दूसरोंकी दृष्टिसे अपनी भूल मानना हितकारी

प्रवचन दिनांक—१-१-१९४६, गोरखपुर

जो मेरी भूल मानता है, मेरी दृष्टिसे भूल न होनेपर भी उसकी दृष्टिसे मैं स्वीकार कर लेता हूँ। भूलको मैं अपने माथेपर ले लेता हूँ, क्योंकि जब वह मुझमें भूल मानता है तो उसकी दृष्टिसे मान लेता हूँ। दृष्टिभेद तो रहता ही है। अपनी आत्माका कल्याण चाहनेवाले, अपने व्यवहारका सुधार चाहनेवालेको इसी तरह मान लेना चाहिये। कोई भी व्यक्ति यदि हमारे कारण दुखी है तो उचित यह है कि हमें उसका दु:ख दूर करना चाहिये। नहीं तो कमसे कम अपनी भूल मान ही लेनी चाहिये।

यह देखा जाता है अन्तकालमें भगवान‍्की स्मृति रखते हुए मरनेवालोंका कल्याण हो जाता है। कल्याण करनेवाले भगवान् हैं और कल्याणमें हेतु है उस मरनेवालेकी भक्ति, उसमें हमलोग निमित्त हो गये। भगवान‍्की कृपा है जो उसे भगवन्नाम सुनानेमें हमलोगोंको निमित्त बना लिया। हमलोग नहीं बनते तो दूसरोंको बना लेते।

भगवान् निमित्त बनायें तो बन जाना चाहिये। अहंकार नहीं करना चाहिये कि मेरे द्वारा अमुक उत्तम कार्य हुआ। मेरेमें तो बुद्धिकी बड़ी कमी है। व्यवहारमें बहुत भूल होती है। पर भगवान‍्की बड़ी दया है, दयाकी सीमा ही नहीं है। पद-पदपर दया दिखलायी देती है। कई बार मैं किसीसे बात करता हूँ, पर अपनी बात समझा नहीं पाता। मेरा उच्चकोटिका व्यवहार नहीं होता। पर इससे अच्छा कैसे करूँ, यह समझमें नहीं आता। प्राय: ऐसा होता है। आपलोग सहायता करें। मैं शिक्षाके रूपमें लेना भी चाहता हूँ। मेरे व्यवहारसे जिन लोगोंको उद्वेग नहीं होता, यह तो उन लोगोंकी ही दया है। उनकी श्रद्धा और प्रेम ही इसका कारण है। मेरी क्या विशेषता हुई। अगर मेरी होती तो किसीको भी मुझसे उद्वेग क्यों होता। मैं तो ऐसा चाहता हूँ कि किसीको भी मेरे द्वारा उद्वेग न हो। यस्मान्नोद्विजते लोको पर यह होता नहीं है। दूसरेसे उद्वेगको न प्राप्त होना यह तो भीतरकी बात है। मैं कुछ इस विषयमें नहीं कहता, आप जो चाहे समझें। पर ऊपरसे तो यही दीखता है कि उद्वेग होता है। अपनी कमजोरीकी बात मैंने सुनायी। आप भी इससे लाभ उठाना चाहें तो उठा सकते हैं। लौकिक-पारलौकिक सभी बातोंमें भगवान‍्की दया-ही-दया दिखायी देती है। मेरे प्रति कुटुम्बकी, स्त्री एवं भाइयोंके व्यवहारमें भगवान‍्की दया-ही-दया है। संसारमें लोग इनको ही सुख मानते हैं। जहाँ मैं जाता हूँ, वहीं मकान मिल जाते हैं, कोई कमी नहीं है। खाने-पीनेका शुद्ध सामान, हाथका घी, हाथका पिसा हुआ आटा सब आगेसे आगे तैयार रहता है। कहीं कष्ट नहीं। दया-ही-दया भरी पड़ी है। पारलौकिक दया भगवान‍्का उपदेश पद-पदपर दीखता रहता है। जो कुछ भी प्रारब्धानुसार सुख-दु:ख आकर प्राप्त होता है, सबमें भगवान‍्की दया-ही-दया दिखायी पड़ती है। जिनको आप दु:ख कहते हैं, उनमें मुझे तो दया-ही-दया दिखायी देती है।

स्त्रियोंको गहने-कपड़ोंमें तथा सन्तानमें सुख दीखता है। पर वास्तवमें इनमें दु:ख-ही-दु:ख है, परन्तु यह बात समझमें नहीं आती। मुझे भगवान‍्की सर्वत्र दया-ही-दया दीखती है। भगवान‍्की स्मृति होना, आपलोगोंका मिलना—सब भगवान‍्की दया-ही-दया है। अच्छे कामके लिये भगवान् निमित्त बनाते हैं, यह उनकी दया है, लेख लिखते हैं—अच्छे-अच्छे ग्रन्थ देखने पड़ते हैं, शास्त्रोंका अनुशीलन किया जाता है, सब भगवान‍्की दया-ही-दया है। लोगोंकी जितनी श्रद्धा है, मैं उसके योग्य नहीं हूँ, लोगोंकी ही दया है कि वे मुझे अच्छा समझते हैं। मैं उनकी धारणाके अनुसार बनकर रहनेका ही तो प्रयत्न करूँगा। यह उनकी दया ही तो है, जो मुझे अच्छा समझते हैं। जो मेरेसे प्रेम करता है, उससे मैं प्रेमका व्यवहार करूँ, इसमें मेरी क्या महत्ता है। मेरी महत्ता तो तब है, जब प्रेम न करनेवालेसे मैं प्रेमका व्यवहार करूँ। आपलोगोंको भी अपने कल्याणके लिये ऐसे ही समझना चाहिये। हम जितना अनुमान करते हैं, उससे अनन्तगुनी दया हमपर है, हमारी बुद्धिमें वह समा ही नहीं सकती। छोटे शीशेमें आकाशका प्रतिबिम्ब भी नहीं समा सकता है। जो जितनी अधिक दया अपनेपर समझता है, उतनी ही फलती है।