नित्य जीवनोपयोगी बातें
१-भगवान्के जिस नाममें प्रीति हो, उस नामका प्रतिदिन नियमित रूपसे पचीस हजार जप करना चाहिये।
२-विनय-पत्रिकाके किसी पदको गाकर एकान्तमें सच्चे हृदयसे प्रार्थना करें कि प्रभो! मुझे शरणमें ले लें।
३-विनोदमें भी झूठ न निकले, सदा सत्य एवं मधुर शब्द निकले, इसका अभ्यास करना चाहिये।
४-भगवान्को स्मरण करते हुए भगवान्की सेवाके भावसे ही शरीर और मनके सारे कार्य हों, यह प्रयत्न करते रहना चाहिये।
५-जहाँतक हो निरन्तर भगवान्का स्मरण बना रहे।
६-गिरते हुएको कभी धक्का न दिया जाय, अर्थात् बुरा करनेवालेके प्रति भी बुरी भावना न की जाय। हमारी बुरी भावना उसके पतनमें सहायक होगी।
७-हमारा बुरा कोई कर नहीं सकता, दूसरा यदि कोई कारण बन जाता है तो वह दयाका पात्र है।
८-हम किसीका बुरा कर नहीं सकते, पर किसीका बुरा चाहकर अपना बुरा अवश्य कर लेते हैं।
९-अपना सुख बाँटे, दूसरेके दु:खमें हिस्सा मिले तो ले ले।
१०-दु:ख सहन किया जाय, किसीको दु:ख दिया न जाये।
११-यहाँ सब कुछ क्षणभंगुर है, यह समझकर ममता-आसक्ति कम करे।
१२-अपने दोष देखे तथा दूसरेके गुण देखे।
१३-दूसरोंके गुण-दोष कुछ भी न देखकर भगवान्के गुणोंका स्मरण करना सर्वोत्तम है।
१४-सेवा तथा दान अवश्य करे, पर उनका अधिकार मानकर करे, अभिमान न करे।
अच्युतानन्द गोविन्द नामोच्चारणभेषजात्।
नश्यन्ति सकला रोगा: सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥