पात्र और संस्कृत भाषाकी महत्ता
प्रवचन दिनांक—२-१-१९४१, गोरखपुर
बहुत सोचनेपर यह बात मालूम देती है कि सब समय बातें प्रकट ही नहीं होती। बहुत बार प्रकट होकर भी रुकावट होती है। देश, काल, वस्तु तीनों ही कारणसे नहीं होती। कालकी तो विशेष आपत्ति नहीं मालूम होती। देशका भी यद्यपि कुछ प्रभाव है, पर विशेष बात नहीं। पात्रपर ही आकर बात टिकती है। उन्हीं मनुष्योंसे कमी आती है, इसका कारण उनका भाव घटना-बढ़ना है। वातावरण और संगसे स्वभाव बदलता रहता है। मनुष्योंका पतन हो रहा है। पुरुष होटल पार्टी इस ओर बढ़ रहे हैं। स्त्रियाँ चमक-दमक फैशन आदिकी ओर बढ़ रही हैं। दोनों ही पतनकी ओर बढ़ रहे हैं।
आजकल मेरी वृत्तियोंमें संसारका अभाव अधिक समय रहता है। लोगोंके नाम-रूपके चित्र बहुत ही कम पकड़े जाते हैं। रूप तो थोड़ा याद आता भी है, नाम तो और भी कम स्मृतिमें आता है।
संस्कृत भाषा बड़ी मूल्यवान् है, अलभ्य वस्तु है। दुनियासे इसका दिनपर दिन ह्रास होता जा रहा है। ऐसी शुद्ध, सुन्दर, स्पष्ट भाषा दुनियामें और कोई नहीं है। एक शब्दके इतने रूप बनते हैं, जितने किसी भाषामें नहीं होते। उदाहरण भज् धातु है, इसके इतने रूप हो जायँगे—भज, भजन, भगवान्, भक्ति इत्यादि। इतना विस्तार किसी भाषामें नहीं है। वेद ईश्वररचित भी नहीं कहा जाता। सदासे नित्य सनातन है। संस्कृत विद्या नष्ट हो जायगी तो उसका उत्थान होना कठिन है।
जो धर्म और ईश्वरको छोड़ देता है, उसकी धर्म और ईश्वर रक्षा नहीं करते, क्योंकि उसीने ईश्वर और धर्मको छोड़ा है।