हर परिस्थितिमें भगवान्की दयाके दर्शन तथा निष्कामभावकी महिमा
प्रवचन दिनांक—१२-५-१९५९, गंगेहरकी कुटिया, वटवृक्ष, स्वर्गाश्रम
मैं अपना समय व्यर्थ नहीं खोता हूँ। खाली रहनेपर जप करता रहता हूँ। समय व्यर्थ नहीं खोना चाहिये। सत्संगमें आने-वालेको पाँच मिनट पहले आ जाना चाहिये।
अपने मनके अनुकूल या प्रतिकूल जो भी घटना होती है, वह अपने लिये भगवान्का मंगलमय विधान है। उसके प्राप्त होनेपर प्रसन्न रहे। प्रभु मंगल करनेवाले हैं, अनिष्ट तो वे करते ही नहीं।
सत्संगके समय कोई नास्तिक आकर निरर्थक बातें पूछने लगे तो उसको विघ्न नहीं समझे। उसमें प्रसन्न रहे। यदि विघ्न माने तो नीची श्रेणी है। वह भगवान्का भेजा हुआ है। भगवान् परीक्षा कर रहे हैं, यदि विघ्न मान लिया तो अनुत्तीर्ण हो गये। उसको पुरस्कार मान लिया तो पुरस्कार है।
रोग आता है तो औषधि लेनी चाहिये। जैसे प्यास लगती है तो जल पीना पड़ता है, इसी तरहसे औषधि लेनेसे रोग ठीक होने लगे तो प्रसन्न नहीं होना चाहिये। यदि रोग बढ़ता है तो दु:ख नहीं होना चाहिये।
मनके अनुकूलमें उतनी शिक्षा नहीं है, जितनी प्रतिकूलमें शिक्षा मिलती है। प्रतिकूल अवस्थामें वैर, द्वेष, क्रोध आदि नहीं हों तो यह उत्तम बात है। क्रोधका आपके पास अवसर नहीं आया और आपको क्रोध नहीं आया तो क्या पता चले कि अपने क्रोधपर विजय पायी है। क्रोधकी स्थिति आनेपर क्रोध नहीं हो, तब वास्तविक स्थितिका पता चले।
भगवान्की दयाको इतनी छोटी बना दी। स्त्री, पुत्र एवं धनमें ही लगा दी। यह आत्मकल्याण करनेवाली नहीं है। इनमें समता रहनी चाहिये। यदि इनमें ही दया मान ली तो डूब जाता है।
भगवान्की दयाको सकाम भावमें मान लिया तो नीचे गिरनेकी सम्भावना है और प्रतिकूलतामें दया माने तो यह प्रतिकूलता ऊँचा उठानेवाली है। रोगके द्वारा भगवान् चेताते हैं कि मृत्यु आनेवाली है, भगवान् सावधान करते हैं। रोग पापका फल है, निश्चिंत होकर कैसे सो रहे हो। यदि उसको परम तपमें घटा ले तो वह परम तप हो जाता है। मेरे रोग हुआ तब मैंने शरीरमें खोजा, किन्तु उसमें भोक्ता नहीं मिला।
आपने भगवान्की प्राप्तिको कठिन मान लिया, इसलिये विलम्ब हो रहा है। आपने साधन थोड़ा किया और उसको बहुत मान लिया। आप हिसाब लगायें कि आप कितने समय भजन करते हैं और कितने समय दूसरा काम करते हैं।
एक आदमी एक करोड़ रुपये नित्य कमाता है, वह भी कहता है कम है। इसी तरह यदि चौबीस घंटे भजन होने लगे तो वह भी कहेगा कि अभी भजन थोड़ा होता है।
करमें तो माला फिरे जीभ फिरे मुख माहिं।
मनवा तो चहुँ दिसि फिरे यह तो सुमरन नाहिं॥
अपना साधन बेगार काटनेकी तरहसे है। यदि प्रेम हो जाय तो भजन छूटे ही नहीं। जैसे प्रह्लाद, मीरा आदिको कितनी कठिनाई हुई, पर उनसे भजन नहीं छूटा।
भजन होवे तो ऐसा विश्वास करे कि सब रोमोंसे नाम-जप हो रहा है। बहुत प्रेम, श्रद्धासे भजन करे, तब इस प्रकार प्रतीत होता है। भजन श्रद्धा-विश्वाससे करे। भजनसे पापोंका नाश मानना भूल है। अन्धकारका नाश तो सूर्यके आभासमात्रसे हो जाता है। सूर्यसे यह कहनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती कि हे सूर्य भगवान्! अन्धकारका नाश कर दें। इसी तरह भगवान्के स्मरणमात्रसे ही पापोंका नाश हो जाता है। फिर भगवान्से उसके लिये क्या कहें।
पारससे संत श्रेष्ठ हैं, संतसे नाम श्रेष्ठ है, नामसे बढ़कर भगवान् श्रेष्ठ हैं। भगवान् सबसे श्रेष्ठ हैं। जो भगवान्को सबसे श्रेष्ठ समझ लेता है, वह उनको सब प्रकारसे भजता है। वह कभी परमात्माको भूल नहीं सकता।
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥
(गीता १५। १९)
हे भारत! जो ज्ञानी पुरुष मुझको इस प्रकार तत्त्वसे पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकारसे निरन्तर मुझ वासुदेव परमेश्वरको ही भजता है।
जब वह परमात्माको कभी नहीं भूलेगा तो परमात्मा भी उसको कभी नहीं भूलेंगे।
संसारके पदार्थ केवल इच्छा करनेसे नहीं मिलते, वे प्रारब्धसे मिलते हैं। भगवान् इच्छा करनेसे मिलते हैं।
भगवान् आज ही मिल सकते हैं, यदि आप एक भगवान्के सिवाय और किसी चीजकी इच्छा नहीं रखें।
हमारी स्त्री, पुत्र, धन, मान-बड़ाई आदिमें जो प्रीति है, यदि उन सबसे हटाकर एक भगवान्में प्रीति हो जाय तो भगवान् आपके पीछे-पीछे घूमने लग जायँ। दूसरेमें आपका प्रेम, भक्ति होगी तो भगवान् नहीं आयेंगे। वह तो व्यभिचारिणी भक्ति है। उससे भगवान् नहीं आते। केवल भगवान्के मिलनेकी उत्कट इच्छा हो तो भगवान् रह नहीं सकते।
लोग रुपये, स्त्री, पुत्र बहुत चाहते हैं, पर मिलते कितनोंको हैं। जितना उनके प्रारब्धमें होता है, उतना ही मिलेगा।
भगवान्में श्रद्धा, विश्वास, प्रेम या उत्कट इच्छा हो जाय तो इनमेंसे एक-एक बात भगवान्की प्राप्ति करानेवाली है।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:॥
(गीता ९।२६)
जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेमसे पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्तका प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुणरूपसे प्रकट होकर प्रीतिसहित खाता हूँ।
भगवान् कहते हैं कि प्रेमसे अर्पण किया हुआ मैं खाता हूँ। क्या भगवान्ने झूठ कहा है? आप प्रेमसे दें, आज भी भगवान् आकर खा सकते हैं। जैसे द्रौपदीने बुलाया और भगवान् आ गये। भगवान्ने सहदेवसे कहा कि दुर्वासाजीको बुला लाओ। यह श्रद्धा है कि वहाँपर खानेकी एक भी वस्तु नहीं, पर भगवान्ने कहा कि बुला लाओ तो बुलाने चले गये।
निष्कामभावका दर्जा बहुत ऊँचा है। इसके आरम्भका नाश नहीं होता है। सकामभावसे की हुई क्रियाका फल मिल गया तो उसका नाश हो जाता है। पुत्रके लिये यज्ञ किया और पुत्र हो गया तो उसका फल समाप्त हो गया। वैद्यसे दवा ली और पैसा दे दिया, वह लेनदेन समाप्त हो गया। निष्कामभावसे थोड़ा भी काम किया, बदलेमें कुछ भी नहीं चाहा तो वह कैसे समाप्त हो सकता है। उसके तो भगवान् ऋणी हो जाते हैं। जैसे हनुमान्जीके भगवान् राम ऋणी हैं। भगवान्ने हनुमान्जीको बड़ा मूल्यवान् हार दिया। वे हारको दाँतोंसे तोड़कर देखते हैं। किसीने पूछा क्या कर रहे हो? हनुमान्जीने कहा—राम नाम देखता हूँ। जिसमें रामका नाम नहीं, वह कोई कामका नहीं। उन्होंने पूछा क्या तुम्हारे शरीरमें राम हैं? हनुमान्जीने कहा यदि शरीरमें नहीं हैं तो शरीर कोई कामका नहीं। हनुमान्जीने अपनी छाती चीरकर भगवान्के दर्शन करा दिये।
भगवान्ने कहा कि हनुमान् मैं तुम्हारा ऋणी हूँ और मैं उससे मुक्त होना भी नहीं चाहता, क्योंकि तुम्हारे ऊपर विपत्ति आये और मैं तुम्हारी सहायता करूँ, तब उऋण होऊँ। मैं यह नहीं चाहता कि तुम्हारे ऊपर विपत्ति आये।
हनुमान्जीके रोम-रोममें राम-राम था। इतना प्रेम होना चाहिये कि हर एक रोमकी जड़में राम-राम अंकित हो जाय। प्रेम हो जाय और उस समय रोमाञ्च हो तो यह भाव करना चाहिये कि मेरे हर रोमसे राम-राम हो रहा है। इस तरहसे एक रामका नाम लेनेसे बहत्तर करोड़ नाम हो जाते हैं। भावके मुकाबलेमें क्रिया बहुत नीचे दर्जेकी है। निष्काम भाव है, क्रिया कार्य है।
स्वर्ग मिल गया तो क्या, नरक मिल गया तो क्या? सिद्धान्तके हिसाबसे जैसा स्वर्ग है, वैसा ही नरक है। न मालूम हम कितनी बार स्वर्गमें गये और कितनी बार नरकमें गये। एक बार और स्वर्गमें चले गये तो क्या हुआ?
अपनी आत्माका कल्याण हो तो नरक भी अच्छा है और अपनी आत्माका पतन हो या फँसाव हो तो स्वर्ग भी किस कामका?
निष्कामभाव थोड़ा होनेसे भी कल्याण हो जाता है, पूरा होनेसे तो वह दूसरोंका भी कल्याण कर सकता है। ऐसे पुरुषोंका संग बहुत लाभदायक है।
हम कई वर्षोंसे सत्संग कर रहे हैं, पर वह सुख नहीं मिला। सत्संगका तात्पर्य क्या है? एक नम्बर सत्संग परमात्माके साथ संग है। दो नम्बर भगवान्के साथ जो परिकर रहते हैं, उनका संग। जैसे कृष्ण-अवतारमें भगवान्के परिकर थे।
एक भक्तको वैकुण्ठ ले जा रहे थे, मार्गमें नरक मिला। नारकी जीव कष्टसे चिल्ला रहे थे। उनके दु:खको देखकर भक्त बोला—यहाँपर ठहरिये। भक्तके ठहरनेसे उनका चिल्लाना बन्द हो गया, उनकी पीड़ा शान्त हो गयी। वे कहने लगे—आपके शरीरको स्पर्श करके जो वायु आती है, उससे हमें बहुत शान्ति मिल रही है। उसने यमदूतोंको कह दिया कि मुझे वैकुण्ठमें क्या करना है? यदि इन सबके लिये भी वैकुण्ठमें स्थान हो तो मैं भी चल सकता हूँ, अन्यथा यहींपर रहूँगा। इतने दुखियोंको सुख मिलता है, तब वैकुण्ठमें क्या करना? भक्तने वहाँपर कीर्तन प्रारम्भ कर दिया। सब मिलकर कीर्तन करने लगे। सबके पाप नष्ट हो गये और वे वैकुण्ठके अधिकारी हो गये।
रामनामके प्रभावसे भगवान् शंकरने काशीमें मुक्तिका क्षेत्र खोल रखा है। रामनाम तारक मंत्र है।
ईश्वरके साथ रहकर या महापुरुषोंके साथमें रहकर मुक्ति बाँटे तो उसमें जो आनन्द है, वह स्वयं मुक्त होनेमें नहीं है।
निष्कामभावसे थोड़ी क्रिया करनेसे भी मुक्त हो जाता है।
भगवान् कहते हैं कि कर्म मुझको नहीं बाँध सकते, क्योंकि कर्मके फलकी मुझे परवाह नहीं है।
निष्कामभाव आरम्भ हो जाता है तो वह उसका कल्याण करके ही छोड़ता है। निष्कामभावमें कोई भी विघ्न नहीं आता, क्योंकि भगवान् उसकी रक्षा करते हैं।
मनुष्य इसके लिये बाध्य नहीं है कि निष्काम कर्म करना ही पड़ेगा। जैसे माता-पिताकी सेवा करना कर्तव्य है। यज्ञोपवीत-वालेको सन्ध्यावन्दन एवं गायत्री-जप करना कर्तव्य है। उसी तरह परमात्माकी प्राप्तिकी इच्छा रखनेवालेको निष्काम कर्म करना चाहिये।
निष्कामभावसे क्रिया करते-करते यदि कोई भूल भी हो जाय तो भगवान्के यहाँ उसका दण्ड नहीं मिलता। साधनको साध्यसे भी बढ़कर मानना चाहिये।
भगवान्के दर्शन जिसको होते हैं, वह कह सकता है कि भगवान् मिलते हैं, दूसरा कैसे कह सकता है?