पारमार्थिक पत्र

फाल्गुन कृष्ण १५, संवत् १९८२

बम्बईमें भजन, ध्यान, सेवा, सत्संगका प्रचार बहुत जोरसे होना चाहिये। घर-घरमें श्रीभगवान‍्की भक्तिका प्रचार और प्रभावका प्रचार बहुत शीघ्र हो उसकी चेष्टा करनी चाहिये। समय बीता जा रहा है। श्रीनारायणदेवकी प्रेरणाके अनुसार अभीतक निष्कामभावसे श्रद्धा-भक्ति-त्यागके सहित परम प्रेमका प्रचार हुआ नहीं, इसलिये बहुत जोरसे बहुत शीघ्र प्रचार होनेके लिये उपाय करना चाहिये।

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अधिक श्रावण कृष्ण ९, संवत् १९७७

लोभ सच्ची वस्तुका करना चाहिये। भगवान‍्के नामका जप, सत्संग तथा भगवान‍्के स्वरूपका ध्यान सत्यस्वरूप भगवान‍्को मिलानेवाला है, इसीलिये सत्य है। अत: भगवान‍्के नामका जप, स्वरूपका ध्यान और अच्छे पुरुषोंके संगका लोभ करना चाहिये। यानि उत्तम कमाई समझकर ऊपर लिखे काममें समय बिताना चाहिये। सच्चे लोभके लिये मिथ्या लोभ छोड़ देना चाहिये।

शरीरके आराम, आलस्य और मिथ्या स्वार्थपर क्रोध करना चाहिये। यानि इन दोषोंका नाश करना चाहिये। आराम, आलस्य और मिथ्या स्वार्थको बहुत तत्पर होकर छोड़ना चाहिये। संसारमें आलस्य और वृथा चेष्टा तथा शरीरका आराम भगवान‍्के मिलनेमें विघ्न करनेवाला है। इसलिये इनको चेष्टापूर्वक छोड़ना चाहिये।

अधिक श्रावण कृष्ण ९, संवत् १९७७

संसारके सभी भाइयोंकी परम सेवा करनी चाहिये, यानि भगवान‍्की भक्तिमें लगानेकी चेष्टा करनी चाहिये। भगवान‍्की भक्तिमें लगानेके समान कोई भी परम सेवा नहीं है। सबको नहीं लगा सकते तो अपना संग करनेवाले तथा अपने मित्रोंको तो अवश्य लगाना चाहिये। आपको जो उत्तम काम तथा उत्तम वस्तु मालूम हो वह सबको समान भावसे बतानी चाहिये और परमेश्वरके नामका जप निरन्तर निष्कामभावसे करना चाहिये तथा ध्यान करनेकी चेष्टा भी करनी चाहिये।

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अधिक श्रावण कृष्ण १३, संवत् १९७७

भगवान‍्के भक्तोंका संग विश्वासपूर्वक करनेसे तथा उनके कहे अनुसार अभ्यास करनेसे नाम जप निरन्तर हो सकता है। हर समय चेष्टा करनी चाहिये।

नामजपके समान कुछ भी नहीं है। इस प्रकार माननेसे संसारकी आसक्ति छूटकर नामजपमें एक पलकी भी भूल होनेका कोई कारण नहीं है। एकान्तमें ध्यान लगानेके अभ्याससे ही एकान्तमें मन लग सकता है। ध्यान नहीं हो तो नामजप करना चाहिये। शास्त्रोंका अभ्यास करना चाहिये। शास्त्रोंके अर्थमें मन लगाना चाहिये। समय-समयपर ध्यानकी भी चेष्टा रखनी चाहिये। ऐसे अभ्यास करनेसे ध्यान निरन्तर लग सकता है। फिर ध्यान छोड़नेकी मनमें भी नहीं आ सकती, उसका ध्यान छूट भी नहीं सकता।

मार्गशीर्ष कृष्ण १२, सं०१९७७

संसारमें रहकर भी साफ मनसे काम करें तो बहुत अच्छी तरह काम चल सकता है। संसारमें चतुराई वाले व्यक्तिसे चतुराईकी बात भी कर ले तो कुछ आपत्ति नहीं, बाकी छल कपटकी बात करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। हृदय शुद्ध हुए बिना शुद्ध व्यवहार होना कठिन है। इसलिये संसारका काम करते हुए भी भजन करनेका, भगवान‍्का नामजप करनेका अभ्यास करना चाहिये। नामजप करनेसे पाप नाश होकर हृदय शुद्ध हो जायेगा, फिर कुछ भी बाधा नहीं आयेगी, रुपयोंका लोभ छूट जायगा, फिर रुपयोंके लिये चतुराई कपट करना नहीं होगा। और कुछ विशेष बाधा नहीं है।

स्वार्थ छोड़नेसे व्यवहार भी शुद्ध हो सकता है। व्यवहार भी अधिक करना ठीक नहीं। जिसका बहुत तेज साधन हो, वह अधिक व्यवहार करे तो भी कुछ हर्ज नहीं। बिना शक्ति अधिक व्यवहार नहीं करना चाहिये। भजन, ध्यान होते हुए ही जितना हो सके उतना काम देखना चाहिये।

आपने लिखा कि भगवान‍्ने गीताजीमें अर्जुनको और योगवासिष्ठमें श्रीवशिष्ठजी महाराजने रामचन्द्रजीको गृहस्थ छोड़नेके लिये कहा है। ऐसा कोई उल्लेख नहीं है। यदि गृहस्थ छोड़नेकी लिखते तो श्रीरामचन्द्रजी और अर्जुन गृहस्थ छोड़ देते। अर्जुन तो गृहस्थ छोड़नेके लिये तैयार थे, जिन्हें भगवान‍्ने उपदेश देकर युद्ध कराया है। केवल यह भाव बताया कि तुम मेरा स्मरण रखते हुए युद्ध करो।

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।

(गीता ८। ७)

इसलिये हे अर्जुन! तू सब समयमें निरन्तर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर।

सभी जगह भगवान‍्के कहनेका आशय है कि निष्कामभावसे काम करते हुए संसारमें रहे तथा मेरा भजन ध्यान करते हुए, मन, बुद्धि मेरेमें रखते हुए, स्वार्थको छोड़कर संसारका काम करते हुए मेरी कृपासे उद्धार हो जायगा।

आपने लिखा कि मेरे कुसंग नहीं है। मुझे भी निगह है कि आपके बहुत खराब संगत नहीं है परन्तु संसारका चिन्तन, संसारका प्रेम, सांसारिक वस्तुओं और भोगोंका चिन्तन, रुपयोंका चिन्तन, शरीरके आरामका चिन्तन—ये सब कुसंग ही है।

आपने लिखा कि सुग्रीव, उद्धव तथा अर्जुनके मित्र बनकर भगवान‍्ने बहुत ही कृपा की। उनकी तरह और किसीपर भी भगवान‍्की कृपा नहीं हुई। उससे बढ़कर और क्या कृपा होगी। ऐसी कृपा होकर भी सुग्रीव, उद्धव तथा अर्जुनको ज्ञान नहीं हुआ। आपका यह समझना भूल है। उन लोगोंको ज्ञान हो गया। उन लोगोंके उद्धार होनेकी तो बात ही क्या है, भगवान‍्के भक्तोंकी और सखाओंकी कृपा भी जिसपर हो जाय, उसका संसारसे उद्धार हो जाता है। भगवान‍्के नामका जप और प्रेमसे भक्ति करनेसे उद्धार हो जाता है।

भगवान‍्की कृपासे उद्धार हो जाता है, भगवान् स्वयं ही उसको बुद्धि दे देते हैं।

मच्चित्ता मद‍्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥

(गीता १०। ९-१०)

निरन्तर मुझमें मन लगानेवाले और मुझमें ही प्राणोंको अर्पण करनेवाले भक्तजन मेरी भक्तिकी चर्चाके द्वारा आपसमें मेरे प्रभावको जनाते हुए तथा गुण और प्रभावसहित मेरा कथन करते हुए ही निरन्तर सन्तुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेवमें ही निरन्तर रमण करते हैं।

उन निरन्तर मेरे ध्यान आदिमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजनेवाले भक्तोंको मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।

अपने पूछा कौन-सी कृपासे उद्धार हो सकता है। गीता अध्याय १८। ६२-६६ के अनुसार शरणागत होना चाहिये—

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद‍्गुह्यतरं मया।

विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥

(गीता १८। ६२-६३)

हे भारत! तू सब प्रकारसे उस परमेश्वरकी ही शरणमें जा। उस परमात्माकी कृपासे ही तू परम शान्तिको तथा सनातन परम धामको प्राप्त होगा।

इस प्रकार यह गोपनीयसे भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुझसे कह दिया। अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञानको पूर्णतया भलीभाँति विचारकर, जैसे चाहता है वैसे ही कर।

उनका हर समय चिन्तन करनेसे ही इस प्रकार शरणागत होता है। भगवान‍्की कृपासे ज्ञान होकर परमपदको निश्चित प्राप्त होता है। लिखी हुई बातोंको अच्छी तरह समझना चाहिये।

आपने पूछा मुझे संसारमें रहकर क्या करना चाहिये। भगवान‍्का गुणानुवाद और प्रभाव-प्रेमकी बातें पढ़नी सुननी चाहिये। हर समय उनके नामका जप और स्वरूपका ध्यान रखते हुए संसारका काम आसक्ति और स्वार्थ छोड़कर करना चाहिये। यदि आसक्ति नहीं छूटे तो कोई हर्ज नहीं। भगवान‍्के लिये भगवान‍्का ही सभी कुछ जानकर भगवान‍्का चिंतन करता हुआ भगवान‍्के लिये सेवककी तरह भगवान‍्का सेवक होकर अपना स्वार्थ छोड़कर संसारका काम करना चाहिये।

आपने लिखा कि उपदेशका सदाव्रत मेरेको भी पात्र जानकर देना चाहिये। उपदेश देनेवाला मैं कौन हूँ, परन्तु आपकी आज्ञा मानकर मेरे समझमें आयी वैसी शास्त्रोंकी बात लिखी है।

संसारमें कुछ भी सुख है नहीं, संसारमें दु:ख ही है। संसारमें जो कुछ सुख भासता है, वह भी मिथ्या भासता है। अन्तमें दु:ख ही है।

दशरथजी तथा वसुदेवजीके भगवान‍्ने अवतार लिया। उनलोगोंको सांसारिक दु:ख देखनेमें बहुत ही हुआ, परन्तु भगवान‍्की कृपासे अन्तमें संसारसागरसे उद्धार हो गया। सदाके लिये आनन्दघनको प्राप्त हो गये। उन लोगोंके उद्धारमें कुछ शंका नहीं है।

संसारमें उन लोगोंको क्लेश देखनेमें आया वह ठीक है। पूर्व जन्मोंमें जो भी कुछ किया हुआ था, उसे भोगकर शुद्ध हो गये। भगवान‍्के अवतार लेनेसे उनका उद्धार हो गया, इसलिये वे पुण्यात्मा भी हैं। पुण्य पाप सबके ही रहे हैं, किसीके पाप अधिक होते हैं, किसीके पुण्य।

वसुदेवजी तथा दरशरथजी पिछले जन्ममें भगवान‍्के बहुत ही भक्त थे, परन्तु कुछ पाप भी किसी जन्ममें बन गया होगा, वह सब पाप भोगकर तथा भक्तिके प्रतापसे पाप नाश होकर, अंतमें इस असार संसारसे उद्धार हो गया।

आपने लिखा संसारमें जीवको सुख देखनेमें नहीं आता है, फिर यह जीव संसारमें क्यों तथा किसलिये भटक रहे हैं? मूर्खता यानि अज्ञानके कारण भटक रहे हैं। भूलसे संसारमें सुख मान रखा है। मृगतृष्णाके जलकी तरह संसारमें मिथ्या सुख भासता है। इन्हीमें मूर्खतासे फँसकर मृगकी तरह भटक रहे हैं।

आपने पूछा इस जीवको सुख किस प्रकार हो? सुख भगवान‍्की भक्तिमें है। भक्ति करनेसे भगवान‍्के मिलनेपर सदाके लिये पूर्ण आनन्द हो जाता है। गीता ६। ११-३२ तकका अर्थ देख लीजियेगा।

इस अनुसार भजन ध्यान करनेसे अपार सुखकी प्राप्ति हो सकती है। फिर कभी दु:ख नहीं हो सकता और उसके समान कोई आनन्द भी नहीं है, उसका कभी नाश भी नहीं होता।

आपने पूछा कि संसारमें रहकर किस प्रकार बर्ताव करना चाहिये? बड़ोंमें श्रद्धा, समानवालोंमें मित्रता, छोटेमें पालनभाव रखकर सबकी सेवा यानि उपकार करना चाहिये।

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वैशाख कृष्ण ७, संवत् १९७८

भगवान‍्के नामका जप प्रेम और ध्यान सहित जपना चाहिये। निरन्तर जप होनेसे स्वत: ही संसारका चिन्तन छूट सकता है। संसारका चिन्तन ही संसारमें गिरानेवाला है। ऐसा जानकर श्रीपरमेश्वरका चिन्तन हर समय हो, इसके लिये नामजप और सत्संगकी विशेष चेष्टा करनी चाहिये। नामका उच्चारण बहुत प्रेममें विह्वल होकर और उच्चारणके समय शरीरका भी ज्ञान नहीं रहे तो बहुत आनन्दकी बात है। संसारका और शरीरका ज्ञान नहीं रहे तो बहुत आनन्दकी बात है। संसार और शरीरका ज्ञान यदि हो भी जाय तो भी संसारको लीलामात्र देखना चाहिये। इस प्रकार करनेसे शरीरमें रोमांच, कंठ और वाणी गद‍्गद हो जाय तो भगवान् शीघ्र मिल सकते हैं।

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अधिक श्रावण कृष्ण १२, संवत् १९७७

आपके काकाजीकी नित्य चरण स्पर्श और सेवा करनी चाहिये। उनकी आज्ञा अनुसार चलना चाहिये। उनकी आज्ञाके समान कुछ भी सेवा नहीं है।

श्रीभगवान‍्के नामका जप निरन्तर होनेके लिये विशेष चेष्टा करनी चाहिये। भगवान‍्के नामका जप निरन्तर होनेसे अन्त:करण शुद्ध हो जाता है। फिर उसमें कोई भी दोष नहीं रहता। सारे उत्तम गुण स्वत: ही आ जाते हैं, इसलिये जिस प्रकार नामजपका तार नहीं टूटे, इसकी चेष्टा करनी चाहिये। नामजप होनेसे भगवान‍्में प्रेम तथा निष्कामभाव, भगवान‍्का ध्यान तथा माता-पिताकी सेवा सभी अच्छी तरह स्वत: ही हो सकते हैं। निरन्तर भजनके अभ्याससे निरन्तर ध्यान होकर भगवान‍्की प्राप्ति बहुत ही शीघ्र हो सकती है।

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ज्येष्ठ शुक्ल १२, संवत् १९७७

भगवान‍्के नामका जप यदि पाँच विशेषणों सहित किया जाय तो बहुत ही शीघ्र लाभ पहुँच सकता है—

१-गुप्त भावसे—भगवान‍्के भजन और प्रेमको छिपाना चाहिये।

२-मनसे नामका जप चिन्तन किया जाय, वही आदरसहित समझा जाता है। बिना मनके आदर नहीं हो सकता। जैसे बिना मनके सेवा, सन्ध्या तथा नित्यकर्म करना उनका तिरस्कार करना है। यदि तिरस्कार करके भी किया जाय तो कुछ पाप नहीं है, परन्तु लाभ कम है।

३-अर्थसहित यानि जपनेके समय नामीको याद रखना चाहिये। नाम नाम पर नामीका ध्यान करना चाहिये। इस प्रकार करनेसे ध्यान निरन्तर हो जाता है। फिर नामपर ध्यान करनेकी आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि ध्यान परिपक्व होनेके बाद ध्यान नहीं छूट सकता।

४-निष्कामभावसे करे। चाहे अपना प्राण भी जायँ, परन्तु भगवान‍्से प्रार्थना नहीं करे तथा जीनेकी इच्छा भी भगवान‍्से नहीं चाहे। दूसरेको शाप वरदान देनेकी अपनी शक्ति भी नहीं समझे। भजन, ध्यान, सेवा करके किसीसे भी स्वार्थ सिद्ध करना हीरा माणिक देकर बदलेमें पत्थर लेना है।

५-ऊपर लिखे अनुसार साधन निरन्तर होना चाहिये। तार न टूटे। अभ्यास बढ़नेसे काम करते हुए भी यह साधन हो सकता है। जैसे चरखा कातनेवाली चरखा फेरते हुए तार नहीं टूटने देती है, बात भी करती है, परन्तु उसका मन तारकी ओर है कि कहीं तार नहीं टूट जाय।

संवत् १६०० के आसपास भगवान‍्के बहुतसे भक्त हुए थे। उन्होंने उस समय कुछ सुधार किया था। जब-जब समय कुछ अधिक गिर जाता है, तब भगवान् अपने भक्तोंको प्रेरणा करके समय सुधारते हैं। बहुत अधिक पाप बढ़ जाता है, तब भगवान् स्वयं प्रकट होकर समयको सुधारते हैं। इधरमें कलियुग कुछ विशेष फैल गया, इसीलिये भगवान‍्की प्रेरणा होती है। कुछ समयको सुधारना चाहिये। ऐसा अवसर पाकर यदि उद्धार नहीं करनेवाला मन्दबुद्धि समझा जायेगा और जन्म मरणको प्राप्त होगा।

जो न तरै भवसागर

नर समाज अस पाइ।

सो कृत निन्दक मन्दमति

आत्माहन गति जाइ॥

इस समय भगवान‍्की प्रेरणा भक्ति मार्गको उन्नत करनेकी है। जिससे बहुत शीघ्र उद्धार हो सकता है। ऐसा अवसर सदा ही नहीं रहेगा। जब दुकानदारको वस्तु बेचनेकी गरज होती है, तब वस्तु सस्ती बिकती है और जब गरज नहीं होती है, तब बहुत ऊँचा दाम देनेसे तथा चेष्टा करनेसे वस्तु मिलती है। ऐसा जानकर अवसर नहीं चूकना चाहिये। कटिबद्ध होकर भगवान‍्की भक्तिके साधनमें बहुत जोरसे विश्वास करके लगना चाहिये।

भगवान‍्का भक्त इच्छा करे तो हजारों व्यक्तियोंका अकेला उद्धार कर सकता है। एक धर्मात्मा पुरुष हजारों व्यक्तियों सहित डूबती हुई नौकाको चाहे तो पार लगा सकता है।

भक्त प्रह्लादपर प्रसन्न होकर भगवान‍्ने वरदान देनेके लिये कहा, तब प्रह्लादने सबका उद्धार करनेकी चेष्टा की, यदि सबका उद्धार नहीं हुआ तो भी हजारों व्यक्तियोंका उद्धार कर दिया।

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आषाढ़ शुक्ल ११, संवत् १९७७

गीता अध्याय २। ११ को जानने तथा धारण होनेके बाद किसी बातका भी शोक नहीं हो सकता। वास्तवमें संसारमें शोक करने लायक कुछ भी नहीं है।

परमेश्वरको भुलाना, हर समय याद नहीं करना ही शोक करनेकी बात है।

भगवान‍्का गुणानुवाद सुननेके लिये समय न मिले तो शोक करना चाहिये।

एक सत्, चित्, आनन्दके सिवाय और कुछ है ही नहीं। शरीर तथा संसारका अभाव देखनेके समान वैराग्य और ध्यान कुछ नहीं है। जिस समय संसार भासने लग जाय, उस समय संसारको मिथ्या समझना तथा ब्रह्मलोक एवं वैकुण्ठधामकी पदवीकी भी इच्छा नहीं रखनी चाहिये। एक सत्, चित्, आनन्दके अतिरिक्त किसीका चित्र भी नहीं बँधने देना चाहिये, यदि बँध भी जाय तो कल्पित मानना चाहिये।

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अधिक श्रावण कृष्ण ४, संवत् १९७७

आजकल सुना है कि कलकत्तामें सत्संगका प्रचार बहुत अच्छा है। इस अवसरपर तुम लोगोंको उचित है कि कुछ लाभ उठाना चाहिये। इस तरहका अवसर सदा एक-सा नहीं रहता। दिन सदा एक-से नहीं रहते। दलाली क्या बराबर एक सी चलती है। बाजारमें अच्छी दलाली तो कोई कोई समय चलती होगी। आजकल भगवान‍्की प्राप्तिका समय बहुत अच्छा समझा जाता है।

तुम लोग दलाल हो, चलतीमें दलाली नहीं बैठाओगे तो फिर कब बैठाओगे। भगवत्प्राप्तिके रोजगारके समान कोई रोजगार नहीं है। रोजगारकी चलतीका अवसर बहुत कम समय ही आया करता है। जिसपर भी ऐसा मौका तो बहुत ही कम समय आता सुना गया है।

दलालके नुकसान कभी हो नहीं सकता। सांसारिक मिथ्या दलालीमें तो कोई आसामी डूब जाय तो सम्भवत: कुछ नुकसान लग सकता है, नहीं तो उलाहना ही आ जाय, परन्तु इसमें तो उलाहना ही नहीं है।

घरसे कुछ लगता ही नहीं। दलालके दिवाला पड़ नहीं सकता, फिर तुम लोग इस काममें नहीं लगोगे तो तुम्हारा अपने मित्रोंमें विश्वास ही नहीं है।

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श्रावण कृष्ण १४, संवत् १९७८

श्रीमंगलनाथजी महाराजकी सत्संग बहुत आनन्द देनेवाली है और अच्छे भाग्यसे ही प्राप्त होती है।

आपने लिखा नामका जप तो बन जाता है, किन्तु ध्यान विशेष नहीं होता। सो ठीक है, मानसिक जप करना चाहिये। जहाँ मन जावे वहाँ भी भगवान् हैं। नामका चिन्तन करना चाहिये तथा अपने हृदयमें भगवान‍्का नाम लिखकर जपना चाहिये। नामका मनसे चिन्तन करना चाहिये। मनसहित जपका सौ गुना अधिक माहात्म्य है। मन नहीं लगे तो बलात् लगाना चाहिये। भजन अधिक एवं निरन्तर होने लग जाय तो मन स्वत: ही भगवान‍्में लग जाया करता है, इसलिये निरन्तर भजनकी विशेष चेष्टा करनी चाहिये, निरन्तर भगवान‍्का ध्यान होनेकी आवश्यकता है। यदि आपको श्रीसत्, चित्, आनन्दके निरन्तर ध्यानकी आवश्यकता है तो फिर ध्यान किसलिये नहीं होता है। जिनको निरन्तर एक ध्यानकी ही आवश्यकता है, उनका तो ध्यान होना ही चाहिये। ध्यान हुए बिना उसको चैन ही नहीं पड़ती, जैसे जलके बिना मछलीको।

ध्यानकी आवश्यकता ही कुछ कम समझी गयी है, अन्यथा ध्यानके लिये बहुत ही चेष्टा की जाती। जैसे भूख तेज लगनेपर भोजनकी तजबीज बैठानी ही पड़ती है। चाहे जिस तरह ही बैठो। इसी प्रकार ध्यानकी भूख लगनेपर तजबीज चाहे जिस तरह बैठे, बैठानेके लिये पूर्ण चेष्टा की जाती है। ध्यानमें रुचि होनी ही भगवान‍्की पूर्ण कृपाका प्रादुर्भाव समझा जाता है, फिर उसको ध्यानमें कोई बाधा नहीं दे सकता। आपने लिखा कि मन अटकाव करता है। मनको यदि ध्यान रुचता तो क्या अटकाव करता, ध्यान लगे बिना मन ठहर ही नहीं सकता। आप ध्यान करनेकी कुछ महिमा सुनकर अच्छा समझते हैं, वह भी बहुत ही उत्तम है। आप अच्छा समझते हैं, उसके लिये ही चेष्टा होनी चाहिये। विशेष समय ध्यानकी चेष्टामें ही बिताना चाहिये।

एक मिनट समय व्यर्थ बीत जाय तो आगे बहुत ही सावधान हो जाना चाहिये। आगे यदि नहीं समझे तो उनका पश्चात्ताप भी कम कीमतका है। कुछ मनका धोखा है तो भी पश्चात्ताप करना उत्तम ही है।

आपने लिखा कि अर्थसहित नामका जप किस प्रकार करना चाहिये। नामका जप अर्थसहित यानि जपनेके समय नामीको याद रखना चाहिये। नाम नामपर नामीका ध्यान करना चाहिये। इस प्रकार करनेसे ध्यान निरन्तर हो जाता है। फिर नाम नामपर ध्यान करनेकी आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि प्रेम होनेके बाद ध्यान छूट नहीं सकता। आजकल आपका समय कैसा बीत रहा है। चित्तकी शान्ति कैसी रहती है। जिस प्रकार ही हो चित्तकी शान्ति निरन्तर हो, उसके लिये विशेष चेष्टा करनी चाहिये। और आपको क्या करना है। यदि आप ध्यान करना सबसे उत्तम कल्याणकारक समझते हों तो फिर कटिबद्ध होकर प्राणपर्यन्त इसके लिये चेष्टा करनी चाहिये।

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भाद्रपद कृष्ण ७, संवत् १९७७

आपने लिखा कि भगवान‍्के नामका जप अधिक नहीं हो पाता। दुकानके कामका संकल्प बहुत रहता है। दुकानका काम करते हुए जप करनेमें क्या कठिनाई है। यदि दुकानके कामका संकल्प रहे तो भले ही रहे, जप अधिक होनेसे संकल्प भी कम हो सकते हैं।

आपने लिखा कि दुकानके काममें लोभके कारण झूठ अधिक बोलना पड़ता है। इस विषयमें पत्रमें कहाँतक लिखा जाय, कुछ लिखा जाता है।

वास्तवमें सच्ची वस्तु नारायण हैं। उस सच्ची वस्तुका लोभ करना चाहिये। पीछे यदि रुपया ही सच्चा मालूम दे तो कोई हर्ज नहीं। रुपये प्रारब्धमें लिखे हैं, उतने ही होंगे, फिर अन्याय क्यों करना? अधिक झूठ बोलनेसे रुपये आ जायेंगे, यह मनका भ्रम है। यदि विश्वास नहीं हो तो बात न्यारी है। अन्यायसे जो आय होगी, उससे कभी सुख होगा ही नहीं। अन्यायका फल दु:ख है। सभी प्रकारसे विचारनेसे पाप करके रुपये कमानेकी कोई आवश्यकता नहीं है। और आपको क्या लिखा जाय।

भगवान‍्के नामका जप निष्कामभावसे अधिक होनेसे तथा सत्संग होनेसे स्वत: ही व्यवहार सुधर जाया करता है। इसलिये भजन सत्संगकी विशेष चेष्टा करनी चाहिये।

आपने लिखा कि दूकानके काममें फँसनेसे सत्संग भजन कम होता है, इससे मेरे जैसेका उद्धार होना बहुत कठिन है। इस प्रकार नहीं मानना चाहिये। भले ही चाहे जैसा ही पापी हो, भजन, सत्संग, निष्कामभावसे उद्धार होना कुछ बड़ी बात नहीं है।

भजन होनेमें दुकानका काम भले ही चाहे जितना हो, कोई हर्जा नहीं है। दुकानका काम करते हुए भी बहुत अच्छी तरह भजन हो सकता है।

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आश्विन कृष्ण ६, संवत् १९७७

भजन, ध्यान, सत्संग कैसा बन रहा है? निरन्तर ध्यान रहनेके लिये पूछा सो भगवान‍्में प्रेम और संसारमें वैराग्य होनेसे ही भगवान‍्में निरन्तर ध्यानकी स्थिति रह सकती है।

संसारके चित्रको मिथ्या जानकर भूलना एक भगवान् नारायणके सिवाय और किसीका चिन्तन नहीं करनेकी चेष्टा विशेष करनी चाहिये।

समय बीत रहा है, जानेके दिन निकट आ रहे हैं। समयकाे अमोलक काममें लेना चाहिये। जो अपना ही पेट नहीं भरेगा वह दूसरेकी सेवा क्या करेगा, इस तरह विचार करके भी भजन, ध्यान, सत्संग और विद्याका अभ्यास करना चाहिये। अपना पेट भले ही मत भरो, परन्तु भूखे रहकर भी लोगोंकी सेवा करनेकी इच्छा हो तो भी भजन, ध्यान, सत्संग की और विद्याके अभ्यासकी आवश्यकता है।

मनमें लगन रहनेसे ही ऊपर लिखा साधन सध सकता है। हर समय केवल भगवान‍्के प्रेममें उत्कण्ठा रहनी चाहिये। और कुछ आवश्यकता नहीं है, फिर वे प्रभु जानें।

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वैशाख कृष्ण ९, संवत् १९७८

इस मिथ्या स्वप्नवत् असार संसारकी ओरसे चित्तको हटाकर श्रीसत्, चित्, आनन्दघन परमेश्वरमें प्रेम करना चाहिये।

ऐसे मनमोहन मनके हरनेवालेको कभी चित्तसे विसारना नहीं चाहिये। इस मिथ्या संसारके विषयभोगोंमें अमोलक समय नहीं बिताना चाहिये। निरन्तर वैराग्यमें रहना चाहिये। संसारकी ओरसे हर समय उपराम ही रहना चाहिये। संसारका काम शरीर निर्वाह मात्र तथा लोगोंके हितके लिये कुछ करना पड़े, उस समय भी आनन्द परमात्मामें मगन रहते हुए ही हो सके उतना काम करना चाहिये। चाहे कुछ भी हो, सच्चे प्रेमी नारायणको कभी नहीं भूलना चाहिये। क्या मालूम किस समय इस असार संसारसे रवाना होना पड़ेगा। यदि सच्चे प्रेमी नारायणके चिन्तनकी गाढ स्थिति हुए बिना ही मृत्यु प्राप्त हो गयी तो क्या विश्वास है। यदि निरन्तर चिन्तन होता रहेगा, फिर चाहे जब ही मृत्यु आये, कुछ चिन्ता नहीं है।

वैशाख कृष्ण ६, संवत् १९७८

श्रीकन्हैयालालसे राम राम। तुम्हारा साधन ढीला सुना जाता है। माता, भाभी, भाई और बड़ोंकी सेवा बहुत ही प्रेमके साथ करनी चाहिये।

सच्चे प्रेमी नारायणके साथ मित्रता करनी हो तो उस परम प्यारेको चित्तसे कभी नहीं बिसारना चाहिये। उसके बिना कोई भी तुम्हारे काम नहीं आयेगा।

प्रेमका मर्म भी उसके बिना और कोई भी नहीं जानता है। संसारमें सभी ठगनेवाले हैं, प्रेमी कोई नहीं है। तुमको अभी मालूम नहीं है, प्रेम क्या वस्तु है। तुम मिथ्या वस्तुकी मित्रतामें भूले हुए हो।

उस मिथ्या प्रेममें भूले हुए तुम्हारा अनन्त जन्म हो गया और यदि नहीं चेतोगे तो आगे भी बहुत ही दुर्गति हो सकती है। यदि तुम्हारे जँचे तो चाहे जिस तरह हो संसारके मिथ्या आराम और आलस्यको छोड़कर उस भगवान‍्के प्रेमकी शरण लेनी चाहिये। पहले वाले तुम्हारे प्रेमके कारण मैं बिना ही पूछे अपनी राय दे रहा हूँ।

श्रीबद्रीदाससे प्रेमसहित राम राम बंचना। तुम सांसारिक काममें इतना फँसाव किसलिये कर रहे हो। अपनेको उत्तम साधक मानकर तुम्हारे लिये यह उचित नहीं है कि चाहे जिस तरह ही संसारके काममें फँस जाओ, भगवत्प्राप्ति होनेके बाद भले ही चाहे जितना काम देखो, यदि देखनेकी आवश्यकता समझो।

तुम्हें बहुत जोरसे साधनमें लगना चाहिये, जैसे गणपतरायजी लग रहे हैं। भजन, ध्यान करते हुए हो सके उतना संसारका काम करना चाहिये।

यदि तुम्हारी हिम्मत हो तो भले ही करो, तुम शूरवीर समझे जाओगे, किंतु इतना सामर्थ्य नहीं है, इसलिये बिना सामर्थ्य युद्ध नहीं करना चाहिये, शक्ति अनुसार ही करना चाहिये।