भगवान्के मिलनेकी आशा और भगवद्भावको बढ़ाता रहे
अपनेमें भगवद्भाव खूब बढ़ावे। कोई घरमें आ जाय तो समझे भगवान् आ गये। वाह प्रभु! आप इस रूपमें आये हैं, मैं आपको समझ गया, अब आप छिप नहीं सकते। मन-ही-मन खूब प्रसन्न होवे। मार्गमें चल रहे हैं, आकाशमें बिजली चमकी, प्रकाश हुआ। मनमें समझे कि प्रभुका ही प्रकाश है। अब कोई भी सामने आये, उनको भगवद्भावमें भावित होकर देखे। जितना आदर हम भगवान्को देते हैं, उतना आदर उनका करे। खूब प्रसन्न होवे, प्रभु! अब मैं आपको जान गया, अब आप छिप नहीं सकते हैं।
मनमें दृढ़ निश्चय कर लें कि आज भगवान् अवश्य मिलेंगे। न मिलें तो सोचे कि क्यों नहीं मिले, क्या बात है? आज भगवान् नहीं आये। अच्छा अभी नहीं आये, रातको तो अवश्य आयेंगे। रात हुई अब भगवान् आयेंगे। कुछ देर हुई नहीं आये। क्या बात हुई? अभीतक भगवान् नहीं आये, आज तो आनेकी बात थी। क्या हो गया? क्यों विलम्ब हो रहा है। खटका हुआ, भगवान् आ रहे हैं, नहीं तो खटका होता ही कैसे? यहाँ और कोई तो है ही नहीं। उठकर देखा कोई नहीं है। रात हो गयी, सोनेका समय हो गया। प्रभु! अब तो आइये, मेरे पास कोई नहीं है। हे मेरे नाथ! मैं अकेला हूँ, आप क्यों देरी कर रहे हैं। हे मेरे प्रभु! इस प्रकार भगवद्भावके भावोंमें भावित होकर सो जाय। मनमें निश्चय करके सोये कि रातको भगवान् अवश्य आयेंगे और अवश्य मिलेंगे। सुबह हुई, भगवान् नहीं आये। मनमें समझे भगवान् अभी तक क्यों नहीं आये। अच्छा, आज तो अवश्य ही आयेंगे। बस एक ही धुन सवार हो जाय।
मैं आशिक तेरे रूप पे
बिन मिले सबर नहीं होय।
इस प्रकार भगवान्से मिलनेकी उत्कट इच्छा जाग्रत् हो जाय कि अब भगवान् मिलेंगे, अब भगवान् मिलेंगे, अवश्य मिलेंगे, बस इसी धुनमें रात हो गयी।
हे मेरे प्रभु! हे मेरे नाथ! आप अभीतक क्यों नहीं आये? क्यों विलम्ब हो रहा है? इस प्रकार विरह व्याकुलता खूब बढ़ावे।
भगवान्के बिना एक क्षण भी चैन नहीं पड़े। बस, इसी प्रकारके संकल्पोंके प्रवाहमें सो जाय। जब नींद खुले तब भगवान्के विरहमें आतुर हो जाय और प्रभुके लिये पागल हो जाय। इस प्रकार भगवद्भावोंके संकल्प निरन्तर चलते रहेंगे तो भगवान् एक-न-एक दिन अवश्य मिलेंगे। जब भगवान्के बिना एक क्षण नहीं रहा जायगा, प्रभु उसी क्षण प्रगट हो जायँगे।
जग चतुराइ छोड़कर
मूढ होय भज राम।
आलस्य विक्षेपको बराबर हटाता रहे। इनको तो निकट ही नहीं आने दे।
क्रिया और भाव ऊँचे-से-ऊँचा करना चाहिये। क्रियामें ऊँची-से-ऊँची भजन, ध्यान, सेवा है। संसारमें संसारकी भावना हटाकर परमात्माकी भावना करे।
नामको नामीका स्वरूप माने। भगवान्का नाम जपते समय खूब प्रसन्न होवे, क्षण-क्षणमें मुग्ध होता रहे। मानो नामके रूपमें भगवान् हैं।
संसारमें अपनी प्रीति है और स्मृति भी है। भगवान्में प्रीति भी नहीं और उनकी स्मृति भी नहीं है। इसे उलट देना है। संसारसे प्रीति हटाकर भगवान्में जोड़ दे और संसारकी स्मृति हटाकर भगवान्की स्मृति निरन्तर रखे। जैसे खेतमें अन्न उगता है। किसान लोग यथास्थान लगानेके लिये एक अन्नको तोड़कर दूसरी जगह लगाते हैं। ऐसे ही अपने यथास्थान लगानेके लिये संसारसे प्रीति तोड़कर परमात्मामें लगावे। भगवान्को सबसे बढ़कर समझे। भगवान्से बढ़कर संसारमें कोई वस्तु है ही नहीं।
समता ही परमात्माका स्वरूप है। जिनका मन समतामें स्थित है, उनकी परमात्मामें अटल स्थिति है।
संसारकी ओरसे मन हटाना ही वैराग्य है। वृत्तियोंका कहीं न जाना, एक परमात्माके अखण्ड ध्यानमें निरन्तर स्थित रहना— यही उपरामता है।
संसार परमात्माका संकल्प है, वहाँ संकल्पके सिवाय कुछ है ही नहीं। जिनका संकल्प है, वे प्रभु अणु-अणुमें व्याप्त हैं। इसलिये संसारमें परमात्माके सिवाय कुछ है ही नहीं।