जाय॥
गोपियोंकी सर्वत्र श्याममयी चित्तवृत्तिका वर्णन करते हुए श्रीदेवकविने कहा है—
औचक अगाध सिंधु स्याहीकौ उमड़ि आयो,
तामें तीनौं लोक बूड़ि गए एक संगमें।
कारे-कारे आखर लिखे जु कारे कागद सु
न्यारे करि बाँचै कौन जाँचै चितभंगमें॥
आँखिनमें तिमिर अमावसकी रैन जिमि,
जंबूनद-बुंद जमुना-जल-तरंगमें।
यों ही मन मेरो मेरे कामकौ न रह्यो माई,
स्याम रँग ह्वै करि समानो स्याम रंगमें॥
यदि कोई उससे दूसरेकी बात कहता है तो वह उसे सुनना ही नहीं चाहता या उसे सुनायी ही नहीं पड़ती। यदि कहीं जबरदस्ती सुननी पड़ती भी है तो उसका मन उधर आकर्षित होता ही नहीं। शिवजीकी अनन्योपासिका पार्वतीजीको सप्तर्षियोंने महादेवजीके अनेक दोष बतलाकर उनसे मन हटाने और सर्वसद्गुणसम्पन्न भगवान् विष्णुमें मन लगानेको कहा, तब शिवप्रेमकी मूर्ति भगवतीने उत्तर दिया—
जन्म कोटि लगि रगर हमारी।
बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥
महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥
इसी तरह गोपियोंने भी उद्धवजीसे कहा था—
ऊधौ! मन मानेकी बात।
दाख छोहारा छाड़ि अमृतफल बिषकीरा बिष खात॥
जो चकोरको दै कपूर कोउ तजि अंगार अघात।
मधुप करत घर कोरे काठमें बँधत कमलके पात॥
ज्यों पतंग हित जानि आपनो, दीपकसों लपटात।
‘सूरदास’ जाको मन जासों, ताको सोइ सुहात॥
इस प्रकार प्रेमी भक्त एकमात्र अपने प्रियतम भगवान्को ही जानकर, उसीको सर्वस्व मानकर, जैसे मछलीको केवल जलका आश्रय होता है, वैसे ही केवल भगवान्का ही आश्रय लेकर सारी चेष्टाएँ उसीके लिये करता है।
एक भरोसो एक बल, एक आस बिस्वास।
एक राम घनस्याम हित चातक ‘तुलसीदास’॥
वह चातककी टेककी भाँति केवल भगवान्में ही चित्त लगाये, सम्पूर्णरूपसे उसीपर निर्भर करता हुआ, उसीके लिये शरीर धारण करता है। उसका खाना-पीना, सोना-बैठना, चलना-फिरना, देना-लेना, दान-पुण्य करना, सब कुछ उसीके लिये होता है। अतएव उसके समस्त कर्म भगवान्के प्रति अनन्य प्रेमभावसे सम्पन्न होनेके कारण स्वाभाविक ही कल्याणमय होते हैं।
लोके वेदेषु तदनुकूलाचरणं तद्विरोधिषूदासीनता॥११॥
११-लौकिक और वैदिक कर्मोंमें भगवान्के अनुकूल कर्म करना ही उसके प्रतिकूल विषयमें उदासीनता है।
अनन्य भावसे भगवदर्थ कर्म करनेवालेके लिये भगवान्के प्रतिकूल कर्मोंका अपने-आप ही त्याग हो जाता है। वैदिक या लौकिक (श्रौत या स्मार्त), कोई भी ऐसा कर्म वह नहीं कर सकता जो भगवान्के अनुकूल न हो, यानी जिससे प्रेमाभक्तिकी वृद्धिमें सहायता न पहुँचती हो।
पुत्रके लिये माता-पिताकी, स्त्रीके लिये स्वामीकी और शिष्यके लिये गुरुकी आज्ञा मानना वेद और लोक-धर्मके अनुसार सर्वथा कर्तव्य है; परन्तु उनकी आज्ञा भी यदि भगवत्-प्रेमसे विरुद्ध है तो प्रेमी भक्त कष्ट सहकर भी उसका त्याग कर देता है, क्योंकि उसके द्वारा अपने प्यारेके प्रतिकूल आचरण होना असम्भव है।
गोस्वामीजी महाराजने उदाहरण देते हुए कहा है—
जाके प्रिय न राम-बैदेही।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही॥
तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी॥
प्रह्लादने भगवान्के प्रतिकूल पिताकी आज्ञा नहीं मानी, विभीषणने भाईका साथ छोड़ दिया, भरतजी माताकी आज्ञाको टाल गये, राजा बलिने गुरु शुक्राचार्यकी बात नहीं सुनी और व्रजवनिताओंने पतियोंकी आज्ञापर ध्यान नहीं दिया और ये सभी जगत्के लिये कल्याणकारी हुए।
कर्म चार प्रकारके होते हैं—नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निषिद्ध। इनमें मद्य-मांस-सेवन, चोरी, व्यभिचार आदि निषिद्ध कर्म तो सभीके लिये त्याज्य हैं। शास्त्रीय काम्य (सकाम) कर्म बन्धनकारक तथा जन्म-मृत्युके चक्रमें डालनेवाले होनेके कारण ‘काम्यानां कर्मणां न्यासम्’ इस भगवत्-वचनानुसार त्याज्य हैं। रहे नित्य और नैमित्तिक कर्म, इनको लौकिक और वैदिक विधिके अनुसार फलासक्ति छोड़कर केवल भगवान्के आज्ञानुसार भगवत्-प्रीत्यर्थ करना चाहिये। भगवत्-प्रीत्यर्थ वही कर्म होते हैं जो भगवान्के प्रति प्रेम बढ़ानेवाले हों। गीताके अनुसार आसक्ति और फलाशा छोड़कर मन, वाणी और शरीरसे भगवान्के अनुकूल कर्म करना और प्रतिकूल कर्मोंका त्याग करना ही विरोधी कर्मोंमें उदासीनता है। प्रेमाभक्तिकी उन्मादमयी स्थिति प्राप्त न होनेतक ऐसे भगवदनुकूल कर्म प्रेमी भक्तके द्वारा स्वाभाविक हुआ ही करते हैं।
भवतु निश्चयदार्ढ्यादूर्ध्वं शास्त्ररक्षणम्॥१२॥
१२-(विधिनिषेधसे अतीत अलौकिक प्रेमप्राप्ति करनेका मनमें) दृढ़ निश्चय हो जानेके बाद भी शास्त्रकी रक्षा करनी चाहिये। अर्थात् भगवदनुकूल शास्त्रोक्त कर्म करने चाहिये।
प्रेमकी बाह्यज्ञानशून्य, विधि-निषेधसे अतीत सिद्धावस्थामें लौकिक और वैदिक कर्मोंका त्याग अपने-आप ही हो जाता है, जान-बूझकर किया नहीं जाता।
इसलिये जबतक प्रेमकी वैसी, सब कुछ भुला देनेवाली स्थिति प्राप्त न हो जाय तबतक प्रेमके नामपर शास्त्रविहित कर्मोंका त्याग कभी नहीं करना चाहिये। शास्त्रके अनुसार भगवान्के अर्पणबुद्धिसे भगवदनुकूल नित्य-नैमित्तिक कर्म और श्रवण-कीर्तनादिरूप भजन करते-करते ही भगवान्का वह परमोच्च प्रेम प्राप्त होता है। भगवान् स्वयं आज्ञा करते हैं—
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
(गीता१६।२४)
अत: तुम्हारे लिये क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये—इसकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है, यह जानकर तुम्हें शास्त्रविधिके अनुसार ही कर्म करना चाहिये।
अन्यथा पातित्याशंकया॥१३॥
१३-नहीं तो गिर जानेकी सम्भावना है।
जो मनुष्य जान-बूझकर शास्त्रोंकी आज्ञाका पालन न करके शास्त्रके प्रतिकूल, अमर्यादित कार्य करता है और उसे प्रेमका नाम देकर दोषमुक्त होना चाहता है, वह अवश्य ही गिर जाता है। भगवान्ने स्वयं कहा है—
य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत:।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥
(गीता१६।२३)
‘जो मनुष्य शास्त्रकी विधिको छोड़कर मनमाना स्वेच्छाचार करता है वह न सिद्धि पाता है, न परम गति पाता है और न उसे सुखकी ही प्राप्ति होती है।’ जान-बूझकर शास्त्रविहित कर्मोंका त्याग करना प्रेमका आदर्श नहीं है, मोह है, उच्छृंखलता और स्वेच्छाचार है। ऐसा करनेवाला परिणाममें आसुरी योनि, नरक और दु:खोंको ही प्राप्त होता है।
लोकोऽपि तावदेव किन्तु भोजनादिव्यापारस्त्वाशरीरधारणावधि॥१४॥
१४-लौकिक कर्मोंको भी तबतक (बाह्यज्ञान रहनेतक विधिपूर्वक करना चाहिये।) पर भोजनादि कार्य जबतक शरीर रहेगा तबतक होते रहेंगे।
वैदिक कर्मके साथ ही लौकिक जीविका, गृहस्थ-पालन आदिके कार्य भी सावधानीके साथ भगवदनुकूल विधिके अनुसार करने चाहिये। अवश्य ही एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें वैदिक, लौकिक कार्य अनायास ही छूट जाते हैं; परंतु उस स्थितिके प्राप्त होनेतक दोनों प्रकारके कर्म विधिवत् अवश्य करने चाहिये। फिर तो आप ही छूट जायँगे। परन्तु आहारादि कर्म उस अवस्थामें भी रहेंगे। कारण, वे शरीरके लिये आवश्यक हैं। यद्यपि प्रेमके नशेमें चूर भक्त आहारादिके लिये न तो कोई इच्छा करता है और न चेष्टा ही करता है, परन्तु आहारादि प्राप्त होनेपर अभ्यासवश अनायास ही उसके द्वारा आहार कर लिया जाता है। अवश्य ही वह भी भगवत्प्रसाद ही होता है।