दहेजके त्यागसे जातिकी रक्षा

प्रवचन दिनांक—२६-१-१९४१, कलकत्ता

राजस्थानमें क्षत्रिय लोग लड़कीको मार डाला करते थे। कारण यही खर्चकी वृद्धि था। आज वही दशा हमारी जातिकी होने जा रही है।

भाई लोग जब आकर अपना दु:ख सुनाते हैं तो भले आदमीके आँखोंमें आँसू आने लगते हैं। पचास रुपया महीना कमानेवाले भाईकी लड़कीके विवाहमें दो-तीन हजारका खर्च लगता है, इतना रुपया कहाँसे लाये।

लड़कीवाला दहेज नहीं देनेकी बात कहे, यह नहीं हो सकता। लड़केवालेको त्याग करना चाहिये। जिस भाईके लड़के हैं, उनके लड़की भी होगी। न भी हों तो भी उन्हें समाजके लिये कुछ विचार करना चाहिये।

जिसमें त्यागवृत्ति हो वही इसे निभा सकेगा। लड़कीके विवाहमें आपको जो देना होगा आप देंगे, पर लड़केके विवाहमें आप त्याग करें। सभी लोग इस बातको मान लें तो आपको लड़कीके विवाहमें भी देना नहीं पडे़गा। आरम्भमें तो थोड़ी शूरवीरताकी ही आवश्यकता पडे़गी।

हमारे घरोंकी स्त्रियोंको भी समझना चाहिये। थोड़ा दहेज लेकर आनेवाली बहूको सास ताना मारती है, बहू बेचारी जाकर अपने माँ-बापके सामने रोती है।

यह तो विवाहके बादकी बात है। विवाहके पूर्व हरे-भरेके नेगका दो सौ रुपया सुनकर बेटेवाले बहाना करने लगते हैं। जब लड़कीवाला चार सौ रुपया देना स्वीकार कर लेता है तो ठीक है नहीं तो तिलक वापस कर देते हैं। विदाईके समय कम देनेपर लड़केवालोंका मुँह उतर जाता है। यह वास्तविकता है—

अन माँग्या तो दूध बराबर

माँग लिया सो पाणी।

खैंचातानी खून बराबर

यह संतोंकी वाणी॥

त्याग होना चाहिये। त्यागसे आत्माका उद्धार होता है। संसारमें मान मिलता है, गौरव बढ़ता है। वीरता, धीरताके साथ त्याग करना चाहिये। लड़केके विवाहमें दहेजकी प्रथा यथाशक्ति बन्द कर देनी चाहिये। दहेजका दिखावा एवं लेन-देन कतई बन्द कर देना चाहिये। जब दहेज ही बन्द हो जायगा, तब सब काम ठीक हो जायगा।

लड़कियाँ मरने लगीं या लोग मारने लगे तो फिर हमारी जाति रहेगी ही कैसे? हमारी जातिमें घोर आग लग गयी है। यदि नहीं बुझावेंगे तो परिणाम घोर भयंकर आनेवाला है। अपने स्वार्थकी ओर देखकर भी आपको इसपर विचार करना चाहिये। हमारी जातिका नाश हो जायगा तो धर्म भी अवश्य ही नष्ट हो जायगा। हमलोगोंको तत्पर होकर, आगे बढ़कर इस काममें भाग लेना चाहिये।