निवेदन

श्रीजयदयालजी गोयन्दका एक जातिस्मर महापुरुष थे। आध्यात्मिक जगत‍्में इस प्रकारके महापुरुष बहुत ही थोड़े हैं। इन्होंने बचपनसे ही भगवत्प्राप्तिकी साधना प्रारम्भ कर दी थी एवं छोटी आयुमें ही भगवत्प्राप्ति कर ली थी।

इनकी भक्ति तथा निष्काम भावसे प्रसन्न होकर भगवान‍्की इनपर विशेष कृपा हुई। प्रश्न उठा कि भगवान‍्ने ऐसी कृपा कैसे की? स्वयं इनके मनमें उत्तर आया कि भगवान् निष्कामभाव एवं भक्तिके प्रचारकी प्रेरणा दे रहे हैं।

ये गीताके मर्मज्ञ थे। गीता अध्याय १८ श्लोक ६८-६९में लिखा है कि भगवद्भावोंके प्रचार करनेवालेके समान कोई भगवान‍्का प्रिय नहीं है और भविष्यमें होगा भी नहीं। इन दो श्लोकोंने इनके हृदयपर ऐसी छाप लगा दी जिससे आपका जीवन केवल भगवद्भावोंके प्रचारमें लग गया।

इस उद्देश्यसे गीताप्रेस एवं कल्याणकी स्थापना इनके द्वारा हुई। इनके एक ही लगन रहती थी कि मनुष्य मात्रको यह अद‍्भुत मनुष्य जीवन मिला है इसमें किसी तरह भगवत्प्राप्ति हो जाय। पुस्तकके प्रवचनोंमें यह संकेत आया है कि जैसे सोलहवीं शताब्दीमें बहुतसे भक्त हुए थे, उस समय कल्याणका विशेष अवसर था, इसी प्रकार इस समय मनुष्योंके लिये भगवान‍्ने कल्याणका एक विशेष अवसर दिया है।

इसी उद्देश्यसे आप स्थान-स्थानपर प्रवचन देते थे। गीताभवन बननेके पूर्व ऋषिकेशमें झाड़ियोंमें सत्संग कराते थे। बादमें वहाँपर एकान्तकी कमीके कारण गंगाजीके इस पार स्वर्गाश्रम वटवृक्षके नीचे ग्रीष्म ऋतुमें लगभग ३-४ महीनोंके लिये सत्संगका आयोजन करते थे। वहाँ, कलकत्ता तथा गोरखपुरमें लगभग ७०-७५ वर्ष पूर्व जो प्रवचन दिये गये थे, उनको तथा अन्तरंग सत् संगियोंसे हुए पत्राचारको भी इस पुस्तकमें संकलित करनेका प्रयास किया गया है। इनको पढ़नेसे यह स्पष्ट होता है कि उनके हृदयमें हमलोगोंके कल्याणके लिये कितनी लगन थी। साधारणसे साधारण व्यक्तिके लिये साधनमें लाने योग्य बहुतसे साधन बतलाये गये हैं। पापीसे पापी, व्यापारी, माता-बहिनें सब अपना कल्याण कर सकते हैं। कोई जाति परिस्थिति कल्याणमें बाधक नहीं है।

इन प्रवचनोंको पढ़नेसे ही हमारे हृदयमें भगवत्प्राप्तिकी इच्छा जाग्रत हो जायेगी और साधन भी होने लग जायेगा। ऐसी हमारी धारणा है। इन प्रवचनोंको ध्यानसे पढ़नेपर विलक्षण आध्यात्मिक लाभ अवश्य मिलेगा।