इस क्षणभंगुर शरीरमें भगवच्चर्चा और भगवत्प्रेम ही सार है

एक ओर तो मनुष्य जीवनकी इतनी क्षणभंगुरता और लाचारी एवं दूसरी ओर उसका अभिमान तथा राग-द्वेष। बड़ी ही शोचनीय स्थिति है। मनमें बात है बोल नहीं सकते। संसारके पदार्थोंमें ममता है। ममता रहनेपर ही मर गये। मरनेके बाद कुछ भी नहीं कर सकते। अत: मनुष्य शरीरकी इस स्थितिका खयाल करके सदा सावधान रहना चाहिये तथा सब प्रकारके राग-द्वेषका त्याग करके सदा भगवान‍्के स्मरणमें ही अपनेको लगाये रखना चाहिये, तभी कल्याण है।

भगवान‍्के सिवाय मनमें जो फालतू अडंग बडंग फुरणा होती है, उसको सर्वथा हटाकर केवल परमात्माका चिन्तन करे। फालतू चिन्तन होने ही नहीं दे, फालतू चिन्तन बड़ा ही हानिकर है। यही सबसे बढ़कर बात है।

संसारके स्त्री, धन, कुटुम्ब, परिवार ये सब हाड़, मांस एवं विष्ठाके पुतले हैं। इनमें क्या प्रेम करे। प्रेमके योग्य तो केवल एक परमात्मा ही हैं। संसार प्रीति करनेके योग्य नहीं हैं। संसारमें प्रेम करना महामूर्खता है एवं अपना पतन करना है। गलेमें फाँसी लगाकर मरना है। इसलिये सब ओरसे मनको हटाकर केवल एक परमात्मामें ही लगाये।

भगवान‍्के नामका जप तथा कीर्तनसे फालतू फुरणा बहुत ही कम हो जाती है।

मनमें खूब वैराग्य रखे। वैराग्य ही सबसे ऊँचे दर्जेकी चीज है। शरीरमें प्रीति नहीं करे। खाने-पीनेके लिये जो कुछ मिल जाय, रोटी मिली तो क्या, खिचड़ी, हलुवा हुआ तो क्या। अन्दर जाकर सबकी खाक ही हो जाती है।

स्वाद, आराम, भोगकी इच्छा पहलेसे ही हटा दे। संसारके खाने-पीने, चमक-दमकके जो पदार्थ हैं, भीतरसे उनका बिलकुल तिरस्कार कर दे।

भोजन करे तो स्वादकी ओर खयाल ही नहीं करे। केवल परमात्माके ध्यानमें, चिन्तनमें स्थित होकर ही करे। और कोई भी काम करे तो भगवान‍्के ध्यानमें मस्त होकर करे।

खाने-पीनेकी, भोगकी, ऐश-आरामकी वस्तुएँ एवं संसारके पदार्थोंका संग्रह नहीं करे। इन सब पदार्थोंसे बिलकुल उपराम होकर संसारमें विचरण करे।

मनुष्य जीवनमें खूब विरक्ति होनी चाहिये। अपने शरीरका पालन-पोषण तो पशु भी करता है। इसमें क्या विशेषता है? विशेषता दूसरोंके परोपकारमें एवं सेवा करनेमें ही है। निष्काम हो तो सबसे उत्तम है।

हर समय अपनेपर भगवान‍्की दया समझता रहे। हर समय भगवान‍्का हाथ मस्तकपर समझे।

भगवान‍्की दया-प्रेम समझ-समझकर हर समय नाचता रहे, मुग्ध होता रहे। चारों ओर उनकी दया-ही-दया देखे। अपने मस्तकपर भगवान‍्का हाथ देखे और हर समय आनन्दमें मुग्ध होता रहे।

ऐसे ही निराकारके उपासक समझें, मानो एक आनन्द-ही-आनन्द है। आनन्दके सिवाय कुछ है ही नहीं। अपनेको आनन्दके सागरमें डूबा हुआ समझे, मानो मेरे चारों ओर आनन्द है। वह आनन्द कैसा है? नित्य है, चेतन है, सत्य है।

चले तो ऐसा प्रतीत हो मानो मैं आनन्दमें ही चल रहा हूँ। मेरे ऊपर-नीचे, बाहर-भीतर, चारों ओर एक आनन्द-ही-आनन्द परिपूर्ण हो रहा है। ऐसा प्रतीत हो मानो आनन्दकी बाढ़ आ गयी हो। हर समय आनन्दमें मस्त रहे।

हर एक भाईको एकान्तमें बैठकर भगवान‍्को सम्मुख समझकर गद‍्गदभावसे आर्त होकर रुदन करना चाहिये। हे नाथ! मेरा आपके सिवाय दूसरा कोई नहीं है। हे प्रभो! हे दीनबन्धो! मैं आपकी शरण हूँ। मेरी रक्षा करो। आपके सिवाय मेरे दूसरा कोई आधार नहीं है। हे कृपासिन्धो! बस, मेरी यही इच्छा है कि आपके चरणारविन्दको छोड़कर दूसरे किसी भी पदार्थोंका किसी कालमें, किसी प्रकारसे, कभी भी चिन्तन न हो। जाग्रत् , स्वप्न, सुषुप्ति सभी अवस्थामें आपकी मधुर मूर्तिकी झाँकी निरन्तर देखता रहूँ। अबसे लेकर मरणपर्यन्त भगवान‍्को एक क्षण भी नहीं छोडे़।

बार-बार मनसे पूछे बोल तेरी क्या इच्छा है? उत्तर यही मिले कुछ नहीं, कुछ नहीं, कुछ नहीं। मनसे संसारकी फुरणा सर्वथा हटा ही दे, निकट आने ही न दे, किन्तु भगवान‍्को नहीं छोड़े।

शौच जाय तो परमात्माका ध्यान करे, पेशाब करे तो परमात्माका ध्यान करे, भोजन करे तो परमात्माका ध्यान करता हुआ ही करे। चलना-फिरना तथा जो कुछ भी क्रिया करे, परमात्माके ध्यानमें मस्त होकर करे। सबसे बढ़कर है श्रद्धा-प्रेम, केवल परमात्मा इसके योग्य हैं। भगवान‍्की अपने ऊपर हर समय कृपा मानता रहे।

महात्माके द्वारा जो चीज देखी जाय, छुई जाय, सुनी जाय, वे सब मुक्तिदायक हो जाते हैं, आँखके द्वारा देखी जाय, कानोंद्वारा सुनी जाय, लेख वगैरह जो कुछ देखा जाय, वे सब चीज मुक्तिदायक हो जाते हैं। महात्माके द्वारा जिस चीजका सम्बन्ध हो जाय, वह चीज भी मुक्तिदायक हो जाती है।

महात्माका मिलना जन्म-मरणका अन्त करनेवाला है, किन्तु महात्माका मिलना भगवान‍्की कृपासे ही होता है।

ईश्वरके लिये ईश्वरसे प्रेम करे। भगवत् विषयको लेकर भगवान‍्की इच्छा रखनेवालोंसे प्रेम करे। इन दोनोंमें दूसरा अधिक महत्त्वपूर्ण है। बड़े आदमियोंसे प्रेम करनेवाले बहुत हैं, किन्तु दुखी, अनाथ, गरीब व्यक्तियोंसे प्रेम करना अधिक महत्त्वपूर्ण है। संसारकी सत्ता परमात्मतत्त्वका बोध न होनेपर है। परमात्मतत्त्वका बोध होनेपर संसारकी सत्ता नहीं रहती। जैसे दिग्भ्रम हो जाता है।

धन और पुत्र आदि किसी पदार्थसे तृप्ति नहीं हो सकती। अधिक धन-परिवार होनेसे भजन होना कठिन है।

अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥

(गीता ९। ३३)

इसलिये तू सुखरहित और क्षणभंगुर इस मनुष्यशरीरको प्राप्त होकर निरन्तर मेरा ही भजन कर।

ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।

आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध:॥

(गीता ५। २२)

जो ये इन्द्रिय तथा विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले सब भोग हैं, वे यद्यपि विषयी पुरुषोंको सुखरूप भासते हैं तो भी दु:खके ही हेतु हैं और आदि-अन्तवाले अर्थात् अनित्य हैं। इसलिये हे अर्जुन! बुद्धिमान् विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता।

भगवान‍्ने हमें सत्संग दिया, भजन करनेकी रुचि दी, फिर भी हम तीव्रताके साथ भजनमें नहीं लगते इसका कारण है विषयोंमें आसक्ति।

हम आये थे भगवत्प्राप्ति करनेके लिये और लग गये विषयोंको बटोरनेमें।

हिरण्यकशिपु, रावणको देखिये। सारे संसारका वैभव उन्हें प्राप्त था, किन्तु अन्तमें उन्हें खाली हाथ जाना पड़ा।

हम किस वैभवकी इच्छा करें। मनुष्यको केवल भगवान‍्की इच्छा करनी चाहिये। भगवान‍्के बलपर ही भगवान‍्को पानेकी इच्छा करनी चाहिये। उन्हींके बलपर हम उन्हें प्राप्त कर सकते हैं।

साधकको अन्धा, बहरा, गूँगा, पंगु बन जाना चाहिये।

साधक सर्वत्र भगवान‍्को देखे। भगवान‍्की बात ही सुने, भगवान‍्की चर्चा ही करे, दूसरी चर्चा न करे। चले तो भगवान‍्की ओर ही चले।

कानन दूसरो नाम सुनै नहिं

एकहि रंग रंगो यह डोरो।

धोखेहु दूसरो नाम कढै

रसना मुख बाँधि हलाहल बोरो॥

ठाकुर चित्तकी वृत्ति यहै

हम कैसेहु टेक तजैं नहिं भोरो।

बावरि वे अँखियाँ जरि जायँ

जो साँवरो छाँड़ि निहारति गोरो॥

साधकको भजनको छोड़कर और काम करनेका अवकाश ही नहीं होना चाहिये।

भगवान‍्के नाम, रूप, गुण आदिका निरन्तर स्मरण करनेकी चेष्टा करे। जगत‍्को भूल जाय तो कोई हर्ज नहीं, परन्तु भगवान‍्को नहीं भूले। दो काम मुख्य हैं—

भगवान‍्की कृपापर अटल विश्वास और भगवान‍्के नामका निरन्तर जप।

साध्य भले ही न मिले, पर साधन नहीं छूटना चाहिये। साधनको साध्य बना ले। साधनमें उकताना नहीं चाहिये। साधनमें कभी संतोष नहीं करे। निरन्तर और आजीवन साधन होते रहना चाहिये।

भजन और दानको कलके भरोसे पर नहीं छोड़े।

जिनका भगवान‍्से प्रेम नहीं है, उन्हें कोटि वैरियोंके समान जानकर त्याग देना चाहिये। तुलसीदासजी कहते हैं—

जाके प्रिय न राम-बैदेही।

तजिये ताहि कोटि बैरी सम,

जद्यपि परम सनेही॥ १॥

तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन

बंधु, भरत महतारी।

बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज-बनितन्हि,

भये मुद-मंगलकारी॥ २॥

नाते नेह रामके मनियत

सुहृद सुसेब्य जहाँ लौं।

अंजन कहा आँखि जेहि फूटै,

बहुतक कहौं कहाँ लौं॥ ३॥

तुलसी सो सब भाँति परम हित

पूज्य प्रानते प्यारो।

जासों होय सनेह राम-पद,

एतो मतो हमारो॥ ४॥

भगवान‍्से अलग करनेवाली कोई भी वस्तु हो, वह सर्वथा त्याज्य है। सबमें भगवान‍्की भावना करे। कोई भी सामने आये। उसमें सबसे पहले भगवान‍्की भावना करके उसे बार-बार मन-ही-मन प्रणाम करे। फिर बात करते हुए भी यह स्मरण रखे कि हम भगवान‍्से बात कर रहे हैं।

सम्मान, प्रेम, हित और सत्य—ये चार बात व्यवहारमें रहनी चाहिये।

जिस तरह सुननेका शौक है, उस शौकको बढ़ावे, उससे अधिक धारण करनेकी, उससे अधिक काममें लानेकी चेष्टा करे।

भगवन्नाम-जपकी विधि—नामजपसे दो गुना लाभ है, यदि नामजप गुप्त रूपसे किया जाय। यदि नामजप गुप्त रूपसे एकान्तमें किया जाय तो उससे पाँच गुना लाभ है। एकान्तमें गुप्त रूपसे मौन होकर नामजप करनेपर दस गुना लाभ है। एकान्तमें गुप्त रूपसे मौन होकर आदरसहित नामजप करनेपर सौ गुना लाभ है। एकान्तमें गुप्त रूपसे मौन होकर आदरसहित ध्यान करते हुए नामजप करनेपर सहस्रगुना लाभ है। एकान्तमें गुप्त रूपसे मौन होकर आदरसहित ध्यान करते हुए निष्काम भावसे नामजप करनेपर दस सहस्रगुना लाभ है। एकान्तमें गुप्त रूपसे मौन होकर आदरसहित ध्यान करते हुए निष्कामभावसे अत्यन्त प्रेमसहित तैलधारावत् नामजपका अनन्तगुना लाभ है।

प्रेमके योग्य एकमात्र परमात्मा ही हैं, उनसे ही प्रेम करे। संसारसे प्रेम करना दु:खोंको मोल लेना है। अत: सब ओरसे चित्तवृत्तियोंको हटाकर केवल एक परमात्मामें ही लगावे। भगवान‍्के सिवाय कोई भी वस्तु अच्छी नहीं लगे। भगवान् ही मीठे लगें। हृदय भगवान‍्से भरा रहे। सर्वत्र, सबमें, सब समय भगवान‍्को देखो।

संसारमें जो कुछ भी अनिच्छा, परेच्छा या देवेच्छासे हो रहा है, वह सब भगवान‍्की इच्छासे हो रहा है। भगवान‍्की इच्छासे जो कुछ होता है, उससे हमारा अमंगल हो नहीं सकता। इसमें हमारा हित ही हित भरा हुआ है। भगवान‍्के द्वारा हमारा अहित हो ही नहीं सकता, असम्भव है। जैसे एक माँके द्वारा भी बच्चेका अहित होना सम्भव नहीं है। फिर परम पिता परमात्माके द्वारा अहित होना कैसे सम्भव हो सकता है? इस प्रकार जो कुछ भी हो रहा है, इसमें भगवान‍्का विधान समझकर खूब प्रसन्न रहना चाहिये। भगवान‍्के भक्त भी भगवान‍्के समान हैं। उनके द्वारा जो कुछ होता है, उसमें हमारा हित-ही-हित भरा है।

संसारमें ईश्वरकी मान्यता कर ले तो ईश्वरकी प्राप्ति हो जाय। राम नामको अपने जीवनका आधार बना लेवे। जैसे श्वासके बिना हम जी नहीं सकते, वैसे ही हम राम नामके बिना जी नहीं सकें। यदि हम भगवान‍्का भजन निरन्तर शुरू कर देंगे तो हमारा बेड़ा पार हो जायेगा।

रामनामका जपरूपी भजन ही हमारा प्राण है। भजनमें सहायक हैं—एकान्तवास, सत्पुरुषोंका संग, संसारसे वैराग्य, भगवान‍्में अटल विश्वास।

अबसे लेकर मरणपर्यन्त एक क्षण भी भगवान‍्को नहीं भूलेंगे—यह मनमें निश्चय करे। सब भगवान‍्का स्वरूप हैं, सब भगवान् ही हैं। जैसे कोई हरे रंगका चश्मा लगा ले तो उसको सारा संसार हरे रंगका दिखायी देने लग जायगा, ऐसे ही हम भगवान‍्के रंगका चश्मा लगा लें तो सारा विश्व हमें भगवन्मय दीखने लग जायगा। नारायणके सिवाय कुछ है ही नहीं, सब जगह भगवान् ही परिपूर्ण हो रहे हैं। सबका सार यही है कि भगवान‍्की निरन्तर स्मृति रहनी चाहिये। चाहे वह किसी भी प्रकारसे हो।

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥

(गीता १०। १०)

उन निरन्तर मेरे ध्यान आदिमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजनेवाले भक्तोंको मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।

निरन्तर भजनके लिये अभ्यास और वैराग्य, महापुरुषोंकी शरण तथा भगवान‍्में प्रेम होना चाहिये। सब जगहसे प्रेम हटाकर भगवान‍्में लगाना चाहिये। अपनी सारी शक्ति सामग्री पाकर भी यदि हम भगवान‍्को प्राप्त न कर सके तो हमारे समान मूर्ख कौन होगा?

सुननेको दिन-रात सत्संग मिलता है। गीता गंगाकी महिमा शास्त्रोंमें भरी पड़ी है। वह हमें प्राप्त है—

भगवद‍्गीता किञ्चिदधीता

गङ्गाजललवकणिकापीता।

सकृदपि यस्य मुरारिसमर्चा

तस्य यम: किं कुरुते चर्चाम्॥

जिसने भगवद‍्गीताको कुछ भी पढ़ा है, गंगाजलकी जिसने एक बूँद भी पी है, एक बार भी जिसने भगवान् कृष्णचन्द्रका अर्चन किया है, उसकी यमराज क्या चर्चा कर सकता है?

पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता।

सतसंगति संसृतिकर अंता॥

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उमा राम सम हितु जग माहीं।

गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं॥

कानमें सुननेको नारायण, हृदयमें नारायण, साथमें नारायण, दृष्टिमें नारायण, बोलीमें नारायण इस तरह नारायणका अभ्यास करनेसे नारायणकी ही प्राप्ति होती है।

ध्यानमें सहायक—१-पवित्र तथा एकान्त देशका सेवन, २-महापुरुषोंका संग, ३-ध्यानविषयक शास्त्रोंका सेवन, ४-संसारसे वैराग्य और उपरामता। ५-हल्का भोजन। ६-भगवान‍्के नामका जप।

प्रश्न—सांसारिक सुखकी प्राप्तिमें तथा परमात्माकी प्राप्तिके सुखमें क्या अन्तर है?

उत्तर—तुम देवतासे जाकर पूछो कि विष्ठा खानेवाले सूअरमें तथा एक अमृत पीनेवालेमें क्या अंतर है? वे समझेंगे कितना मूर्ख है। यह तो बिल्कुल प्रत्यक्ष है, एक मनुष्यसे पूछ लो। संसारके तथा ब्रह्मलोकके सम्पूर्ण विषय भोग और सुख भगवत्प्राप्तिके मुकाबलेमें कुछ नहीं हैं।

मेरे अनुभवकी बीती हुई बात बताता हूँ। मेरे जब-जब वैराग्य बढ़ता था, तब-तब सांसारिक सुखमें रस प्रतीत नहीं होता था। जिन पुरुषोंको रस प्रतीत होता था, हमें उनकी मूर्खता प्रतीत होती थी और हँसी आती थी कि कैसा मूर्ख है? जो सांसारिक सुखको सुख मानकर भोगता है।

वैरागी पुरुषोंका संग तथा स्मरण करनेसे हमारे वैराग्य होता है। अपनेमें सत्त्वगुण खूब बढ़ाना चाहिये। इसके बढ़नेसे रज-तम दोष अपने-आप नष्ट हो जायेंगे। सत्त्वगुण क्या है? जिससे भजन, ध्यान, सत्संगमें प्रीति हो। सत्संग करनेसे भजन-ध्यान बढ़ेगा। भजन-ध्यान तेजीसे होनेसे काम, क्रोध, लोभ, मोहकी ताकत नहीं कि हमारे पास आ सकें। यह सब डाकू, दुर्गुण, दुर्व्यवहार दूरसे ही भाग जायँगे। निकट नहीं आयेंगे।

संसारसे वृत्तियाँ हटाकर परमात्मामें लगायें। जो कुछ हो रहा है, यह सब भगवान‍्की लीला है।

संसारसे उपराम होकर हर समय परमात्माके ध्यानमें मस्त होकर रहना चाहिये, अपने निष्कामी बने। भगवान‍्से कुछ माँगे ही नहीं। प्रह्लादकी तरह देनेपर भी नहीं लेवे। भगवान‍्ने बार-बार कहा, किन्तु प्रह्लादने कहा प्रभु कुछ नहीं चाहिये। अधिक आग्रह किया, तब प्रह्लादने सोचा कि मेरे अन्दर कोई कामना छिपी हुई होगी, तभी भगवान् बार-बार कह रहे हैं। तब उन्होंने कहा कि भगवन्! मेरे अन्दर जो कामना छिपी हुई है, उसे ही नष्ट कर दीजिये।

यदि भगवान‍्से माँगना ही हो तो यही माँगे कि प्रभु आपमें मेरा पूर्ण प्रेम हो। आपसे कभी वियोग न हो, आपकी निरन्तर स्मृति बनी रहे। यह निष्कामके ही तुल्य है।

संसारके विषय, ऐश, आराम, स्वाद, शौकीनी, विलासिताको विषके समान समझकर बिलकुल त्याग दें।

नर तनु पाइ बिषय मन देहीं।

पलटि सुधा ते सठ विष लेहीं॥

हर समय परमात्माके ध्यानमें रमण करे। नश्वर पदार्थोंसे सर्वथा सम्बन्ध हटा लेवे, ठुकरा देवे। तिरस्कार कर देवे तथा सब ओरसे प्रीति हटाकर केवल एक परमात्मामें ही प्रेम करना चाहिये।

दर्शन कारण रामजी तड़फत हूँ दिन रैन।

धाय बचाओ हे हरि हे प्रभु राजिव नैन॥

बिलखत मन हरि के बिना दरस बिना नहीं चैन।

मुराद हरि के मिलन बिन बरखा ज्यूँ बहै नैन॥

परम धन भगवान् श्रीहरिके लिये मन सदा लालायित रहे। उनको पानेके लिये उनकी ओर निरन्तर बढ़ता रहे। उनके दर्शनके बिना चैन नहीं पड़े। केवल भगवान‍्को ही जीवनका आधार बना लेवे।