प्रेमके वशमें भगवान्

प्रवचन दिनांक—३-५-१९४१, प्रात:काल, वटवृक्ष, स्वर्गाश्रम

एक तीतर बोला। पहलवानने सुना दण्ड, कुश्ती, कसरत। एक रसोइया था उसने सुना हल्दी, धनिया, अदरक। एक भक्त जा रहा था उसने सुना—सीताराम, दशरथ। इसी प्रकार अपनी-अपनी भावनाके अनुसार लोग समझते हैं।

जाकी रही भावना जैसी।

प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥

यह बात इसपर चली थी कि कोई आपका झुकाव भक्तिकी ओर समझते हैं और कोई ज्ञानकी ओर।

एक बड़ी ही प्रेमकी कथा है। बंगालके प्रचलित लीलाभिनयोंमें प्रवीरकी लीला की जाती है। प्रवीरकी कथा जैमिनीय-अश्वमेधमें भी है, पर वह अन्य रूपमें है। इसका वर्णन अन्य किसी पुराणमें आता हो तो पता नहीं। बहुत-से शास्त्र और इतिहास विधर्मी शासनमें नष्ट हो गये।

धर्मराज युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णके परामर्शसे अश्वमेधयज्ञ करनेका निश्चय किया। अश्व छोड़ा गया। उसकी रक्षाके लिये धनुर्धर अर्जुन नियुक्त हुए। उनके साथ विशाल वाहिनी थी। यात्राके पूर्व भगवान् श्रीकृष्णने भी अर्जुनके साथ चलनेकी इच्छा प्रकट की; किंतु ‘इस छोटे-से कार्यके लिये आपको कष्ट देना अपेक्षित नहीं। भूमण्डलपर विजय प्राप्त करनेके लिये तो मैं और यह सेना ही पर्याप्त है’ कहकर अर्जुन चल पड़े। वह अश्व माहिष्मतीके समीप पहुँचा।

प्रवीरके पिता माहिष्मतीनरेश नीलध्वज अर्जुनका नाम सुनते ही सशंक हो गये। उन्होंने अश्वको न पकड़नेमें ही कुशल समझी, पर इस संवादसे वीरांगना जुन्हादेवी क्षुब्ध हो गयीं एवं अपने प्राण-प्रिय पुत्र भक्त प्रवीरके समीप गयीं और उसे प्रतिष्ठा-रक्षार्थ समरमें डट जानेके लिये प्रोत्साहित करती हुई बोलीं—‘बेटा! मैं तुम्हें अपने प्राणोंसे अधिक प्यार करती हूँ, साथ ही तुमसे देश, जाति और स्वाभिमानकी रक्षाकी आशा भी करती हूँ। अर्जुनकी विशाल वाहिनी अश्वमेधके अश्वके साथ तुम्हारे क्षत्रियत्वको, तुम्हारी वीरताको, तुम्हारी स्वतन्त्रता एवं तुम्हारे देशाभिमानको ललकार रही है। पर मैं चाहती हूँ कि वह यहाँसे विजयोन्मत्त बनकर न जा सके। अश्वमेधके अश्वको पकड़कर अर्जुनको उलटे पाँव लौटनेके लिये विवश कर दो।’

‘माँ! श्रीकृष्ण-सारथि वीरवर अर्जुन!’ प्रवीर चकित होकर बोल भी नहीं पाया कि उसकी स्नेहमयी जननीने दुर्गाकी भाँति हुंकारकर कहा, ‘हाँ, वही अर्जुन! यदि तुझे एक क्षण भी विचार करना है तो स्पष्ट बोल, मैं स्वयं युद्ध करनेके लिये अर्जुनके विशाल सैन्यमें प्रवेश करूँगी। मैं समझूँगी कि मैंने पुत्रको जन्म ही नहीं दिया था।’

‘आज्ञा शिरोधार्य है माता! तुम निश्चिन्त हो अन्त:पुरमें जाओ।’ प्रवीरके इस कथनसे संतुष्ट हो माता भीतर चली गयी और प्रवीरने अर्जुनके पास पत्र भेजा, ‘मैं आपका अश्व रोक रहा हूँ। आप रणांगणमें आ जाइये।’

दूसरे दिन अरुणोदय होते ही समर छिड़ गया। भयंकर युद्ध हुआ। भक्तवर वीर प्रवीरके पैने बाणोंसे अर्जुन आकुल हो उठे। उन्होंने प्रद्युम्नसे कहा, ‘प्रवीरकी सुकुमारताका विचार छोड़कर तुम शरवर्षा करो।’ पर प्रद्युम्नने तुरंत कहा, ‘आपकी भाँति वीर प्रवीर भी मेरे पिताजीके प्रिय भक्त हैं। अत: इनकी भक्तिका ध्यान आनेपर मेरा हाथ शिथिल पड़ जाता है और मैं पूरे वेगसे युद्ध नहीं कर सकता।’ इसके बाद महाबली भीम आगे आये; किंतु भगवच्चरणाश्रित, भगवान‍्के बलसे बलवान् प्रवीरके तीक्ष्ण तीरोंके सामने उनकी एक न चली। अर्जुनने जिन-जिन भयंकर एवं विषैले बाणोंको प्रवीरका मस्तक छिन्न करनेके लिये चलाया, वे सभी व्यर्थ सिद्ध हुए। राजकुमार प्रवीरने अर्जुनसमेत उनके सैन्यको विकल एवं पराजित कर दिया।

अर्जुनके वीरत्वदृप्त मुख-मण्डलपर विषादकी कालिमा छा गयी। उसी समय प्रवीरने आकर कहा—‘वीरवर अर्जुन! अश्वमेधका घोड़ा इसी बलपर छोड़ा था? मैं आपको स्पष्ट बता देता हूँ कि यदि आपको अपने प्राण प्यारे नहीं हों तब तो आप कल पुन: समरभूमिमें आइयेगा; अन्यथा अब सुखपूर्वक लौट जाइये और यहाँ उस दिन उपहार लेकर आइये, जिस दिन इस घोड़ेसे मैं अश्वमेधयज्ञ करूँगा। आप भगवान् श्रीकृष्णकी सहायताके बिना मुझपर विजय कभी भी नहीं पा सकते। मुझे जीतनेकी आकांक्षा मनमें हो तो श्रीकृष्णको बुलाइये, उनके दर्शनकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा।’ प्रवीर कुछ क्षणोंके लिये भगवान‍्के ध्यानमें तन्मय हो गया।

अर्जुनने अब भगवान‍्के सामने अभिमानभरी वाणी कहनेकी अपनी भूलका अनुभव किया। तुरंत व्याकुल होकर भगवान‍्से प्रार्थना की, ‘हे हरि! हे नाथ!! हे गोविन्द!!! हे वासुदेव!! हे नारायण!!! मेरी अनुचित वाणीके लिये क्षमा करें। आप शीघ्र आकर मेरी रक्षा करें।’ अर्जुनकी पुकार सुनते ही भक्तभयभंजन भगवान् तुरंत वहाँ प्रकट हो गये। मानो अबतक यहीं कहीं छिपे थे।

भगवान‍्को देखते ही अर्जुन उनके चरणोंमें गिर पड़े। प्रभुने दृष्टि फेरी तो देखा प्रवीर भी प्रभुके पावन चरणोंमें दण्डकी भाँति लेटकर प्रणिपात कर रहा है। भगवान् अर्जुन और प्रवीर दोनोंसे मिले। प्रवीर गद‍्गद हो रहा था। हर्षातिरेकसे उसने कहा, ‘प्रभो! आपके दर्शन पाकर आज मैं धन्य हो गया।’ उसने फिर अर्जुनसे कहा, ‘पार्थ! मैं आपका भी ऋणी हूँ, आपकी ही कृपासे मुझे आज श्यामसुन्दरकी त्रैलोक्यपावनी मधुर मनोहर झाँकीके दर्शन करनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अब हम अपने शिविरमें चलें। कलसे भगवान‍्के सामने ही युद्ध होगा।’ फिर दोनों अपने-अपने शिविरोंमें चले गये।

प्रवीरको देखते ही देवी जुन्हाने उन्हें छातीसे चिपका लिया और कहा, ‘बेटा! तुम्हारी विजयके लिये मैं भगवती भागीरथीकी आराधना करने जा रही हूँ।’ प्रवीरकी वीरहृदया धर्मप्राणा पत्नी मदनमंजरीने अत्यन्त आनन्द प्रदर्शित करते हुए कहा, ‘भगवान् श्रीकृष्णको अपनी भक्तिसे प्रसन्न करके मैं भी आपकी विजयके लिये उनसे प्रार्थना करूँगी।’ प्रवीर भी भगवान‍्के ध्यानमें तल्लीन था।

आधी रात बीत गयी। इधर प्रवीरपत्नी मदनमंजरी अर्जुनके सुषुप्त सैन्यमें प्रवेश करने गयी। उसके हाथमें लंबी नंगी तलवार थी। प्रहरीके स्थानपर भगवान् शंकर त्रिशूल लिये खड़े थे। उन्होंने मदनमंजरीका परिचय और अर्द्धरात्रिमें नंगी तलवार लेकर शिविरमें आनेका कारण पूछा।

मदनमंजरीने निस्संकोच सत्य कह दिया, ‘मैं प्रवीरपत्नी हूँ। अपने पतिके प्राणोंकी रक्षाके लिये भगवान् श्रीकृष्णके पास जाना चाहती हूँ।’

भगवान् शंकर बोल उठे, ‘यह सम्भव नहीं। भगवान् सो रहे हैं। तुम वापस लौट जाओ।’

‘यदि ऐसा ही है तो फिर आपके ही चरणोंमें यह मस्तक अभी लोट जायगा’ कहते हुए मदनमंजरीने तलवार ऊपर उठा ली।

भगवान् शंकरने अपना परिचय देते हुए कहा, ‘मैं तुमपर अत्यन्त प्रसन्न हूँ और कैलास जा रहा हूँ। यहाँसे प्रयाण करनेके पश्चात् मेरा कोई दायित्व नहीं है।’

मदनमंजरी श्रीकृष्ण-शिविरके द्वारपर पहुँची तो द्वारपालने डाँटते हुए वहाँ उपस्थित होनेका कारण पूछा। मदनमंजरीने विनम्रतासे द्वारपालको भी उत्तर दिया—‘अपने प्राणधनके प्राणोंकी भीख माँगने महाराज नीलध्वजकी पुत्र-वधू भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंके समीप जाना चाहती है।’

द्वारपालने कहा, ‘यहाँसे लौट जाओ। प्रभु इस समय शयन कर रहे हैं।’

मदनमंजरीने तलवार तान ली और कहा, ‘यदि आप भगवान‍्के समीप नहीं जाने देते तो मैं अभी अपना मस्तक काटकर आपके चरणोंमें समर्पित करती हूँ।’

द्वारपालने मदनमंजरीका हाथ पकड़ लिया, पर उसने देखा—ये तो वे ही त्रैलोक्यनाथ मदनमोहन श्यामसुन्दर भगवान् श्रीकृष्ण हैं, जिनके लिये वह प्राणोंपर खेलकर आयी थी। वह प्रभुके चरणोंपर लोट गयी। कुछ देर बाद उसने कहा, ‘प्रभो! आप तो अन्तर्यामी हैं। पर कहे बिना मुझसे रहा नहीं जाता। प्रात:काल ही धनुर्धर अर्जुनसे मेरे पतिदेवका युद्ध होगा। धनुर्धर अर्जुनको आपकी सहायता प्राप्त है और आपकी सहायता पाकर वे जो चाहें कर सकते हैं। इस कारण मैं आपसे अपने जीवन-धनके प्राणकी भीख माँगती हूँ।’

अपनी कौमोदकी गदा और सहस्रार सुदर्शन चक्र उसके हाथमें देते हुए भक्तवत्सल करुणामय भगवान‍्ने कह दिया ‘इसे जबतक प्रवीर अपने पास रखेगा, युद्धमें उसे कोई नहीं मार सकेगा।’ मदनमंजरीने भगवान‍्के चरणोंमें प्रणाम किया और द्रुतगतिसे लौटकर दोनों आयुध अपने पतिको दे दिये। भगवान‍्की बात भी बता दी।

उधर धर्मपरायणा जुन्हादेवीने श्रीगंगाजीको सन्तुष्ट कर लिया और श्रीशिवजीसे प्रार्थना करनेके लिये कहा कि वे अपने त्रिशूलके साथ प्रवीरकी ओरसे युद्ध करें। श्रीगंगाजीकी प्रार्थना सुनते ही आशुतोषने कहा, ‘अर्जुनके साथ श्रीकृष्ण हैं और उनके सामने समरभूमिमें उतरना मेरे लिये सम्भव नहीं।’

प्रात:काल होते ही अर्जुन अपने सखा श्रीकृष्णके पास पहुँचे तो देखा कि वे उदास और चिन्तित मुद्रामें अवनतमुख बैठे हैं। अर्जुनको देखते ही उन्होंने कहा, ‘बन्धुवर! प्रवीर-पत्नीकी भक्तिसे सन्तुष्ट होकर अपने दोनों आयुध मैंने उसे समर्पित कर दिये और जबतक वे आयुध उसके पास हैं, तुम उसका कोई अनिष्ट नहीं कर सकते। मेरी उपस्थितिसे प्रत्येक समय तुम्हारे शुभमें विघ्न ही उपस्थित हो जाता है।’

भगवान‍्की वाणी सुनते ही भीम क्रुद्ध हो गये। उन्होंने कहा, ‘आपको सोच-विचारकर वरदान देना था। आप हमारी रक्षा करनेके लिये आये हैं कि और भी विपत्ति लादनेके लिये यहाँ पहुँचे हैं।’ पर भीमको बड़ी विनयसे चुप कराते हुए अर्जुनने सरल विश्वासपूर्वक भगवान‍्से विनम्र शब्दोंमें कहा, ‘यह क्या कहते हैं प्रभो! आपकी प्रत्येक क्रियामें मंगल छिपा है, इसपर मेरा दृढ़ विश्वास है। इस आयुध-दानमें भी मेरा कोई हित ही है। मैं पूर्ण निश्चिन्त हूँ। आप मेरे सर्वस्व हैं। आपहीने इस यज्ञके अनुष्ठानकी प्रेरणा एवं इसकी निर्विघ्न समाप्तिका वचन दिया है। आप जैसा उचित समझें, वैसा करें।’

भगवान् श्रीकृष्ण चुप थे। उन्हें अपने ऊपर निर्भर अर्जुनकी चिन्ता थी। वे बोल नहीं पा रहे थे। अर्जुनने पुन: कहा, ‘प्रभो! प्रात: हो चला। युद्धका समय आया ही चाहता है। अब आपकी क्या आज्ञा है?’

भगवान‍्ने कहा, ‘आओ, शंकरजीके पास चलें। वे कोई युक्ति सोचकर बता सकते हैं। वे दोनों भगवान् शंकरजीके समीप गये। वहाँ श्रीकृष्णने कहा, ‘भगवन्! प्रवीर-पत्नीकी भक्तिपर मुग्ध होकर मैंने अपनी कौमोदकी गदा तथा सुदर्शन चक्र भी उसके पतिके लिये दे दिया। वे जबतक प्रवीरके पास रहेंगे, युद्धमें उसे कोई नहीं मार सकेगा। अब अर्जुन कैसे विजयी हों, इसीका उपाय जाननेके लिये हम दोनों आपकी सेवामें आये हैं।’

श्रीशंकरजी बोले—‘सर्वज्ञ होकर भी आपने उसे वरदान कैसे दे दिया?’ श्रीकृष्णने उत्तर दिया—‘जिस प्रकार उसकी भक्तिपर मुग्ध होकर आप रात्रिमें ही सैन्यके द्वारको त्यागकर कैलास चले आये, उसी प्रकार भक्तिविवश होकर मुझे भी वरदान देना पड़ा।’

भगवान् शंकरने धीरे-धीरे कहा, ‘मैं भी बड़े असमंजसमें पड़ गया हूँ। उधर प्रवीरकी माता जुन्हाकी आराधनासे सन्तुष्ट होकर श्रीगंगाजी प्रवीरके पक्षमें त्रिशूल लेकर अर्जुनसे युद्ध करनेके लिये आग्रह कर रही हैं, इधर आपका अनुरोध है। ऐसी दशामें मैंने निश्चय कर लिया है कि मैं किसी भी पक्षकी ओरसे युद्धभूमिमें नहीं उतरूँगा।’

निराशाभरे स्वरोंमें भगवान‍्ने अर्जुनसे कहा, ‘भाई अर्जुन! मेरी पहुँच तो यहींतक थी और इन्होंने स्पष्ट उत्तर दे दिया। अब क्या किया जाय?’ अर्जुनने उत्तर दिया, ‘महाराज! मैं कुछ नहीं जानता। मैं केवल इतना ही जानता हूँ कि आप जो कुछ करेंगे, उसमें अवश्य हित होगा। हाँ, युद्धका समय समीप आ रहा है।’

भगवान‍्ने एक क्षण सोचा और फिर वे अर्जुनके साथ भगवती उमाके पास गये। वहाँ उन्होंने सारा वृत्तान्त बताते हुए कहा ‘यदि आप समरभूमिमें मोहिनीरूपमें आकर उससे आयुध ले लें तो हम दोनों निश्चिन्त हो जायँ।’ भगवती उमाने ‘तथास्तु’ कह दिया। श्रीकृष्ण यही चाहते थे। अर्जुनके साथ लौट पड़े।

अर्जुन युद्धभूमिमें पहुँचे तो उन्होंने देखा, प्रवीर अपनी विशाल वाहिनीके साथ युद्धकी प्रतीक्षा कर रहा है। युद्ध प्रारम्भ होना ही चाहता था कि प्रवीरने अपनी आँखोंके सामने आकाशमें एक नवयौवनसम्पन्ना अपूर्व लावण्यवती सुन्दरीको देखा। विश्वमें ऐसी सुन्दरता होती है, इसकी उसे कल्पना भी नहीं थी। भगवान‍्की अघटन-घटना-पटीयसी मायाने जितेन्द्रिय भक्त प्रवीरकी मतिमें मोह उत्पन्न कर दिया और वह विषयी कामासक्त मनुष्यकी भाँति उस देवीसे प्रणय-याचना करने लगा। मायाकी ऐसी ही महिमा है।

परम सुन्दरी देवीने कहा, ‘युद्धभूमिमें प्रेमकी बात प्रलाप-सी लगती है। यदि तुम सचमुच प्रेमदान चाहते हो तो अपने आयुध फेंक दो।’ मायामोहित प्रवीर इस समय मूढ़ बन गया था। उसने श्रीकृष्णप्रदत्त दोनों आयुध फेंक दिये। भगवती उन्हें उठाकर तुरंत अन्तर्धान हो गयीं। मायाका पर्दा हटा। प्रवीरकी आँखें खुलीं तो उसने मन-ही-मन पश्चात्ताप करते हुए कहा कि ‘मैंने क्या अनर्थ कर डाला।’

अन्तमें उसने सोचा, कदाचित् यह कार्य भगवान‍्ने ही किया है। प्रेमपूर्वक रोष प्रकट करते हुए उसने भगवान‍्से कहा, ‘प्रभो! वे अस्त्र यदि माया करके ले ही लेने थे तो आपने देनेका नाटक क्यों किया?’ भगवान‍्ने उत्तरमें कहा, ‘प्रियवर प्रवीर! मैंने अस्त्र नहीं लिये हैं। यदि मुझे ही उन्हें लेना होता तो मैं देता ही क्यों?’ प्रवीर तुरंत बोल उठा, ‘प्रभो! यदि ऐसी बात है तो आपके लिये अर्जुनकी सहायता करना उचित नहीं। मैं भी आपको अपने प्राणोंसे अधिक मानता हूँ। आपके चरणोंमें मेरी अनुरक्ति कम नहीं है।’

प्रवीरकी बात सुनते ही अर्जुनने कहा, ‘प्रभो! मैंने आपको युद्धमें सहायता देनेके लिये बुलाया है। प्रवीरमें शक्ति न हो तो अश्व छोड़ दे।’ प्रवीरने रोषपूर्वक उत्तर दिया, ‘अश्व मैंने छोड़नेके लिये नहीं पकड़ा है।’ दोनों ओरसे घनघोर शरवर्षा होने लगी। आकाश तीखे बाणोंसे आच्छादित हो गया, पर अर्जुनकी एक न चली, वे पराजित होने लगे।

भगवान‍्ने कहा, ‘अर्जुन! प्रवीरके प्रभावको देख लो। मेरे सहायता करनेपर भी वह तुम्हें पराजित कर रहा है।’

अर्जुन जो भी अस्त्र क्रुद्ध होकर चलाते, प्रवीर उसे ही नष्ट कर देता, पर अन्तत: उस दिन अर्जुनने प्रवीरको पराजित कर दिया।

भक्त प्रवीरने प्रभुसे कहा, ‘स्वामिन्! आप तो सबके हैं, फिर युद्धभूमिमें यह पक्षपात कैसा?’ इसी क्षण उसने प्रभुकी विश्वमोहिनी मुसकान देखी। फिर क्या था। उन्हें सन्तुष्ट देखकर प्रवीरने अर्जुनके रथसे खींचकर उनको अपने रथपर बैठा लिया। भगवान‍्ने लगाम ले ली। अत्यन्त गर्वके साथ प्रवीरने कहा, ‘अर्जुन! अब जी भर युद्ध कर लें। अब आपको या तो प्राण लेकर भागना पड़ेगा या सदाके लिये यहीं रणभूमिमें शयन करना होगा।’

प्रवीरको कोई भी उत्तर न देकर अर्जुनने भगवान‍्से कहा, ‘भगवन्! मैं आपके बिना नहीं जी सकता। आप मेरे रथपर आ जाइये। आपको मैंने बुलाया है।’ इसपर भगवान‍्ने अर्जुनके रथपर आकर घोड़ोंकी लगाम सँभाल ली।

उदास होकर प्रवीरने कहा, ‘प्रभो! कम-से-कम एक युद्धमें तो आप मेरे सारथि बन जाते!’ फिर उसने अर्जुनसे कहा, ‘आज मैं आपका पौरुष देखूँगा।’

कई दिव्यास्त्रोंके प्रयोगसे प्रवीर परास्त हुआ, पर उसने अर्जुनको फटकारते हुए कहा, ‘दूसरोंके बलपर युद्ध करनेवाले शूर नहीं कहे जाते। भगवान‍्के बिना आप मुझे परास्त कर सकें, ऐसी सामर्थ्यका आपमें लेश भी नहीं है।’

फिर उसने भगवान‍्से कहा, ‘प्रभो! आप हम दोनोंके हैं। आप अब अर्जुनका रथ हाँकना छोड़कर निष्पक्षभावसे हमदोनोंका युद्ध-कौशल देखें, फिर आप समझ लेंगे कि वस्तुत: वीर योद्धा कौन है और आज अर्जुन भी समरका स्वाद चख सकेंगे।’

भगवान् हँसने लगे। भक्तवर प्रवीरने भगवान‍्को सन्तुष्ट जानकर पुन: उनको अर्जुनके रथसे खींच लिया और पासहीके तालवृक्षसे बाँध दिया। फिर उसने अर्जुनसे कहा, ‘अर्जुन! अब आप अपनी वीरताका परिचय दीजिये। अब मैं आपको युद्ध करनेका फल चखाता हूँ।’ पर अर्जुनने करुण नेत्रोंसे भगवान‍्की ओर देखकर कहा, ‘प्रभो! क्या मैंने आपको इसीलिये बुलाया था? कौरवोंकी सभामें जब महाबलशाली योद्धा भी आपको नहीं बाँध सके, तब यहाँ आप कैसे बँध गये हैं? मैं व्याकुल हो रहा हूँ। देव! आप शीघ्र आइये, मेरे रथकी बागडोर सँभालिये।’ जिनके एक नामसे सारे बन्धन कट जाते हैं, वे ही अचिन्त्यशक्ति भगवान् आज अपने प्रेमी भक्तकी प्रेमरज्जुसे बँधे हैं! पर दूसरी ओर भी वैसा ही भक्त है। उसकी दीन वाणी भी भगवान‍्को खींच रही है। भगवान् अर्जुनकी दीन वाणी सुनते ही रस्सी तुड़ाकर उसके रथपर आकर बैठ गये और रथ हाँकने लगे। भगवान‍्की आज विचित्र दशा है। वे प्रेमी भक्तोंकी खींचातानीमें प्रेममय होकर आश्चर्यमयी क्रीड़ा कर रहे हैं!

प्रवीरसे रहा नहीं गया। उसने पुन: भगवान‍्से कहा, ‘प्रभो! बड़ा आश्चर्य है, कुछ क्षण भी तटस्थ होकर आप दो भक्तोंका युद्ध और वीरत्व तो देखते, पर आपकी जैसी इच्छा!’ उसने पुन: अर्जुनको सम्बोधित कर कहा, ‘वीरता नामकी कोई वस्तु आपमें नहीं है। दूसरोंके सहारे वीरोंको पराजित करनेका प्रयत्न तो समरभूमिमें बड़ा ही अशोभन है।’ उसने रोषमें आकर इतने तीक्ष्ण शरों एवं दिव्यायुधोंकी वर्षा की कि अर्जुन विकल हो उठे और उनकी सारी सेना क्षत-विक्षत होकर छिन्न-भिन्न हो गयी। यहाँ भी भगवान‍्की ही लीला कार्य कर रही थी।

इसपर आश्चर्य प्रकट करते हुए भगवान् श्रीकृष्णने कहा, ‘जब एक प्रवीरके सम्मुख ही तुम्हारी यह दशा है, तब तुम अन्य योद्धाओंके सामने क्या कर सकोगे?’ दोनों पक्ष अपनी विजयके लिये शक्ति-प्रयोग कर रहे थे। इस प्रकार होते-होते अन्तमें आज प्रवीर हार गया और अर्जुनकी विजय हुई।

किंतु वीर प्रवीरको तनिक भी चिन्ता नहीं थी। उसने पुन: अर्जुनको डाँटा, ‘अर्जुन! आप सच्चे वीरत्वको स्वीकार कीजिये। यदि श्रीकृष्णके बिना आप युद्ध करें तो आपको प्राण-रक्षामें भी कठिनता हो जाय।’ फिर उसने भगवान‍्से कहा, ‘स्वामिन्! मैं भी आपका भक्त हूँ, पर आप अबतक अर्जुनमें और मुझमें अन्तर समझते हैं? ऐसा क्यों करते हैं नाथ! मुझे आपसे बड़ी आशा है।’

भगवान् हँस पड़े। प्रवीरने उन्हें अपने अनुकूल समझकर तुरंत खींच लिया और पासहीके तालवृक्षसे पुन: कसकर बाँधते हुए कहा, ‘प्रभो! अबकी बार प्रतिज्ञा कीजिये कि किसीका पक्ष न लेकर निष्पक्षभावसे युद्ध देखूँगा।’ प्रभुने हँसते हुए मौन स्वीकृति दे दी।

फिर क्या था, प्रवीर झटसे कूदकर अपने रथपर जा चढ़ा और शर-सन्धान करते हुए बोला, ‘पार्थ! अब आप प्राण बचाकर भागने या यहीं सदाके लिये सो जानेको प्रस्तुत हो जाइये। प्रभु प्रतिज्ञाबद्ध हो चुके हैं।’ प्रभु बँधे हुए हँस रहे थे। मानो आज उन्हें अपनी इस विवशतामें ही आनन्द मिल रहा है।

पर अर्जुन प्रभुकी ओर देख रहे थे। उन्होंने कहा, ‘देव! यह क्या लीला कर रहे हैं। मेरे प्राणोंपर आ बनी है। अब मैं अधीर हो गया हूँ। कौरव-युद्धके समय आपने मेरी रक्षाके लिये शस्त्र ग्रहण न करनेकी ही प्रतिज्ञा की थी, पर भक्तके लिये उसे तोड़ दिया। वही आपका प्राणप्रिय अर्जुन मरना चाहता है, इसलिये आज फिर प्रतिज्ञा तोड़िये और शीघ्र आकर मेरी रक्षा कीजिये।’ भगवान् तुरंत अर्जुनके रथपर प्रकट हो गये। वे वैसे ही हँस रहे थे।

प्रवीरने व्याकुल होकर कहा, ‘प्रभो! यह आपने क्या किया; आपने अपनी प्रतिज्ञा भी तोड़ दी!’ भगवान‍्ने तुरंत कहा, ‘मैंने तो कोई प्रतिज्ञा नहीं की थी।’

भक्त प्रवीरने प्रणय-रोषसे कहा, ‘प्रभो! आप असत्य बोलेंगे तो संसारकी क्या दशा होगी? आपने प्रतिज्ञा की थी कि मैं चुपचाप युद्ध देखूँगा। पर आप पुन: अर्जुनके रथपर आकर बैठ गये।’

भगवान‍्ने कहा, ‘जिसने प्रतिज्ञा की थी उससे कहो भैया!’ प्रवीरने तालवृक्षकी ओर देखा तो भगवान् वहीं बँधे खड़े थे। उसने एक बार तालवृक्ष और एक बार अर्जुनके रथकी ओर देखा। अब एक ही भगवान‍्के दो रूप हो गये थे। प्रवीरने अर्जुनसे कहा, ‘अर्जुन! आप महान् धन्य हैं और आपके माता-पिता सभी धन्य हैं, जिनके लिये भगवान‍्को दो रूप धारण करने पड़े।’

फिर प्रवीर तालवृक्षसे बँधे हुए भगवान‍्को देखने लगा। उसके हृदयमें छिपा हुआ प्रेमसमुद्र प्रकट होकर उमड़ चला। वह अपने-आपको भूल गया। भगवान‍्की नित्य नवनवायमान सुर-मुनि-मनमोहिनी रूपमाधुरीने प्रवीरपर ऐसा विलक्षण जादू किया कि प्रवीरका बाह्य ज्ञान सर्वथा लुप्त हो गया। वह उस अलौकिक रूप-सुधा-सागरमें डूब गया।

इसी समय भगवान‍्ने अर्जुनसे कहा, ‘पार्थ! तुम अति शीघ्र प्रवीरका मस्तक उतार लो।’ अर्जुन बोले, ‘प्रभो! प्रवीर युद्ध छोड़कर आपके ध्यानमें तल्लीन है, ऐसी अवस्थामें इसे मारना धर्मविरुद्ध है।’

भगवान् तुरंत बोल उठे, ‘अर्जुन! मेरे भक्त प्रवीरको युद्धमें सम्मुख मार सकनेकी सामर्थ्य किसमें है। यह मेरी इच्छा है कि मेरा भक्त मेरे ध्यानमें निमग्न रहता हुआ ही मेरे परमधाममें पहुँच जाय। मेरी आज्ञा है, तुम इसे मार डालो। तुम्हें पाप नहीं लगेगा।’

अर्जुनने एक अत्यन्त तीक्ष्ण अर्द्धचन्द्राकार दिव्य शर छोड़ा, जिससे प्रवीरका मस्तक कटकर उछला और भगवान‍्के चरणोंमें जा गिरा। उसमेंसे एक परम ज्योति निकली और वह भगवान‍्के मंगलमय श्रीविग्रहमें समा गयी। प्रवीरका प्राणान्त होते ही उसकी बची-खुची सेना भाग गयी। माहिष्मतीमें शोक छा गया!

प्रवीरकी मृत्युका समाचार सुनकर उसके पिता विलाप करने लगे और पुत्र-शोकमें रोती हुई परंतु पुत्रकी वीर तथा भक्त-गतिसे गर्विता उसकी माताने कहा, ‘बेटा! तुम अर्जुनके बाणसे कटकर प्रभुके धाममें गये और मैं वीर क्षत्रियकुमारकी माता सिद्ध हुई। मेरा जन्म सफल हुआ।’

इसी बीचमें भगवान् वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने विलाप करती हुई जुन्हादेवीसे कहा, ‘आप चिन्ता न करें। यदि कहें तो प्रवीरको पुन: जीवित कर दूँ।’ जुन्हादेवीने कहा, ‘प्रभो! आपके सम्मुख मृत्यु पाकर पुन: कौन जीवित होना चाहेगा, पर मैं चाहती हूँ कि हम दम्पतीको भी वही गति प्राप्त हो, जो आपने पुत्रको दी है।’

भगवान‍्ने ‘तथास्तु’ कहा, और प्रभु अन्तर्धान हो गये।

पतिव्रता मदनमंजरी भी पतिके साथ सती होकर भगवान‍्के परमधाममें पहुँच गयी!

प्रवीरकी रस्सियोंसे बँधना, अर्जुनके लिये प्रतिज्ञा तोड़कर जाना यह प्रेमका परम दिग्दर्शन है।